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सोमरस के बारे में वह सब कुछ जो आपको जानना चाहिए

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प्राच्य संस्कृतियों के अधिकतर विरोधियों की मान्यता रही है कि वैदिक ऋषि जो सोमरस पीते थे वह शराब थी। बच्चन के बाउजी बड़के बच्चन साहब ने तो पूरी कविता ही झोंक रखी है इसी कुत्सित सोच के आस पास।

सोम सुरा पुरखे पीते थे, हम कहते उसको हाला,
द्रोणकलश जिसको कहते थे, आज वही मधुघट आला,
वेदिवहित यह रस्म न छोड़ो वेदों के ठेकेदारों,
युग युग से है पुजती आई नई नहीं है मधुशाला।।

वही वारूणी जो थी सागर मथकर निकली अब हाला,
रंभा की संतान जगत में कहलाती ‘साकीबाला’,
देव अदेव जिसे ले आए, संत महंत मिटा देंगे!
किसमें कितना दम खम, इसको खूब समझती मधुशाला।।

सोमरस ‘शराब’ नहीं है, ऋग्वेद में शराब की घोर निंदा करते हुए कहा गया है कि,

हृत्सु पीतासो युध्यन्ते दुर्मदासो न सुरायाम्।। 
इसका मतलब है कि सुरापान करने या नशीले पदार्थों को पीने वाले अक्सर युद्ध, मार-पिटाई या उत्पात मचाया करते हैं।

ऋगवेद की इस ऋचा से स्पष्ट हो जाता है कि सोमरस कोई मादक पदार्थ न होकर कोई पवित्र रस या औषधि ही होनी चाहिए।

स्वयं भगवान कृष्ण ने कहा है,

त्रैविद्या मां सोमपाः पूतपापा यज्ञैरिष्ट्वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते |
ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोकमश्र्नन्ति दिव्यान्दिवि देवभोगान् ||
“जो वेदों का अध्ययन करते तथा सोमरस का पान करते हैं, वे स्वर्ग प्राप्ति की गवेषणा करते हुए अप्रत्यक्ष रूप से मेरी पूजा करते हैं | वे पापकर्मों से शुद्ध होकर, इन्द्र के पवित्र स्वर्गिक धाम में जन्म लेते हैं, जहाँ वे देवताओं का सा आनन्द भोगते हैं |”

कुछ का दावा है कि सोम वह पादप है जो अफगानिस्तान की पहाड़ियों में पैदा होता है। उनके लिए ऋग्वेद 10.34.1 का यह मन्त्र “सोमस्येव मौजवतस्य भक्षः” उद्धृत करते हैं। मौजवत पर्वत को आजके हिन्दुकुश अर्थात अफगानिस्तान से निरर्थक ही जोड़ने का प्रयास करते हैं, जबकि सच्चाई इसके विपरीत है। निरुक्त में “मूजवान पर्वतः” पाठ है, मगर वेद का मौजवत और निरुक्त का मूजवान एक ही है, इसमें संदेह होता है। क्योंकि सुश्रुत में “मुञ्जवान” सोम का पर्याय लिखा है। अतः मौजवत, मूजवान और मुञ्जवान पृथक पृथक ही सिद्ध होते हैं।

कुछ विद्वान सोमरस को मत्स्यपुराण के इस श्लोक से भी जोड़ते हैं। हालांकि यहां सोम का अर्थ चन्द्रमा से है। जहाँ की गणना इस प्रकार है-

आपो ध्रुवश्च सोमश्च धरश्चैवानिलोज्नल:।
प्रत्यूषश्च प्रभासश्च वसवोज्ष्टौ प्रकीर्तिता:॥

कुछ सोमरस को भांग बताते हैं; लेकिन सोमरस के दही में मिलाए जाने का वर्णन है और भांग कभी भी दही में नहीं मिलाते हैं। ऋग्वेद की एक ऋचा में लिखा गया है कि यह निचोड़ा हुआ शुद्ध दधिमिश्रित सोमरस, सोमपान की प्रबल इच्छा रखने वाले इंद्रदेव को प्राप्त होता है। ऋग्वेद-1/5/5 में कहा है,

 हे वायुदेव! यह निचोड़ा हुआ सोमरस तीखा होने के कारण दुग्ध में मिश्रित करके तैयार किया गया है। आइए और इसका पान कीजिए।

ऋग्वेद-1/23/1 में कहा है,

शतं वा य: शुचीनां सहस्रं वा समाशिराम्। एदुनिम्नं न रीयते।।
अर्थात् नीचे की ओर बहते हुए जल के समान प्रवाहित होते सैकड़ों घड़े सोमरस में मिले हुए हजारों घड़े दुग्ध मिल करके इंद्रदेव को प्राप्त हों।

सोमरस बनाने की विधि

सोमरस बनाने का बड़ा नाटकीय वर्णन अमीश त्रिपाठी ने अपने उपन्यास Immortals of Meluha में किया है। जबकि वेदों में इसका पूर्ण विवरण है। ऋग्वेद सूक्त 28 मंत्र 9 कहता है,

उच्छिष्टं चम्वोर्भर सोमं पवित्र आ सृज। नि धेहि गोरधि त्वचि।।
यानि मूसल से कुचली हुई सोम को बर्तन से निकालकर पवित्र कुशा के आसन पर रखें और छानने के लिए पवित्र चरम पर रखें।

आयुर्वेद सोमरस

औषधि: सोम: सुनोते: पदेनमभिशुण्वन्ति।- निरुक्त शास्त्र (११-२-२)

यानि सोम एक औषधि है जिसको कूट-पीसकर इसका रस निकालते हैं। सोम को गाय के दूध में मिलाने पर ‘गवशिरम्’ व दही में ‘दध्यशिरम्’ बनता है। शहद या घी के साथ भी मिश्रण किया जाता था। सोमरस बनाने की प्रक्रिया वैदिक यज्ञों में बड़े महत्व की है। इसकी तीन अवस्थाएं हैं, पेरना, छानना और मिलाना। कहा जाता है ऋषि-मुनि इन्हें अनुष्ठान में देवताओं को अर्पित करते थे। और बाद में प्रसाद के रूप में खुद भी इसका सेवन करते थे।

संजीवनी बूटी की तरह हैं सोमरस के गुण

सोमरस एक ऐसा पेय है, जो संजीवनी की तरह काम करता है. यह शरीर को हमेशा जवान और ताकतवर बनाए रखता है.

स्वादुष्किलायं मधुमां उतायम्, तीव्र: किलायं रसवां उतायम।
उतोन्वस्य पपिवांसमिन्द्रम, न कश्चन सहत आहवेषु।।- ऋग्वेद- 6.47.1
यानी सोम बहुत स्वादिष्ट और मीठा पेय है। इसका पान करने वाला बलशाली हो जाता है। वह अपराजेय बन जाता है। शास्त्रों में सोमरस लौकिक अर्थ में एक बलवर्धक पेय माना गया है।

अलग है आध्यात्मिक अर्थ

आध्यात्मिक नजरिए से यह माना जाता है कि सोम, साधना की उच्चावस्था में शरीर में पैदा होने वाला रस है। इसके लिए कहा गया है,

सोमं मन्यते पपिवान् यत् संविषन्त्योषधिम्।
सोमं यं ब्रह्माणो विदुर्न तस्याश्नाति कश्चन।। (ऋग्वेद-१०-८५-३))

यानि बहुत लोग मानते हैं कि मात्र औषधि रूप में जो लेते हैं, वही सोम है पर ऐसा नहीं है। एक सोमरस हमारे भीतर भी है, जो अमृतस्वरूप परम तत्व है। जिसको खाया-पिया नहीं जाता केवल ज्ञानियों द्वारा ही पाया जा सकता है। 

ऋषि सोमरस

इसका आध्यात्मिक अर्थ एक कविता से समझते हैं,

हे सोम!
 
वनस्पतियों का रस, देह की पुष्टि तू है!
तू ही देह की अग्नि को तृप्त कर रहा है!
देह का बल तू है, जीव का अन्न तू है!
गौ के थनों से झर रहा दुग्ध तू है!
अस्थियों की मांस-मज्जा तू है, रक्त तू है!
 
तू ही आनन्द, माधुर्य, ‘रसो वै सः’ तू है!
मन तुझसे है, मन तू है, जल तुझसे है, जल तू है!
सूर्यकिरणों का विचरण मार्ग तू है!
हिरण्यमय नभ तूझसे है, कृष्णवर्ण कृष्ण तू है!
और बरस रहा नभचन्द्र से, वह शीतल अमृत तू है!
 
तेरी ही भूख, अग्नि की अशनाया है!
यह रुद्ररूप अग्नि, इसका रोदन तू है!
तू इसे मिल जाए तो यही शांत है, शिव है!
अग्नि की आहुति तू है, सूर्य का अर्घ्य तू है!
देवताओं को पहुंच रहा हविष्य तू है!
 
पर्वत की वह खोई औषधि तू है,
जिसके लिए सभ्यताओं ने खोज की है!
औषधियों की प्राणदायक शक्ति तू है!
लक्ष्मण की संजीवनी का रहस्य तू है!
दुग्ध, घृत, मधु, अमृत का तत्व तू है! 
 
कलि के ‘वेदविद’! 
वेद की ऋचा में सोम किस अर्थ में प्रयुक्त हुआ है, 
क्या तुम हमें बता सकोगे?
 
– मुदित मित्तल 

वनस्पति शास्त्र और आयुर्वेद में एक लता का वर्णन है जिसे सोमवल्ली कहते हैं। इसे महासोम, अंसुमान, रजत्प्रभा, कनियान, कनकप्रभा, प्रतापवान, स्वयंप्रभ, स्वेतान, चन्द्रमा, गायत्र, पवत, जागत, साकर आदि नामो से भी जानते हैं।

इसका वैज्ञानिक नाम Sarcostemma Acidum है, और यह Apocynaceae परिवार का सदस्य है जो सबट्रापिकल हिमालय में कठिनाई से मिल जाता है।

आयुर्वेदिक ग्रंथ सोमरस के बारे में सूचना देते हैं-

धन्वन्तरी सोमरस

रसेंद्रचूड़ामणि 6।6-9 में कहा है,

पञ्चांगयुक्पञ्चदशच्छदाढ्या सर्पाकृतिः शोणितपर्वदेशा।
सा सोमवल्ली रसबन्धकर्म करोति एकादिवसोपनीता।।
करोति सोमवृक्षोऽपि रसबन्धवधादिकम्।
पूर्णिमादिवसानीतस्तयोर्वल्ली गुणाधिका।।
कृष्ण पक्षे प्रगलति दलं प्रत्यहं चैकमेकं शुक्लेऽप्येकं प्रभवति पुनर्लम्बमाना लताः स्युः।
तस्याः कन्द: कलयतितरां पूर्णिमायां गृहीतो बद्ध्वा सूतं कनकसहितं देहलोहं विधत्ते।।
इयं सोमकला नाम वल्ली परमदुर्लभा।
अनया बद्धसूतेन्द्रो लक्षवेधी प्रजायते।

जिसके पंद्रह पत्ते होते हैं, जिसकी आकृति सर्प की तरह होती है। जहाँ से पत्ते निकलते हैं- वे गठिं जिसकी लाल होती है, ऐसी वह पूर्णिमा के दिन लायी हुई पञ्चांग (मूल, डण्डी, पत्ते, फूल और फल) से युक्त सोमवल्ली पारद को वद्ध कर देती है। पूर्णिमा के दिन लाए हुआ पञ्चांग से युक्त सोमवृक्ष भी पारद को बधिना, पारद की भस्म बनाना आदि कार्य कर देता है। परंतु सोमवल्ली और सोमवृक्ष, इन दोनों में सोमवल्ली अधिक गुणों वाली है।

इस सोमवल्ली का कृष्ण पक्ष में प्रतिदिन एक-एक पत्ता झड़ जाता है। और शुक्ल पक्ष में पुनः प्रतिदिन एक-एक पत्ता निकल आता है। इस तरह यह लता बढ़ती रहती है। पूर्णिमा के दिन इस लता का कंद निकाला जाए तो वह बहुत श्रेष्ठ होता है। धतूरे के सहित इस कन्द में बँधा हुआ पारद देह को लोहे की तरह दृढ़ बना देता है। और इससे बँधा हुआ पारद लक्षवेधी हो जाता है अर्थात एक गुणाबद्ध पारद लाख गुणा लोहे को सोना बना देता है। यह सोम नाम की लता अत्यन्त ही दुर्लभ है। कम से कम आज के समय में सोमवल्ली किसी सोमलता से कम नहीं।

 – डॉ. मधुसूदन उपाध्याय, लेखक भारतीय संस्कृति, इतिहास, कला, धर्म एवं आध्यात्म के गहन जानकार हैं।

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पैडमैन – पुरुष-विरोधी मानसिकता का नंगा नाच

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अगर बात सिर्फ सेनेटरी नैपकिन की होती तो कोई बात नहीं थी अगर बात सिर्फ शौचालय बनाने की होती तो भी कोई बात नहीं थी| मगर हर बात में स्वतः ही पुरुष के प्रति घृणा कहाँ से आ जाती है यह समझ से परे है| जब शौचालय पर फिल्म की तब भी आदमी को गाली दी बल्कि शौच करते हुए आदमी की फोटो तक सोशल मीडिया पर डाल दी, आदमी की इज्ज़त होती नहीं ना| हर चीज़ को आदमी के अत्याचार से जोड़ दो शौचालय बनाना चाहिए क्योंकि हमारे पुरुष शौच करती हुई महिला तक को नहीं छोड़ते हैं| किस प्रकार का लॉजिक है यह ?

मैं उस ज़माने की हूँ जब सेनेटरी नैपकिन भारत में कदम रख रहे थे| यह उस समय की बात है जब केयरफ्री नाम का संभवतःएक ही ब्रांड आता था| वो भी किसी काम का नहीं था विशेषतौर पर मेरी जैसी लडकियों के लिए क्योंकि हम स्कूल जाती थी, साईकल चलाती थी और कबड्डी भी खेलती थी| सेनेटरी नैपकिन नहीं थे तो काम कैसे चलता था ? छोटे गाँव और कस्बों में कपडे की दुकान पर सस्ते सूती कपडे के थान मिलते थे और रूई तो थी ही| मैं ऐसे स्कूल में भी पढ़ी हूँ, जहाँ ढंग का टॉयलेट भी नहीं था| मतलब पैड बदलने की कोई व्यवस्था नहीं थी| मगर मुझे याद नहीं कि मैं या मेरे साथ की किसी लड़की ने कभी इसके लिए पूरी पुरुष जाति को ज़िम्मेदार ठहराया हो| हमने उसमें से रास्ता निकाला और आगे बढ़ते गए| सूती कपडे के साथ-साथ घर के पुराने सूती कपड़ों का भी इस्तेमाल होता था, जिसको फिल्म वाले ओल्ड रग्स यानी चीथड़े बताएँगे| फिर आया मिस यूनिवर्स का दौर जब सुष्मिता सेन मिस यूनिवर्स बनी| सुष्मिता सेन के मिस यूनिवर्स और ऐश्वर्या राय के मिस वर्ल्ड बनने के बाद ताबड़तोड़ कॉस्मेटिक और सेनेटरी नैपकिन के ब्राण्ड भारत में आये| हमारे लिए राहें आसन हुई मगर दुष्प्रचार के साथ कि हम भारत की स्त्रियाँ गन्दगी से मासिक धर्म का निर्वाह करती है, हम बेचारी गरीब और सताई हुई हैं इत्यादि| सेनेटरी नैपकिन बेचने का यह तरीका था और इसके लिए सिस्टेमेटिक ब्रेनवाशिंग की गयी| हम सूती कपडे और रूई इन्स्तेमाल करते थे, इन्होने प्रचार किया कि हम गन्दा कपड़ा और गन्दा कागज़ इस्तेमाल करते हैं|

खैर सेनेटरी नैपकिन चल पड़े बाज़ार में क्योंकि इनकी ज़रुरत भी थी| तरह तरह के प्रचार से इनको बेचा गया छू लो दुनिया, कर लो सब मुट्ठी में जैसे अगर वो 3 दिन रुक गयी तो दुनिया हाथ से निकल जाएगी| ध्यान देने की बात यह है कि menstrual कप, पीरियड पैनटी जैसे अन्य तरीकों का ज़्यादा प्रचार नहीं किया गया| क्योंकि उनको बार- बार खरीदना नहीं पड़ता, बाज़ार आगे कैसे बढेगा|

क्या हम गन्दी चीज़ें प्रयोग करती थी –

व्यक्तिगत साफ़ सफाई सबकी अलग-अलग होती है| कोई रोज़ नहाता है तो कोई हफ्ते में एक बार, कोई कपड़े धोये और प्रेस किया बिना नहीं पहनता तो कोई मुचड़े कपड़ो में प्रसन्न है| कहने का अर्थ यह है कि जो वैसे साफ सुथरी नहीं रहती वो मासिक धर्म के दौरान भी गन्दी ही रहेगी| एक औरत अगर गन्दगी से रहती है तो यह पूरे भारत की स्त्रियों की समस्या नहीं है| मगर ठीक है आपको पैड बेचना है तो कुछ भी कहिये| मज़े की बात यह कि इन् लोगों ने प्रचार किया कि यह लोग बेचारी पैड बनाती, धोती, सुखाती हैं फिर प्रयोग करती है| अब इनसे पूछिए कि पीरियड पैनटी को भी तो धोया जाता है और आजकल रीयूज़ेबल पैड भी आते हें है| वो क्या हें, उनको भी धोया, सुखाया जाता है|

सेनेटरी नैपकिन पर टैक्स क्यों –

सस्ते नैपकिन खरीदेंगी महिलाये? मेरे मोहल्ले में एक सस्ते लोकल नैपकिन बेचने वाली महिला आई थी जिस से किसी ने भी नहीं खरीदा, पैड में कोई खराबी नहीं थी बस उस पर कोई बड़ा ब्रांड का नाम नहीं था| यहाँ शनेल ब्राण्ड की फर्स्ट कॉपी खरीदने वाली महिला जब सेनेटरी नैपकिन पर टैक्स की बात करती है तो हंसी आती है| हजारों रुपये ब्रांडेड कास्मेटिक पर लगा देने के बाद सेनेटरी नैपकिन पर टैक्स याद आया है| सरकार कह रही है कि सेनेटरी नैपकिन बनाने के लिए जिस कच्चे माल की आवश्यकता होती है वो महँगा है| हर बात पर सरकार और पुरुषों पर दोष मढने वाली महिला को यह बात नहीं समझ आएगी| दोष देने से बेहतर होता रास्ता तलाश करना जिससे कच्चा माल भारत में पैदा हो सके मगर इतनी मेहनत कौन करे दोष देना आसान है| और दोष भी कैसा ज़रा भाषा का चुनाव देखिये –

इनका मानना है कि सेनेटरी नैपकिन पर टैक्स है वियाग्रा पर नहीं क्योंकि ज़्यादातर नीति बनाने वाले 65 साल के वृद्ध हैं जिनको स्तंभन दोष हो चुका होता है| जैसा कि मैंने आरम्भ में कहा कि किसी भी चीज़ को बेचने के लिए यह लोग किसी भी स्तर तक गिर जाते हैं| एक फेमिनिस्ट की सोच वियाग्रा, सेक्स, स्तन, लिंग से आगे नहीं बढ़ पाती| किसी भी विषय पर बात करवा लीजिये यह घूमकर इसी पर आ जायेंगी|

फ्री ब्लीडिंग से सेनेटरी नैपकिन तक –

कुछ साल पहले किरण गाँधी नाम की एक महिला लन्दन में बिना पैड पहने मैराथन दौड़ी थी और उसको बहुत बहादुर मानकर पुरस्कार भी दिया गया था| एक तरफ फेमिनिट्स लोग पुरुष पर सब दोष मढ़कर सेनेटरी नैपकिन का प्रचार करते हैं दूसरी तरफ यह महिला बिना पैड के दौड़ती है| कोई इनसे पूछे सशक्तिकरण का अर्थ यदि आदिम काल में लौटना है जहाँ ना कपड़े हों ना सुविधाएँ तब तो सबको सशक्त करना आसान है| इसको फेमिनिस्ट्स ने फ्री ब्लीडिंग का नाम दिया है| उसने अपना अनुभव बताया था कि कैसे उसको पुरुषों ने टोका कि, “मैडम आपके कपड़ों पर दाग हैं|” यह उनको पितृसत्ता का दमन लगा था| इस प्रकार के तर्क के हिसाब से यदि मैं किसी को टोकूं कि आपके कपड़ों की सिलाई खुली है या दाग है तो उसे मातृसत्ता का दमन माना जाये|

इनके लॉजिक से चलने वाली महिलाएं बहस करती हैं तो कहती हैं कि आप लोग नहीं जानते कितना दर्द है माहवारी और बालक को जन्म देने में| तो पुरुष का दर्द क्या आप समझती हैं ? आप खुद कंफ्यूज है कि करना क्या है फ्री ब्लीडिंग या सेनेटरी नैपकिन|

पीरियड टैबू का ढिंढोरा पीटने वाली महिलाओं से पूछे कोई कि इसको टैबू बनाया किसने? स्वयं महिलाओं ने ही ना, घर के पुरुष को तो पता भी नहीं चलता कि लड़की को माहवारी शुरू हो गयी है| एक और बात कि पीरियड्स के बारे में बात नहीं कर सकते, यह बिलकुल गलत है जहाँ ज़रुरत होती है वहां करते हैं| सड़क चलते पीरियड, सेक्स बात क्यों क्यों ज़रूरी है पहले कोई यह बताये? वो सब करना पाश्चात्य संस्कृति का हिस्सा जहाँ हर बात यही से शुरू होकर यही ख़तम होती है| कभी मुश्किल में पुरुष से कह कर देखिये, आपको सहायता ही मिलेगी, यह मेरा निजी अनुभव है|

 मेन्स्ट्रुअल मैन-

पैडमैन नाम की यह फिल्म आपको बताएगी कि कैसे माहवारी, महामारी है और इससे बड़ी समस्या भारतवर्षे, आर्यावर्ते, जम्बुद्वीपे में हो ही नहीं सकती| यह फिल्म अरुणाचलम मुरुगुनाथम नाम के व्यक्ति पर बनी है जिसने सस्ते सेनेटरी नैपकिन बनाने का बीड़ा उठाया| इसके लिए उनको समाज से बहिष्कृत भी किया गया| उनकी पत्नी तक ने उनका साथ छोड़ दिया और अपनी माँ के घर वापिस चली गयी| पर किसी भी कर्मठ पुरुष की तरह अरुणाचलम अपने लक्ष्य तक पहुँच कर माने| और हम स्त्रीयों ने क्या दिया उनको बदले में, वही पुरुष के प्रति घृणा और पुरुष सत्ता को गाली| पुरुषसत्ता जब खुद पर प्रयोग कर के सेनेटरी नैपकिन बनाती है तो अच्छी लगती है मगर वही पुरुष सत्ता जब अपने लिए थोडा सा प्यार और सम्मान चाहती है तो ख़राब लगने लगती है|

जिस तरह ट्विंकल खन्ना पैडमैन फिल्म का प्रचार कर रही हैं उससे उनकी कुंठित मानसिकता का पता चलता है| फेमिनिस्म, महिलाओं को किस तरह एहसानफरामोश होना सिखाता है यह भी साफ़ दिखता है| गौरतलब है कि मेन्स्त्रुअल मैंन नाम की एक डाक्यूमेंट्री पहले ही अरुणाचलम पर बन चुकी है, इस  फिल्म में तथ्यों से छेड़छाड़ अवश्य की गयी होगी| फिल्म का ट्रेलर देखिये अक्षय कुमार कहते हैं, “ब्लडी मेन अगर आधे घंटे खून बहे तो मर जाये|” यह वो अक्षय कुमार हैं जो आर्मी आर्मी किया करते हैं| सरहद के जवानों की कहानी यह बोलते समय भूल गए| क्योंकि जब इज्ज़त मन में ना हो सिर्फ दिखावा हो तो जुबां फिसल ही जाती है| यही नहीं उन्होंने यह तक कहा कि सेना की सब्सिडी घटाकर महिलाओं को सेनेटरी नैपकिन उपलब्ध कराये जाएँ| इससे उनके मानसिक दिवालियेपन का पता चलता है| कांस्टेबल नितिन BSF का हिस्सा थे, लगातार खून बहते हुए भी गोली चलाते रहे और अंततः शहीद हुए| उनकी वजह से सीमा तोड़कर आने वाले आतंकवादी भाग खड़े हुए| यह केवल एक कहानी है, ज़रा ढूंढ कर देखिये ऐसी सैंकड़ों कहानियां मिल जाएगी हर समाज, हर देश में| पुरुषों की लाशों पर सभ्यताएं बनी हैं और आप सिर्फ एक सेनेटरी नैपकिन वाली फिल्म बेचने के लिए इतनी बेहूदी बात कर रहे हैं ? मैं फेमिनिज्म को बढ़िया आन्दोलन मान लेती अगर इस एक लाइन को हटाने के लिए महिलाएं आन्दोलन कर देती कि हमारे पुरुष ऐसे नहीं हैं| पूरा ट्रेलर देखंगे तो पायेंगे कि औरत हर जगह रो रही है, जैसे महिलाएं ही बीमार होती हैं बस पुरुष को कोई बीमारी पकड़ती ही नहीं|

कैंसर में भी केवल स्तन कैंसर की चर्चा होती है जबकि प्रोस्टेट कैंसर उससे कहीं ज्यादा होता है और पुरुष शर्म से बता भी नहीं पाते| लेकिन नहीं प्रचार तो यह है कि शर्म, लाज केवल महिला के लिए है पुरुष निरा लम्पट निर्लज्ज है| सिगरेट पर पैसे खर्च करता है मगर सेनेटरी नैपकिन पर नहीं, वाह लॉजिक! पुरुष घर खर्च के लिए पैसे देता है तो उसमे कितना झोल झाल करती हैं महिलाएं इसका कोई अंदाज़ा है क्या? मगर आप यह कह भी नहीं सकते क्योंकि महिला गँगा की भांति पवित्र होती है और पुरुष दानव| औरत खुद अपनी प्राथमिकता तय नहीं कर पाई इसमें पुरुष समाज क्या करे? पुरुष ने हर तरह की सुविधाएँ दे डाली मगर फिर भी महिला पुरुष को दोष देती घूम रही है| ट्विंकल खन्ना, सोनम कपूर और अक्षय कुमार को इस तरह की वाहियात बात करते कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि उनको एक फिल्म बेचनी है| फुल्लू नाम की फिल्म इसी विषय पर आई थी, उसमे भी यह लाइन थी, “जो औरत का दर्द नहीं समझता उसको भगवन मर्द नहीं समझता|” आप समझते रहिये औरत का दर्द, बदले में वही औरत आपके खिलाफ नफरत फैलाती रहेगी|

फेमिनिस्म के नाम पर साबुन, तेल, शैम्पू, सब बिक रहा है आपकी यह पैडमैन फिल्म भी बिक जाएगी, रह जायेगा तो सवाल क्या पुरुष को कठघरे में खड़ा करना ज़रूरी था, क्या सेना के जवानों के खून का अपमान ज़रूरी था?

– ज्योति तिवारी, पुरुष अधिकार कार्यकर्ता, लेखिका व सामाजिक सरोकार से जुड़े कार्य करती हैं. उनकी किताब ‘अनुराग‘ बेस्ट सेलर पुस्तक रही है.

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Advertisements – the covert weapon in the stealth war against men and boys

Misandry in India

Do we ever wonder how the TV programs that we keep on seeing for the purpose of entertainment, function financially? Who funds for the content that is generated, the actors, the designers, the technicians, the staff, the crew and all the extravaganza that one sees on the TV?

If you are thinking that the paltry sum that you pay at the end of the month as your cable TV or dish subscription charges, then you need a serious reality check. Because the cost of running TV programs is in the range of tens of thousands of millions of rupees which it is impossible to be covered by the subscription charges.
Then, the question arises, as to who bears the financial brunt and why would someone do so? Why would someone provide entertainment for free to millions and millions of people and that too for so many decades? What are “they” gaining out of it?

When I say, “they”, it refers to the group of people responsible for running the TV programs. So, the questions that arise are,
Who are “they”?
What are “they” gaining?
Do “they” have any covert agenda behind all this?
If so, what?
What are the pros and cons of the said covert agenda, if any?

We will try to answer all the above questions, but before that let’s understand the source of money behind all this.
The source of money is advertisements. The advertisements of various products, brands and the various promotional campaigns that we see, are the backbone of the finances of the TV programs that we see.
So, how does that work? The product or the company that wants to place its advertisement must pay for the slot and these payments are astronomical. In a popular program like a famous TV series or a cricket match or much-awaited awards show, the slots can range from Rs. 2 million to 10 million for 20 seconds. That’s not all, if any product wants its advertisement campaign to be effective, it should book multiple slots and the budget of such a campaign can run into tens of thousands of millions.

Suffice it to mention here that merely talking about the product won’t suffice as the companies paying such astronomical sums for advertisements, would actually want those products to be sold, so that people, can move out of their homes and buy the products.

The most effective way to do so, is to make the advertisement appeal emotionally to the audience and in doing so, many a time, a lot of covert and hidden messages are passed which sneak into the subconscious of the masses and it shifts the perception of the mass, even before the masses realizing it.

Let me take an example and talk about it to be more precise about what I am hinting at. These days, an ad is doing rounds on Indian television wherein a young mother who has two children – elder daughter and younger son – is shown preparing herself to wash clothes. At that instant, the small boy child mockingly tells his elder sister to focus so that she can learn the washing of clothes. So, the mother calls up the small boy and pretends as if she is unable to open the lid of the fabric conditioner, and asks the little boy, who must be of 5 years of age, to help her open it. After he does so, she asks him to pour a few drops in the bucket and in the process, tells him that it is not only for his elder sister, he too should learn to wash clothes. The ad is of Comfort Fabric Conditioner.

Now, what is the problem with this ad? And the answer is, that there are multiple problems. Let me list down first the few wrong assumptions that ad has made:
That doing household chores is a woman’s duty.
That men and boys don’t do it.
Household chores are just washing clothes, rest all stuff like fixing broken things, electric repairs, and many other dangerous stuff takes care of itself.
Washing clothes, if done by women are derogatory, if done by men, are progressive.
By teaching boys to wash clothes, gender equality can be achieved.
First of all, what business has the company preaching “social lectures” in its advertisements? Advertisements are meant to talk about how the product in question can help one solve a particular problem or be of help instead of becoming carriers of agents of perceived social change. And if so, then the change should be complete and non-discriminatory. Only telling that boys should equip themselves with knowledge of household chores (which they should as it makes them self-dependent) and not telling girls to aspire to become financially independent is gender biased and the worst part is that this gender bias is being practiced on kids.

There is one more such ad that needs mention. It’s the ad by Lloyd Washing machine. That ad is so wrought with male bashing and sarcastic remarks on men, that I feel whoever, conceptualized, approved and made the ad are sick to the core and wreak of male hatred and misandry. In that ad, a couple is shown shopping for a washing machine. The husband is shown as telling the salesperson that washing clothes is her department so he should explain it to her and then the wife goes on to mock the husband by asking the salesperson to show a washing machine that makes it so easy to wash clothes that even “sir” (referring sarcastically to her husband) can use it easily.
Llyod Washing Machine Ad
Now, what are the problems with this ad?
Why don’t we see ads where it is shown that earning money for the household is not just a man’s job and women should also shoulder the burden?
Can you imagine an ad where the husband mocks the wife bordering on humiliation and there is no backlash?
Why is it so important that men share the household chores when women aren’t sharing the burden of earning for the family?
Why men are constantly reminded that a few household chores like cooking food, washing clothes is such an arduous task that women are being oppressed with it and how does it become progressive if the man is encouraged to do the same?
When women aren’t really being forced to earn money for the family while men are being forced to do household chores, how are we achieving gender equality in even the nearest of sense?

So, while we are at the ads, let’s also talk about the Goodnight ad wherein once again, a 5 year old boy is shown to be “protecting” his baby sister from mosquitoes by switching on Goodnight mosquito repellant. And, he is glorified while doing it. So, what are the problems with this ad?
Inculcating the protector syndrome in a small boy from a young age of 5 is self-damaging to his developing psyche. It makes him feel less worthy of himself if he’s not risking his life for the sake of others.
It also tells him that, as he is the protector, he is to shut down regarding his own feelings and later, in life, when he turns out to be less expressive as a man, he is chided then too for that.
Why do we need to design ads that talk less about the product qualities and its usage and more about who should use that product and for whom? Goodnight Mosquito Repellant Ad

So far, we just saw three examples of ads which are currently running on television in millions and millions of homes and apart from telling people about the products, these ads are silently passing down the message of male bashing and male disposability.
Now, one counter argument can be that most people don’t watch ads. But that’s just a perception. The reality is, people do watch ads. If not all, quite a few of them. And the reason for that is, when ads are squeezed in extremely engrossing programs like a cricket match (which a sizeable population watches) or an awards show or a very good movie, many people just sit through the ads as they don’t want to miss their favorite program. Moreover, most TV channels these days are synced up. So, you’ll see almost all channels showing ads concurrently, so one way or the other, it is made sure the ads are delivered to the audience.
Pertinently, as the ads are delivered constantly, they are far more efficient in building the public perception more vicariously than anything else.
And now, that we have spoken about how advertisements are used as the covert weapon in the stealth war against men and boys, we will now talk about the questions raised at the beginning of the article one by one.

Who are “they”?

The business tycoons, in general, but more like a hierarchy which goes up and narrows down to a slender group of Jewish bankers, famously known as the Rothschild family that not only controls the Central Bank of America, but also the major financial and economic policies of the world at large. They have also been referred to as the “Financial Dinosaurs” in my previous article “Feminists do not work for women, they work against men, why?”

What are “they” gaining?

Control over the human civilization through divide and conquer, as we shall see in further answers.

Do “they” have any covert agenda behind all this?

Yes, as we shall see in further answers.

If so, what?

Absolute power and the ability along with the means and mechanism to control people’s lives by constantly influencing the discourse, the public perception and the way the masses feel about their lives. It’s an information warfare out there which transgresses national borders, races and ethnicities and in this war, discourse and public perception is the platform and to shift the same, advertisements are one of the very efficient means to do it. As their primary objective is to create branding and increase sales, the delivery of the “message” becomes easy and thus, the covert weapon in the stealth war against men and boys. If you want to know, why this war against men and boys, read my previous article – “Feminists do not work for women, they work against men, why so?”

What are the pros and cons of the said covert agenda, if any?

The obvious and the myopic pro is for the economy which gets boosted because these advertisements not only create a craving for a life that’s highly materialistic but by their covert messages, drive a wedge in the inter-gender equations leading to strained relations between men and women. As a result, relationships become more fragile, marriages break more often leading to high stress and increased consumerism. The disadvantage, of course, is an unhealthy society where paranoia becomes the norm and trust, the exception, thus leading to a world with unending war which keeps the pockets of the financial dinosaurs warm.

 – Virag Dhulia, Filmmaker, Writer, Entrepreneur. Author of famous novel ‘Chess without a Queen’

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Feminists Do Not Work For Women, They Work Against Men – Why?

Feminism In India

How many people know that the rise of feminism coincided with the increase of women in the workforce? It might appear to you that feminists are responsible for the economic dignity of women, wherein they can be financially independent and not “depend” on any man for it. But, do you know that for any movement to instantiate, proliferate and sustain itself to levels that can make a global impact, huge funding and resources are required?

Now, here’s the interesting part. Ever since its emergence, if you see the narrative created, developed and spread by feminists, it’s all about blaming and shaming men, including the men who have power, money, and influence. Whereas, interestingly, it was the same men who were funding feminists allowing them to spread a narrative against themselves! And it was not adding up. Why would men fund a war against themselves?

Unless there were other ulterior covert motives behind it. And one of them being, getting women to work, so that they can also be taxed. Getting women to the workplace would also increase competition for men, increasing the rush leading to better productivity and more inflows to the coffers of the powers that be.

Many young women were fooled into believing that feminism was their window to freedom without realizing that it actually meant living a risky and reckless life (just like men) and now it is visible with a lot of women turning against feminism but I am afraid it’s too late now.

Financial dinosaurs who wield their financial prowess across geographical and geopolitical boundaries had much to gain from feminism as they had to gain from the spread of terrorism. Surprised? Because, so far we all thought that terrorism was a handiwork of a few frustrated, radicalized, brainwashed astray young men dying (literally) to get the world’s attention.

But, think for a while. Who gave you that definition of terror? That definition of terror has come to us from the media. The newspapers, the articles, the magazines, the columns, the news hours, the prime time, the breaking news et al. Now, it is no mean task to run a media channel, it needs huge financial resources and power-backing. So, it does not rule out the possibility that a definition that favors to the powers that be, comes out.

Again, if we come back to acts of terrorism. Any act of terror requires planning, materials, infrastructure, resources, people, and most importantly, money. So, the question is, when all the big global powers are committed to eradicate terrorism, where do the terrorists get their resources from? It has to be from some person on Earth only and how is that person/group of persons is never tracked after almost 5 decades of reported acts of terror? This also doesn’t add up.

Again, unless there’s another ulterior covert objective behind the existence of terrorism. Ain’t that obvious? The people who stand to gain most from the existence of terrorists are the powerful people because it keeps the multi-billion dollar arms trade on, it justifies the inflated Governments and the increased surveillance of people, most of whom have nothing to do with terrorism and thus giving them access to huge amount of private information of people which can be further used to bolster economy which again fills the coffers of the powers that be.

More so, terrorism divides people along the lines of religion and so does feminism, along the lines of gender. And a closer look reveals that many well-known radical feminist speakers and writers are also “terrorist sympathizers” and they constantly work to create an environment conducive for the terrorists to thrive, much as they create an environment for abusive women to be treated as victims, worthy of sympathy.

If we take a look at India and some of the recent events, the picture becomes clear. When the JNU student leader Kanhaiya was arrested on charges of sedition because he had spoken against India for the hanging of Afzal Guru, the suspect in the attack on Indian Parliament on 13 December 2001, many feminists like Sheila Rashid, Nivedita Menon, etc. had condemned the stand of vindicating Kanhaniya and they also went to the lengths of saying that Kashmir was never an integral part of India.

Nivedita Menon[1] also attends seminars by Popular Front of India, a radical Islamist Organization which has been operative since the last 25+ years and has been quite instrumental in helping Iran create instability in the Kashmir region with the help of ISI and sabotaging attempts by R&AW of India to prevent acts of terror. The same professor talks about the oppression of women and stands with Muslims saying India has perpetrated acts of terror on Kashmir.
Another interesting thing is that all the feminists attack Hindu festivals and traditional practices citing that they are regressive and oppress women but do not challenge any of the Islamic practices. They rather embolden and encourage Islamic practices. In fact, the viewpoint of many of today’s western feminists is that Islam is a progressive religion, Hijab is empowerment and very soon, that thought process will infiltrate India as well.

The question is, why target India? The answer is simple. Thousands of years back, India was ahead of the world in terms of academics, technology, and research. Invasions started taking place and Muslim, followed by Christians worked very hard to destabilize India. And that was done on a systematic basis by attacking the education system and the culture of India, calling it third world and regressive and then plaguing it with the intellectual virus of secularism.

Today, under the name of secularism, Hinduism is openly denounced, denigrated and looked down upon and such a behavior is hailed as progressive. Similarly, today, under the name of feminism, men are openly denounced, denigrated and looked down upon and such a behavior is hailed as progressive.

To add to the equation, all notable secularists are anti-Hindu and radical male hater feminists. They have a single agenda – create chaos in the society with rhetoric and propaganda. These academicians, under the guise of education, and using it as a front, deal with young impressionable minds of students and poison them against Indian culture, Indian traditions and fill them with male hatred.

Many young Hindu men today, are ashamed of themselves and vilify their own clan riding on a guilt trip induced by systematized, globally funded and internationally orchestrated anti-India, anti-male indoctrination leading to a confused generation of youngsters that hesitates in taking the country forward. Impeding India’s progress has many benefits to the West because it is now threatened with India’s rising strengths in technology, manufacturing, and infrastructure.

So, where do feminism and male bashing fit into the picture? It should not be a coincidence that just as India gained independence, it suddenly became misogynistic and started oppressing women which was retrospective in nature or at least that’s what the rumor mills tell us when we throw a glance at the Indian history.

So, Indian men, the real workforce of the country, the bonded labor, the backbone and the spine of progress of India, are now misogynistic, patriarchal wife-beating, woman-hating dowry seekers and thus, Indian labor becomes cheap labor because now India is a third world developing country that first needs to learn to treat its women folk right before telling the world of what it truly deserved. And who stands to gain from it? Obviously, the financial dinosaurs of the West.

Therefore, Indian feminists take a cue from Western feminists, try to ape all Western laws on Indian dynamics throwing the Indian society into a tizzy of chaos precipitating a tug-of-war between pristine old customs and “modernity” and the sacrificial lambs are the unsuspecting Indian men who keep on telling everyone – we should respect our mothers and sisters while those same mothers and sisters were waging war against men.

Most feminists are women from broken relationships and if prodded, they promptly blame the man in the relationship, but only if we talk to those men involved, will we get a true picture. So, now all these women who couldn’t eke out a harmonious relationship with one man, spread their bitterness around, turning women into gullible, vulnerable victims making them target of sympathy and inject a slow poison of terroristic victim mentality jeopardizing the social health of India.

It is extremely important to realize the nexus between anti-India forces forging terrorism on the soil and the anti-men forces forging feminism on the same soil and both of them working as a team together to break India, to break Hinduism and to weaken men. Remember, only if our men are stronger, the country progresses and thus for the sake of our country, we must eradicate feminism from the country.

 – Virag Dhulia, Filmmaker, Writer, Entrepreneur. Author of famous novel ‘Chess without a Queen’

References:
[1]: Hamid Ansari And PFI: The Iran Connection

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सौन्दर्य प्रतियोगिताओं के सामाजिक एवं आर्थिक निहितार्थ

Manushi Chhillar

तो मानुषी छिल्लर को मिल गया सौन्दर्य ताज और आप लहालोट हो उछलने लगे। छिल्लर ने कह दिया कि मां को मातृत्व और उसकी ममता का मूल्य सैलरी में मिलना चाहिए और आपको यह बड़ी अच्छी बात लगी। कसम से आपकी क्यूटनेस को नमन रहेगा।

अब जरा पिछले पंद्रह दिनों के घटनाओं पर नजर डालिए। मूडीस(टाम मूडी नहीं)भारत की रेटिंग को Baa3 से Baa2 करता है। ईज आफ बिजनेस डूइंग की रैंक में भारत सौ देशों की श्रेणी में आ जाता है और तभी छिल्लर विश्व सुन्दरी बन जाती हैं।

कई वर्ष पहले भारत सुन्दरी इन्द्राणी रहमान ने विश्व सुन्दरी प्रतियोगिता के दौरान स्वीमिंग सूट पहनने से इनकार कर दिया था। परिणामतः इन्द्राणी रहमान विश्व सुन्दरी प्रतियोगिता के दौर से बाहर कर दी गयीं।

हमारी संस्कृति में सौदर्य बोध के साथ गहरे पवित्रता का भाव जुड़ा है। दीदारगंज की यक्षी का मूर्ति शिल्प हो या मोनालिसा की मुस्कान का चित्र, दोनों ही स्त्री-सौन्दर्य के उच्चतम प्रतिमान हैं। सौन्दर्य के प्रतिमानों के साथ पवित्रता का रिश्ता जुड़ा है प्रतियोगिता का नहीं।

मानव का आदिम चित्त भेद नहीं करता है। कुरूपता एवं सौन्दर्य में कोई विभाजक रेखा नहीं खींचता है परन्तु आज का मानव चित्त जिसे कुरूप कहता है, आदिम चित्त उसे भी प्रेम करता था। आज हमने विभाजक रेखा खींच कर एक ऐसी बड़ी गलती की है जिसके चलते हम कुरूप को प्रेम नहीं कर पाते क्योंकि वह सुन्दर नहीं, दूसरी ओर हम जिसे सुन्दर समझते हैं, वह दो दिन बाद सुन्दर नहीं रह जाता है। परिचय से, परिचित होते ही सौन्दर्य का जो अपरिचित रस था, वह खो जाता है। सौन्दर्य का जो अपरिचित आकर्षण या आमंत्रण है, वह विलीन हो जाता है। इसी सौन्दर्य को विलीन होने से बचाने के लिए हमने मेकअप की शुरूआत की। मेकअप ओर मेकअप की पूरी धारणा बुनियादी रूप से पाखंड है क्योंकि स्वाभाविक सुन्दरता को किसी बनावट की जरूरत नहीं होती। फिर भी मेकअप का सामान बनाने वाली विश्व की दो बड़ी बहुराष्ट्रीय कम्पनियां ‘यूनीलिवर’ एवं ‘रेवलाॅन/प्राक्टर एं गैम्बिल’, ‘मिस यूनिवर्स’ और ‘मिस वल्र्ड’ नामक सौन्दर्य के विश्वव्यापी उत्सव करती है। इन प्रतियोगिताओं की राजनीति समझने की जरूरत है।

कुछ घटनाओं पर सिलसिलेवार नजर डालें

१) सोवियत संघ के विघटन के तुरन्त बाद रूस की एक लड़की को विश्व सुन्दरी के खिताब से नवाजा गया।

२) 1992-93 में जमैका ने जब उदारीकरण की घोषणा की तो उसी वर्ष जमैका की लिमहाना को विश्व सुन्दरी घोषित कर दिया गया।

३) बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को व्यापार की छूट देने के साथ ही वेनेजुएला को 1970 से आज तक ‘मिस वल्र्ड’, ‘मिस यूनिवर्स’ और ‘मिस फोटोजेनिक’ के तीस से अधिक खिलाब मिल चुके हैं।

४) दक्षिण अफ्रीका की स्वाधीनता के बाद राष्ट्रपति नेल्सन मंडेला द्वारा बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को आमंत्रण देने के पुरस्कार स्वरूप वास्तसाने जूलिया को ‘रनर विश्व सुन्दरी’ बनाया गया।

५) विश्व बैंक और अन्तरराष्ट्र्रीय मुद्राकोष के निर्देशों के तहत ढांचागत समायोजन का कार्यक्रम संचालित कर रहे क्रोएशिया और जिम्बाव्वे की लड़कियों को भी चौथा और पांचवा स्थान इन विश्वव्यापी सौन्दर्य उत्सवों में मिला।

६) 1966 में जब इन्दिरा गांधी के रुपये का 33 फीसदी अवमूल्यन किया तो उसी वर्ष भारत की रीता फारिया विश्व सुन्दरी बन बैठी।

७) मनमोहन सिंह द्वारा उदारीकरण और वैश्वीकरण की दिशा में चलाये जा रहे ढांचागत समायोजन के कार्यक्रमों का परिणाम हुआ कि 27 वर्ष बाद भारत के खाते में ‘मिस यूनिवर्स’ और ‘मिस वल्र्ड’ दोनों खिताब दर्ज हो गये। फिर भी 97 मंे मुरादाबाद की डायना हेन ‘मिस वलर््ड’ के ताज की हकदार हो गयीं।

८) सौन्दर्य प्रसाधन बनाने वाली ‘रेवलाॅन’ ‘लैक्मे’ और ‘यूनीलीवर’ कम्पनियां विजेताओं को वर्ष भर खास किस्म के कब्जे में रखती हैं। वे कहां जायेंगी ? क्या बोलेंगीं ? क्या पहनेंगी ? सभी कुछ वर्ष भर तक ये प्रायोजित कम्पनियां ही तय करती हैं।

९) 1966 में विश्व सुन्दरी खिताब प्राप्त भारत की रीता फारिया को अमरीका-वियतनाम युद्ध के समय प्रायोजित कम्पनी में अमरीकी सैनिकों का मनोरंजन करने के लिए वियतनाम भेजा था।

१०) ये कम्पनियां यह बेहतर ढंग से समती हैं कि विवाहित स्त्री का सौन्दर्य परोसने योग्य नहीं होता है इसलिए विजेताओं पर यह कठोर प्रतिबन्ध होता है कि ये वर्ष भर विवाह नहीं कर सकती हैं।

उत्पाद बनने के लिये स्वतः तैयार नारी देह के सौन्दर्य अर्थशास्त्र का विस्तार इन विश्वव्यापी उत्सवों से निकलकर हमारे देश के गली, मुहे, शहरों, विद्यालय और विश्वविद्यालयों तक पांव पसार चुका है।

भूमंलीकरण और भौतिकवाद के इस काल में स्त्री देह का उत्पाद या विज्ञापन बन जाना, उस नजरिये का विस्तार है, जिसमें स्त्री अपने लिये खुद बाजार तलाश रही है। विद्रूप बाजार में येन-के न-प्रकारेण अपना स्थान बना लेना चाहती है। उसे अपने स्थान बनाने की ‘अवसर लागत’ नहीं पता है। वह कहती है कि उसे यह तय करने का समय नहीं मिल पा रहा है कि किन-किन कीमतों पर क्या-क्या वह अर्जित कर रही है ?

‘फायर’ का प्रदर्शन वह अपने दमित इच्छाओं का विस्तार स्वीकारती है जिसके सामने पहले प्रेम निरुद्ध फिर विवाह के बाद प्रेम की वर्जना थी और अब ‘इस्टेंट लव’ के फैशन की खास और खुली स्वीकृति।

पश्चिम के लिए विकृतियां ही सुखद प्रतीत होती है क्योंकि उनके लिए जीवन का सौन्दर्य अपरिचित हैं। भारत की अस्मिता और गरिमा भी इसलिये रही क्योंकि हमने अभ्यान्तर सौन्दर्य एवं शुद्धता को उसके पूरे विज्ञान को विकसित किया है।

हमारा सौन्दर्य सत्यम्-शिवम्-सुन्दरम् है। हमारा सत्यम् अनुभव है, शिवम् है – कृत्य, वह कृत्य जो इस अनुभव से निकलता है और सौन्दर्य है उस व्यक्ति की चेतना का खिलना जिसने सत्य का अनुभव कर लिया है। मांग और पूर्ति के अर्थशास्त्रीय सिद्धान्त बाजारवादी अर्थव्यवस्था में वस्तुओं/ उत्पादों का मूल्य तय करते हैं। स्त्री देह के प्रदर्शन, उपलब्धता की पूर्ति का विस्तार मूल्यहीनता के उस ‘वर्ज’ पर खा है जहां मांग के गौण हो जाने का गम्भीर खतरा दिखायी दे रहा है इससे स्त्री सौन्दर्य के उच्चतम प्रतिमान तो खिर ही रहे हैं सौन्दर्य के साथ पवित्रता के रिश्तों में भी दरार चौड़ी होती जा रही है।

ऐश्वर्या राय, सुष्मिता सेन, लारा दत्ता, प्रियंका चोपड़ा, डायना हेडन कैसे बनती हैं?

लगभग हर बड़े ब्यूटी कॉन्टेस्ट में एक राउंड स्विमिंग सूट या बिकिनी राउंड भी होता है और इस में पहने जाने वाले कपड़े काफी छोटे होते हैं. इस राउंड में भाग लेने वाली मॉडल्स के लिए सबसे बड़ी चिंता यह होती है कि अगर प्रदर्शन के दौरान उनके कपड़े हल्के से भी इधर या उधर खिसक गए तो उनके लिए बहुत अपमानजनक स्थिति हो सकती है और इसी स्थिति से बचने के लिए मॉडल्स बट ग्लू का इस्तेमाल करती है. बट ब्लू एक प्रकार की Gum होती है, जिस की पकड़ काफी मजबूत होती है और इसी की वजह से मॉडल्स बिकिनी राउंड में अपने कपड़े खिसकने से या इधर-उधर होने से बचाती है.

यह एक खतरनाक सत्य है की ब्यूटी कॉन्टेस्ट में हिस्सा लेने वाली सभी मॉडल अपने को बढ़-चढ़कर दिखाना चाहती है और इसी ख्वाहिश के लिए यह अपना वजन तेजी से घटाती है. लेकिन अब स्लिम ब्यूटी की जगह यह बात अंडरवेट ब्यूटी तक पहुंच गई है.
अंडरवेट का मतलब होता है सेहत के लिए खतरनाक यानी कि आपका वजन आपके लंबाई के हिसाब से जितना होना चाहिए उससे कहीं ज्यादा कम जो सेहत के लिए बहुत ही खतरनाक चीज है. 1930 के दौर में अमेरिका में एवरेज बीएमआई 20.8 थी, जो वैश्विक स्तर पर हेल्दी रेंज में रखी जाती है जबकि 2010 में अमेरिका में ब्यूटी कॉन्टेस्ट में हिस्सा लेने वाली लड़कियों की एवरेज बीएमआई 16.9 थी। इसे अंडरवेट माना जाता है|

पहले माना जाता था की सुंदरता एक पैदाइशी गुण होता है लेकिन अब ब्यूटी कांटेस्ट के बढ़ते चलन ने इसे एक महंगा काम बना दिया है क्योंकि अब कम पैसों में ब्यूटी क्वीन नहीं बना जा सकता. वास्तव में ब्यूटी कॉन्टेस्ट में मॉडल्स के मेकअप के ऊपर लाखों रुपया खर्च होता है जिसमें ड्रेस, मेकअप, हेयर स्टाइलिस्ट, पर्सनल ट्रेनर, कोच, ट्रांसपोर्टेशन तथा ब्यूटी कॉन्टेस्ट में हिस्सा लेने वाली फीस इत्यादि होती है, जिनका खर्चा लाखों रुपए तक बैठता है. आमतौर पर यह खर्चा ब्यूटी कॉन्टेस्ट का लेवल और देश के अनुसार अलग अलग हो सकता है.

सौंदर्य प्रतियोगिताएं यूं तो आधुनिक जमाने की उपज है लेकिन इसके कई नियम ऐसे हैं जो कि अपने आप में एक पुरानी सोच और दकियानूसी विचार ही दर्शाते हैं जैसे ब्यूटी कॉन्टेस्ट में हिस्सा लेने वाली किसी भी मॉडल का अविवाहित होना जरूरी है. इसके साथ-साथ यह भी आवश्यक है कि उसने बच्चे को जन्म ना दिया हो. इसके अलावा सौंदर्य प्रतियोगिताओं में मिस टाइटल वाली ज्यादातर प्रतियोगिताओं में एंट्री 25-26 साल तक ही मिलती है।

तैयार रहिए बाहर तक झांकती कालर बोन हड्डियां, लाइपोसक्शन और कास्मेटिक सर्जरी की नई नई दुकानें, माडलिंग की आड़ में मुक्त देह की नुमाइशों, इनफर्टिलिटी, आत्महत्याओं और मानसिक अवसाद से घिरे नवयुवक नवयुवतियां आपका इन्तजार कर रही हैं।

 – डॉ. मधुसूदन उपाध्याय, लेखक भारतीय संस्कृति, इतिहास, कला, धर्म एवं आध्यात्म के गहन जानकार हैं।

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Mallika Dua-Akshay Kumar-Twinkle Khanna controversy: A maxi cheeseburger of ironies

Mallika Dua-Akshay Kumar-Twinkle Khanna controversy:

Quite often, men are given the ill-advice that if you have just one woman, she will fight with you, but if you have two women, they will fight over you. The reason I say this as ill-advice is because, while the women may fight over you, but then you would be dealing with the pressure of protecting two women and that can be something very dreadful to imagine.

Now, without going into the over-analysis of that, let’s pick a case from current affairs wherein actually a man and two women are involved. The women sure seem to be fighting with each other but not over the man. You have guessed it right. I am referring to the recent controversy surrounding seemingly insensitive remarks made by Bollywood star Akshay Kumar to comedian Mallika Dua in a TV show aired on the Star Plus channel, which called for a huge reaction by Mallika’s father and journalist Vinod Dua, followed by a public outrage against Akshay on the social media and only when she saw her husband getting decimated in the public perception, did his wife, Twinkle Khanna also decide to jump into the battlefield.

Twinkle, who writes with the name MrsFunnyBones, as ironical it may sound because she is rarely funny, took digs at Mallika for “over-reacting”. For the context, the comment which Akshay made, which is very clearly visible and audible in a video that has gone viral, is as follows.

22 years old comedian from Rajasthan, Shyam Rangeela, famous for his mimicry of PM Narendra Modi, performed on TV and he gave a wonderful performance. As was the ritual of the show, Akshay went on to ring a bell to mark his performance while other mentors of the show, including Mallika joined Akshay in ringing the bell and then Akshay says – “Mallika ji aap bell bajao, main aapko bajata hun” (Ms. Mallika, you ring the bell, while I will ring you).

The statement’s not the problem. The problem is with the declined form of the usage of Hindi language wherein a lot of otherwise decent words and phrases have come to mean a lot of slanderous things over the past few decades (thanks to Bollywood and the “tapori” language of Mumbai). Now here “Bajata hun” can have multiple meanings, one of which is “banging” which we all know what it translates to.

So, where is the irony? It’s a comedy show, and in the spur of the moment, Akshay just made a comment and it is always possible to take it in the lighter stride. And Mallika could actually be seen laughing when the comment was made. The trouble starts when her anti-Modi father, journalist Vinod Dua, sees that the comment was made on his daughter on a program wherein Modi was mimicked, the performance was awesome, and the video of the unaired show went viral, and then Mr. Dua decides to encash the opportunity to make hay while the Sun shines by creating controversy, so that his media channel “The Wire” can get some mileage.

So, Vinod Dua, writes a scathing post against Akshay calling him cretin and threatening to “Screw him” openly. Without taking any sides, I can say that the stand taken by Vinod Dua is not correct. Instead of slamming and abusing Akshay, he could have easily filed a complaint under section 354 of the Indian Penal Code against Akshay. But, he knew that the complaint won’t stand because Mallika has not complained immediately and she was clearly seen laughing at the comment. So, Mr. Dua decides to take advantage of the situation by talking about it socially and dishing out moral accolades.

Then, suddenly, Mallika Dua also realizes that actually she is the one who has been “subjected to harassment” at workplace and starts singing against Akshay on the social media. And then, many social media champions remind Mallika Dua of the kind of sleazy comedy that she herself performs on YouTube and asked her, if her morally elevated dad, Mr. Dua has seen those shows or not. For which, Mallika has the standard feminist reply – do not judge a woman by her past.

Well, then how do we determine whether a woman has really suffered or she is just playing the victim card? Feminists know that if they don’t bring in their defense of “not judging a woman by her past”, then all their claims will fall flat. The problem is with the stupid men, who fall for such baseless arguments sans logic or common sense.

So, that’s the irony from the “complainant’s” side. Now, are there any ironies on the side of the accused, i.e., Akshay? Well, it seems there are. Akshay Kumar, a Canadian national, and a known playboy since decades, who has ditched many famous heroines of his time, after romancing them, getting engaged with them, rose to fame recently, when he did a lot of movies with either the patriotic theme or the feminist theme or both.

So, a Canadian national, who refuses to accept Indian citizenship, does a bunch of patriotic movies and becomes a hero in real life. I don’t want to know if this reminds you of any particular Italian lady. And then, at the same time, our flamboyant Casanova, having sent a few famous actresses down the depression lane, starts talking about “women empowerment and respecting women” with his films like Rustom and Toilet – Ek Prem Katha, and his upcoming film – The Padman. And while all this, he is accused of passing a sleazy and insensitive remark to a female co-worker on the sets of a TV show.

But, that’s not the end of the irony. His wife and feminist icon, Twinkle Khanna, well known for her anti-male stands when she talked about men should not live more than 40 years, or mothers are like God but mothers-in-law are like devils, comes to the rescue of her accused husband and resorts to abuse-apology and victim blaming as she calls the response of the Dua clan as an overreaction and lack of sense of humor.

 

Now, there’s a double irony here. First of all, Twinkle is extremely critical of Hindu customs of being loyal to your husband and calls them regressive and patriarchal, but when it comes to her own husband, she defends him nonetheless and secondly, her stand is contradictory of her otherwise social stand on women’s issues.

So, we have a complainant who has a past of sleazy performances, an accused who is drawn into a region of conflict of interest, a campaigner for the complainant who has professional and political mileages to be drawn by keeping the debate alive and a campaigner for the accused who has her hands dirty with sabotaging her own social stand of moral values and issues, because this time, it’s about her husband.

Would you not like to call this as a “Maxi Cheeseburger of Ironies”? I would definitely call this one. Something to be used for entertainment and coffee-table gossips, not moral compassing.

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King of Bahraich Defeated And Killed Saiyyad Salar Masud: You Won’t Find It In Secular Syllabus

Suheldev

A number of historic events of importance have been kept aside from text books and historic studies in India. We cannot estimate if such moves were intentional conspiracies or a phenomenon of chance, but the impact of filtering history is definitely not good. Wiping out certain parts where Indians themselves were on the victorious side of a war makes way for number of suspicions. Here we came across such an instance that has been kept marginalised from mainstream history, though it was an evidently an important event that India witnessed. Here is all you need to know about the *‘Bahraich’* War.

‘Bahraich’ War took place during the month of July, way back in 1033. This war ended in a freezing defeat for the Muslim invaders who invaded India through the hands of Rajput kings. The defeat faced by the invaders was so harsh that it took them more than 150 years to raise an eye on India again.
It so happened in 1026, that Mahmud of Ghazni invaded the Gujrati region of India, and returned after he demolished the famous Somanatha temple. This act of his was witnessed by his 11 year old apprentice and nephew, Saiyyad Salar Masud. Demolition and robbery of the Somanatha temple incited ideas in the head of Saiyyad Salar Masud, who rightfully assumed that India would be a grand treasure – for one temple of Gujrat itself housed a great amount of materials that they looted.
This, combined with greed to convert India into a Muslim nation compelled Saiyyad Salar Masud to invade India soon after Ghazni’s death in 1030. Though this ambitious ruler was merely a 19 year old teenager, he led a massive army of 10,000 armed men. His relentless invasion sure had a notable impact on Indian rulers, most of who failed to counter or stop him. Saiyyad Salar Masud not only progressed along by looting the lands he invaded, but also converting the native rulers to Islam.
At the same time, Raja Sukhadev, or who is popularly known as Suhaldev; ruled a state named ‘Shravasthi’. 17 Rajput kings served under his emperorship, and this man was also a fierce warrior known to have led an army larger than that of Saiyyad Salar Masud. His army consisted of not just armed men, but war horses, elephants and wagons as well.
Unaware of this, Saiyyad Salar Masud continued his victory parade and reached Sathrik (now in UP), where he set up camp and called the place his capital. He assumed that no king in India was strong enough to outdo his army, and it would be an easy task to convert Hindu rulers to Islam – for they lacked unity amongst one another. With same assumptions in mind, Saiyyad Salar Masud sent his messenger to Bahraich (a part of UP, now situated in Lucknow), to ask for the ruler to surrender. However, his messenger was thrown out of Bahraich by the ruling Rajput King of the place. The pre-conception that Hindu rulers lacked unity was falsified by the united Rajput rulers of Shravasthi, who served under Raja Suhaldev.
When the messenger and Saiyyad Salar Masud attacked the ruler of Sathrik with an army of 10,000, he was ridiculously outnumbered by the united army of Shravasthi – which consisted of a whopping 1,20,000 soldiers! The valorous Rajputs mercilessly erased off every trait of existence of Saiyyad Salar Masud and what was considered to be his great army. The anger that aroused owing to Saiyyad Salar Masud’s misdeeds such as burning down Hindu temples and forceful conversions was brought out by the Rajputs on the war field in Bahraich. Saiyyad Salar Masud was brought down by Raja Suhaldev himself. Rajputs were hailed for the glorious victory for years to come; but sadly not in our history textbooks anymore.
Strange indeed, that an event that clearly demonstrates the victory of truth of evil has been sidelined by our historians. We are made to study the history of leaders such as Hitler and Mussoloni, but how many of us know the name of Raja Suhaldev? It’s probably high time we shift our focus towards what’s actually important for us to know.

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सीताजी ने किन जानवरों से की है रावण की तुलना?

Sita in ashoka vatika

आजकल हिन्दुओं में बड़ी चतुराई से रावण का महिमामंडन किया जा रहा है और यह झूठ फैलाया गया है कि रावण ने किसी स्त्री का स्पर्श नहीं किया था, उसमें वासना थी तो संयम भी था, आदि आदि जिससे रावण को चरित्रवान साबित किया जा सके और लोगों को श्रीराम से दूर करके राक्षस रावण के समीप ले जाया जा सके। पर वास्तव में यह पूरी तरह झूठ है!!

श्रीराम के जीवन का सबसे प्रमाणिक ग्रन्थ है वाल्मीकि रामायण जो कि श्रीराम के समकालीन ऋषि वाल्मीकि द्वारा रचित है। श्रीराम के जीवन पर यही सबसे प्राचीन ग्रन्थ है। वाल्मीकि रामायण के अनुसार रावण एक बहुत ही दुष्ट राक्षस था। जो कि सभी अवगुणों की खान था, वह यज्ञों में मांस फिंकवाता था, ऋषियों की हत्याएं कराता था, स्त्रियों का बलात्कार जैसा जघन्यतम कर्म करता था। वाल्मीकि रामायण के अनुसार वह कतई भी चरित्रवान नहीं था। उसके पापों, वहशीपन और अधर्म के कारण वाल्मीकि रामायण में सभी ने उसकी कड़े शब्दों में निंदा की है। सीताजी ने रावण की अनेक बुरे जानवरों से तुलना की है और उसे उन जानवरों के समान कहा है :-

1. कुत्ता 

सन्दर्भ : वाल्मीकि रामायण 5.21.31
कुत्ता एक वफादार व पालतू पशु है पर वह एक दम्भी पशु है जो अपनी औकात से बाहर के कामों को करने में रुचि लेता है। इसलिए अपमानसूचक शब्दों में हमेशा “कुत्ता” सम्बोधन प्रधान रहा है। रावण भी अपनी हैसियत से बाहर, श्रीविष्णु की लक्ष्मी का हरण करने चला था। इसलिए कहा गया है, “कभी तो कुत्ता भी शेर बनने लगता है”। लंकेश को भी इसीलिए कुत्ते के समान कहा गया है।

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2. सियार

सन्दर्भ : वाल्मीकि रामायण 3.47.45
सियार एक धूर्त जानवर है। कपटी, धोखेबाज और दुष्ट को धूर्त कहा जाता है। इसके लिए सबसे बड़ी मिसाल धूर्त सियार की दी जाती है। ‘रंगा सियार’ कहावत भी प्रसिद्ध है। सीताजी का धोखे से अपहरण करने वाला रावण भी इसीलिए सियार के समान धूर्त कहा गया है।

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3. बिल्ली

सन्दर्भ : वाल्मीकि रामायण 3.47.45
बिल्ली एक डरपोक जानवर है। शूद्रता के लिए बिल्ली का उदाहरण दिया जाता है। जैसे वह तो बिल्ली की तरह दुम दबाकर भाग गया। रावण भी अंत तक मारीच, मेघनाद, कुम्भकर्ण की आड़ में छुपता बचता रहा। इसलिए उसे बिल्ली के समान कहा है।

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4. कौआ

न्दर्भ : वाल्मीकि रामायण 3.47.46
कौआ एक कर्कश, ढीठ व अपशकुनी पक्षी है। यह सभी को वाणी से कष्ट देता है। रावण भी ऐसा ही अप्रिय भाषण करने वाला क्रूरकर्मा था। वह भी एकदम कौए की तरह काला था, रूप से भी कर्म से भी। इसलिए उसे कौए के समान कहा गया है।

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5. मद्गु (सांप की जाति)

सन्दर्भ : वाल्मीकि रामायण 3.47.47
सांप एक जहरीला व सबको भयभीत व आतंकित करने वाला प्राणी है। सभी को यह अप्रिय होता है। मद्गु एक छोटा सा शुद्र जलपक्षी भी होता है। रावण भी ऐसा ही जहरीला व सबको आतंकित करने वाला आतंकवादी था। इसलिए उसकी तुलना मद्गु से की गई है।

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6. गिद्ध

सन्दर्भ : वाल्मीकि रामायण 3.47.47
गिद्ध एक बहुत ही अमंगलकारी पक्षी है। यह मृत जीवों के मांस पर पलता है और हिंसक होता है। एक तरह से यह मृत्यु यानी शोक और अमर्ष का प्रतीक है। रावण भी ऐसा ही अमंगलकारी, ऋषियों तक की हत्या करने वाला, व मानव मांसभक्षी था। इसलिए उसकी तुलना गिद्ध से की गई है।

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सीताजी ने बहुत ही बुद्धिमत्तापूर्वक दुष्ट राक्षस रावण के लिए पशुओं की उपमाएं चयनित की हैं। भगवती सीता पराम्बा को बारम्बार प्रणाम है।

– मुदित मित्तल

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Savarkar on the Rohingya Crisis

Veer Savarkar

Be it Muslim infiltration in Asam, warning against suicidal Gandhian non-violence and Muslim appeasement, encouragement to the militarization of the country, warning against Chinese infiltration or the need of nuclear bomb and the perennial threat of Pakistan, every prophecy of Veer Savarkar came true.

Here’s what he said about Rohingya Muslims in Myanmar:

veer savarkar

“A couple of years ago I had issued a statement warning the Burmese that there was growing rapidly a hybrid Moslem population in Burma which would in the near future constitute a similar danger to the homogeneity of the Burmese people, as it did in the case of India. The Moslems used to marry Burmese girls in large numbers for at least a century in the past and were very particular in bringing up their progeny as Moslems, while no Moslem would, as a rule, give his girl in marriage to a Burmese.

The easy-go-lucky Burmese hardly suspected political danger out of such designed social relations. But soon after that, the Burma-Moslem riots miscalled as the Indo-Burmese riots started. The Moslems paid a heavy price for their mischief and the eyes of the Burmese got opened. “

 – Veer Savarkar25-09-1942

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8 States in India Where Hindus are Minority

Decrease in Hindu Population

There are many states in India where Hindus are in minority but still deprived of getting minority special status.

Jammu & Kashmir

After a continuous struggle of six centuries and several failed attempts of Umayyads, Abbasids, Ghaznavids, Kashmir finally fell into Muslim hands in mid of 14th century CE.Because of severe atrocities like forceful mass conversion, destructions of temples, abduction of women and massacres Hindus became minority in the region. In 1990 there were around 5 lakh Kashmiri Hindus who were compelled to leave the valley  by Pakistan sponsored terrorism.

Today, there are only 28.34%  (2011 census) Hindus in Jammu and Kashmir, completely wiped out from POK and Kashmir valley.

Punjab

The ancient Panchnad region of Vedic Hindus faced countless invasion even since Alexander and before. But kept standing proudly as the bulwark of Bharat.

The Muslim atrocities medieval era reduced Hindu population to great extent. In 1947, a larger part of Punjab went into Pakistan where Hindus and Hindudom has been completely wiped out.

Today in Indian Punjab the Hindu population is only 38.5%.

Meghalaya

Until the beginning of 19th century, the total population of Meghalaya was following indigenous religion. Ceaseless conversion for last two centuries has made the sate 75% Christian.

Today, Hindu population in Meghalaya is 11% only.

Arunanachal Pradesh

Arunachal Pradesh  is the region  where sage Parashuram washed away sins, the sage Vyasa meditated, King Bhishmaka founded his kingdom, and Lord Krishna married his consort Rukmini.

Today, Hindu population is only 29% in Arunachal Pradesh

Manipur

Until the beginning of 18th century, 100% Manipuris were following indigenous religion.

Today Hindu population in Manipur is only 41%

Nagaland

Till early 19th century, Naga people were followers of indigenous religion.

Today, Hindu Population is only 8%.

Lakshadweep

In union territory of Lakshdweep the Hindu Population is only 2%.

Source: Census  2011.

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