Hinduism

हिन्दू धर्म में क्यों महत्वपूर्ण हैं पुराण?

पुराणों की गाथा, भाग-1

फूलपत्तियों और फलों से लदी हुई बहुत सी टहनियों वाला हिन्दू धर्म का वटवृक्ष वेदों की गहराई तक फैली जड़ों पर टिका हुआ है, पर उसका तना क्या है? उसका तना है ‘पुराण’। अगर हिन्दू धर्म को एक बहुमंजिला भव्य इमारत कहा जाए तो वेद उसकी नींव कहा जाएगा और ‘पुराण’ उसके खम्भे जिसपर उसकी छतें टिकी हुई हैं। आज संसार में जितना भी हिन्दू धर्म बचा हुआ है, सब पुराणों पर अवलम्बित है, पुराणों को इसमें से हटा दें तो सनातन वटवृक्ष औंधे मुंह गिर पड़ेगा और सनातन धर्म का महल जमींदोज हो जाएगा।

     भारतीय ही नहीं विश्व इतिहास के ग्रन्थ भी संसार में पुराण ही हैं। पुराणों को छोड़कर विश्व इतिहास की कोई श्रृंखला नहीं बैठ सकती। ‘पुराण’ नाम ही स्पष्ट है कि इसका सम्बन्ध ‘पुराना’ से है। भारतीय इतिहास के मुख्य ग्रन्थ हैं ‘रामायण’ और ‘महाभारत’। पर इन दो ग्रन्थों में केवल उस काल का नहीं पीछे का भी बहुत सा इतिहास है। रामायण और पूरे महाभारत में अनेक राजवंशों और ऋषियों की परम्पराओं का इतिहास बिखरा हुआ है। 18 पुराणों में से एक ‘हरिवंश पुराण’ महाभारत का ही अंतिम पर्व है, जिसमें श्रीराम के जीवन का भी वर्णन है। अतः इतिहास और पुराण आपस में गुंथे हुए हैं।

     पुराण केवल इतिहास ही नहीं बल्कि सनातन संस्कृति के मंथन से निकला अमृत कलश हैं। हिन्दू धर्म में जितनी भी परम्पराएं, रीतियाँ, दान-दक्षिणा-सेवा-परोपकार आदि आचार, वीरता-दयालुता-क्षमाशीलता-वचननिष्ठा आदि व्यवहार देखा जाता है सब पुराणों की कथाओं से ही सीखा जाता है। जप-तप-नियम-शुद्धता-भक्ति-गौप्रेम आदि सभी कुछ पुराण से ही सीखा जाता है। ऐसे में पुराण ही हिन्दू समाज के टॉर्च की तरह हैं जिन्होंने कलियुग के काले अंधेरे में धर्म को प्रकाश दिखाए रखा, भारतीय मनीषा, कला और विद्याओं का संरक्षण किया, और गुलामी, विधर्मियों के अत्याचार, मलेच्छ संस्कृतियों के संसर्ग, अन्य ग्रन्थों के लुप्त या लुप्तप्राय हो जाने पर भी हिन्दू होने के बोध को खत्म नहीं होने दिया। वेद भी स्वयं कहते हैं कि मनुष्य पुराणवत आचरण करें। 

पुराण रचयिता वेदव्यास

पुराणों का मुख्य विषय क्या है?

– सृष्टि की उत्पत्ति किस प्रकार हुई, पांच महाभूत, इन्द्रियाँ और बुद्धि आदि तत्व कैसे उत्पन्न हए?
– इसका लय कहाँ और कैसे होगा, अलग अलग समय और अंत में इसकी गति क्या थी और क्या होगी ?
– इस सृष्टि और प्रलय के बीच क्या क्या हुआ?
– सृष्टि के पदार्थों की उत्पत्ति का क्रम किस प्रकार है?
– मनुष्य जाति के प्रमुख ऋषि और राजा किस क्रम से अधिकारारूढ़ हुए, सूर्यचन्द्र आदि वंश, मनु, मनुपुत्र, देव, दानव, इन्द्र, और भगवान के अवतारों का क्या इतिहास है?
– उन पूर्वजों के चरित्र कैसे थे? 

      इन पांच बातों का ज्ञान जिससे ज्ञात हो वह पुराण विद्या कहलाती है। इस प्रकार पुराण हिन्दू जाति के सर्वस्व ही हैं। पुराण का सम्मान वेदवत करना चाहिए क्योंकि सभी शास्त्रों में ब्रह्मा ने पुराण का स्मरण किया और उसके बाद वेद प्रादुर्भूत हुए। अर्थात् पुराण वेद से भी पहले उत्पन्न हुए। क्यों? तो इसको ऐसे समझें कि जैसे हमें एक गिलास पानी पीना है; तो पहले हमारे मन में गिलास और पानी का चित्र खिंच जाता है; फिर हम वाणी से कहते हैं कि, “एक गिलास पानी दो”, यानि शब्द से पहले उसका अर्थ प्रकट होता है। उसी तरह वेद का गूढ़ अर्थ पुराणों में ही निहित है। इसलिए ब्रह्मा ने पहले ‘अर्थ’ अर्थात् पुराण का स्मरण किया तदनन्तर शब्द ब्रह्म के रूप में वेद का प्राकट्य हुआ।

      इसलिए कहा गया कि, “इतिहास और पुराणों के द्वारा ही वेदों के अर्थ का अनुशीलन करना चाहिए। इतिहास पुराणों को न जानने वाले अल्पज्ञ मनुष्यों से वेद डरता है, कि कहीं ये पुरुष मुझपर प्रहार न कर दें।” अतः पुराणों का द्रोही धर्म के साथ साथ विशेष रूप से वेद का द्रोही है। शेष क्रमशः…

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