History

आजाद हिन्द फौज के संस्थापक, वायसराय हार्डिंग पर बम फेंकने वाले रासबिहारी बोस

rasbihari-bose

देश की आजादी के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर देने वाले क्रांतिकारियों का जब जब जिक्र होगा, 1911 से 1945 तक अनवरत अपने आपको भारत की आज़ादी की लड़ाई के लिए तिल तिल गलाने वाले महान क्रांतिकारी रासबिहारी बोस का नाम हमेशा आदर के साथ लिया जाता रहेगा, जिनका 25 मई को जन्मदिवस है। रासबिहारी ब्रिटिश राज के विरुद्ध गदर षडयंत्र एवं आजाद हिन्द फौज के प्रमुख संगठनकर्ता थे। इन्होंने न केवल भारत में कई क्रान्तिकारी गतिविधियों का संचालन करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, बल्कि विदेश में रहकर भी वह भारत को स्वतंत्रता दिलाने के प्रयास में आजीवन लगे रहे। दिल्ली में वायसराय लार्ड चार्ल्स हार्डिंग पर बम फेंकने की योजना बनाने, गदर की साजिश रचने और बाद में जापान जाकर इंडियन इंडिपेंडेस लीग और आजाद हिंद फौज की स्थापना करने में रासबिहारी बोस की महत्वपूर्ण भूमिका रही।

रासबिहारी बोस का जन्म 25 मई 1886 को बंगाल में बर्धमान के सुबालदह गांव में विनोदबिहारी बोस के यहाँ हुआ था। विनोदबिहारी जी नौकरी के सिलसिले में चन्दननगर रहने लगे थे और यहीं से रासबिहारी जी की प्रारम्भिक शिक्षा पूरी हुयी। वे बचपन से ही देश की स्वतन्त्रता के स्वप्न देखा करते थे और क्रान्तिकारी गतिविधियों में उनकी गहरी दिलचस्पी थी। 1908 में अलीपुर बम मामले में अपना नाम आने की ख़बरों के बाद इससे बचने के लिए बंगाल छोड़ने के बाद प्रारंभ में रासबिहारी बोस ने शिमला पहुँच कर एक छापेखाने में नौकरी की। उसके बाद देहरादून के वन अनुसंधान संस्थान में कुछ समय तक रसायन विभाग के संशोधन सहायक के पद पर कार्य किया।

वास्तविकता ये है कि फ्रेंच आधिपत्य वाले चन्दन नगर में रहकर बम बनाने का प्रशिक्षण प्राप्त कर चुके रास बिहारी बोस इस शोध संस्थान में नौकरी बम निर्माण के लिए आवश्यक रासायनिक पदार्थ को प्राप्त करने के लिए कर रहे थे। उसी दौरान उनका क्रांतिकारी जतिन मुखर्जी के अगुवाई वाले युगातंर के अमरेन्द्र चटर्जी से परिचय हुआ और वह बंगाल के क्रांतिकारियों के साथ जुड़ गए। बाद में वह अरबिंदो घोष के राजनीतिक शिष्य रहे जतीन्द्रनाथ बनर्जी उर्फ निरालम्ब स्वामी के सम्पर्क में आने पर संयुक्त प्रान्त (वर्तमान उत्तर प्रदेश), और पंजाब के प्रमुख आर्य समाजी क्रान्तिकारियों के निकट आये और इस प्रकार शीघ्र ही वे कई राज्यों के क्रातिकारियों के संपर्क में आ गए।

इसी दौरान बंगाल में क्रान्तिकारियों के बढ़ते दबाव के कारण अंग्रेजों ने भारत की राजधानी कलकत्ता से दिल्ली में स्थानांतरित कर दी। रास बिहारी बोस ने अंग्रेजों के मन में भय उत्पन्न करने के लिए तत्कालीन वायसराय हार्डिंग पर फेंकने की योजना चन्दन नगर में आकर बनाई। योजना को क्रियान्वित करने के लिए 21 सितम्बर 1912 को अमरेन्द्र चटर्जी के एक शिष्य बसंत कुमार विश्वास दिल्ली के क्रांतिकारी अमीरचन्द के घर आ गये। दूसरे दिन 22 सितम्बर को रास बिहारी बोस भी दिल्ली आ गये। 23 दिसंबर को शाही शोभायात्रा निकाली गयी जिसमें हाथी पर वायसराय हार्डिंग्स सपत्नीक सवार था। साथ ही अंगरक्षक मैक्सवेल महावत के पीछे और हौदे के बाहर छत्रधारी महावीर सिंह था।

लोग सड़क किनारे खड़े होकर,घरों की छतों-खिड़कियों से इस विशाल शोभा यात्रा को देख रहे थे। शोभा यात्रा चांदनी चौक के बीच स्थित पंजाब नेशनल बैंक के सामने पहुंची ही थी कि एकाएक भंयकर धमाका हुआ। बसन्त कुमार विश्वास ने उन पर बम फेंका लेकिन निशाना चूक गया। इस बम विस्फोट में वायसराय को हल्की चोटें आई पर छत्रधारी महावीर सिंह मारा गया। वायसराय को मारने में असफल रहने के बावजूद रास बिहारी बोस अंग्रेज सरकार के मन में भय उत्पन्न करने में कामयाब हो गये।

बम विस्फोट के अपराधियों को पकड़वाने वालों को एक लाख रूपये पुरस्कार की घोषणा सरकार की तरफ से की गई। इसके बाद ब्रिटिश पुलिस रासबिहारी बोस के पीछे लग गयी पर वह बचने के लिये रातों-रात रेलगाडी से देहरादून खिसक लिये और आफिस में इस तरह काम करने लगे मानो कुछ हुआ ही नहीं हो। अगले दिन उन्होंने देहरादून के नागरिकों की एक सभा बुलायी, जिसमें उन्होंने वायसराय पर हुए हमले की निन्दा भी की। इस प्रकार उन पर इस षडयन्त्र और काण्ड का प्रमुख सरगना होने का किंचितमात्र भी सन्देह किसी को न हुआ। हालाँकि इस बम कांड में शामिल अन्य सभी क्रांतिकारी पकड़ लिए गए जिनमें मास्टर अमीर चंद्र, भाई बाल मुकुंद और अवध बिहारी को 8 मई 1915 को फांसी पर लटका दिया गया, जबकि वसंत कुमार विश्वास को अगले दिन 9 मई को फांसी दी गई।

rasbihari bose

चित्र में क्रान्तिधर्मा रासबिहारी बोस अपनी जीवन सहचरी तोशिके के साथ हैं।

1913 में बंगाल में बाढ़ राहत कार्य के दौरान रासबिहारी बोस जतिन मुखर्जी के सम्पर्क में आए जिन्होंने उनमें नया जोश भरने का काम किया और जिसके बाद वो दोगुने उत्साह पूरी तरह से क्रान्तिकारी गतिविधियों के संचालन में लग गए। भारत को स्वतन्त्र कराने के लिये उन्होंने प्रथम विश्व युद्ध के दौरान अमेरिका में स्थापित गदर पार्टी के नेताओं के साथ मिलकर ग़दर की योजना बनायी। युगान्तर के कई नेताओं ने सोचा कि यूरोप में युद्ध होने के कारण चूँकि अभी अधिकतर सैनिक देश से बाहर गए हुये हैं, अत: शेष बचे सैनिकों को आसानी से हराया जा सकता है। रासबिहारी की सहायता के लिए बनारस में शचीन्द्रनाथ सान्याल थे ही, अमेरिका से गदर पार्टी के विष्णु गणेश पिंगले भी आ गये।

पिंगले को गदर पार्टी ने रास बिहारी बोस की सहायता से पंजाब में क्रान्तिकारियों को संगठित करने के लिए भेजा था। पिंगले से मिलने के बाद बोस के साथी सान्याल पंजाब गये और उनके प्रयासों से 31 दिसम्बर 1914 को अमृतसर की पीरवाली धर्मशाला में क्रान्तिकारियों की गुप्त-बैठक हुई। पिंगले व सान्याल के साथ इस बैठक में करतार सिंह सराभा, पंडित परमानन्द, बलवन्त सिंह, हरनाम सिंह, विधान सिंह, भूला सिंह आदि प्रमुख लोग उपस्थित थे। बाद में प्रयासों को गति देने हेतु रास बिहारी बोस भी जनवरी 1915 में पंजाब आये। करतार सिंह सराभा गज़ब के उत्साही और जोशीले थे जिन्होंने रास बिहारी बोस के साथ मिल कर सम्पूर्ण भारत में पुनः एक बार गदर करने की योजना बनाई। तारीख तय हुई 21 फरवरी 1915।

देश के सभी क्रान्तिकारियो में जोश की लहर दौड़ पड़ी। सर्वत्र संगठन किया जाने लगा लेकिन होनी को कुछ और ही मंजूर था। पंजाब पुलिस का जासूस सैनिक कृपाल सिंह क्रांतिकारियों की पार्टी में शामिल हो चुका था। पैसे के लिए उसने अपना जमीर बेच दिया और समस्त तैयारी की सूचना अंग्रेजों को दे दी। परिणामस्वरूप समस्त भारत में धर पकड़, तलाशियाँ और गिरफतारियां हुईं। इस प्रकार दुर्भाग्य से उनका यह प्रयास भी असफल रहा और कई क्रान्तिकारियों को गिरफ्तार कर लिया गया। ऐसी स्थिति मे गदर की योजना विफल हो जाने के बाद रास बिहारी बोस ने लाहौर छोड़ दिया। पर इतना अवश्य कहा जाएगा कि सन 1857 की सशस्त्र क्रांति के बाद ब्रिटिश शासन को समाप्त करने का इतना व्यापक और विशाल क्रांतिकारी संघटन एवं षड्यंत्र नहीं बना था और ये रासबिहारी जैसे व्यक्ति के ही वश की बात थी।

उनके अनेक सरकार विरोधी कार्यों के बाद ब्रिटिश खुफिया पुलिस ने रासबिहारी बोस को भी पकड़ने की कोशिश की लेकिन वह उनके हत्थे नहीं चढ़े और लाहौर से बनारस और फिर चन्दन नगर आ कर रहने लगे। यहाँ रास बिहारी बोस ने पराधीन देशों का इतिहास पढ़ा तो उन्हें ज्ञात हुआ कि बिना किसी अंतर्राष्टीय मदद के कोई भी पराधीन देश स्वतन्त्रता नहीं प्राप्त कर सका है। ऐसे में वे भी विदेशों से सहायता ले भारत को मुक्त कराने के बारे में सोचने लगे। इसी समय गुरूदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर जापान जाने वाले थे जिसे रास बिहारी ने भारत से बाहर जाने का स्वर्णिम अवसर समझा।

गुरूदेव के पहुँचने के पहले जापान पहुँच कर व्यवस्था देखने का इरादा बता कर, वे जून 1915 में राजा प्रियनाथ टैगोर के नाम से जापान पहुँच गए, जिसके बाद वे वहां के अपने जापानी क्रांतिकारी मित्रों के साथ मिलकर देश की स्वतंत्रता के लिए प्रयास करते रहे। उन्होंने जापान में अंग्रेजी के अध्यापन के साथ लेखक व पत्रकार के रूप में भी काम प्रारम्भ कर दिया और न्यू एशिया नाम से एक समाचार-पत्र भी निकाला। केवल इतना ही नहीं, उन्होंने जापानी भाषा भी सीखी और 16 पुस्तकें लिखीं जिनमें 15 अब भी उपलब्ध हैं।

ब्रिटिश सरकार अब भी उनके पीछे लगी हुई थी और वह जापान सरकार से उनके प्रत्यर्पण की मांग कर रही थी, इसलिए वह लगभग एक साल तक अपनी पहचान और आवास बदलते रहे। जापान सरकार ने इस माँग को मान भी लिया था किंतु जापान की अत्यंत शक्तिशाली राष्ट्रवादी संस्था ब्लेड ड्रैगन के अध्यक्ष श्री टोयामा ने श्री बोस को अपने यहाँ आश्रय दिया। इसके बाद किसी जापानी अधिकारी का साहस न था कि श्री बोस को गिरफ्तार कर सके। 1916 में जापान में ही रासबिहारी बोस ने प्रसिद्ध पैन एशियाई समर्थक सोमा आइजो और सोमा कोत्सुको की पुत्री से विवाह कर लिया और 1923 में वहां के नागरिक बन गए।

जापानी अधिकारियों को भारतीय राष्ट्रवादियों के पक्ष में खड़ा करने और देश की आजादी के आंदोलन को उनका सक्रिय समर्थन दिलाने में भी रासबिहारी बोस की भूमिका अहम रही। साथ ही वे भारतीय क्रांतिकारियों और नेताओं से भी संपर्क बनाए रहे और भारत में हो रही हर गतिविधि पर उनकी पैनी नजर रही। 1938 में नेता जी सुभाष चन्द्र बोस के कांग्रेस अध्यक्ष चुने जाने पर उन्हें लिखा रासबिहारी जी का पत्र इस सम्बन्ध में उल्लेखनीय है, जिसे इस लेख के बड़ा हो जाने के बाद भी मैं यहाँ देने का लोभ संवरण नहीं कर पा रहा हूँ।

मेरे प्रिय सुभाष बाबू,
भारत के समाचार पत्र पाकर मुझे यह सुखद समाचार मिला है कि आगामी कांग्रेस सत्र के लिए आप अध्यक्ष चुने गये है । मैं हार्दिक शुभकामनायें भेजता हूँ । अंग्रेजों के भारत पर कब्जा करने में कुछ हद तक बंगाली भी जिम्मेदार थे । अतः मेरे विचार से बंगालियों का यह मूल कर्तव्य बनता है कि वे भारत को आजादी दिलाने में अधिक बलिदान करें। देश को सही दिशा में ले जाने के लिए आज कांग्रेस को क्रांतिकारी मानसिकता से काम लेना होगा । इस समय यह एक विकासशील संस्था है – इसे विशुद्ध क्रांतिकारी संस्था बनाना होगा । जब पूरा शरीर दूषित हो तो अंगों पर दवाई लगाने से कोई लाभ नहीं होता ।

अहिंसा की अंधी वंदना का विरोध होना चाहिये और मत परिवर्तन होना चाहिये । हमें हिंसा अथवा अहिंसा – हर संभव तरीके से अपना लक्ष्य प्राप्त करना चाहिये । अहिंसक वातावरण भारतीय पुरूषों को स्त्रियोचित बना रहा है । वर्तमान विश्व में कोई भी राष्ट्र यदि विश्व में आत्म सम्मान के साथ जीना चाहता है तो उसे अहिंसावादी दृष्टिकोण नहीं अपनाना चाहिये । हमारी कठिनाई यह है कि हमारे कानों में बहुत लम्बे समय से अन्य बातें भर दी गयी है । वह विचार पूरी तरह निकाल दिया जाना चाहिये ।

शक्ति आज की वास्तविक आवश्यकता है । इस विषय पर आपको अपनी पूरी शक्ति लगानी चाहिये । डॉ. मुंजे ने अपना मिलेटरी स्कूल स्थापित करके कांग्रेस की अपेक्षा अधिक कार्य किया है । भारतीयों को पहले सैनिक बनाया जाना चाहिये । उन्हें अधिकार हो कि वे शस्त्र लेकर चल सकें । अगला महत्वपूर्ण कार्य हिन्दू – भाईचारा है । भारत में पैदा हुआ मुस्लिम भी हिन्दू है, तुर्की, पर्शिया, अफगानिस्तान आदि के मुसलमानों से उनकी इबादत – पद्धति भिन्न है। हिन्दुत्व इतना कैथोलिक तो है कि इस्लाम को हिन्दुत्व में समाहित कर ले – जैसा कि पहले भी हो चुका है । सभी भारतीय हिन्दू है -हालांकि वे विभिन्न धर्मो में विश्वास कर सकते है। जैसे कि जापान के सभी लोग जापानी है, चाहे वे बौद्ध हों, या ईसाई ।

हमें यह मालूम नहीं है कि जीवन कैसे जीया जाये और जीवन का बलिदान कैसे किया जाये । यही मुख्य कठिनाई है । इस संदर्भ में हमें जापानियों का अनुसरण करना चाहिये । वे अपने देश के लिए हजारों की संख्या में मरने को तैयार है । यही जागृति हम में भी आनी चाहिये । हमें यह जान लेना चाहिये कि मृत्यु को कैसे गले लगाया जा सकता है । भारत की स्वतंत्रता की समस्या तो स्वतः हल हो जायेगी ।
आपका शुभाकांक्षी,
रास बिहारी बोस
25-1-38 टोकियो

इस समय तक संसार पर द्वितीय विश्वयुद्ध के बादल मंडराने लगे थे और ऐसे में भारत में वीर सावरकर विभिन्न प्रान्तों और नगरों में जा-जाकर भारतीयों को उनके अस्तित्व के प्रति जागरूक रहने का आह्‌वान करते हुए सैनिकीकरण की बात पर जोर दे रहे थे। इसी दौरान 22 जून 1940 को नेता जी सुभाषचन्द्र उनसे मिलने बम्बई पहुँचे। भेंट के समय नेता जी ने कलकत्ता में हॉलवेल व अन्य अंग्रेजों की मूर्तियॉं तोड़ने की अपनी योजना से उन्हें अवगत कराया। यह सुनकर सावरकर जी बड़े गम्भीर भाव से बोले– “मूर्तिभंजन जैसे अतिसाधारण अपराध के कारण आप सरीखे तेजस्वी और शीर्षस्थ राष्ट्रभक्तों को जेल में पड़े-पड़े सड़ना पड़े, यह मैं ठीक नहीं समझता। सफल कूटनीति की मांग है कि स्वयं को बचाते हुए शत्रु को दबोचे रखना। ब्रिटेन आजकल युद्ध के महासंकट में फॅंसा है, हमें इससे पूरा लाभ उठाना चाहिए। यह देखिये श्री रासबिहारी बोस का गुप्त पत्र, जिसके अनुसार जापान कभी भी युद्ध में शामिल हो सकता है। ऐसे ऐतिहासिक अवसर को हाथ से मत जाने दो। आप भी रासबिहारी बोस आदि क्रान्तिकारियों की तरह अंग्रेजों को चकमा देकर विदेश खिसक जाइये और उचित समय आते ही जर्मन-जापानी सशस्त्र सहयोग प्राप्त कर, देश की पूर्वी सीमा की ओर से ब्रिटिश सत्ता पर आक्रमण करने का मनसूबा बनाइये। ऐसे सशस्त्र प्रयास के बिना देश को कभी स्वाधीन नहीं कराया जा सकता।” यह सब तन्मयता से सुनकर पुनर्मिलन की आशा व्यक्त करते हुए नेताजी ने विदा ली। इसी प्रेरणा के फलस्वरूप वे जर्मनी जाकर सिंगापुर पहुँचे और आज़ाद हिन्द फौज एवं सरकार का गठन किया, यह विश्वविदित है।

उधर रासबिहारी ने 28 मार्च 1942 को टोक्यो में एक सम्मेलन बुलाया जिसमें इंडियन इंडीपेंडेंस लीग की स्थापना का निर्णय किया गया। इस सम्मेलन में उन्होंने भारत की आजादी के लिए एक सेना बनाने का प्रस्ताव भी पेश किया। 22 जून 1942 को रासबिहारी बोस ने बैंकाक में लीग का दूसरा सम्मेलन बुलाया, जिसमें सुभाष चंद्र बोस को लीग में शामिल होने और उसका अध्यक्ष बनने के लिए आमन्त्रित करने का प्रस्ताव पारित किया गया। द्वितीय विश्वयुद्ध में जापान ने मलय और बर्मा के मोर्चे पर कई भारतीय युद्धबन्दियों को पकड़ा था।

इन युद्धबन्दियों को इण्डियन इण्डिपेण्डेंस लीग में शामिल होने और इंडियन नेशनल आर्मी (आई०एन०ए०) का सैनिक बनने के लिये प्रोत्साहित किया गया। इसी के बाद आज़ाद हिंद फ़ौज का गठन रासबिहारी बोस की इंडियन नेशनल लीग की सैन्य शाखा के रूप में सितंबर 1942 को किया गया। रासबिहारी बोस शक्ति और यश के शिखर को छूने ही वाले थे कि जापानी सैन्य कमान ने उन्हें और जनरल मोहन सिंह को आईएनए के नेतृत्व से हटा दिया लेकिन आईएनए का संगठनात्मक ढांचा बना रहा। बाद में इसी ढांचे पर सुभाष चंद्र बोस ने आजाद हिन्द फौज के नाम से आईएनएस का पुनर्गठन किया।

स्थिति हाथ से जाती देख रासबिहारी बोस ने जापान सरकार से अनुरोध किया कि नेताजी को जल्द-से-जल्द जर्मनी से जापान बुलाना होगा क्योंकि आई.एन.ए. को नेतृत्व वही दे सकते हैं, कोई और नहीं। जापानी ग्राउण्ड सेल्फ-डिफेन्स के लेफ्टिनेण्ट जेनरल सीजो आरिसु (Seizo Arisu) ने रासबिहारी बोस से पूछा– क्या आप नेताजी के अधीन रहकर काम करने के लिए तैयार हैं? कारण कि रासबिहारी बोस उम्र में नेताजी से ग्यारह साल बड़े थे , और आजादी के संघर्ष में भी उनसे बहुत वरिष्ठ। रासबिहारी बोस का जवाब था कि देश की आजादी के लिए वे सहर्ष नेताजी के अधीन रहकर काम करेंगे।

तब जर्मनी में जापान के राजदूत जनरल ओशिमा को सन्देश भेजा गया और नेताजी को जर्मनी से जापान भेजने के प्रयास तेज हो गए। हाँ, दूतावास में जापानी मिलिटरी अटैश के श्री हिगुति (Mr. Higuti) नेताजी से यह पूछना नहीं भूले कि वे रासबिहारी बोस के अधीन रहकर काम करना पसन्द करेंगे या नहीं? नेताजी का जवाब था कि व्यक्तिगत रुप से तो वे रासबिहारी बोस को नहीं जानते; मगर चूँकि वे टोक्यो में रहकर भारत की आजादी के लिए संघर्ष कर रहे हैं, इसलिए वे (नेताजी) खुशी-खुशी उनके सिपाही बनने के लिए तैयार हैं। आजादी के संघर्ष के दो महानायक एक-दूसरे के अधीन रहकर देश की आजादी के लिए काम करने को तैयार हैं- यह एक ऐसा उदाहरण है, जिसे हमारे देश के विद्यार्थियों को जरूर पढ़ाया जाना चाहिए। मगर अफसोस, हमारे बच्चों को सत्ता हासिल करने के लिए अपने ही बाप भाइयों को क़त्ल कर देने वाले बादशाहों के किस्से तो पढाये जाते हैं पर इन निस्पृह बलिदानियों के बारे में एक शब्द भी नहीं।

4 जुलाई 1943 को सिंगापुर के कैथे भवन में रास बिहारी बोस ने आजाद हिन्द फौज की कमान सुभाष चन्द्र बोस को सौंपी। सुभाष चन्द्र बोस ने सर्वोच्च सलाहकार के पद पर रास बिहारी बोस को आग्रहपूर्वक रखा। पर अब तक आजीवन संघर्ष व जीवन सहचरी तोशिको तथा पुत्र माशेहीदे के निधन से रास बिहारी बोस का मन व शरीर दोनो टूट चुके थे। नवम्बर 1944 में सुभाष चन्द्र बोस जब रास बिहारी बोस के पास आये तब तक उनकी हालत बहुत खराब चुकी थी। स्थिति बिगडने पर जनवरी 1945 में उन्हें सरकारी अस्पताल टोकियो में उपचार हेतु भर्ती कराया गया।

इसी समय जापान के सम्राट ने उगते सूर्य के देश के दो किरणों वाले द्वितीय सर्वोच्च राष्टीय सम्मान ‘आर्डर ऑफ़ राइजिंग सन’ से रास बिहारी बोस को विभूषित किया। भारत को ब्रिटिश शासन की गुलामी से मुक्ति दिलाने की जी तोड़ मेहनत करते हुए और इसकी ही आस लिए 21 जनवरी 1945 को रास बिहारी बोस का निधन हो गया। जापान ने तो इस अमर बलिदानी के जज्बे और संघर्ष को भरपूर सम्मान दिया पर ये कृतघ्न देश उन्हें कुछ ना दे पाया। किसी ने सही कहा है कि-

जारी रहा क्रम यदि, यूं ही अमर शहीदों के अपमान का।
तो अस्त ही समझो सूर्य, भारत भाग्य के आसमान का।

इस महान हुतात्मा को कोटि कोटि नमन एवं विनम्र श्रद्धांजलि|

विशाल अग्रवाल (लेखक भारतीय इतिहास और संस्कृति के गहन जानकार, शिक्षाविद, और राष्ट्रीय हितों के लिए आवाज़ उठाते हैं। भारतीय महापुरुषों पर लेखक की राष्ट्र आराधक श्रृंखला पठनीय है।)

यह भी पढ़ें,

आर्य अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ – जीवन का अचर्चित पक्ष
1 Comment

1 Comment

  1. Pingback: उन्नीस वर्ष की आयु में फांसी पर चढ़ने वाले वीर करतार सिंह सराभा - The Analyst

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Most Popular

The Analyst is India’s fastest-growing News & Media company. We track everything from politics to Finance, fashion to sports, Science to religion. We have a team of experts who do work around the clock to bring stories which matter to our audience.

Copyright © 2018 The Analyst. Powered by Databox Inc.

To Top