Men's Corner

महिला सशक्तिकरण के नाम पर बौद्धिक, सांस्कृतिक एवं नैतिक पतन

आजकल एक फोटो सोशल मीडिया पर बहुत देखी जा रही है जिसमे एक बंगाली दुल्हन सिगरेट पीती दिख रही है। महिलाएँ इसको बड़ी बोल्ड तस्वीर की तरह ले रही हैं उनको इसमें फिर इसमें सशक्तिकरण दिखाई देने लगा है। मुझे फिर से इसमें कुछ बोल्ड नहीं लगा, मैंने अपने गांव में बीड़ी, पान मसाला, गांजा पीती हुई औरतें और आदमी दोनों देखे हैं। क्या बोल्ड होता है इसमें और कैसे किसी भी प्रकार का नशा सशक्तिकरण का प्रतीक बन जाता है ? फ़ेमिनिस्टों का मानना है कि स्त्री को नशा करते देख लोगों को अजीब लगता है और स्त्री ही सारी नैतिकता का ठेका क्यों ले ? मगर यह स्त्री के विरुद्ध है या पुरुष के,ज़रा ध्यान से सोचिए।

जब आप स्त्री को नशा करना अजीब मानते हो और पुरुष को सामान्य तो पुरुष के लिए नशा सामान्य हो जाता है। और तब पुरुष पर कुछ भी बीते लोगों को सामान्य लगता है।आदमी है पीकर पड़ा होगा कहीं इसलिए मरने दो, औरत पीकर ना पड़ी रहे इसका ध्यान रखा जाए , यह विचार पुरुष विरोधी है । फ़ेमिनिस्टों से मेरा प्रश्न है यदि आप स्त्री पर नैतिकता का ठीकरा नहीं फोड़ना चाहते तो फिर स्त्री के लिए अलग स्टेटस की मांग क्यों करती हैं ? वो स्त्री है सबल है ऐसा मैं भी मानती हूँ तो उसको रक्षा की आवश्यकता ही क्या ?नशा करती हुई स्त्री अजीब है क्योंकि उसने अपने खुद के लिए एक सहमी सकुचाई वाली छवि बनाई है। सच पूछा जाए तो स्त्री ने स्वयं के लिए कई छवियां गढ़ ली है और इन छवियों में से एक भी खुलती है तो उसको और समाज दोनों को कष्ट होता है। मैंने दादी नानी को तम्बाकू वाला पान खाते देखा है पर कभी नहीं लगा कि इसकी वजह से वो सशक्त या अशक्त हैं। हुक्का पीती,बीड़ी फूंकती यहाँ तक की शराब पीती महिलाएं सुदूर देहात में भी मिल जाएँगी। मगर इनको सशक्तिकरण का प्रतीक माना नहीं जाता।

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अब दुल्हन को सिगरेट पीता दिखाने के पीछे की मानसिकता समझिये, यह सनातन रीति -रिवाज़ों का मज़ाक बनाने की एक और कोशिश है। एक और तस्वीर सामने आयी है जिसमे दुल्हन को नग्न दिखाया है और वह सिन्दूर, टोपोर और गाछकोटा पकडे हुए है। इतना ही नहीं वो बंगाली दुल्हन की तरह पान का पत्ता भी पकडे हैं मगर उसने कपडे नहीं पहने । फोटोग्राफर और मॉडल दोनों ने जान बूझकर ऐसी तस्वीर उतारी जिससे हिन्दू भावनाओं को ठेस लगे। ऐसा एक ट्रेंड सा चल पड़ा है कि इस तरह की ऊलजलूल हरकत करो और फिर उसको महिला सशक्तिकरण से जोड़ कर प्रसिद्धि पा लो। कुछ मूर्ख कूल टाइप की महिलाएं इस पर विश्वास भी कर लेंगी और महिला उत्थान का परचम लहराती मिलेंगी।

दरअसल यह महिलाएं फेमिनिज्म के नाम पर बौरा गयी हैं इनको हर बात, हर रस्म,हर रिवाज़ में दमन दिखने लगा है। अपने अंदर की कुंठा को वो कभी दुल्हन के मेकअप में निक्कर पहन कर दिखाती हैं ,कभी जयमाल में नाचते हुए आती हैं। फेमिनिज्म एक ड्रग की तरह है, जहाँ इस तरह का ओछापन आपको एक हाई देता है, आपको लगता है आप ना जाने क्या हो गयी हैं। आप ध्यान देंगे तो पाएंगे यह उस तबके की महिलाएं हैं जो पढ़ी -लिखी है और कभी कोई उत्त्पीडन हुआ होगा ऐसा लगता नहीं है। मीडिया इनको बोल्ड महिला की तरह प्रस्तुत करता है और आम छोटी समझ वाली लड़की इनके बहकावे में आ जाती है। जो संस्कार और लिहाज़ कभी गुण होते थे वो अब संकीर्ण सोच माने जाते हैं। सुदूर देहात में खेत में काम करती हुई महिला को सशक्त लगने के लिए यह सब ड्रामा करने की ज़रुरत नहीं। वो हाड़ तोड़कर पति के साथ काम करती है और रीति – रिवाज़ों का पालन भी करती है। जब मन करता है बीड़ी भी फूंक लेती है। शादी ब्याह में गाली गाने वाली या नकटौरा करने वाली महिला सशक्तिकरण का प्रतीक नहीं बनती। उस काल्पनिक आज़ादी का प्रतीक बनती हैं यह भोंडी महिलाएं जिनको बस हिन्दू परम्पराओं पर कुठाराघात करना है।

इस तरह की नौटंकी करती महिलायें केवल छिछोरपन का प्रतीक हैं और पुरुष से बराबरी की होड़ में सोचने समझने की क्षमता खो बैठी हैं। सबसे बड़ी गलती उनकी है जो महिला होकर ऐसा कर रही है बोलकर इन महिलाओं पर ज़रुरत से ज़्यादा ध्यान दे रहे हैं। इनको इनके हाल पर छोड़ दीजिये इनको उत्तर प्रकृति अपने तरीके से देगी। मगर हाँ हिन्दू रीतियों का मज़ाक उड़ने वाली इन महिलाओं को सज़ा मिलनी चाहिए मगर वो सज़ा देने की हिम्मत हिन्दू समाज जुटा नहीं पाया है।

 

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