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अलाउद्दीन ख़िलजी का हवसी जेहाद..

    alauddin-khilji-malik-kafoor

    बाजीराव मस्तानी में अमर पराक्रमी और वीरता के पर्याय पेशवा बाजीराव को एक भाण्ड मात्र दिखाने और फिर लतखोर हिन्दुओं द्वारा इस फिल्म को सफल बनाने के बाद मिली हिम्मत के बाद संजय लीला भंसाली लेकर आ रहा है पद्मावती जिसके प्रमुख किरदारों रणवीर सिंह द्वारा निभाया जा रहा अलाउद्दीन ख़िलजी, शाहिद कपूर द्वारा निभाया जा रहा रतन सिंह और दीपिका पादुकोण द्वारा निभाया जा रहा रानी पद्मावती, के फर्स्ट लुक हाल ही में जारी किये गए और इसी के साथ इस फिल्म के रिलीज होने की उलटी गिनती शुरू हो गयी और साथ ही हिन्दुओं की मूर्खताओं, उनके निक्कमेपन, उनके शून्य इतिहासबोध, अपने ही पूर्वजों को कलंकित करने की उनकी प्रवृत्ति और आक्रमणकारियों, आतताइयों, बलात्कारियों और अपने ही देश-धर्म-समाज-संस्कृति के प्रबल शत्रुओं का महिमामंडन करने की उनकी आदतों की श्रंखला में एक नया अध्याय जुड़ना भी लगभग तय हो गया|

    मुम्बइया फिल्म उद्योग के लिए कुछ भी कहने का कोई अर्थ नहीं क्योंकि इनसे कभी कोई आशा-अपेक्षा रही ही नहीं क्योंकि ये अपवादस्वरुप इक्का दुक्का लोगों को छोड़ कर पूरी तरह से मुस्लिम माफिया के पैसों और वामपंथियों की सोच पर चलने वाला उद्योग है, जहाँ प्रारम्भ के कुछ समय को छोड़कर हमेशा से ही मंदिर का पुजारी बलात्कारी और मुल्ला-पादरी सदाशयता के प्रतीक, हिन्दू सेठ-साहूकार बेईमान-अन्यायी और पठान बड़े दिलवाले-ईमानदार और गाँव का ठाकुर जमींदार अत्याचारी-अय्याश और कोई मुसलमान पात्र गरीबों का हमदर्द-फ़क़ीर टाइप होता रहा है| पूरी तरह अभारतीयता में रंगे मुम्बइया फिल्म उद्योग के लोग मनसा-वाचा-कर्मणा पूरी तरह देश विरोधी, हिन्दू विरोधी और सनातन संस्कृति विरोधी हैं और अपनी इस घृणा को उनका कोई ना कोई सदस्य जब तब जाहिर भी करता रहता है|

    पर हिन्दू समाज, इसको क्या कहें? इस कदर कोई समाज मर सकता है, अपने इतिहास को बिसरा सकता है, अपने नायकों को अपमानित कर सकता है और अपने ही अत्याचारियों को महिमामंडित कर सकता है, यक़ीन करना मुश्किल हो जाता है| कल किसी पोस्ट पर देखा, रणवीर सिंह के अलाउद्दीन वाले लुक पर लड़कियाँ हाउ क्यूट, सो डैशिंग, रियल हंक, वाउ और जाने क्या क्या कह रही थीं| कुछ का कहना था कि इतने क्यूट ख़िलजी के पास जाने में पद्मिनी को क्या प्रॉब्लम थी, वहीँ कुछ मुझ जैसों को रिग्रेसिव, ऑर्थोडॉक्स, फैनेटिक और इसी तरह के कई विशेषणों से नवाज रहीं थीं| समझ आ गया कि इस हिन्दू समाज का कुछ नहीं हो सकता| जिस जाति की महिलाओं में, जिन पर आने वाली पीढ़ी को परम्पराओं-संस्कारों और अतीत से जोड़ने की मुख्य जिम्मेदारी होती है, इस किस्म की मूर्खायें भरी हों, उसका उद्धार तो स्वयं भगवान् भी नहीं कर सकते|

    रणवीर सिंह अलाउद्दीन ख़िलजी के भेष में

    अलाउद्दीन ख़िलजी, क्रूरता और वासना का दूसरा नाम, आज हीरो फिगर बनाया जा रहा है और हम इसे रोकने में असमर्थ हैं| अपने सगे चाचा, जो कि उसका ससुर भी था, की कथित पवित्र माह रमज़ान में निर्दयता हत्या करने के बाद, उसके कटे सर की परेड कराने वाला अलाउद्दीन ख़िलजी अगर कुछ था, तो वो था एक क्रूर हत्यारा, एक कट्टर धर्मांध, एक बलात्कारी और सबसे बढ़कर हिन्दुओं का परम शत्रु| वो बहुत फ़क़्र से कहता था कि मैंने हिन्दुओं का बुरी तरह से मानमर्दन किया है और वो चूहों की भाँति अपने बिलों में घुस गए हैं| दक्षिण में देवगिरि का यादव साम्राज्य हो या गुजरात का गुर्जर राज, उसके आक्रमणों में केवल अपना राज्य बढ़ाने की ही मंशा नहीं थी, साथ में थी हमेशा की तरह मुस्लिम शासकों की धार्मिक मदांधता, जिसके चलते न केवल मंदिरों को पददलित किया गया, देव प्रतिमाओं को अपमानित किया गया; बल्कि हिन्दुओं का हज़ारों की संख्या में कत्लेआम किया गया, हिन्दू स्त्रियों के साथ बलात्कार किये गए, उन्हें गुलाम बनाया गया और उनके शरीरों को नोचा-खसोटा गया|

    युद्ध के नियमों को तो वैसे कभी किसी मुस्लिम शासक ने नहीं माना, पर गुजरात के राजा कर्णदेव बघेला पर आक्रमण करते समय सारी मर्यादाएं भूलते हुए रात में आक्रमण किया गया और सोते हुए आम लोगों को इस्लाम के नाम पर क्रूरतापूर्वक मारा गया| इसी युद्ध में राजा कर्णदेव की सुन्दर पत्नी कमलादेवी भी भागते हुए पकड़ ली गयी, जिससे बाद में अधिकांश में उसी की सहमति से अलाउद्दीन ने विवाह कर उसे मल्लिका बना लिया| इसी आक्रमण में महमूद ग़ज़नवी द्वारा पहले तोड़े गए सोमनाथ मंदिर, जिसे हिन्दुओं ने फिर से उसी शान के साथ खड़ा कर लिया था, को फिर से नष्ट-भ्रष्ट कर दिया गया और हिन्दुओं की अस्मिता को अपमानित करने के उद्देश्य से मंदिर की मूर्तियों को अलाउद्दीन ने अपने सिंहासन की सीढ़ियों में लगवा दिया|

    हिन्दुओं को लेकर ख़िलजी की सोच का अंदाज केवल इस एक बात से लगाया जा सकता है कि उसके द्वारा नियुक्त प्रधान काजी का मानना था कि यदि कोई मुसलमान थूकने की इच्छा ज़ाहिर करता है तो हिन्दू को आगे बढ़कर अपना मुँह खोलकर उसके आगे हाज़िर करना ही चाहिए| ख़िलजी ने कमलादेवी की शह पर राजा कर्णदेव से हुयी उसकी बेटी देवलदेवी को भी देवगिरि को हराकर अपहृत करा लिया, बलात उसका धर्म परिवर्तन कर उसका विवाह अपने बेटे खिज्रखाँ से कर दिया| वही खिज्रखाँ जिसके नाम पर, हज़ारों सखियों संग रानी पद्मिनी के जौहर के बाद, 30000 राजपूतों का कत्लेआम कर, चित्तौड़ के किले का नाम खिज्राबाद कर दिया था खिलजी ने|

    खिज्रखाँ की हत्या के बाद बदकिस्मत देवल देवी को पहले अलाउद्दीन ख़िलजी के प्रेमी हिजड़े मलिक काफूर का कृपापात्र बन कर रहना पड़ा और फिर ख़िलजी के दूसरे पुत्र मुबारिक शाह ने उसे जबरदस्ती अपनी पत्नी बना लिया| देवलदेवी ने बाद में योजनाबद्ध ढंग से अपना प्रतिशोध गुजरात से ही जबरदस्ती लाकर मुस्लिम बना दिए एक लड़के अर्थात मुबारिक शाह के विश्वासपात्र खुसरू खान के साथ मिलकर लिया। हिन्दू जिजीविषा की अद्भुत गाथा, रोमांचित करने वाली ये कहानी फिर कभी| अगर कोई फिल्म सच में बननी चाहिए थी तो खुसरू शाह और देवल देवी की इस अदम्य जिजीविषा पर बननी चाहिए थी| पर क्या कहें?

    अगर अलाउद्दीन पर ही फिल्म बननी थी तो वो पद्मावती और ख़िलजी की किसी कथित प्रेम कहानी पर नहीं जिसके बारे में तत्कालीन इतिहास में कहीं कुछ दर्ज़ नहीं, बल्कि ख़िलजी के गुलाम मलिक काफूर और उसकी प्रेम कहानी पर बननी चाहिए थी, जिसके बारे में इतिहास में भरपूर साक्ष्य मिलते हैं| इसे और शानदार बनाने के लिए बॉलीवुड तारिख-ए-फ़िरोज़शाही का सहारा ले सकता है, जिसके अनुसार ख़िलजी के हरम में 50000 गुलाम लड़के रहते थे, जिनमें से 20000 सुन्दर किशोरों और बच्चों का अपहरण उसने अपनी गुजरात विजय के बाद किया था|

    सच तो ये है कि अलाउदीन ख़िलजी पर कोई भी फिल्म केवल यही प्रदर्शित करने के लिए बनायी जा सकती है कि वो कितना क्रूर, मदांध, कामपिपासु और वहशी शासक था| जिसने अपने पूरे जीवन में केवल और केवल वहशियत का नंगा नाच किया| पर बॉलीवुड का क्या, कल को वो खिज्रखाँ और देवल देवी की प्रेम कहानी पर भी कोई फिल्म बना सकता है क्योंकि इस बारे में तो बहुत सी फ़र्ज़ी कहानियाँ मुस्लिम इतिहासकारों द्वारा लिखी गयी हैं| जबकि पद्मिनी और अलाउद्दीन के बारे में तो कोई ऐतिहासिक साक्ष्य उपलब्ध भी नहीं| यहाँ ये बता देना आवश्यक है कि खिज्रखाँ और देवल देवी की कथित प्रेम कहानियां झूठ के पुलिन्दों से ज्यादा कुछ नहीं क्योंकि देवल देवी और खुसरू शाह द्वारा बाद में मुस्लिम सत्ता को दी गयी चुनौतियाँ ये सिद्ध करती हैं कि दोनों भले ही ऊपर से मुस्लिम बन गए थे, परन्तु उनके मन में हमेशा ही अपने मूल धर्म के लिए एक लौ जलती रही|

    पर वाह रे हिन्दू समाज, उसे ना खुसरू शाह से मतलब है, और ना देवल देवी से, उसे ना हरिहर और बुक्का के बारे में रत्ती भर पता है और ना विद्यारण्य स्वामी के बारे में, उसे अगर कुछ पता है तो बॉलीवुड के भाँडों द्वारा परोसा गया झूठा और बनावटी इतिहास, जिसका केवल एक ही उद्देश्य होता है, हिन्दू अस्मिता पर चोट| जोधा-अकबर हम देख ही चुके हैं, पद्मावती-अलाउद्दीन ख़िलजी हम देखने जा ही रहे हैं; ज्यादा दिन नहीं बीतेंगे जब हम मोहम्मद बिन कासिम को भी एक भावुक प्रेमी के रूप में देखेंगे और सूर्या-परमिला नामक राजा दाहिर की उन दो ललनाओं को उसकी प्रेमिका के रूप में और यहाँ से शुरू होकर ये किस्से हर बार किसी अत्याचारी-अन्यायी-धर्मांध मुस्लिम शासक को नायक की तरह हमारे सामने प्रस्तुत करते रहेंगे और उनके अत्याचार का शिकार किसी हिन्दू ललना को उनकी प्रेमिकाओं के रूप में और हम ये सब देखने के लिए अभिशप्त हैं क्योंकि एक समाज के तौर पर हम बेगैरत हो चुके हैं, ख़त्म हो चुके हैं, मर चुके हैं|

    विशाल अग्रवाल (लेखक भारतीय इतिहास के गहन जानकार, शिक्षाविद और हाशिये के लोगों को मुख्यधारा से जोड़ने में प्रयासरत हैं|)

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      Vishal Agrawal

      The author Vishal Agrawal

      श्री विशाल अग्रवाल भारतीय इतिहास के गहन जानकार, शिक्षाविद और हाशिये के लोगों को मुख्यधारा से जोड़ने में प्रयासरत सामाजिक कार्यकर्त्ता हैं

      1 Comment

      1. Abe harami teri bato main nafrat bhari hai beshak film main jo dikhaya us ke hisab se alauddin kutta ek ayyash thaa ham aaise harami ko musalman hi nahi samazhte par kutte tu bhi apni soch ko badal kamine

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