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क्या पॉस्को अधिनियम में संशोधन न्याय सुनिश्चित कर सकेगा?

कठुआ में हुए तथाकथित बलात्कार काण्ड के बाद उपजे भारी दबाव में सरकार ने ऑर्डिनेंस लाकर पॉस्को एक्ट में बदलाव करके और कठोर प्रावधान शामिल किये. इस बदलाव  के बाद से  बलात्कार के  सभी मामलों में फांसी की आवाजें उठ रही है, लोगों के सवाल हैं आखिर सभी मामलों में फांसी क्यों नहीं? हालाँकि निजी तौर पर मैं  जघन्य अपराधों के लिए फांसी का समर्थक हूँ लेकिन ऐसे सवालों के जवाब निर्भया कांड के बाद मिलते हैं।

निर्भया कांड के बाद कानून में सख्ती की गयी लेकिन इस सख्ती के अपराध में कमी भले न आई हो लेकिन इस कानून के दुरूपयोग में भारी वृद्धि हुई। एक लम्बे वक्त तक प्रेम सम्बन्धों में रहने के बाबजूद बलात्कार के मुकदमे दर्ज करवाए जाने लगे हैं, स्थिति इस कदर खराब हुई है कि गाँव-कस्बों में दो युवकों की आपसी लड़ाई के बाद जब थाने में मुकदमा दर्ज होता तो इन युवकों के घरों की महिलाओं बलात्कार, छेड़खानी का मुकदमा दर्ज करवाती हैं। कई बार इन कानूनों का इस्तेमाल रुपए ऐठनें के लिए भी किया जाता है। ऐसे मामलों में पुरुष की कोई सुनवाई नहीं हैं, महिलाओं के मामलें में जांच से पूर्व ही पुरुष बलात्कारी घोषित कर दिया जाता है।

बीबीसी के मुताबिक एक सर्वे में दिल्ली में 2013-2014 के बाद दर्ज हुए ज्यादातर पॉस्को मामले फर्जी थे। दिल्ली महिला आयोग की 2014 की रिपोर्ट माने तो साल 2013 में बलात्कार के 53 फीसदी मामले फर्जी थे। ‘द हिंदू’ की एक पत्रकार रुक्मणि श्रीनिवासन ने एक अदालत में बलात्कार के मामलों का अध्ययन किया, 460 मामलों में केवल 12 मामलों में ही किसी अनजान पर बलात्कार का आरोप था। इनमे एक तिहाई से अधिक मामलों में लड़की ने अपना इच्छा से सम्बन्ध बनाए थे लेकिन जब यह बात उनके परिजनों को पता लगी तो उन्होंने इस रिश्ते को तोड़ने के लिए बलात्कार के मामले दर्ज कराए। वहीं एक चौथाई मामले ऐसे थे जिसमें प्रेम संबंधो के बाद पुरुष के शादी से इनकार के बाद महिला ने बलात्कार का मामला दर्ज कराया था।

जुलाई 2018 में दिल्ली की एक निचली अदालत ने बलात्कार के झूठे मामले में एक व्यक्ति को बरी करते हुए कहा, ”दिल्ली पर ‘रेप कैपिटल’ का ठप्पा लगने की वजह झूठे मामले हैं।” न्यायाधीश एएसजे विरेंद्र भट ने कहा कि यहां एक चलती बस में 16 दिसंबर के गैंग रेप की घटना से ऐसा माहौल बना कि महज किसी महिला का यह बयान कि उसके साथ रेप हुआ है, उसे अटल सत्य माना जाने लगा और आरोपी को गिरफ्तार कर उसके खिलाफ चार्जशीट दायर होने लगी। अदालत ने कहा कि इन मामलों में बरी किए गए लोगों की खबरें बमुश्किल छपती हैं। मीडिया इस तरह के मामलों में बरी किए जाने के फैसले के प्रति आंखें मूंद लेता है। वहीं फंसाए गए लोग समाज में अपना मान-सम्मान खो देते हैं और चूंकि इसे दोबारा नहीं पाया जा सकता, इसलिए इन पीडि़तों के नुकसान की भरपाई की जाए ताकि वे फिर से एक नई जिंदगी शुरू कर सकें। यह बहुत ही अफसोस की बात है कि कमजोर, बीमार और बूढ़े लोग भी बलात्कार के झूठे आरोपों से अछूते नहीं हैं।

यह मात्र दिल्ली की स्थिति नहीं हैं। हरियाणा, मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश सभी जगह ऐसे मामले हैं। दहेज कानून की स्थिति इससे भी अधिक भयावह है। इस कानून के तहत युवक को परिवार सहित आग में झोंक दिया जाता है। इस कानून के दुरुपयोग पर सुप्रीम कोर्ट ने भी सख्ती जताते हुए तुरंत गिरफ्तारी पर रोक लगा दी है। यह कानून अब व्यवसाय बन चुका है। महिला कानूनों के दुरूपयोग से हर साल हजारों युवक आत्महत्या कर लेते हैं लेकिन उनकी कहीं चर्चाएँ नहीं होतीं। अगर बलात्कार के सभी मामलों में फांसी चाहिए तो दहेज-बलात्कार के फर्जी मुकदमों में फंसाने वाली महिलाओं के खिलाफ भी फाँसी या उम्रकैद की सजा होनी चाहिए। फिलहाल पॉस्को एक्ट में बदलाव हुआ है शायद बलात्कार के मामलों में कमी आएगी लेकिन मैं आश्वस्त हूँ कि फर्जी मामलों में तेजी से इजाफा होगा। इस विषय में विभिन्न स्त्रोतों द्वारा हुई रिपोर्ट्स को आपके अवलोकनार्थ प्रस्तुत कर रहा हूँ :

अंग्रेज़ी अख़बार ‘द हिंदू’ की पत्रकार रुक्मणि श्रीनिवासन का तबादला मुंबई से दिल्ली हुआ. दिल्ली पहुंचकर उन्होंने यह पता लगाने की कोशिश की कि दिल्ली को रेप की राजधानी क्यों कहा जाता है.उन्होंने 2013 में दिल्ली की अदालतों में चले 460 मामलों का अध्ययन किया. इनमें से केवल 12 मामलों में ही किसी अनजान पर बलात्कार का आरोप था. एक तिहाई से अधिक मामले जिनमें युवा शामिल थे. उन्होंने अपनी मर्जी से सेक्स किया. लेकिन जब यह बात उनके परिजनों को पता लगी तो उन्होंने इस रिश्ते को तोड़ने के लिए बलात्कार के मामले दर्ज कराए. इनमें से बहुत से मामले अंतर्जातीय और अलग-अलग धर्मों के थे.वहीं एक चौथाई मामले ऐसे थे जिसमें पुरुष के शादी से इनकार के बाद महिला ने बलात्कार का मामला दर्ज कराया था. हालांकि कई देशों में इस तरह के मामलों को बलात्कार नहीं माना जाता है. लेकिन भारत में इस तरह की परिस्थितियों में बलात्कार के आरोप का सामना करना पड़ता है. बीबीसी हिंदी

2015 में मानवाधिकार आयोग को महिला उत्पीड़न की 17,479 शिकायतें दर्ज हुई थीं, जिनमें उन्होंने 14,800 मामले निस्तारित किए. क्योंकि निरस्त मामलों में आरोप झूठे थे:  जी न्यूज़

2013 में कोर्ट ने कहा था कि बलात्कार के झूठे मामलों ने दिल्ली को रेप कैपिटल बना दिया है अदालत ने कहा कि इन मामलों में बरी किए गए लोगों की खबरें बमुश्किल छपती हैं। वहीं फंसाए गए लोग समाज में अपना मान-सम्मान खो देते हैं और चूंकि इसे दोबारा नहीं पाया जा सकता, इसलिए इन पीडि़तों के नुकसान की भरपाई की जाए ताकि वे फिर से एक नई जिंदगी शुरू कर सकें।यह बहुत ही अफसोस कीबात है कि कमजोर, बीमार और बूढ़े लोग भी बलात्कार के झूठे आरोपों से अछूते नहीं हैं : नवभारत टाइम्स

यूपी का महिला आयोग कहता है 99 फीसदी मामले जांच के बाद फर्जी पाये जाते हैं यानि वर्षों तलक जेल की सजा, समाज में इज्जत नौकरी परिवार सब कुछ बिखर जाता है। जिन महिलाओं के साथ वाकई में अत्याचार होते हैं वो किसी न किसी की बहन बेटी होती है और झूठे केसों में फंसने वाला युवक किसी का बेटा, भाई नहीं? उसकी कोई कद्र नहीं, उसकी कहीं बात नहीं : दैनिक जागरण 

सुप्रीम कोर्ट ने 2012 के आंकड़े के आधार पर कहा था कि दहेज कानून के तहत 197762 लोग गिरफ्तार हुए जिनमे एक चौथाई माँ बहन थीं जिन्हें पति के साथ ही झूठे आरोपों में जेल में डाला गया : एनडीटीवी इंडिया 

साल दर साल आंकड़ा बढ़ रहा है। दिल्ली की एक ही अदालत में 2013 में 460 मामलों में से मात्र 12 सही थे। यानि 448 युवकों की जिंदगी बर्बाद हुई। वो जेलों में रहे, समाज में इज्जत, नौकरी कुछ भी नही बचा। जिस दिल्ली को रेप कैपिटल कहकर बदनाम किया जाता है वहां 2013 में 53 फीसदी मामले फर्जी हैं: इंडिया संवाद

हरियाणा पुलिस ने राज्य के विभिन्न पुलिस थानों में 26 अक्तूबर 2014 से लेकर 20 फरवरी 2015 तक की अवधि के दौरान महिला उत्पीडऩ के 2715 केस दर्ज किए गए। जिनमें सबसे अधिक 1024 केस दहेज उत्पीडऩ से संबंधित थे। इसके महिलाओं व लड़कियों के अपहरण से संबंधित 621 केस दर्ज किए गए। इसके अलावा इस अवधि के दौरान बलात्कार के 330, महिलाओं व युवतियों से छेड़छाड़ के 271, यौन उत्पीडऩ के 169 केस दर्ज किए गए हैं।इस अवधि के दौरान पुलिस ने प्रदेश में दहेत उत्पीडऩ की कुल 1024 में से 180 शिकायतों को फर्जी पाया और केस रद्द कर दिए गए। यही नहीं महिला उत्पीडऩ की श्रेणी में सर्वाधिक चर्चित रहे बलात्कार के कुल 330 केसों में 32 केस फर्जी पाए गए। पुलिस ने इन केसों को खारिज कर दिया गया। इसके अलावा पुलिस ने इस दौरान छेड़छाड़ के 37 केस रद्द किए हैं। गृह विभाग ने इस अवधि के दौरान रद्द किए गए केसों में साफ लिखा है कि असत्य पाए जाने के कारण इन केसों को रद्द किया गया है: पत्रिका न्यूज़

हरियाणा: पुलिस के आंकड़ों पर गौर करें तो दुष्कर्म और छेड़छाड़ के फर्जी मामलों में पिछले तीन वर्षों से एकाएक बढ़ोतरी हुई है। वर्ष 2014 से अब तक दुष्कर्म का हर चौथा और छेड़छाड़ का हर तीसरा केस फर्जी दर्ज हुआ। इन तीन वर्षों में दुष्कर्म के अब तक 174 केस दर्ज हुए, जिनमें से 42 कैंसिल हुए, वहीं छेड़छाड़ के 386 मामलों में एफआईआर दर्ज हुई जिनमें 107 झूठे पाए गए: दैनिक भाष्कर 

–  विशाल महेश्वरी 

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