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क्यों और कब लगता है प्रयाग, हरिद्वार, उज्जैन, नासिक में कुंभ?

कुंभ

मानव जीवन का परम एवं चरम लक्ष्य है अमृत्व की प्राप्ति। पुराण वर्णित देवासुर संग्राम में समुद्र मंथन से अमृत कलश प्रकट हुआ था| भगवान विष्णु ने स्वयं मोहिनी रूप धारण कर दैवी प्रकृति वाले देवताओं को अमृतपान कराया था। पर उससे पहले अमृत कलश पर अधिकार जमाने के लिए देव-दानवों में बारह दिन तक अविराम युद्ध छिड़ गया था। उस समय चंद्रमा ने घट से प्रस्रवण होने से, सूर्य ने घट फूटने से, गुरु ने दैत्यों के अपहरण से एवं शनि ने देवेन्द्र के भय से घट की रक्षा की। पर इस युद्ध के दौरान पृथ्वी के चार स्थानों (प्रयागहरिद्वारउज्जैननासिक) पर कलश से अमृत बूँदें छलक पड़ी थीं| अतः जिस समय जिस स्थान में अमृत कलश से अमृत बूँदें छलकी और चंद्र आदि ने कलश की रक्षा की थी, उस समय की ज्योतिषीय स्थिति जब चंद्र-सूर्य-गुरु ग्रह उसी स्थान पर बनाते हैं, तब उस स्थान पर कुंभ का योग होता है|

समुद्र मंथन

प्रयागराज कुंभ का शास्त्रीय व ज्योतिषीय आधार

प्रयाग में अमृत छलकने का समय वह था जब सूर्य मकर-राशि में (मकर-संक्रान्ति पर) तथा बृहस्पति वृष-राशि में प्रवेश किए थे। एक अन्य गणना के अनुसार सूर्य एवं चन्द्र मकर-राशि में तथा बृहस्पति के वृष-राशि में प्रवेश करने पर, माघ की अमावस्या को प्रयाग में कुम्भ-पर्व का आयोजन होता है। यहाँ के कुम्भ को ‘मकरस्थ कुम्भ’ भी कहा जाता है—

प्रयागे भास्करक्षेत्रे मकरस्थे रवौ सति।
मेषे जीवे मृगे चन्द्रे कुम्भाख्यो योग उच्यते॥
माघे मेषगते जीवे मकरे चन्द्रभास्करौ।
अमावस्या तदा योग: कुम्भाख्यस्तीर्थनायके॥

कृत्यसारसमुच्चय में कहा गया है:

माघामायां मृगे भानौ मेषराशिगते गुरौ।
कुम्भयोगो भवेत्तत्र प्रयागे त्वतिदुर्लभः॥

kumbh mela
प्रयाग कुंभ

एक और प्राचीन श्लोक के अनुसार प्रयाग कुम्भ-पर्व के पूर्ण योग के लिए माघी अमावस्या, मेष अथवा वृष के गुरु और श्रवण अथवा धनिष्ठा-नक्षत्र के पूर्वार्धजन्य मकरस्थ चन्द्र-भास्कर(सूर्य) का होना अत्यावश्यक है—

यदा स्यातं नक्रे दिनकरनि शेशौ खगरवौ।
सुमन्त्री देवानां रविसुतयोतोऽप्ती खलु यदा॥
श्रुतिर्विश्वं माघे शमयति च विश्वाघमखिलं।
त्रिवेणी कुम्भोऽस्मिन् ननु नरकपातश्च न भवेत्॥

पद्मपुराण में कहा गया है—

मकरस्थे रवौ माघे प्रातः काले तथाऽमले।
गोष्पदेऽपि जले स्नानं स्वर्गदं पापिनामपि॥
—पद्मपुराणम्, उत्तरखण्ड, 127.5

नारदपुराण में कहा गया है—

मकरस्थे रवौ माघे गोविन्दाच्युत माधव।
स्नानेनानेन मे देव ! यथोक्तफलदो भव॥
—नारदपुराण, उत्तरपर्व, 63.13-14

अर्थात, मकर-राशि पर सूर्य के होते हुए माघ मास में त्रिवेणी के जल में किए हुए मेरे इस स्नान से संतुष्ट हो आप शास्त्रोक्त फल देनेवाले हों।

हरिद्वार कुंभ का शास्त्रीय व ज्योतिषीय आधार

सूर्य और चन्द्र जब मेष-राशि में हों और बृहस्पति कुम्भ-राशि में हों, तब हरिद्वार में ‘कुम्भ’ नामक योग होता है जो उत्तम माना गया है—

पद्मिनीनायके मेषे कुम्भराशिगतो गुरौ।
गंगाद्वारे भवेद्योगः कुम्भनामा तदोत्तमः।।
कृत्यमञ्जरी

बृहस्पति कुम्भ-राशि में हों और जिस दिन सूर्य मेष में जाएँ, उस दिन हरिद्वार में किए गए स्नान से पुनर्जन्म नहीं होता है। यह लोक में ‘कुम्भ’ के नाम से विख्यात है जो लोगों के द्वारा हर प्रकार से जाना जाता है—

कुम्भराशिगते जीवे यद्दिने मेषगे रवौ।
हरिद्वारे कृतं स्नानं पुनरावृत्तिवर्जनम्।
लोके कुम्भमिति ख्यातं जानीयात् सर्वतो नरैः।।

हरिद्वार कुंभ
हरिद्वार कुंभ

वसन्त ऋतु में विषुव-संक्रान्ति अर्थात मेष-राशि की संक्रान्ति होने पर तथा देवताओं के गुरु के कुम्भ- राशि में रहने पर हरिद्वार में ‘कुम्भ’ नामक योग बनता है। इस योग से मानव सुधा यानी अमृत प्राप्त करता है—

वसंते विषुवे चैव घटे देवपुरोहिते।
गंगाद्वारे च कुम्भाख्यः: सुधामिति नरो यत:।।

उज्जैन कुंभ का शास्त्रीय व ज्योतिषीय आधार

जब सूर्य मेष-राशि में और बृहस्पति सिंह-राशि में और प्रवेश किए थे, तब उज्जैन के क्षिप्रा में अमृत छलका। इस घटना की स्मृति में उज्जैन में यहाँ प्रत्येक 12 वर्ष पर ‘सिंहस्थ’ नामक कुम्भ का आयोजन होता है—

मेष राशि गते सूर्ये सिंह राशौ बृहस्पतौ।
उज्जियन्यां भवेत कुम्भः सदा मुक्तिप्रदायकः॥

उज्जैन कुंभ

उज्जैन सिंहस्थ कुंभ

प्रयाग की तरह उज्जैन के लिए भी ज्योतिषीय विकल्प उपलब्ध है—

घटे सूरिः शशी सूर्यः कुह्यां दामोदरे यदा।
धारायां च तदा कुम्भो जायते खलु मुक्तिदा:॥

कार्तिक दामोदर (कृष्ण) अमावस्या को सूर्य और चंद्र के साथ होने पर एवं सूरि (बृहस्पति) के तुला-राशि में प्रवेश होने पर मोक्षदायक कुम्भ धारानगरी (उज्जैन) में आयोजित होता है।

नाशिक कुंभ का शास्त्रीय व ज्योतिषीय आधार

जब सूर्य और बृहस्पति सिंह राशि में प्रवेश किए थे, तब नासिक के गोदावरी में अमृत छलका। मतांतर से बृहस्पति, सूर्य और चन्द्रमा के कर्क-राशि में प्रवेश करने पर अमावस्या-तिथि को गोदावरी-तट पर ‘सिंहस्थ’ नाम से प्रसिद्ध कुम्भ का आयोजन होता है—

सिंह राशि गते सूर्ये सिंह राशौ बृहस्पति।
गोदावर्या भवेत कुम्भो जायते खलु मुक्तिदः॥

जब सूर्य और बृहस्पति सिंह-राशि में प्रवेश किए थे, तब नासिक के गोदावरी में अमृत छलका। मतांतर से बृहस्पति, सूर्य और चन्द्रमा के कर्क-राशि में प्रवेश करने पर अमावस्या-तिथि को गोदावरी-तट पर ‘सिंहस्थ’ नाम से प्रसिद्ध कुम्भ का आयोजन होता है—

सिंहराशिं गते सूर्ये सिंहराशौ बृहस्पतौ।
गोदावर्यां भवेत्कुम्भो भक्तिमुक्तिमुक्तिदः॥

कृत्यसारसमुच्चय में कहा गया है—

कर्के गुरुस्तथा भानुचन्द्रश्चन्द्रक्षयस्तथा।
गोदावर्यां तदा कुम्भो जायतेऽवनिमण्डले॥
अयं योगस्तदा यदा गुरुः कर्कराशौभवेत्तस्मिन् श्रावणमावास्यायां सम्भवति॥

नासिक कुंभ
नासिक कुंभ

ब्रह्मपुराण में कहा गया है :

षष्टिर्वर्षसहस्राणि भागीरथ्यवगाहनम्।
सकृद्गोदावरीस्नानं सिंहयुक्ते बृहस्पतौ॥
—ब्रह्मपुराण, 175.84

अर्थात, जिस समय बृहस्पति सिंह-राशि पर हों, उस समय गोदावरी में केवल एक बार स्नान करने से मनुष्य साथ हज़ार वर्षों तक गंगा-स्नान करने के सदृश्य पुण्य प्राप्त करता है।

ब्रह्मवैवर्तपुराण में कहा गया है :

अश्वमेधफलं चैव लक्षणोदनजं फलम्।
प्राप्नोति स्नानमात्रेण गोदायां सिंहगे गुरौ॥

अर्थात, जिस समय बृहस्पति सिंह-राशि पर स्थित हों, उस समय गोदावरी में केवल स्नानमात्र से ही मनुष्य अश्वमेध-यज्ञ करने का तथा एक लाख गोदान करने का पुण्य प्राप्त करता है।

ब्रह्माण्डपुराण में कहा गया है :

यस्मिन् दिने गुरुर्याति सिंहराशौ महामते।
तस्मिन् दिने महापुण्यं नरः स्नानं समाचरेत्॥
यस्मिन् दिने सुरगुरुः सिंहराशिगतो भवेत्।
तस्मिंस्तु गौतमीस्नानं कोटिजन्माघनाशनम्॥
तीर्थानि नद्यश्चस तथा समुद्राः क्षेत्राण्यरण्यानि तथाऽऽश्रमाश्च।
वसन्ति सर्वाणि च वर्षमेकं गोदातटे सिंहगते सुरेज्ये॥

गोदावरी में सिंहस्थ-पर्व के समय देव, दानव, यक्ष और मनुष्यादि जो कोई गौतमी (गोदावरी) का स्नान तथा पान करेगा, वह समस्त संकटों से मुक्त होकर सर्वविजयी होगा। सिंहस्थ-गुरु के समय गोदावरी में विधिपूर्वक स्नान, पूजा, पाठ तथा दान करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है।

केवल प्रयाग और हरिद्वार में लगता है अर्धकुंभ!!

यही वे ज्योतिषीय स्थितियां हैं जिनके आधार पर चार जगहों पर कुंभ का आयोजन होता है| इन चार में से केवल हरिद्वार व प्रयागराज में अर्धकुंभ का भी आयोजन होता है, जो प्रत्येक दो पूर्णकुंभ मेलों की मध्यावधि में आता है| एक ही स्थान पर दो पूर्णकुम्भों में गुरु के 12 वर्ष के गोचर के कारण 12 वर्ष का अंतर होता है, अर्धकुंभ एक पूर्णकुम्भ के 6 वर्ष बाद लगता है| केवल हरिद्वार और प्रयाग में ही कुंभ की आवश्यक ज्योतिषीय शर्तों का अर्धभाग अर्धकुंभ के समय पूर्ण होता है इसलिए केवल हरिद्वार, व प्रयागराज में ही अर्धकुंभ लगता है| नासिक व उज्जैन में अर्धकुंभ नहीं लगता| प्रत्येक 12 पूर्णकुंभों के पश्चात 144 वर्षों में महाकुम्भ का आयोजन होता है| इस वर्ष मकर संक्रांति से महाशिवरात्रि तक प्रयागराज में अर्धकुंभ का आयोजन हो रहा है|

कुंभ कलश

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