History

चंद्रशेखर ‘आज़ाद’- वो बातें जो आप नहीं जानते

यों देखा जाए तो 1857 के महायुद्ध से बहुत पहले ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरुद्ध देशवासियों का संघर्ष शुरू हो चुका था। सत्तावन का विप्लव बहुत संगठित रूप में सामने आया और इसीलिए दुनिया उसे जान पायी। यह महासंग्राम दबा दिया गया पर भारतीय समाज में इसकी अनुगूँज देर तक बनी रही। भले ही ऊपर से ना दिखाई देता हो पर चिंगारी तो राख के नीचे हमेशा ही ज़िंदा रही। सत्तावन की क्रान्ति के हिसाब से देखा जाये तो क्रांतिकारी कहे जाने वाले लोग स्वतंत्रता के समझौताविहीन संघर्ष को अपने रक्त से 63 साल तक अकेले ही सींचते रहे अर्थात जब तक 1920 नहीं आ गया और गांधी जी के नेतृत्व और असहयोग आंदोलन ने जन्म लेना प्रारम्भ कर दिया। इसके पहले तो एक अंग्रेज द्वारा बनायीं गयी कांग्रेस नामक संस्था अपने जन्म के 35 साल बाद तक मात्र ‘गॉड सेव दि किंग’ जैसी प्रार्थनायें अपनी सभा में गाती रही। जनता के मन में उसका संग्रामी रूप असहयोग आंदोलन के दिनों में पहली बार प्रस्फुटित हुआ।

असहयोग की लहर में पूरा देश बह गया था। काशी में संस्कृत पढ़ रहे एक 14 वर्षीय छात्र ने भी इसमें अपनी आहुति दी। चन्द्रशेखर तिवारी नामक इस किशोर को धरना देने के आरोप में गिरफ्तार कर पारसी मजिस्ट्रेट मि. खरेघाट के अदालत में पेश किया गया, जो बहुत कड़ी सजाएँ देने के लिए कुख्यात थे। उन्होंने इस किशोर से उसकी व्यक्तिगत जानकारियों के बारे में पूछना शुरू किया, तो उसने अपना नाम ‘आज़ाद’, पिता का नाम ‘स्वाधीन’ और घर का पता ‘जेलखाना’ बताया। मजिस्ट्रेट मि. खरेघाट इन उत्तरों से चिढ़ गए और उन्होंने चन्द्रशेखर को पन्द्रह बेंतों की सज़ा सुना दी। जल्लाद ने अपनी पूरी शक्ति के साथ बालक चन्द्रशेखर की निर्वसन देह पर बेंतों के प्रहार किए। प्रत्येक बेंत के साथ कुछ खाल उधड़कर बाहर आ जाती थी। पीड़ा को सहन कर वह बालक हर बेंत के साथ ‘महात्मा गांधी की जय’ या ‘भारत माता की जय’ बोलता जाता था। इस पहली अग्नि परीक्षा में सम्मान उत्तीर्ण होने के फलस्वरूप बालक चन्द्रशेखर का बनारस के ज्ञानवापी मोहल्ले में नागरिक अभिनन्दन किया गया। अब वह चन्द्रशेखर आज़ाद कहलाने लगा और इस आज़ाद शब्द की सार्थकता को उस बालक से बेहतर शायद ही कभी किसी ने निभाया हो।

चंद्रशेखर के कोमल शरीर पर लगे बेंतों के घाव तो भर गए पर उनके निशान और कसक देर तक बनी रही। गांधी जी द्वारा मनमर्ज़ी से असहयोग आंदोलन वापस लेने पर बहुत से युवाओं की तरह चंद्रशेखर को भी धक्का लगा। असहयोग की लड़ाई से मोहभंग हुआ तो भीतर की छटपटाहट उस बालक को क्रांतिकारी संग्राम की ओर खींच ले गयी। काशी क्रांतिकारियों का केंद्र था ही। वहां उसे क्रान्ति पथ के पथिक मन्मथनाथ गुप्त मिले और वह निर्भीक होकर उनके साथ चल पड़ा। फिर तो पीछे मुड़कर नहीं देखा उसने कभी और वो बन गया क्रांतिकारियों का कमांडर इन चीफ चंद्रशेखर आज़ाद, एक नाम जो वीरता का पर्याय बन गया।

इस नर शार्दूल के क्रांतिकारी जीवन का परिचय पाने से पहले उचित होगा कि उनके परिवार, जन्मस्थान एवं माता-पिता के बारे में कुछ जानकारी प्राप्त कर ली जाये। चंद्रशेखर आज़ाद का जन्म झाबुआ जिले के एक आदिवासी ग्राम भावरा (अब चन्द्र्शेखर आजाद नगर) में 23 जुलाई 1906 को हुआ था। यह गाँव अब झाबुआ जिले से काट कर अलग जिला बना दिए गए अलीराजपुर ज़िले में आता है। चंद्रशेखर आज़ाद के जन्म की यह तिथि उनके साथी भगवानदास माहौर ने आज़ाद की माँ से प्राप्त जानकारियों के आधार पर निश्चित की थी।

‘यश की धरोहर’ में माहौर जी ने लिखा है–‘”चंद्रशेखर आज़ाद का जन्म मध्य भारत की झाबुआ तहसील के ग्राम भावरा में हुआ था………….. आज़ाद की माता जी का देहांत 22 मार्च 1951 को झाँसी में मेरे घर पर ही हुआ। वे मेरे तथा भाई सदाशिव मलरापुरकर के साथ मेरे घर पर ही दो साल से रह रहीं थीं और तभी उन्होंने आज़ाद के जन्म और बाल्यकाल की बातें बतायीं थीं, जिन्हें मैंने नोट कर लिया था। माताजी ने बताया था कि चंद्रशेखर का जन्म सुदी दूज सोमवार को दिन के दो बजे हुआ था। । सम्वत माता जी को विस्मृत हो गया था।” इसी तिथि के आधार पर माहौर जी ने आज़ाद की जन्म कुंडली बनायी और आज़ाद की जन्मतिथि 23 मार्च 1906 नियत की। हालाँकि उनके पैतृक गाँव उत्तर प्रदेश के उन्नाव ज़िले के बदरका के लोग उनका जन्मदिवस 7 जनवरी 1906 मानते हैं।

उनके पिता पंडित सीताराम तिवारी उत्तर प्रदेश के उन्नाव ज़िले के बदरका गाँव के रहने वाले थे और वहां अपनी विमाता के साथ रहते थे। हालाँकि मूल रूप से उनके पूर्वज कानपुर के मसबानपुर के निकट भौंती गाँव के रहने वाले थे। सामाजिक मान-प्रतिष्ठा होने के बावजूद तिवारी जी की आर्थिक स्थिति अच्छी न थी। 1899 में भीषण अकाल पड़ने के कारण उन्हें अपना गाँव बदरका छोड़ना पड़ा और अपने एक रिश्तेदार हजारीलाल का सहारा लेकर वे अपनी पत्नी जगरानी देवी और पुत्र सुखदेव को लेकर अलीराजपुर रियासत जा पहुंचे। बदरका निवासी रामलखन अवस्थी, जो वहां पुलिस में दरोगा थे, ने उन्हें पुलिस की नौकरी दिलवा दी पर इसमें उनका मन न लगा क्योंकि अपने लोगों पर ही जोर जुल्म करना उनको गवारा न था। नौकरी छोड़कर वे समीपस्थ गाँव भाबरा में बस गये, जहाँ उन्होंने भैंसे पालकर दूध का धंधा शुरू किया। किसी बीमारी के कारण भैंसे मर गयीं और तब उन्हें पाँच रूपये मासिक पर सरकारी बगीचे में चौकादरी की नौकरी करनी पड़ी।

इसी निपट विपन्नावस्था में यहीं बालक चन्द्रशेखर का जन्म हुआ और बचपन बीता। बचपन से ही वे घुमन्तू प्रवृत्ति के थे। अधिकांश समय भील बालकों के साथ जंगलों की खाक छानते फिरते। उन्हें तीर कमान बनाने का बहुत शौक था और इनसे ही वे जंगली जानवरों का शिकार करते। जंगल में ही आज़ाद भील बालकों से निशाना लगाना सीखते और बचपन में सीखा निशानेबाजी का उनका ये हुनर बाद में उनकी पहचान बन गया। कुश्ती करने और दंड पेलने का भी उन्हें जबरदस्त शौक था। उनके पिता के मित्र मनोहरलाल त्रिवेदी, जो आज़ाद के क्रांतिकारी जीवन में भी उनके बहुत निकट रहे, उन्हें और उनके बड़े भाई सुखदेव को पढ़ाते थे पर पढ़ने में उनका मन ही नहीं लगता था।

परिवार की निर्धनता के कारण कुछ समय आज़ाद ने तहसीलदार के यहाँ भृत्य की नौकरी की, पर यह गुलामी उनके स्वाभिमानी मन को रास न आयी। पिता के साथ प्रायः किसी न किसी विषय पर उनकी खटपट हो जाती थी, जिस कारण से उनका मन अपने घर से उचटने लगा। एक दिन वह परिवार को बिना बताये, बिना किसी से कुछ कहे सुने घर छोड़कर चले गए। इस सम्बन्ध में आज़ाद पर महाकाव्य लिखने वाले श्रीकृष्ण सरल ने लिखा है-“कुछ लोगों का कहना है कि वे पहले वाराणसी गए थे। तथ्यों के अन्वीक्षण से मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ कि पहले वो बम्बई गए थे और वहां मन ना लगने के कारण वहीँ से वाराणसी जा पहुँचे। यहाँ पहुँचने पर उन्होंने अपने माता पिता को सूचना दे दी थी। ”

आज़ाद के फूफा जी पंडित शिवविनायक मिश्र बनारस में ही रहते थे। कुछ उनका सहारा लिया और कुछ खुद भी जुगाड़ बिठाया तथा ‘संस्कृत विद्यापीठ’ में भर्ती होकर संस्कृत का अध्ययन करने लगे। उन दिनों बनारस में असहयोग आंदोलन की लहर चल रही थी। विदेशी माल न बेचा जाए, इसके लिए लोग दुकानों के सामने लेटकर धरना देते थे। ऐसे ही एक धरने में चंद्रशेखर भी पकडे गए और वो चर्चित प्रसंग हुआ जिससे चंद्रशेखर तिवारी को दुनिया ने चंद्रशेखर आज़ाद के रूप में जाना और जिसका वर्णन ऊपर किया गया है। बाद में क्रांतिपथ का राही बनकर वो क्रान्तिकारियों के साथ कदम से कदम मिला कर चल पड़े।

उन दिनों उत्तर भारत का क्रांतिकारी दल शचीन्द्रनाथ सान्याल और योगेश चन्द्र चटर्जी के नेतृत्व में चल रहा था। अब नई चेतना और विचार के साथ ‘हिन्दुस्तान प्रजातंत्र संघ’ के नाम से क्रांतिकारी नया विधान लेकर आये जिसमें देश की स्वतंत्रता के लिए क्रांतिकारी प्रयासों के साथ ही ऐसी प्रजातांत्रिक व्यवस्था के निर्माण का संकल्प था जहाँ मनुष्य द्वारा मनुष्य का तथा एक राष्ट्र द्वारा दूसरे राष्ट्र का शोषण संभव न होगा।

असहयोग के समय छोड़े गए हथियार क्रांतिकारियों ने फिर से उठा लिए। क्रांतिकारी दल के नए नेता के रूप में शाहजहाँपुर के पंडित रामप्रसाद बिस्मिल सामने आये। उन्होंने पार्टी चलाने के लिए कुछ धनी और देशद्रोही व्यक्तियों के घरों में डकैतियाँ डालीं, जिनमें चंद्रशेखर आज़ाद भी साथ थे। पर पार्टी नेतृत्व जल्द ही ऐसे एक्शनों से ऊब गया। उसे लगा कि यह अपने ही देशवासियों पर ज्यादती है और क्यों न सीधे सरकार पर हमला किया जाये।

योजना बनी और 9 अगस्त 1925 को लखनऊ के निकट काकोरी रेलवे स्टेशन से थोड़ी दूर पर एक सवारी गाडी को रोककर सरकारी खजाने की लूट की गयी। इस काम में रामप्रसाद बिस्मिल की अगुआई में अशफ़ाक़ुल्ला खान, शचीन्द्र बख्शी, राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी, चंद्रशेखर आज़ाद, मन्मथनाथ गुप्त, केशव चक्रवर्ती, मुरारीलाल, मुकुन्दीलाल और बनवारीलाल ने हिस्सेदारी की। योजना तो पूर्णतः सफल रही पर बाद में कुछ सुराग मिलने पर जब अंग्रेजी सरकार ने धरपकड़ शुरू की तो दल के नेता बिस्मिल और लगभग 40 क्रांतिकारी युवक सरकार की गिरफ्त में आ गए। पकडे नहीं जा सके तो चंद्रशेखर आज़ाद।

काकोरी का मुकदमा लखनऊ की अदालत में 18 महीने तक चला, जिसमें बिस्मिल, अशफ़ाक़ुल्ला खान, ठाकुर रोशन सिंह और राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी को फाँसी की सजाएं दी गयीं, जबकि कुछ को काले पानी की सजा और अन्य को कारावास का दंड मिला। इस घटना के बाद संगठन बिखर गया और क्रांति की मशाल बुझती सी लगी, पर एक सूरमा अभी भी मुक्त था। आज़ाद फरार हो गए, पर चुप नहीं बैठे। 19 दिसंबर 1927 को काकोरी काण्ड में हुयी फाँसियों के बाद दल के नेतृत्व का भार उनके कन्धों पर आ गया। आज़ाद ने खिसककर झाँसी में अपना अड्डा जमा लिया। झाँसी में चन्द्रशेखर आज़ाद को एक क्रान्तिकारी साथी मास्टर रुद्रनारायण सिंह का अच्छा संरक्षण मिला। झाँसी में ही सदाशिव राव मलकापुरकर, भगवानदास माहौर और विश्वनाथ वैशंपायन के रूप में उन्हें अच्छे साथी मिल गए।

झाँसी की ‘बुंदेलखण्ड मोटर कम्पनी’ में कुछ दिन उन्होंने मोटर मैकेनिक के रूप में काम किया, मोटर चलाना सीखा और पुलिस अधीक्षक की कार चलाकर उनसे मोटर चलाने का लाइसेंस भी ले आए। जब झाँसी में पुलिस की हलचल बढ़ने लगी तो चन्द्रशेखर आज़ाद ओरछा राज्य में खिसक गए और सातार नदी के किनारे एक कुटिया बनाकर ब्रह्मचारी के रूप में रहने लगे। आज़ाद के न पकड़े जाने का एक रहस्य यह भी था कि संकट के समय वे शहर छोड़कर गाँवों की ओर खिसक जाते थे और स्वयं को सुरक्षित कर लेते थे।

उन्होंने संगठन के बिखरे हुए सूत्रों को जोड़ा और गुप्त रहकर तेजी से पार्टी संचालन किया। सौभाग्य से इसमें उन्हें भगत सिंह के बौद्धिक नेतृत्व का जबरदस्त सहयोग मिला। अब ‘हिन्दुस्तान प्रजातंत्र संघ’ के नाम में ‘समाजवादी’ शब्द जोड़कर नई योजनाएं तैयार की जाने लगीं। आज़ाद पार्टी के सेनापति बनाये गए। स्वतंत्रता से प्रजातंत्र और फिर समाजवादी लक्ष्य तक की क्रांतिकारियों की इस संघर्ष यात्रा पर गर्व ही किया जा सकता है, जबकि दूसरी ओर आज़ादी के लिए आन्दोलनरत कांग्रेस ‘पूर्ण स्वतंत्रता’ के अपने प्रस्ताव तक भी नहीं पहुँच पायी थी।

साइमन कमीशन का झाँसा आया तो देश भर में उसका तीव्र विरोध हुआ। हर कहीं ‘साइमन गो बैक’ के नारे और और काले झंडे। लाला लाजपतराय पर ऐसे ही एक जुलूस में लाठियाँ बरसाई गयीं जिससे वे बुरी तरह घायल हो गए और उनकी मृत्यु हो गयी। क्रांतिकारियों को लगा कि यह देश का अपमान है और इसका बदला लिया जाना चाहिए। चंद्रशेखर आज़ाद, भगतसिंह, राजगुरु और कुछ अन्य क्रांतिकारियों ने मिलकर दिन-दहाड़े पुलिस अफसर साण्डर्स को मारकर यह साबित कर दिया कि देश के नौजवानों का खून अभी ठंडा नहीं हुआ है। उन्होंने देश की जनता और हुकूमत को यह भी बताया कि इस तरह रक्त बहाने की अपनी विवशता पर वे दुखी हैं पर क्रान्ति के रास्ते में कुछ हिंसा अनिवार्य है। अत्याचारी सरकार को सावधान करते हुए उन्होंने अपनी घोषणा के नोटिस भी जगह जगह चिपकाए और वितरित किये।

1928 का वर्ष गहरे असंतोष का था। सब ओर हलचल थी। केंद्रीय असेम्बली में सरकार दो अत्यधिक दमनकारी कानून पेश करने वाली थी। इस माहौल में क्रांतिकारी दल ने इनका विरोध करने का निर्णय किया। तय हुआ कि जिस समय वह जनविरोधी कानून केंद्रीय असेम्बली में प्रस्तुत हों, ठीक उसी समय बमों का विस्फोट करके बहरों के कान खोले जाएँ। आज़ाद का विचार था कि ऐसा करने के बाद क्रांतिकारी वहाँ से निकल जाएँ लेकिन बहुमत से फैसला हुआ कि भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त बम फेंकने के पश्चात अपनी पार्टी की नीतियों, सिद्धांतों, लक्ष्यों और घोषणाओं के पर्चे फेंककर गिरफ्तारी देंगे तथा मुकदमे के समय अदालत को मंच के रूप में इस्तेमाल करके जनता और दुनिया के बीच अपना प्रचार करेंगे। ऐसा ही हुआ। भगतसिंह और दत्त ने 8 अप्रैल 1929 को बहरों के कान खोलने के लिए बम का धड़ाका किया और जेल चले गए।

भगतसिंह, दत्त और बाद में गिरफ्तार अन्य क्रांतिकारियों पर ‘लाहौर षड़यंत्र केस’ चला, जिसमें भगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव को फाँसी तथा दूसरों को कालापानी की सजाएं सुनाई गयीं। इससे पहले ही आज़ाद ने भगतसिंह को जेल से छुड़ाने की योजना पर गंभीरता से कार्य किया। भगवतीचरण इसी तैयारी में बम परीक्षण करते हुए रावी नदी के तट पर शहीद हो गए। फिर भी आज़ाद ने लक्ष्य को नहीं छोड़ा, पर भगतसिंह बाहर आने के लिए तैयार ही नहीं हुए।

आज़ाद निरंतर फरार रहकर निर्भीकता से पार्टी का कार्य कर रहे थे। वे अब ब्रिटिश सत्ता के लिए जबरदस्त चुनौती बन चुके थे। पार्टी के कुछ एक सदस्यों के विश्वासघात के चलते यह बहादुर सेनानायक आखिरकार 27 फरवरी 1931 को इलाहबाद के अल्फ्रेड पार्क में ब्रिटिश पुलिस के द्वारा चारों तरफ से घेर लिया गया। अपनी एक मामूली पिस्तौल और चंद कारतूसों के बल पर उन्होंने जिस तरह शक्तिशाली माने जाने वाले अंग्रेजी साम्राज्यवाद को जबरदस्त टक्कर दी, वह संसार के क्रांतिकारी आंदोलन के इतिहास की अमिट गाथा है। ब्रिटिश पुलिस अफसरों ने भी आज़ाद की बहादुरी का लोहा माना। पुलिस अधिकारी नॉट बाबर ने उनकी शहादत के बाद उनके शव के पास जाकर हैट उतारकर उन्हें सलामी दी। वह उनकी पिस्तौल अपने साथ इंग्लैण्ड ले गया था, जिसे स्वतंत्रता के बाद स्वदेश वापस मँगाया गया। इस घटना का भी अपना एक रोमांचक किस्सा है, जिसका वर्णन थोड़ा सा आगे किया गया है।

उस समय उत्तर प्रदेश में पुलिस का इन्स्पेक्टर जनरल हॉलिंस था। हॉलिंस ने अंग्रेजी पत्रिका ‘Men Only’ के अक्टूबर 1954 के अंक में भारत में अपनी नौकरी के संस्मरणों के प्रसंग में आज़ाद और पुलिस की इस लड़ाई का जिक्र किया है। इस लेख के अनुसार आज़ाद की पहली गोली अंग्रेज पुलिस सुपरिंटेंडेंट नॉट बाबर की बाँह में लगी, जिसने उसकी कलाई तोड़ दी। पुलिस के सिपाही बाड़ की झाड़ियों के पीछे छिपकर आज़ाद और उनके साथी पर गोलियाँ चलाने लगे। पुलिस इन्स्पेक्टर विश्वेश्वर सिंह निशाना लेने के लिए झाडी के ऊपर से झाँक रहा था। उसने स्वयं को सुरक्षित समझकर आज़ाद को एक गाली दे दी। गाली को सुनकर आज़ाद को क्रोध आया। जिस दिशा से गाली की आवाज़ आई थी, उस दिशा में आज़ाद ने अपनी गोली छोड़ दी। उस समय तक आज़ाद के शरीर में दो तीन गोलियाँ धँस जाने से खून बह रहा था। ऐसी हालत में भी आज़ाद ने इन्स्पेक्टर के झाँकते हुए चेहरे का निशाना लेकर जो गोली चलायी, उससे विश्वेश्वर सिंह का जबड़ा टूट गया। हालिंस ने अपने संस्मरण में आज़ाद के इस निशाने की प्रशंसा करते हुए लिखा है–”यह आज़ाद का अंतिम परन्तु अत्यधिक प्रशंसा के योग्य निशाना था।”

हालिंस ने तो यही लिखा कि आज़ाद पुलिस की गोलियों से मारे गए परन्तु लड़ाई के समय मौजूद लोगों का कहना था कि वहाँ मौजूद दोनों क्रांतिकारियों में से एक जख्मी होकर लड़ता रहा, जबकि दूसरा भाग गया। (दूसरे क्रांतिकारी सुखदेवराज को आज़ाद ने खुद भगा दिया था, जैसा कि बाद में उन्होंने अपने संस्मरणों में लिखा था।) लड़ने वाले ने आखिरी गोली अपनी कनपटी पर मार ली। उसके गिर पड़ने पर भी पुलिसवालों का उसके समीप जाने का साहस न हुआ। कई गोलियाँ उसके निष्प्राण शरीर में मारकर ये निश्चय किया गया कि कहीं वो ज़िंदा तो नहीं। पुलिस शरीर को अपनी गाडी में उठाकर ले गयी। उनकी पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार उन्हें तीन या चार गोलियाँ लगी थीं। इस रिपोर्ट के अनुसार उनकी दाईं कनपटी पर गोली का घाव था और घाव के चारों ओर के बाल जले हुए थे। यह इस बात का प्रमाण था कि कनपटी का घाव, पिस्तौल कनपटी पर रखकर गोली मारने से हुआ था। गोली दूर से आकर लगने पर कनपटी पर बालों के जलने का कोई कारण न होता।

आज़ाद के अंतिम संस्कार के बारे में जानने के लिए उनके बनारस के रिश्तेदार श्री शिवविनायक मिश्रा द्वारा दिया गया वर्णन पढ़ना समीचीन होगा। उनके शब्दों में—“आज़ाद के अल्फ्रेड पार्क में शहीद होने के बाद इलाहबाद के गांधी आश्रम के एक सज्जन मेरे पास आये। उन्होंने बताया कि आज़ाद शहीद हो गए हैं और उनके शव को लेने के लिए मुझे इलाहबाद बुलाया गया है। उसी रात्रि को साढ़े चार बजे की गाडी से मैं इलाहबाद के लिए रवाना हुआ। झूँसी स्टेशन पहुँचते ही एक तार मैंने सिटी मजिस्ट्रेट को दिया कि आज़ाद मेरा सम्बन्धी है, लाश डिस्ट्रॉय न की जाये। इलाहबाद पहुंचकर मैं आनंद भवन पहुँचा तो कमला नेहरू से मालूम हुआ कि शव पोस्टमार्टम के लिए गया हुआ है। मैं सीधा डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट के बँगले पर गया। उन्होंने बताया कि आप पुलिस सुपरिंटेंडेंट से मिल लीजिये। शायद शव जल दिया गया होगा। मुझे पता नहीं कि शव कहाँ है। मैं सुपरिंटेंडेंट से मिला तो उन्होंने मुझसे बहुत वाद-विवाद किया। उसके बाद उन्होंने मुझे भुलावा देकर एक खत दारागंज के दरोगा के नाम से दिया कि त्रिवेणी पर लाश गयी है, पुलिस की देखरेख में इनको अंत्येष्टि क्रिया करने दी जाये। बंगले से बाहर निकला तो थोड़ी ही दूर पर पूज्य मालवीय जी के पौत्र श्री पद्मकांत मालवीय जी दिखाई दिए। उन्हें पता चला था कि मैं आया हुआ हूँ। उनकी मोटर पर बैठकर हम दारागंज पुलिस थानेदार के पास गए। वे हमारे साथ मोटर में त्रिवेणी गए। वहाँ कुछ था ही नहीं। हम फिर से डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट के बंगले की तरफ जा रहे थे कि एक लड़के ने मोटर रुकवा कर बताया कि शव को रसूलाबाद ले गए हैं।”

“रसूलाबाद पहुंचे तो चिता में आग लग चुकी थी। अंग्रेज सैनिकों ने मिट्टी का तेल चिता पर छिड़क कर आग लगा दी थी और आस पास पड़ी फूस भी डाल दी थी ताकि आग और तेज हो जाये। पुलिस काफी थी। इंचार्ज अफसर को चिट्ठी दिखाई तो उसने मुझे धार्मिक कार्य करने की आज्ञा दे दी। हमने फिर लकड़ी आदि मंगवाकर विधिवत दाह संस्कार किया। चिता जलते जलते श्री पुरुषोत्तमदस टंडन एवं कमला नेहरू भी वहाँ आ गयीं थीं। करीब दो-तीन सौ आदमी जमा हो गए। चिता के बुझने के बाद अस्थि-संचय मैंने किया। इन्हें मैंने त्रिवेणी संगम में विसर्जित कर दिया। कुछ राख एक पोटली में मैंने एकत्रित की तथा थोड़ी सी अस्थियाँ पुलिस वालों की आँखों में धुल झोंक कर मैं लेता आया। उन अस्थियों में से एक आचार्य नरेंद्रदेव भी ले गए थे। शायद विद्यापीठ में जहाँ आज़ाद के स्मारक का पत्थर लिखा है, वहां उन्होंने उस अस्थि के टुकड़े को रखा है। सांयकाल काले कपडे में आज़ाद की भस्मी का चौक पर जुलूस निकला। इलाहाबाद की मुख्य सड़कें अवरूद्ध हो गयी। ऐसा लग रहा था मानो सारा देश अपने इस सपूत को अंतिम विदाई देने के लिए उमड़ पड़ा है। जलूस के बाद एक सभा हुई। सभा को क्रांतिधर्मा शचीन्द्रनाथ सान्याल की पत्नी ने सन्बोधित करते हुए कहा-जैसे बंगाल में खुदीराम बोस की शहादत के बाद उनकी राख को लोगों ने घर में रखकर सम्मानित किया वैसे ही आज़ाद को भी सम्मान मिलेगा। शाम की गाडी से मैं बनारस चला गया और वहां विधिवत शास्त्रोक्त ढंग से आज़ाद का अंतिम संस्कार किया।”

शिवविनायक जी जो अस्थियाँ अपने साथ चोरीछिपे ले गए थे, उन्हें उन्होंने एक ताँबे के पात्र में अपने घर की दीवार में छिपाकर रख दिया तथा अपनी मृत्यु से पहले उनकी देखभाल के लिए पाँच विश्वासपात्र साथियों का एक ट्रस्ट बना दिया। 1975-76 तक उन अस्थियों की ओर किसी का ध्यान नहीं गया। हां, ये सुनने में अवश्य आता रहा कि मिश्रा जी के सुपुत्रगण उन अस्थियों के बदले में कुछ चाहते हैं। 1976 में नारायणदत्त तिवारी उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने और उन्होंने शहीद ए आजम भगत सिंह के छोटे भाई सरदार कुलतार सिंह को राज्यमंत्री बनाकर उन्हें स्वतंत्रता सेनानियों के विभाग की जिम्मेदारी सौंपी। आज़ाद के साथी रामकृष्ण खत्री ने कुलतार सिंह जी से मिलकर उन अस्थियों के सम्बन्ध में चर्चा की और फिर इन दोनों ने शचीन्द्रनाथ बख्शी के साथ मिलकर शिवविनायक मिश्रा जी के सुपुत्रों को समझा बुझाकर उन्हें अस्थियां देने को राज़ी कर लिया।

जून 1976 के अंतिम सप्ताह में वो अस्थियां मिश्रा जी के घर से लाकर ताँबे के कलश में विद्यापीठ में रखी गयीं। 1 अगस्त 1976 को अस्थिकलश की शोभायात्रा विद्यापीठ वाराणसी से प्रारम्भ हुयी और वहाँ से रामनगर, चुनार, मिर्ज़ापुर, इलाहबाद, प्रतापगढ़, रायबरेली, सोख्ता आश्रम, कालपी, उरई, मोंठ, झांसी, सातार-तट (ओरछा मध्य प्रदेश), कानपुर, बदरका (उन्नाव) होते हुए 10 अगस्त 1976 को लखनऊ पहुंची। रास्ते में पड़ने वाले हर नगर, कसबे, गाँवों में हजारों हजार लोगों ने इस शोभायात्रा का स्वागत किया और चन्द्रशेखर आज़ाद अमर रहें के नारों से आसमान को गुंजा दिया। लखनऊ के बनारसी बाग स्थित संग्रहालय के प्रांगण में अस्थिकलश समर्पण का आयोजन हुआ और इस यात्रा में शामिल रहे आज़ाद के साथी क्रांतिकारियों ने वह अस्थिकलश संग्रहालय के अधिकारियों को समर्पित कर दिया। तब से जनता के दर्शनार्थ वह अस्थिकलश वहां एक विशेष कक्ष में रखा हुआ है।

अल्फ्रेड पार्क में जिस वृक्ष के नीचे आज़ाद ने वीरगति प्राप्त की थी, घटना के दूसरे दिन से बहुत से लोग राष्ट्रीय वीर की स्मृति में उस पेड़ की पूजा करने लगे। पेड़ के तने में बहुत सी गोलियाँ धंस गयीं थीं। श्रद्धालु लोगों ने पेड़ के तने पर सिन्दूर पोत दिया और वृक्ष के नीचे धूप-दीप जलाकर फूल चढाने लगे। शीघ्र ही वहां सैंकड़ों की तादाद में पूजा करने वाले पहुँचने लगे। ब्रिटिश सरकार के लिए तो यह असहनीय था और इसलिए उसने वह पेड़ कटवा दिया, परन्तु जनता तभी से एल्फ्रेड पार्क को आज़ाद पार्क पुकारने लगी और पार्क का यही नाम प्रचलित हो गया। कांग्रेस शासन में पुराने एल्फ्रेड पार्क पर ‘मोतीलाल नेहरू स्मारक’ का पट्ट लगा दिया गया परन्तु हमारे लिए तो वो सदैव ही आज़ाद पार्क है, जिसमें आज़ाद के बलिदान स्थल पर लगी उनकी एक मूर्ति और अंग्रेजी सरकार द्वारा जलाये गए पेड़ की जगह स्वतंत्रता के पश्चात बाबा राघवदास द्वारा लगाया गया पेड़ अभी भी आँखों के सामने उस अमर बलिदान को सचित्र कर देता हैं।

दो बातें यहाँ कहने से मैं स्वयं को नहीं रोक पा रहा हूँ–एक, तब लोगों द्वारा उस पेड़ की पूजा करना जहाँ उनके श्रद्धालु होने की गवाही देता है, वहीँ ये भी बताता है कि हम अपने नायकों के साथ उनके जीते जी तो कभी खड़े होते ही नहीं, उनकी मृत्यु के बाद भी उनके द्वारा छोड़े गए अधूरे कामों को पूरा करने को लेकर हम में कोई आग्रह नहीं होता। हमारे लिए सबसे मुफीद पड़ता है, किसी भी महापुरुष को चार हाथों वाला बनाकर उसे भगवान की श्रेणी में खड़ा करके, उसकी पूजा अर्चना करके उनके आदर्शों, कर्मठता, त्याग और बलिदान को अपनाने से छुट्टी पा जाना, इस तर्क की आड़ में कि अरे वो तो अवतार थे, देवता थे, भगवान थे। जब तक हम अपने देश में समय समय पर हुए महापुरुषों की लम्बी श्रृंखला से कुछ सीखेंगे नहीं, उनके आदर्शों को जीवन में अपनाएंगे नहीं, अपने बच्चों को उनके जैसा बनने की प्रेरणा देंगे नहीं, हमारे द्वारा उन्हें याद करना व्यर्थ ही रह जाएगा।

दूसरी बात, उस पार्क में घूमने जाने वाले लोगों से सम्बंधित है, जिनके लिए वो महज एक पिकनिक स्पॉट भर है, जहाँ जाकर बस फोटो खींचनी है, खाना पीना है और मस्ती करनी है। कड़वी बात के लिए माफ़ करियेगा, पर अगर उस तपोभूमि पर जाकर भी किसी के मन में उस क्रांतिधर्मा की याद नहीं आती; वीरता का वो अमर दृश्य आँखों के सामने नहीं खिंचता; 25 वर्षीय उस नौजवान सेनानी, जिसने भारतमाता की सेवा के लिए अपनी माँ को भी बिसरा दिया, की याद करके आँखें नम नहीं होती तो मेरे लिए वो व्यक्ति मुर्दे से भी बदतर है। अफ़सोस, मैं जितनी बार भी वहाँ गया, मुझे वहाँ मुर्दे ही दिखे, जिनके लिए आज़ाद की मूर्ति के पास बना चबूतरा खाने पाने या गप्पे मारने के काम के लिए है और वो मूर्ति उनके बच्चों के छूपनछुपाई खेलने के काम के लिए।

जहाँ तक आज़ाद की पिस्तौल वापस मँगाने से सम्बंधित किस्से की बात है, ये तब की बात है, जब 1969-70 में चन्द्रभानु गुप्त उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे। एक दिन जयदेव कपूर और वचनेश त्रिपाठी ने आज़ाद के साथी रहे रामकृष्ण खत्री को सूचना दी कि उन्हें पता चला है कि उत्तर प्रदेश की पुलिस बीच बीच में विभिन्न स्थानों पर डाकुओं से पकडे गए हथियारों की प्रदर्शनी लगाया करती है, जिनके साथ ही शहीद चंद्रशेखर आज़ाद की पिस्तौल को भी रखा जाता है। ये खबर हृदय को चोट देने वाली है और इस सम्बन्ध में कुछ करना चाहिए। खत्री जी और आज़ाद के कुछ अन्य साथियों ने चन्द्रभानु गुप्त से मिलकर इस बात की जानकारी दी और आज़ाद की उस पिस्तौल को उचित सम्मान देने की अपील की। गुप्त जी ने प्रदेश के तत्कालीन गृह सचिव श्री मुस्तफी जी को इस सम्बन्ध में कार्यवाही करने के लिए आदेशित किया, जिन्होंने उस पिस्तौल की खोज के लिए दिन रात एक कर दिया। अंततः इलाहबाद मालखाने के 1931 के रजिस्टर में 27 फरवरी की तारीख में आज़ाद के पास से मिली पिस्तौल का उल्लेख और विवरण मिला, जिसके साथ ही एक नोट में लिखा हुआ था कि वह पिस्तौल नॉट बाबर एस एस पी को (जिनकी पहली गोली से आज़ाद घायल हुए थे) इंग्लैण्ड जाते समय कुछ चापलूस पुलिसवालों ने भेंट कर दी थी, जिसे वह अपने साथ इंग्लैण्ड ले गए थे।

चूँकि नॉट बाबर उत्तर प्रदेश सरकार से पेंशन पाते थे, श्री मुस्तफी ने उन्हें वह पिस्तौल तुरंत वापस करने के लिए लिखा। लेकिन काफी इंतज़ार के बाद भी जब उनसे कोई जवाब नहीं मिला तब इस मामले में केंद्र से मदद माँगी गयी। केंद्रीय शासन के सम्बंधित सचिव ने इंग्लैण्ड में उस समय के अपने हाई कमिश्नर अप्पा साहब को लिखा कि श्री नॉट बाबर से मिलकर और उन्हें समझा बुझाकर अथवा वह जो मूल्य माँगे, उसे देकर हर हाल में वह पिस्तौल प्राप्त कर ली जाये। पहले तो नॉट बाबर ने आनाकानी की पर बाद में समझाने बुझाने पर उन्होंने इस शर्त के साथ पिस्तौल अप्पा साहब को वापस की कि इसके बदले में उत्तर प्रदेश सरकार एल्फ्रेड पार्क में स्थित आज़ाद की मूर्ति की एक फोटो के साथ धन्यवाद का एक पत्र भेजे। इस प्रकार वह पिस्तौल 1972 के प्रारम्भ में इंग्लैण्ड से दिल्ली और वहां से फिर लखनऊ लायी गयी।

27 फरवरी 1973 को उस पिस्तौल को लखनऊ के गंगाप्रसाद मेमोरियल हॉल के सामने एक सुसज्जित वाहन पर शीशे के बंद बक्से में रखा गया, जिसकी रक्षा के लिए दोनों तरफ इन्स्पेक्टर रैंक के दो पुलिस अधिकारी तैनात थे। वहां से हज़ारों की संख्या में विशाल जुलूस कैप्टन रामसिंह के बैंड के साथ मार्च करता हुआ निकला। जुलूस में भारतवर्ष के लगभग 450 वयोवृद्ध क्रांतिकारी पैदल चलकर लखनऊ संग्रहालय पहुँचे। वहीँ संग्रहालय के प्रांगण में काकोरी काण्ड के प्रसिद्द क्रांतिकारी शचीन्द्रनाथ बख्शी की अध्यक्षता में विशाल जनसभा संपन्न हुयी। सभा के पश्चात मुख्यमंत्री कमलापति त्रिपाठी के अस्वस्थ होने के कारण उनके प्रतिनिधि के रूप में उत्तर प्रदेश सरकार के मंत्री बेनीसिंह अवस्थी ने ससम्मान लखनऊ संग्रहालय को वो कोल्ट पिस्तौल भेंट की। कई वर्षों तक वह पिस्तौल लखनऊ संग्रहालय में ही रही और जनता पार्टी के शासन के समय में जब इलाहबाद का नया संग्रहालय बनकर तैयार हुआ, तब लखनऊ से इलाहबाद ले जाकर संग्रहालय के विशेष कक्ष में रखी गयी, जिसे आज भी वहाँ देखा जा सकता है।

14 वर्ष के किशोर असहयोगी से भारतीय क्रांतिकारी दल के अजेय सेनापति बनने तक की आज़ाद की महागाथा अत्यंत रोमांचकारी है। वे बहुत गरीब ब्राह्मण परिवार में जन्में जो रूढ़ियों से बंधा हुआ था। उनके विद्रोही व्यक्तित्व ने उससे बहुत जल्द ही छुट्टी पा ली। अपनी शुरूआती संस्कृत की पढ़ाई से पीछा छुटाकर वे असहयोगी बने लेकिन वहीँ ठहर नहीं गए। उन्होने तेजी से छलांग लगाकर क्रांतिकारी पार्टी की सदस्यता ले ली और थोड़े ही समय में उंसके कमांडर इन चीफ के पद तक पहुँच गए। वे लम्बे समय तक निरंतर सक्रिय रहे, जिसका कोई दूसरा सानी नहीं मिलता। वे पुलिस की आँखों में धुल झोंक कर बड़े करतब करते रहे। भगतसिंह जैसे बौद्धिक क्रांतिकारी के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने में उन्होंने कहीं भी अपने को ओछा साबित नहीं होने दिया।

जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें अपनी आत्मकथा में ‘फासिस्ट’ कहा पर वे फासिज्म को व्याख्यायित नहीं कर पाये। उन्होंने लिखा है कि वह (आज़ाद) यह मानने को तैयार नहीं था कि शांतिपूर्ण साधनों से ही हिन्दुस्तान को आज़ादी मिल जायेगी। आज़ाद ने यह भी तर्क दिया कि आगे कभी सशस्त्र लड़ाई का मौक़ा आ सकता है, पर वह आतंकवाद न होगा। क्या ऐसा कहने वाला फासिस्ट हो सकता है। नेहरू से आज़ाद के ये तर्क उन्हें बौद्धिक क्रांतिकारी की श्रेणी में ला खड़ा करते हैं। गांधी और गांधीवादी लगातार क्रांतिकारियों की आलोचना करते हुए उन्हें ‘हिंसक’, ‘हत्यारे’ और ‘फासिस्ट’ कहते रहे, पर गांधी को ‘महात्मा’ और ‘राष्ट्रपिता’ कहने के बाद भी भारतीय जनता ने क्रांतिकारियों की उनकी इस आलोचना को सिरे से खारिज कर दिया।

आज़ाद जीते जी किंवदंती बन गए थे। जनता में वे बेहद लोकप्रिय थे। उन पर अनेक लोकगीत रचे औए गाये गए। उनके चित्र लाखों की संख्या में बिके। आज़ाद पर उज्जैन के कवि श्रीकृष्ण सरल ने महाकाव्य लिखा। एक पुस्तक उनके पूरे युग पर मन्मथनाथ गुप्त ने भी लिखी। आज़ाद के विश्वस्त साथी विश्वनाथ वैशम्पायन ने तीन भागों में उनकी जीवनी की रचना की। भगवान दास माहौर, सदाशिव मलकापुरकर और शिव वर्मा ने ‘यश की धरोहर’ में आज़ाद पर लिखा। यशपाल जी ने ‘सिंहावलोकन’ में आज़ाद के साथ उनके पूरे समय पर सुन्दर किन्तु तथ्यों की दृष्टि से विवादास्पद ढंग से लिखा। उन्होंने 1939 में ‘विप्लव’ का आज़ाद अंक भी निकाला। 1964 में ‘नर्मदा’ का आज़ाद विशेषांक पंडित बनारसीदास चतुर्वेदी के संपादन में प्रकाशित हुआ। शिव वर्मा ने अपनी सुप्रसिद्ध पुस्तक ‘संस्मृतियाँ’ में आज़ाद के साथ अपनी अंतरंगता को लिपिबद्ध किया। सुखदेवराज ने ‘जब ज्योति जगी’ में विस्तार से अपने संस्मरण लिखे। इसके अतिरिक्त आज़ाद पर उनके बलिदान अर्धशती वर्ष में एक स्मारिका भी जारी हुयी। इसके बाद आज़ाद के साथी रहे रामकृष्ण खत्री ने ‘शहीदों की छाया में’ जैसी आत्मरचना हमें दी। लेकिन भगतसिंह पर बहुत तथ्यपूर्ण कार्य होने के बावजूद आज़ाद पर वैसी संलग्नता से कोई पुस्तक नहीं आ सकी।

आज आज़ाद का कोई क्रांतिकारी साथी जीवित नहीं है। स्वतंत्र भारत में उनके सारे साथियों की एक एक करके मौत होती रही और किसी ने कुछ जानने की जरुरत ही नहीं समझी। वे सब गुमनाम चले गए, जिनके ना रहने पर किसी ने आँसू नहीं बहाये, कहीं कोई मातमी धुन नहीं बजी। किसी को पता ही नहीं लगा कि जमीं उन आस्माओं को कब और कहाँ निगल गयी। आज़ाद को आज आज़ाद भारत में याद करने वाले गिने चुने ही हैं। अजय माकन और रमन सिंह जैसों को भी नहीं पता कि भगतसिंह और चन्द्रशेखर आज़ाद में क्या अंतर है। सरकारें और नेता क्यों आज़ाद को याद करें? वो कोई गांधी नहीं, जिन्हें ब्रांड बनाकर दुनिया में अपने को चमकाया जा सके, वो कोई आंबेडकर नहीं जिनके नाम पर वोट जुगाड़े जा सकें, वो कोई भगतसिंह भी नहीं जिनके साथ खुद को जोड़कर अपने को प्रगतिवादी और जनवादी दिखाया जा सके।

लेकिन ताज्जुब तब होता है, जब साहित्य और संस्कृति की दुनिया भी आज़ाद के नाम से किनारा करती हुयी दिखाई देती है। कोई आज़ाद को बौद्धिक क्रांतिकारी नहीं मानता तो शम्भूनाथ शुक्ल जैसे कथित प्रगतिशील उनके ब्राह्मण होने या उनकी जनेऊ वाली तस्वीर को देखकर नाक भौं सिकोड़ते हैं। आज़ाद का कृतित्व आज भी एक चुनौती है। निरे बौद्धिक और किताबी समाज के लिए उनका मूल्यांकन करना आसान नहीं है। आज़ाद के चारों ओर एक धुंध फैलाने का कार्य बरसों हुआ। तब भी, जब उनके कुछ साथी जीवित थे। कई लोगों ने उनकी तस्वीर को धुंधला करने का प्रयास किया लेकिन आज़ाद इतिहास में जिस स्थान पर पहुँच गए हैं, वहां उन्हें छू पाना संभव नहीं था। उनका स्थान हमारे हृदयों में है। हमारे लिए वो नायक थे और सदैव रहेंगे।

तुमने दिया देश को जीवन, देश तुम्हें क्या देगा।
अपनी आग तेज करने को, नाम तुम्हारा लेगा॥
वीरता की प्रतिमूर्ति चंद्रशेखर आज़ाद को कोटि कोटि नमन एवं विनम्र श्रद्धांजलि।

-Vishal Agrawal

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