भारत रत्न प्रणब मुखर्जी: एक शानदार प्रधानमंत्री जो मिल न सका

भारत रत्न प्रणब मुखर्जी

दीनदयाल उपाध्याय, माधवराव सिंधिया, राजेश पायलट की श्रेणी में रखे जाने के लिए आवश्यक नहीं कि आपकी हत्या ही की जाए बल्कि आपको राष्ट्रपति भी बनाया जा सकता है। जी हाँ, हम बात कर रहे हैं उनकी जिन्हें पूरा देश दादा कहता है। भारत के पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ‘पोल्टू दा’ एक बेहतरीन राजनीतिज्ञ। बहन अन्नपूर्णा ने कॉमिक्स के एक कैरेक्टर के नाम पर उनका नाम पर रख दिया था पोल्टू।

एक मजेदार विसंगति है कि आपका खून भी राजनीतिक कद तय करता है। सिक्खों का दिल जीतने के लिए मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाया जा सकता है तो दलितों का हृदय अपने पक्ष में करने के लिए रामनाथ को राष्ट्रपति। प्रणव दा जिस तीन धागे वाली बिरादरी से आते हैं, ऐसा मान लिया गया है कि उसके पास हृदय ही नहीं तो हृदय जीतने का प्रश्न भी नहीं।

खैर, ऐसी ही और तमाम विसंगतियों के बावजूद भारतीय राजनीति की एक बात मुझे बहुत शानदार लगती है कि स्वीकार्यता के लिए नेता और दल विपक्षियों को ‘कोट’ करते हैं। मसलन नेहरू ने संघ की प्रशंसा की, अटल ने इंदिरा को दुर्गा कहा (असमंजस), सोनिया ने आडवाणी की तारीफ की, अटल ने नेहरू की मृत्यु पर बहुत मार्मिक लिखा आदि..और पिछले ही वर्ष की बात है कि पूर्व राष्ट्रपति प्रणव दा संघ के कार्यक्रम को संबोधित कर रहे हैं।

प्रणव दा “अधिकतम संभावनाओं वाले” कांग्रेसी और सच्चे अर्थों में स्टेट्समैन रहे।

हार्पर कोलिन्स पब्लिकेशन की एक किताब द चिनार लीव्स’ में गांधी परिवार के करीबी और वरिष्ठ कांग्रेसी नेता एम एल फोटेदार कहते हैं कि इंदिरा गांधी के बाद प्रणब मुखर्जी और पीवी नरसिम्हा राव को कांग्रेस पार्टी का सर्वेसर्वा माना जा चुका था लेकिन अपने बेटे राजीव गांधी को राजनीति में लाने के फैसले के बाद सब कुछ बदल गया।

1990 में वीपी सिंह की सरकार गिरने के बाद प्रधानमंत्री पद के लिए चायनीज़ पॉलिटिशियन डेंग ज़ियोपिंग से प्रेरित प्रणब मुखर्जी तत्कालीन राष्ट्रपति आर वेंकटरमन के पसंदीदा उम्मीदवार थे लेकिन राजीव गांधी के नहीं। हालांकि कभी अपनी स्पेशल ब्रांड डनहिल पाइप की स्मोकिंग के लिये मशहूर प्रणब दा अपनी आत्मकथा के तीसरे खंड ‘कोअलिशन ईअर्स : 1996-2012’ में कहते हैं कि प्रधानमंत्री न बन पाने का सबसे बड़ा कारण उनकी हिंदी का कमजोर होना था। पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने प्रधानमंत्री न बन पाने का एक और कारण अपना राज्य बताया है।

‘मैं जिस राज्य से आता हूं वहां पिछले 34 सालों से लेफ्ट का शासन है और अगर कोई नेता पीएम बनने जा रहा है तो क्या उसका राज्य उसकी खुद की पार्टी के द्वारा संचालित नहीं होना चाहिए? डॉक्टर सिंह के साथ ऐसी कोई समस्या नहीं थी।’

प्रणब दा दो विषयों में एमए हैं- इतिहास और पॉलिटिकल साइंस, एलएलबी की डिग्री भी है। कैरियर की शुरुआत कोलकाता में डिप्टी एकाउंटेट जनरल (टेलीग्राफ एंड पोस्ट) के ऑफिस में क्लर्क के रूप में हुई। इसके बाद इन्होंने विद्यानगर कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर के रूप में पॉलिटिकल साइंस पढ़ाना शुरू कर दिया. इतना ही नहीं राजनीति में आने से पहले उन्होंने देशेर डाक (मातृभूमि की पुकार) में पत्रकारिता भी की।

उनके पैतृक गांव के पास छठी शताब्दी के गौड़ शासक शशांक ने एक मंदिर बनवाया था, प्रसिद्ध जपेश्वर महादेव मंदिर। ये वही शशांक है, जिसने कन्नौज के राजा हर्षवर्धन के भाई प्रभाकर वर्धन को मार दिया था, बाद में हर्षवर्धन ने उसे हराकर अपने भाई का बदला लिया था। जब 1999 में जपेश्वर महादेव मंदिर का पुनर्निमाण हुआ तो, प्रणव मुखर्जी ने उसके लिए सरकार से एक करोड़ रुपए की सरकारी सहायता दिलवाने के लिए प्रमुख भूमिका अदा की थी।

आपको ये जानकर हैरत होगी इस राजा शशांक को हिंदूवादी शासक माना जाता था, जो बौद्धों का विरोधी था। इसी के चलते इतिहास में आपने हमेशा इसे विलेन के तौर पर ही पढ़ा है लेकिन प्रणव मुखर्जी समेत उत्तर बंगाल के लोग उसको काफी सम्मान देते हैं। ये भी काफी दिलचस्प बात है कि राजा शशांक ने जिसे शहर कर्ण सुवर्ण को अपनी राजधानी बनाया था, उसके अवशेष प्रणव मुखर्जी के संसदीय क्षेत्र जंगीपुरा में ही मिलते हैं यानी मुर्शिदाबाद जिले का गंगाभाटी क्षेत्र।

पोस्तो पसंद करने वाले और मंगलवार को छोड़ लगभग हर दिन मछली करी खाने वाले पोल्टू दा
को चंडी पाठ कंठस्थ है। पिछले पचास वर्षों से नियमित चंडी पाठ करते रहे हैं।

सप्तशती में माँ कहती हैं:- 

” तत्र तत्रार्थ लाभश्च विजयः सर्वकामिकम्
यं यं चिन्त्येति कामं तं तं प्राप्तिनोति निश्चितं “

गांधी परिवार के विश्वसनीय यू.पी.ए. के संकटमोचक’ प्रणव दा संभवतः धीरे धीरे न्यूट्रल होते चले गए थे। सच कहें तो प्रणब दा एक शानदार प्रधानमंत्री थे जो हमें मिल ही नहीं पाया। पूर्व राष्ट्रपतियों की तुलना में प्रणब मुखर्जी के कार्यकाल को बेहतर माना जाता रहा है, क्योंकि इन्होंने अपने कार्यकाल में करीब 37 दया याचिकाएं खारिज कर दी थीं. कसाब और अफजल गुरु जैसे आतंकियों को भी फांसी की सजा को उन्होंने मंजूरी दी थी|

आज प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी की केंद्र सरकार ने दलगत राजनीति से ऊपर उठकर जो एक सच्चे व्यक्ति प्रणब मुखर्जी को भारत रत्न दिया है, वह भारतीय राजनीति की एक नज़ीर है…

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