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महेंद्र सिंह धोनी – क्रिकेट से परे एक प्रेरणास्त्रोत

Mahendra Singh Dhoni

23 मार्च 2003..

जोहानेसबर्ग का वांडरर्स स्टेडियम. आठवें क्रिकेट विश्वकप का फाइनल. ऑस्ट्रेलिया 359 पर 2. भारत के सामने एक असंभव लक्ष्य. पहले ही ओवर में सचिन तेंदुलकर आउट. उसके बाद 125 रनों से करारी हार. सवाल… क्या भारतीय क्रिकेट की गोल्डन जेनरेशन कभी विश्वकप नहीं जीत पाएगी ..

इन सभी चीजों से दूर 21 साल का एक लड़का खड़गपुर में रेलवे के क्वार्टर में पड़ा था. अगले दिन कौन से प्लेटफार्म पर कौन सी गाड़ी आएगी सोचता हुआ. भारतीय टीम के लिए क्रिकेट खेलना उसका बचपन से सपना था, जिन लोगों ने उसकी बायोपिक देखी है उन्होंने ये सब फ़िल्म में देख लिया होगा. नियति को ये स्वीकार था कि ये लड़का क्रिकेट खेले भारतीय टीम के लिए.

महेंद्र सिंह धोनी का भारतीय क्रिकेट में पदार्पण और उत्थान, सफलता की ऐसी कहानी है जो क्रिकेट में पहले बहुत कम देखी गई है.

रामधारी सिंह दिनकर कहते हैं,

“समझे कौन रहस्य ? प्रकृति का बड़ा अनोखा हाल,
गुदड़ी में रखती चुन-चुन कर बड़े कीमती लाल”

किसने सोचा था कि राँची जैसे छोटे शहर से आने वाला लड़का धोनी विश्व क्रिकेट पर ऐसे छा जाएगा, मानो कह रहा हो

“चरण का भार लो, सिर पर सम्भालो,
नियति की दूतियों मस्तक झुका लो,
चलो जिस भाँति चलने को कहूँ मैं,
ढलो जिस भाँति ढलने को कहूँ मैं”

जब सौरव गांगुली ने पूरे विश्वकप में राहुल द्रविड़ से कीपिंग कराई तो इसके पीछे एक विवशता थी, वो एक अतिरिक्त बल्लेबाज खिलाना चाहते थे, कोई विकेटकीपर ऐसा था नहीं जो रेगुलर रन बना सके, जिस दौर में दुनिया की अन्य टीमों के पास एडम गिलक्रिस्ट, एंडी फ्लावर, मार्क बाऊचर जैसे विकेटकीपर बल्लेबाजों की लग्जरी थी, हमारे पास ऐसा कोई न था… नयन मोंगिया की विदाई के पांच साल तक प्रयोग चलते रहे, अजय रात्रा, दीप दासगुप्ता, पार्थिव पटेल, दिनेश कार्तिक… इन सबके बाद अवसर मिला महेंद्र सिंह धोनी को..

पहले ही साल में पाकिस्तान और श्रीलंका के खिलाफ दो घोषणात्मक पारियों (Daddy Hundreds) 148 और 183 ने बता दिया था कि भाई मात्र प्रयोग का हिस्सा बनने नहीं बल्कि इतिहास लिखने आया था, ये सिर्फ शुरुआत थी, भारतीय फैन्स को नया पोस्टर बॉय मिल चुका था जो रन चेज़ में चोक नहीं करता था. इसका सबसे अच्छा उदाहरण हमने देखा 2006 में पाकिस्तान में लाहौर और कराची में… लाहौर में 5 विकेट गिरने के बाद बल्लेबाजी करने आये धोनी ने 46 गेंद पर 72 नाबाद बना दिये… फैसलाबाद में 148… भारतीय टीम के इतिहास में विकेटकीपर बल्लेबाज से ऐसी अपेक्षा कभी नहीं कि जाती थी. “दिस बॉय वाज स्पेशल.”

कुछ निर्णय बहुत लंबी प्लानिंग और स्टडी पर आधारित होते हैं, कुछ इंस्टिंक्ट के आधार पर…. कई बार फँसे हुए मैच में कानों में आवाज गूँजती है, “नाद्वे मणिबंधम, बहिर्मुखम”

सलाहकार आपको कहते कि हरभजन सिंह बड़ा गेंदबाज है, इसका एक ओवर बचा है, आखिरी ओवर इसी को दो, कप्तान की इंस्टिंक्ट कहती है, जोगिंदर शर्मा को दो. इसके सामने गलती करेगा मिस्बाह. मिस्बाह ने गलती की और विश्वकप हमारा हुआ।

वर्ल्ड T20 2016 में बांग्लादेश को एक गेंद पर दो रन चाहिए, वो एक हाथ से दस्ताना उतार कर गेंद थ्रो करने के लिए तैयार होता है, लेकिन जैसे ही गेंद हाथ मे आती है, वो गेंद फेंकने की बजाय स्वयं दौड़कर ही स्टम्प्स बिखेर देता है.

चैंपियंस ट्रॉफी 2013 का फाइनल… रवि बोपारा और ऑइन मोर्गन कूट रहे हैं, ईशांत शर्मा को ओवर दोगे तो और कूटेंगे. लेकिन कप्तान की इंस्टिंक्ट ने कहा ईशांत को ही दो, परिणाम ये हुआ कि ईशांत ने दोनों के विकेट ले लिए और चैंपियंस ट्रॉफी 2013 हमारी हुई… सबके बाद में 2011 का फाइनल…. युवराज सिंह शानदार फॉर्म में, पूरे विश्वकप में बेहतरीन प्रदर्शन.. इसको पहले भेजना चाहिए, लेकिन कप्तान को लगता है कि वो मुरली को युवराज से बेहतर खेल सकता है… दो घण्टे बाद नुवान कुलासेकरा की गेंद लॉन्ग ऑन के ऊपर से दर्शक दीर्घा में गिरी और कॉमेंट्री बॉक्स में रवि शास्त्री उछल उठे, “Dhoniiiiiii finishes off in style” ….. 2003 में जोहानेसबर्ग में मिले घाव अब जाके भरे…

उसका पसंदीदा गाना है, “मैं पल दो पल का शायर हूँ”.. वो वर्तमान में रहना पसंद करता है. इनसिक्योर फील नहीं करता अपनी जगह या उपलब्धि को लेकर. 2007 वर्ल्ड टी ट्वेंटी जीतने के बाद अपनी टी शर्ट के बच्चे की ओर फेंकता है और फिर गायब…. 2011 का विश्वकप जीतने के बाद सेलिब्रेशंस में वो कहीं दिखाई नहीं देता, कप्तान के रूप में नाम उसका ही आएगा लेकिन उसे पता है कि ये मोमेंट सचिन तेंदुलकर का है.. 2008 में नागपुर में जब सौरव गांगुली अपना आखिरी टेस्ट मैच खेल रहे हैं तो अंतिम क्षणों में कप्तानी उनको सौंप देता है…….

“मैं पल दो पल का शायर हूँ” में एक लाइन है “मसरूफ जमाना मेरे लिये, क्यों वक्त अपना बर्बाद करे” ….. 30 दिसम्बर 2014.. वो टेस्ट क्रिकेट से सन्यास लेकर सबको चौंका देता है… जब वो कम से कम दो साल और कप्तान रह सकता था, जनता के बीच सुपरहीरो इमेज, 10 टेस्ट बाकी थे 100 होने में, कुछ रन बचे थे 5000 होने में.. तमाम तरह की कॉन्सपिरेसी थ्योरी लिखी जाती हैं उसकी रिटायरमेंट पर. 2017 में वो वन डे T20 की कप्तानी भी विराट कोहली को सौंप देता है, क्योंकि उसे पता है 2019 के लिए विराट को समय चाहिए. इसके बाद भी विकेट के पीछे से आधी कप्तानी संभालता है ताकि विराट कहीं भी फील्डिंग कर सके…

2018 में चेन्नई सुपर किंग्स की वापसी होती है आईपीएल में, सारे खिलाड़ी 30-35 साल के, सीनियर सिटीजन टीम कहकर मजाक भी बनता है इनका… लेकिन यही टीम इन्हीं सीनियर सिटीजन्स के दम पर चैंपियन बनती है.

आज जब कई बार धोनी को स्ट्रगल करते देखते हैं तो लगता है समय हो गया, लेकिन अंदर से आवाज़ आती है, “मssहेन्द्र बाहुबली को जीssssना होगा”

जिस तरह टेस्ट क्रिकेट से गया…. इसी तरह एक दिन वोे लिमिटेड ओवर क्रिकेट से भी चला जाएगा… एकदम से… अचानक… लेकिन जाने से पहले वो देश के कोने कोने में बैठे लड़कों को बता चुका है कि चाहे आप कहीं से आते हों आप शिखर पर जा सकते हैं.

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