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21 Million ‘Unwanted Girls’: Hoax of Economic Survey

Economic-Survey-2018

Some Economic Survey conducted in an unscientific way says that India has 21 million “unwanted” girls and 63 million “missing” girls because people prefer a male child in India. Here is a look how they get this magical figure of 21 and 63 million because families want a boy so they keep on giving birth to the girl till a boy is born.

Why I don’t trust these surveys –

1.where is the data of those families which kept on having boys till they get a girl? Which means we have unwanted boys too where is the statistics of them?
2.Where is the data of unwed mothers aborting their babies?
3. What was the gender of the unborn babies?
4. Where is the data of communities who prefer to have a large number of children irrespective of gender? ( if you know what I mean )
5. When sex determination test is illegal how they are getting figures for that?

The assumptions made on this basis are-

1. Because people prefer a boy so girls are unwanted ( are you serious? )
2. Girls must be badly treated as nobody wanted them.

Reality check –

the data they gave is a part of some economic survey, also, it is just an estimate. Interestingly, It was published by Washington Post, BBC and other foreign agencies who have this open agenda of presenting India in a bad light. They purposely use figures like 21 million or 63 million as most of the people do not understand million, billion thing in India.

There are many families and mothers who actually mistreat their sons because they wanted a daughter. Also, if a family has one son among 4 sisters the son is considered the bonded labor of the family. He has the burden of responsibilities over his shoulders including sister’s marriage, making a house, taking care of parents ( respondent is son in CRPC 125). So, if you are giving birth to son it’s not a favor for him, his life is burdened. Stop ranting female foeticide!

– Jyoti Tiwari, Men’s rights activist, social activist and a renowned author of best-selling novel ‘Anuraag’

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पैडमैन – पुरुष-विरोधी मानसिकता का नंगा नाच

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अगर बात सिर्फ सेनेटरी नैपकिन की होती तो कोई बात नहीं थी अगर बात सिर्फ शौचालय बनाने की होती तो भी कोई बात नहीं थी| मगर हर बात में स्वतः ही पुरुष के प्रति घृणा कहाँ से आ जाती है यह समझ से परे है| जब शौचालय पर फिल्म की तब भी आदमी को गाली दी बल्कि शौच करते हुए आदमी की फोटो तक सोशल मीडिया पर डाल दी, आदमी की इज्ज़त होती नहीं ना| हर चीज़ को आदमी के अत्याचार से जोड़ दो शौचालय बनाना चाहिए क्योंकि हमारे पुरुष शौच करती हुई महिला तक को नहीं छोड़ते हैं| किस प्रकार का लॉजिक है यह ?

मैं उस ज़माने की हूँ जब सेनेटरी नैपकिन भारत में कदम रख रहे थे| यह उस समय की बात है जब केयरफ्री नाम का संभवतःएक ही ब्रांड आता था| वो भी किसी काम का नहीं था विशेषतौर पर मेरी जैसी लडकियों के लिए क्योंकि हम स्कूल जाती थी, साईकल चलाती थी और कबड्डी भी खेलती थी| सेनेटरी नैपकिन नहीं थे तो काम कैसे चलता था ? छोटे गाँव और कस्बों में कपडे की दुकान पर सस्ते सूती कपडे के थान मिलते थे और रूई तो थी ही| मैं ऐसे स्कूल में भी पढ़ी हूँ, जहाँ ढंग का टॉयलेट भी नहीं था| मतलब पैड बदलने की कोई व्यवस्था नहीं थी| मगर मुझे याद नहीं कि मैं या मेरे साथ की किसी लड़की ने कभी इसके लिए पूरी पुरुष जाति को ज़िम्मेदार ठहराया हो| हमने उसमें से रास्ता निकाला और आगे बढ़ते गए| सूती कपडे के साथ-साथ घर के पुराने सूती कपड़ों का भी इस्तेमाल होता था, जिसको फिल्म वाले ओल्ड रग्स यानी चीथड़े बताएँगे| फिर आया मिस यूनिवर्स का दौर जब सुष्मिता सेन मिस यूनिवर्स बनी| सुष्मिता सेन के मिस यूनिवर्स और ऐश्वर्या राय के मिस वर्ल्ड बनने के बाद ताबड़तोड़ कॉस्मेटिक और सेनेटरी नैपकिन के ब्राण्ड भारत में आये| हमारे लिए राहें आसन हुई मगर दुष्प्रचार के साथ कि हम भारत की स्त्रियाँ गन्दगी से मासिक धर्म का निर्वाह करती है, हम बेचारी गरीब और सताई हुई हैं इत्यादि| सेनेटरी नैपकिन बेचने का यह तरीका था और इसके लिए सिस्टेमेटिक ब्रेनवाशिंग की गयी| हम सूती कपडे और रूई इन्स्तेमाल करते थे, इन्होने प्रचार किया कि हम गन्दा कपड़ा और गन्दा कागज़ इस्तेमाल करते हैं|

खैर सेनेटरी नैपकिन चल पड़े बाज़ार में क्योंकि इनकी ज़रुरत भी थी| तरह तरह के प्रचार से इनको बेचा गया छू लो दुनिया, कर लो सब मुट्ठी में जैसे अगर वो 3 दिन रुक गयी तो दुनिया हाथ से निकल जाएगी| ध्यान देने की बात यह है कि menstrual कप, पीरियड पैनटी जैसे अन्य तरीकों का ज़्यादा प्रचार नहीं किया गया| क्योंकि उनको बार- बार खरीदना नहीं पड़ता, बाज़ार आगे कैसे बढेगा|

क्या हम गन्दी चीज़ें प्रयोग करती थी –

व्यक्तिगत साफ़ सफाई सबकी अलग-अलग होती है| कोई रोज़ नहाता है तो कोई हफ्ते में एक बार, कोई कपड़े धोये और प्रेस किया बिना नहीं पहनता तो कोई मुचड़े कपड़ो में प्रसन्न है| कहने का अर्थ यह है कि जो वैसे साफ सुथरी नहीं रहती वो मासिक धर्म के दौरान भी गन्दी ही रहेगी| एक औरत अगर गन्दगी से रहती है तो यह पूरे भारत की स्त्रियों की समस्या नहीं है| मगर ठीक है आपको पैड बेचना है तो कुछ भी कहिये| मज़े की बात यह कि इन् लोगों ने प्रचार किया कि यह लोग बेचारी पैड बनाती, धोती, सुखाती हैं फिर प्रयोग करती है| अब इनसे पूछिए कि पीरियड पैनटी को भी तो धोया जाता है और आजकल रीयूज़ेबल पैड भी आते हें है| वो क्या हें, उनको भी धोया, सुखाया जाता है|

सेनेटरी नैपकिन पर टैक्स क्यों –

सस्ते नैपकिन खरीदेंगी महिलाये? मेरे मोहल्ले में एक सस्ते लोकल नैपकिन बेचने वाली महिला आई थी जिस से किसी ने भी नहीं खरीदा, पैड में कोई खराबी नहीं थी बस उस पर कोई बड़ा ब्रांड का नाम नहीं था| यहाँ शनेल ब्राण्ड की फर्स्ट कॉपी खरीदने वाली महिला जब सेनेटरी नैपकिन पर टैक्स की बात करती है तो हंसी आती है| हजारों रुपये ब्रांडेड कास्मेटिक पर लगा देने के बाद सेनेटरी नैपकिन पर टैक्स याद आया है| सरकार कह रही है कि सेनेटरी नैपकिन बनाने के लिए जिस कच्चे माल की आवश्यकता होती है वो महँगा है| हर बात पर सरकार और पुरुषों पर दोष मढने वाली महिला को यह बात नहीं समझ आएगी| दोष देने से बेहतर होता रास्ता तलाश करना जिससे कच्चा माल भारत में पैदा हो सके मगर इतनी मेहनत कौन करे दोष देना आसान है| और दोष भी कैसा ज़रा भाषा का चुनाव देखिये –

इनका मानना है कि सेनेटरी नैपकिन पर टैक्स है वियाग्रा पर नहीं क्योंकि ज़्यादातर नीति बनाने वाले 65 साल के वृद्ध हैं जिनको स्तंभन दोष हो चुका होता है| जैसा कि मैंने आरम्भ में कहा कि किसी भी चीज़ को बेचने के लिए यह लोग किसी भी स्तर तक गिर जाते हैं| एक फेमिनिस्ट की सोच वियाग्रा, सेक्स, स्तन, लिंग से आगे नहीं बढ़ पाती| किसी भी विषय पर बात करवा लीजिये यह घूमकर इसी पर आ जायेंगी|

फ्री ब्लीडिंग से सेनेटरी नैपकिन तक –

कुछ साल पहले किरण गाँधी नाम की एक महिला लन्दन में बिना पैड पहने मैराथन दौड़ी थी और उसको बहुत बहादुर मानकर पुरस्कार भी दिया गया था| एक तरफ फेमिनिट्स लोग पुरुष पर सब दोष मढ़कर सेनेटरी नैपकिन का प्रचार करते हैं दूसरी तरफ यह महिला बिना पैड के दौड़ती है| कोई इनसे पूछे सशक्तिकरण का अर्थ यदि आदिम काल में लौटना है जहाँ ना कपड़े हों ना सुविधाएँ तब तो सबको सशक्त करना आसान है| इसको फेमिनिस्ट्स ने फ्री ब्लीडिंग का नाम दिया है| उसने अपना अनुभव बताया था कि कैसे उसको पुरुषों ने टोका कि, “मैडम आपके कपड़ों पर दाग हैं|” यह उनको पितृसत्ता का दमन लगा था| इस प्रकार के तर्क के हिसाब से यदि मैं किसी को टोकूं कि आपके कपड़ों की सिलाई खुली है या दाग है तो उसे मातृसत्ता का दमन माना जाये|

इनके लॉजिक से चलने वाली महिलाएं बहस करती हैं तो कहती हैं कि आप लोग नहीं जानते कितना दर्द है माहवारी और बालक को जन्म देने में| तो पुरुष का दर्द क्या आप समझती हैं ? आप खुद कंफ्यूज है कि करना क्या है फ्री ब्लीडिंग या सेनेटरी नैपकिन|

पीरियड टैबू का ढिंढोरा पीटने वाली महिलाओं से पूछे कोई कि इसको टैबू बनाया किसने? स्वयं महिलाओं ने ही ना, घर के पुरुष को तो पता भी नहीं चलता कि लड़की को माहवारी शुरू हो गयी है| एक और बात कि पीरियड्स के बारे में बात नहीं कर सकते, यह बिलकुल गलत है जहाँ ज़रुरत होती है वहां करते हैं| सड़क चलते पीरियड, सेक्स बात क्यों क्यों ज़रूरी है पहले कोई यह बताये? वो सब करना पाश्चात्य संस्कृति का हिस्सा जहाँ हर बात यही से शुरू होकर यही ख़तम होती है| कभी मुश्किल में पुरुष से कह कर देखिये, आपको सहायता ही मिलेगी, यह मेरा निजी अनुभव है|

 मेन्स्ट्रुअल मैन-

पैडमैन नाम की यह फिल्म आपको बताएगी कि कैसे माहवारी, महामारी है और इससे बड़ी समस्या भारतवर्षे, आर्यावर्ते, जम्बुद्वीपे में हो ही नहीं सकती| यह फिल्म अरुणाचलम मुरुगुनाथम नाम के व्यक्ति पर बनी है जिसने सस्ते सेनेटरी नैपकिन बनाने का बीड़ा उठाया| इसके लिए उनको समाज से बहिष्कृत भी किया गया| उनकी पत्नी तक ने उनका साथ छोड़ दिया और अपनी माँ के घर वापिस चली गयी| पर किसी भी कर्मठ पुरुष की तरह अरुणाचलम अपने लक्ष्य तक पहुँच कर माने| और हम स्त्रीयों ने क्या दिया उनको बदले में, वही पुरुष के प्रति घृणा और पुरुष सत्ता को गाली| पुरुषसत्ता जब खुद पर प्रयोग कर के सेनेटरी नैपकिन बनाती है तो अच्छी लगती है मगर वही पुरुष सत्ता जब अपने लिए थोडा सा प्यार और सम्मान चाहती है तो ख़राब लगने लगती है|

जिस तरह ट्विंकल खन्ना पैडमैन फिल्म का प्रचार कर रही हैं उससे उनकी कुंठित मानसिकता का पता चलता है| फेमिनिस्म, महिलाओं को किस तरह एहसानफरामोश होना सिखाता है यह भी साफ़ दिखता है| गौरतलब है कि मेन्स्त्रुअल मैंन नाम की एक डाक्यूमेंट्री पहले ही अरुणाचलम पर बन चुकी है, इस  फिल्म में तथ्यों से छेड़छाड़ अवश्य की गयी होगी| फिल्म का ट्रेलर देखिये अक्षय कुमार कहते हैं, “ब्लडी मेन अगर आधे घंटे खून बहे तो मर जाये|” यह वो अक्षय कुमार हैं जो आर्मी आर्मी किया करते हैं| सरहद के जवानों की कहानी यह बोलते समय भूल गए| क्योंकि जब इज्ज़त मन में ना हो सिर्फ दिखावा हो तो जुबां फिसल ही जाती है| यही नहीं उन्होंने यह तक कहा कि सेना की सब्सिडी घटाकर महिलाओं को सेनेटरी नैपकिन उपलब्ध कराये जाएँ| इससे उनके मानसिक दिवालियेपन का पता चलता है| कांस्टेबल नितिन BSF का हिस्सा थे, लगातार खून बहते हुए भी गोली चलाते रहे और अंततः शहीद हुए| उनकी वजह से सीमा तोड़कर आने वाले आतंकवादी भाग खड़े हुए| यह केवल एक कहानी है, ज़रा ढूंढ कर देखिये ऐसी सैंकड़ों कहानियां मिल जाएगी हर समाज, हर देश में| पुरुषों की लाशों पर सभ्यताएं बनी हैं और आप सिर्फ एक सेनेटरी नैपकिन वाली फिल्म बेचने के लिए इतनी बेहूदी बात कर रहे हैं ? मैं फेमिनिज्म को बढ़िया आन्दोलन मान लेती अगर इस एक लाइन को हटाने के लिए महिलाएं आन्दोलन कर देती कि हमारे पुरुष ऐसे नहीं हैं| पूरा ट्रेलर देखंगे तो पायेंगे कि औरत हर जगह रो रही है, जैसे महिलाएं ही बीमार होती हैं बस पुरुष को कोई बीमारी पकड़ती ही नहीं|

कैंसर में भी केवल स्तन कैंसर की चर्चा होती है जबकि प्रोस्टेट कैंसर उससे कहीं ज्यादा होता है और पुरुष शर्म से बता भी नहीं पाते| लेकिन नहीं प्रचार तो यह है कि शर्म, लाज केवल महिला के लिए है पुरुष निरा लम्पट निर्लज्ज है| सिगरेट पर पैसे खर्च करता है मगर सेनेटरी नैपकिन पर नहीं, वाह लॉजिक! पुरुष घर खर्च के लिए पैसे देता है तो उसमे कितना झोल झाल करती हैं महिलाएं इसका कोई अंदाज़ा है क्या? मगर आप यह कह भी नहीं सकते क्योंकि महिला गँगा की भांति पवित्र होती है और पुरुष दानव| औरत खुद अपनी प्राथमिकता तय नहीं कर पाई इसमें पुरुष समाज क्या करे? पुरुष ने हर तरह की सुविधाएँ दे डाली मगर फिर भी महिला पुरुष को दोष देती घूम रही है| ट्विंकल खन्ना, सोनम कपूर और अक्षय कुमार को इस तरह की वाहियात बात करते कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि उनको एक फिल्म बेचनी है| फुल्लू नाम की फिल्म इसी विषय पर आई थी, उसमे भी यह लाइन थी, “जो औरत का दर्द नहीं समझता उसको भगवन मर्द नहीं समझता|” आप समझते रहिये औरत का दर्द, बदले में वही औरत आपके खिलाफ नफरत फैलाती रहेगी|

फेमिनिस्म के नाम पर साबुन, तेल, शैम्पू, सब बिक रहा है आपकी यह पैडमैन फिल्म भी बिक जाएगी, रह जायेगा तो सवाल क्या पुरुष को कठघरे में खड़ा करना ज़रूरी था, क्या सेना के जवानों के खून का अपमान ज़रूरी था?

– ज्योति तिवारी, पुरुष अधिकार कार्यकर्ता, लेखिका व सामाजिक सरोकार से जुड़े कार्य करती हैं. उनकी किताब ‘अनुराग‘ बेस्ट सेलर पुस्तक रही है.

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दुष्ट राक्षसियों के प्रति कैसा था हनुमान जी का व्यवहार? हनुमान जी का फेमिनिज़्म!!

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कुछ लोगों द्वारा यह कहा जाता है कि स्त्री कितनी भी दुष्ट हो उसका सम्मान करना ही चाहिए फिर चाहे वह वैश्या ही हो। इसके लिए वे हिन्दू ग्रन्थों से कुछ तर्क भी देते हैं। एक तर्क है कि हनुमान जी ने सुरसा और त्रिजटा जो कि राक्षसियाँ थीं उन्हें माता कहकर सम्मान दिया था फिर बॉलीवुड अभिनेत्री का अपमान क्यों, नाक कान काटने की धमकी क्यों, माना वह दसियों के साथ सोती है फिर भी उसे वैश्या क्यों कहना। इसका उत्तर जानने के लिए हमें वाल्मीकि रामायण में जाना होगा।

वाल्मीकि रामायण सुंदरकांड प्रथम सर्ग में समुद्र लंघन के समय हनुमान जी के सुरसा से सामना होने की कथा है। वाल्मीकि रामायण के अनुसार सुरसा एक देवी ही थी। ऋषियों और देवताओं ने मैनाक पर्वत विजय के बाद पुनः हनुमानजी जी के बल की परीक्षा लेनी चाही और नागमाता सुरसा को राक्षसी का भेष धरकर विघ्न डालने भेजा। हनुमानजी ने पहले तो सुरसा को आदर से समझाया। पर जब वह नहीं मानी तो वे कुपित हो गए और अपना बल दिखाया (श्लोक 151..)। फिर सुरसा को जीतकर उनके असली स्वरूप को प्रणाम किया। परन्तु इस घटना में कहीं भी उन्होंने माता सम्बोधित नहीं किया। अतः यह सुरसा को माता कहने का तर्क खण्डित हो गया, क्योंकि सुरसा न तो कोई नीच दुष्टा स्त्री थी न ही हनुमानजी ने स्त्री समझकर उसे व्यर्थ सम्मान देकर फेमिनिज़्म फैलाया। आगे सिंहिका वध में भी हनुमानजी ने स्त्री विस्त्री कुछ नहीं देखा बस दुष्ट समझकर वध कर डाला।

इसके आगे लंकिनी राक्षसी ने जब हनुमान जी से गलत तरीके से बात की तो हनुमानजी ने भी उसे उसी भाषा में उत्तर दिया। इसके बाद लंकिनी ने हनुमानजी को बड़ी जोर से थप्पड़ मारा, तो हनुमानजी ने भी जोर से मुक्का जड़ दिया। इससे लंकिनी गिर गयी और हार मान ली। स्त्री समझकर हनुमान जी ने पहले ही उसको ज्यादा तेज नहीं मारा था, पर हनुमान जी को उसपर दया आ गई।(सुंदरकांड, सर्ग 3)। शठे शाठयम समाचरेत और सभी पर दयाभाव सनातनियों की नीति है। फेमिनिज़्म हम लोगों की नीति कभी नहीं रही।

इसके आगे लंका दहन में हनुमान जी ने स्त्री पुरुष का भेद न करते हुए लंका दहन किया था। सुंदरकांड 54 सर्ग श्लोक 25-26 में आता है कि,

“लंका धू धू करके जलने लगी। कितनी ही स्त्रियाँ गोदमें बच्चे लिए सहसा क्रंदन करती हुई नीचे गिर पड़ीं। राक्षसियों के सारे अंग आग की चपेट में आ गए, वे बाल बिखरे अट्टालिकाओं से नीचे गिर पड़ीं मानो मेघ से जलती हुई बिजली गिरती हों।”

यहाँ भी हनुमान जी ने दुष्ट औरतों के फेमिनिस्ट भक्तों की तरह रोना नहीं फैलाया, शत्रु को मारा बस फिर चाहे स्त्री हो या पुरुष।

hanuman lankini
लंकिनी पर प्रहार

अब आगे त्रिजटा की बात, तो त्रिजटा विभीषण की पुत्री और बड़ी हरिभक्त थी। हनुमान जी का उनसे कोई वार्तालाप रामायण में नहीं मिलता। परन्तु त्रिजटा परम आदरणीया हैं और माता सीता की परम भक्त व शुभचिंतक होने के कारण माता कहलाने के सर्वथा योग्य हैं। इसलिए त्रिजटा माता को हम सब नमन करते हैं। वे ही तो हमारी जानकी मैया का एकमात्र सहारा थीं उस राक्षस की लंका में।

राक्षसियों के प्रति हनुमान जी के कठोर विचार

परन्तु उनके साथ जो अन्य राक्षसियाँ थीं वे एक नम्बर की नीच दुष्टा थीं। सुंदरकांड में वर्णन है कि वे राक्षसियाँ सीताजी के अलग अलग अंगों को कच्चा खाना चाहती थीं और सीता मैया पर बड़ा अत्याचार करती थीं। उन दुष्टाओं पर हनुमानजी का भारी क्रोध युद्धकाण्ड में प्रकट हुआ है। युद्धकाण्ड 113 सर्ग में हनुमानजी सीताजी को श्रीराम विजय का सन्देश सुनाने के बाद कहते हैं,

“आप जैसी पतिव्रता देवी अशोक वाटिका में बैठकर क्लेश भोग रही थीं और यह भयंकर रूप एवं आचार वाली विकराल मुखी क्रूर राक्षसियाँ आपको बारंबार कठोर वचनों द्वारा डांटती फटकारती रहती थीं। रावण की आज्ञा से यह क्या क्या आपसे कहती थीं मैंने सब सुना है। ये सबकी सब अत्यंत क्रूर और दारुण हैं। मैं तरह तरह के आघातों द्वारा इन सब का वध कर डालना चाहता हूं। मेरी इच्छा है कि मुक्कों, लातों, थप्पड़ों, पिंडलियों और घुटनों की मार से इन्हें घायल करके इनके दांत तोड़ दूं, इनकी नाक और कान काट लूं, तथा इनके सिर के बाल नोच लूं। यशस्विनी! इस तरह बहुत से प्रहारों द्वारा इनको पीट कर क्रूरतापूर्ण बातें करने वाली इन सब अप्रियकारिणी राक्षसियों पटक-पटक कर मार डालूं। जिन जिन भयानक राक्षसियों ने आप को डांट लगाई है उन सबको मैं अभी मौत के घाट उतार दूंगा इसके लिए आप मुझे आज्ञा दें।”

परन्तु परम वात्सल्यमयी जनककिशोरी सीता जी ने हनुमान जी को समझा बुझाकर शांत किया कि इन्हें छोड़ दो, तब कहीं जाकर हनुमानजी माने। दुष्ट स्त्रियों के यही हनुमानजी हिन्दू धर्म की आदर्श स्त्री सीता माता के परमभक्त थे।

hanuman praying sita
हनुमान जी की माता सीता से भेंट

अब हम शूर्पनखा के नाक कान काटने के प्रसङ्ग में श्रीरामचन्द्र का वह आदेश देखते हैं जिसके आधार पर लक्ष्मण जी ने शूर्पनखा को कुरूप किया था। जाहिर है कि शूर्पनखा एक वैश्या थी जो श्रीराम और लक्ष्मण पर डोरे डाल रही थी। वह काम में हद से ज्यादा उन्मत्त थी और सीताजी की हत्या को उतावली थी। ऐसी नीच दुष्ट वैश्या के प्रति श्रीरामचन्द्र ने कहा –

“लक्ष्मण! तुम्हें इस कुरूप, कुल्टा, अत्यंत मतवाली और लंबे पेट वाली राक्षसी को किसी अंग से हीन करके कुरूप बना देना चाहिए।”

यह सुनकर लक्ष्मण जी ने तुरन्त शूर्पणखा के नाक कान काट लिए।

पाठक स्वयं निर्णय करें कि हनुमानजी किसके पक्ष में हैं? दुष्टा स्त्रियों का सम्मान जब श्रीहनुमान जी महाराज ने नहीं किया तो फिर दुष्ट स्त्रियों का झूठा सम्मान क्यों? क्या फेमिनिस्ट हिंदूवादियों में हनुमानजी से ज्यादा बुद्धि है। दुष्ट अभिनेत्रियों के अश्लीलता पूर्ण क्रियाकलाप, अनेक आदमियों से सम्बन्ध, आदि सब नेट पर हैं। ऐसे में उन्हें वैश्या कहने में क्या गलत है? वे पैसे के लिए ही तो अपने अंग प्रदर्शन और शीलभंग करती हैं। जबकि हनुमान जी ने भी दुष्टा स्त्रियों की लात घूंसों से मारने, नाक कान काटने व जान से मारने तक की बात भगवती सीता के समक्ष कही है। स्त्री चाहे कैसी भी दुष्ट हो, बुरे से बुरे कर्म करे पर उसका सम्मान हो यह सनातन धर्म का सिद्धांत नहीं है। हिन्दू धर्म का एक ही सिद्धान्त है, अच्छे कर्म करने वाले गुणवान स्त्री पुरुष दोनों पूजनीय व सम्मान के पात्र हैं और नीचकर्म करने वाले दुष्ट स्त्री पुरुष दोनों धिक्कार, असम्मान और दुत्कार के पात्र हैं। इसमें कोई डिस्काउंट नहीं है। सिद्ध होता है कि दुष्टाओं के लिए सम्मान मांगने वाले श्री हनुमान जी के विरोधी हैं।

– मुदित मित्तल

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क्या सम्बन्ध है हिन्दू विरोधी एजेंडे और फेमिनिस्ट में!

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आपने अक्सर देखा होगा फेमिनिस्ट हिन्दू धर्म की परम्पराओं और रीति रिवाज़ों का मज़ाक उड़ाती मिलती हैं। क्या सम्बन्ध है एंटी हिन्दू एजेंडे और फेमिनिस्ट में ? इतना तो अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि फेमिनिस्ट यानि महिलावादियों को फंडिंग विदेशों से आती है। इन विदेशी फंडिंग में सबसे ऊपर हांस ( HANS ) का नाम आता है। हांस भारत में सेण्टर फॉर सोशल रिसर्च ( CSR )नाम के संगठन को सपोर्ट करता है। CSR को रंजना कुमारी चलाती हैं। मेरी रंजना जी से दो बार मुलाकात हुई है बल्कि गर्मागर्म बहस हुई है। उन्होंने बोला था हिन्दू कोई धर्म नहीं है आप लोग नाहक ही परेशान हैं। वामपंथियों का भी यही मानना है इसलिए वामपंथियों और फेमिनिस्ट में इतनी समानता नज़र आती है।
हान्स के बारे में विस्तार से पढ़ें ऊपर से देखने में यह सामाजिक संगठन लगेगा पर असल में इसका मुख्य कार्य दुनिया में ईसाईयत फैलाना है। तो जब फण्ड देने वाला ईसाई बनाने पर तुला हो ,तो हिन्दू कोई धर्म रह ही नहीं जाता इनके लिए। मैंने एक फेमिनिस्ट संगठन का उदाहरण दिया ऐसे कई हैं जो विदेशों में भारतीय महिलाओं की रोती छवि दिखाकर पैसा बटोर रहे हैं।

इसके अलावा और एक एजेंडा है। भारत की शक्ति है परिवार हमारे यहाँ आज भी पीढ़ियां साथ रहती हैं। इस परिवार को तोड़ने से बाज़ारवाद बढ़ता है , कैसे ? एक केस हुआ तो लड़का परिवार से अलग हुआ ताकि परिवार पर कोई आंच ना आये। अब उस एक परिवार के दो टुकड़े हो गए , दो मकान होंगे दो बेड होंगे दो टीवी होंगे , बाजार बढ़ेगा। क्यों लगता है आपको कि फेमिनिस्ट नित नए कानून लाने की वकालत करती है क्योंकि व्यापार चलता रहेगा , पैसा आता रहेगा। इसके लिए वो हर तरह का ज़हर घोलेंगी बदन ढकी हुई महिला को बहनजी कहा जयेगा ताकी वो नंगी घूमे और कहे कि ,”नज़र तेरी ख़राब है बदन मैं ढकूँ ” ! हमारी लड़कियों को फ़र्ज़ी अत्याचार की कहानियां सुनाई जाएँगी। मज़े की बात तो यह है कि जो हमारे यहाँ अत्याचार बताया जाता है वही इस्लामिक देशों में सशक्तिकरण बताया जाता है। जैसे उनका हिजाब उनकी परंपरा है तो हमारा करवाचौथ पितृसत्ता का प्रतीक। बड़ा झोल झाल है बात इतनी साधारण नहीं है जितनी दिखती है।

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लगभग महीना भर पहले की बात है| मैं अपने कार्यस्थल से अपने घर आ रहा था कि देखा सड़क किनारे लोग भीड़ लगाए खड़े हैं और कुछ लोग उस तरफ दौड़ रहे हैं| ये समझ आ गया कि अभी अभी ही कुछ हुआ है और बाइक को और तेजी से दौड़ा कर भीड़ के पास पहुंचा| वहां देखा कि एक लड़की अपनी स्कूटी सहित सड़क किनारे के गड्ढे में भरे बरसाती पानी से बने दलदल में गिर गयी है और उसमें से निकलने की कोशिशों के लिए हाथ पैर मारते उसमें और फँसती जा रही है|

मेन रोड के चलते भीड़ अच्छी खासी जमा थी जिसमें महिलाओं और युवतियों की संख्या भी ठीकठाक थी, पर बकबक और एक दूसरे से क्या हुआ, कैसे हुआ पूछने के सिवा कोई कुछ करता नहीं दिख रहा था| मैंने तुरंत अपने हेलमेट, बैग और LS बेल्ट को बाइक पर रखा, जूते-मोज़े उतारे और सड़क से नीचे गढ्ढे में उतर गया| चिकनी मिटटी की वजह से पैर टिकाना भी मुश्किल पड़ रहा था, पर कुछ तो करना ही था क्योंकि लड़की पूरी तरह बदहवास और लस्त-पस्त दिख रही थी| इतने में एक और बन्दा नीचे उतर आया और उसने पीछे से मेरा हाथ पकड़ा और फिर देखते ही देखते पूरी श्रृंखला बन गयी और मुझे स्वयं को संभालने की जद्दोजहद से मुक्ति मिल गयी| मैंने धीरे धीरे आगे बढ़कर उस लड़की को खींचने की कोशिश की पर संभव नहीं हुआ, तब उसे पकड़कर किसी तरह से नीचे से उठाया और उसके बाद बाहर खींच लिया| फिर उसकी स्कूटी, बैग, हेलमेट और चप्पलों को भी एक एक कर कीचड से निकाला क्योंकि सब उसमें धंस गए थे|

उस लड़की को पकड़कर बाहर निकालते समय, अगर सच कहूं, तो मैं एक पल भी ये नहीं सोच पाया कि मैं उसे कहाँ से पकड़ रहा हूँ या मेरा हाथ उसके शरीर के किस अंग पर है क्योंकि उस समय दिमाग केवल एक ही बात बता रहा था कि किसी तरह इसे जल्द बाहर निकालो वरना दिक्कत हो जाएगी| मेरे पुरुष या उसके स्त्री होने को लेकर कोई विचार मन में फटका तक नहीं| पर आज सोचता हूँ कि नहीं ये सब भी ध्यान कर लेना चाहिए था क्योंकि वो तो गनीमत है कि वीडियो बनाने वालों में से किसी के सर पर नारीवाद का भूत सवार नहीं था या यूँ कहूं कि कोई प्रेस्टीट्यूट वीडियो नहीं बना रहा था वरना अब तक तो मोलेस्टेशन के मामले में जेल की हवा खा रहा होता|

आप कहेंगे कि कहीं ऐसा भी होता है| मैं कहूंगा कि और कहीं नहीं, इसी हिन्दुस्तान में गलीज नारीवादियों के चलते ऐसा होता है| वरना क्या मज़ाल थी कि ‘दि हिन्दू’ की वो  पत्रकार वेदिका चौबे मात्र 8 सेकेण्ड की एक क्लिप के आधार पर एलफिन्सटन ब्रिज हादसे में मर रहे लोगों की मदद करते एक लड़के को मोलेस्टर ठहरा देती और उसे सदा के लिए शर्मसार कर देती| इस घटना विशेष का जो नया वीडियो सामने आया है, उसमें साफ़ साफ़ दिख रहा है कि वो और उसके जैसे कई लड़के पुल पर किसी तरह लटक कर उसमें दब कर अंतिम साँसे ले रहे लोगों की मदद करने की भरसक कोशिश कर रहे हैं| इस वीडियो में साफ़ दिख रहा है कि मोलेस्टर ठहरा दिया गया वो लड़का दम तोड़ती उस लड़की को पकड़ कर उसे खींच कर बाहर निकालने की कोशिश कर रहा है, पर असफल हो रहा है| एक क्षण के लिए भी कहीं से वो लड़का उस मरणासन्न लड़की से छेड़छाड़ करता या कोई हरकत करना नज़र नहीं आ रहा है|

पर वाह रे नारीवाद, अपने अंध पुरुष विरोध में एक मददगार को ही तुमने मोलेस्टर ठहरा दिया| थू है ऐसे नारीवाद पर और थू है इसके समर्थकों पर| ये लोग कोढ़ हैं किसी भी समाज के लिए| ये किसी भी तरह से किसी स्त्री की कोई सहायता नहीं कर रहे, बल्कि एक ऐसी स्थिति ला रहे हैं जहाँ हम सड़क पर तड़प तड़प कर मरती किसी स्त्री की सहायता इसलिए नहीं करेंगे क्योंकि इनके जैसी कोई कमीनी कोई क्लिप दिखाकर हमें गुंडा, यौनपिपासु, मोलेस्टर, और ना जाने क्या क्या साबित करेगी| आज भले ही कइयों को ये बातें बुरी, कड़वी और भद्दी लगें, पर भगवान् ना करे कल जब ये स्थिति इनके या इनके परिवार की किसी महिला के साथ आएगी और हम दूर खड़े होकर मात्र तमाशा देखेंगे, तब इनको आज के दिन पर अफ़सोस होगा, पर तब तक बहुत देर हो चुकी

 विशाल अग्रवाल (लेखक भारतीय इतिहास और संस्कृति के गहन जानकार, शिक्षाविद, और राष्ट्रीय हितों के लिए आवाज़ उठाते हैं। भारतीय महापुरुषों पर लेखक की राष्ट्र आराधक श्रृंखला पठनीय है।)

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फेमिनिज्म एक विकृत मानसिकता

Feminism in India

पिछले दिनों लंकिनी के वध पर पत्रकारों ने काफी बवाल मचाया था। तब मैंने लिखा था प्रभु लोगों कितने ही पुरुष रोज़ मर जाते हैं पर आप लोगों को कष्ट नहीं होता इस मृत्यु में ऐसा क्या ख़ास है जो चिल्ला रहे हो। प्रेश्या लिखने पर एक पडोसी पत्रकार बंधु नाराज़ हो गए (मानो दुनिया भर के पत्रकारों ने नेता वही हों )। इतने नाराज़ कि बोले तुम पर होगा तो पता चलेगा और ब्लॉक कर के चले गए। यह उनका लॉजिक था , इसी लॉजिक और दूसरों के लिए बुरा सोचने पर पूरा महिलावाद टिका हुआ है। किसी फेमिनिस्ट से बहस कीजिये लॉजिक आएगा, “सोच कर देखिये खुद की बहन के साथ हो तो ?” अरे प्रभु क्यों सोचे गलत, जब अच्छा सोच सकते हैं तो!

जब आप ने मान लिया कि हर पुरुष रेप करने के इरादे से बाहर निकलता है , हर आदमी बस आपको ही ताड़ रहा है तो आपको दुनिया वैसी ही नज़र आएगी। “द हिन्दू ” की #vedikachaube कुछ नहीं बस उसी मानसिकता का शिकार हैं। यदि नीच मानसिकता ना हो तो कैसे किसी भगदड़ में आप यह कैसे सोच सकते हो कि आदमी मरणासन्न महिला को गलत तरीके से छू रहा है ? कैसे आपके नीच दिमाग में यह विचार आया कि हमारे भाई लोग इतने गिरे हुए हैं ? असल में यह वेदिका की खुद की निहायत गन्दी और नीच सोच थी जो उन्होंने दूसरों पर थोपनी चाही। वो खुद मरे हुए लोगों के नग्न शरीर देख रही थी और उनको लगा कि भाई लोग भी उन्ही की तरह नीच हैं।

कुछ तो सुख प्राप्त होता है फेमिनिस्ट को इस देश के पुरुषों का चरित्र हनन करने में, कोई तो बात है कि यह महिलाएं हर आदमी को रेपिस्ट बनाने पर तुली हैं। कोई भाई किसी महिला का जीवन बचाये इससे पवित्र बात क्या हो सकती है ( मेरा अनुभव है कि ऐसे मुश्किल समय पर पुरुष ही बचाने आते हैं ) और उसपर यह इलज़ाम कि वो उसे गलत तरीके से छू रहा था इससे घटिया और क्या हो सकता है। अगली बार कोई भी पुरुष मदद से डरेगा या हिचकिचाएगा तो यही महिलाएं उसको नामर्द बोलेगी। यानी चित भी मेरी पट भी मेरी। “द हिन्दू “ने माफ़ी मांगी है मगर वेदिका को निकाल बाहर नहीं किया। किसी पुरुष की अस्मिता से खिलवाड़ जुर्म होता ही नहीं। कुछ वर्ष पूर्व श्वेता बसु प्रसाद नाम की अभिनेत्री वेश्यावृत्ति में पकड़ी गयी थी। उसके बारे में लिखने के बाद लगभग सभी अख़बारों ने प्रकाशित माफ़ी मांगी थी। यहाँ चार लाइन की माफ़ी है और वेदिका अब भी “द हिंदू “का हिस्सा हैं। कायदे से उनपर मुक़दमा दर्ज होना चाहिए और पूरी कानूनी कारवाही होनी चाहिए। किसी आदमी को रेपिस्ट बना दो मज़ाक है क्या!

 – ज्योति तिवारी, पुरुष अधिकार कार्यकर्ता, लेखिका व सामाजिक सरोकार से जुड़े कार्य करती हैं. उनकी किताब ‘अनुराग‘ बेस्ट सेलर पुस्तक रही है.

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This is why two schools of Indian Feminism are against each other

two schools of indian feminism

I started as an activist so I cannot deny that activism pops up in me from time to time. We keep on discussing what is happening in gender world and why and who is influencing whom. In my quest of giving voice to men, I met many types of feminist men and women both. And recently by a fellow activist, Virag Dhulia was invited by the national commission of women to discuss pre – nuptial agreements. So, the observation and inference drawn about feminists have come by these experiences. I have participated in many media debates with feminists and they all have lost a debate with me. One thing is very clear the whole feminist wave is coming from the west, a society which has already lost the battle with family system, values, and morals. These all Indian feminists are highly impressed by the broken society of west. The whole west today is struggling with teenage pregnancies and sexually transmitted diseases. The free sex and open relationships have damaged everything there. Now, it has hit India and women from every part of the country are copying west blindly. Feminists can be divided into many categories but there are two main categories. Feminism.

First one is the conservative feminists:

One who says the institution of marriage should be protected. Sex outside of marriage or premarital sex is bad for them. This is not because they love the concept of marriage but according to them there should be a man whom they can blame for everything. According to them if something goes wrong in premarital sex they cannot blame men.If they blame the man,  in that case, the woman will be blamed too for having consensual sex. This is the reason rape on the pretext of marriage thing is working.So, being in a marriage is a secure thing for them. Marriage guarantees everything money, sex, luxuries and blame game for the things which are not available to them means they can nag their husband and get things done .. Even if the marriage breaks they can blame and collect money out of it. This category includes old mothers of men who are accused by their daughter – in – laws. These first category feminists are very confused whether to support women or not as the second category feminists have become their enemies. They wear a cotton saree with a collared blouse or a khadi kurta with a stole, a big bindi, beads neck piece, their hairs are short. Mrinal Pandey and Kamla Bhasin come under this category. This category out of confusion sometimes talks about men’s issues. They prefer to be covered and they hate the second category of feminists.

The second category has a very clear agenda, they want free and unquestionable sex that is it .

Free the nipple, no bra panty, no tampons, no sanitary napkin, free bleeding type feminists come under this category. Their resolution is “Nazar Teri kharab hai to burqa main pehnoon “ ( you have a looking with dirty why should I cover myself). This category is aging super confused because they hate to cover themselves but then they support Hijab. Priyanka Chopra comes in this category who recently posted a picture in Hijab and Bikini both. They cry,” nobody has right to rape me even if I roam naked “ but at the same time cry for attention that nobody is looking at me. So if a man looks at them he is perverted, if he does not he is rude and not man enough. They started with, we can do it now took a U-Turn by propagating, He For Her. Now the question is when you claimed to do it why do you need a man? This second category is considered weird by the first category. This category will wear almost no clothes or Hijab. They will have colored hairs, multiple tattoos, pierced nose, ears, navel, lower lip. They proudly flaunt the bra straps and cleavage. And if media or some person report it they will do a drama of why did you point out t get some footage. Deepika Padukone comes in this category.The Hijab women of this category are the most confused ones. They live their whole life in prison of Hijab still talk about empowerment by declaring Hijab is empowerment. They are so brainwashed that Purdah they do becomes empowerment for them.

One thing is common between the two categories both have nothing to do with the welfare of women. All they want is money, attention and media drama.

– Jyoti Tiwari, Men’s rights activist, social activist and a renowned author of best-selling novel ‘Anuraag’

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लड़के विवाह से पहले रखें इन बातों का ध्यान

read before you get maried

फेसबुक लाइव में प्रश्न पूछा गया था कि लड़के विवाह से पहले किन किन बातों का ख्याल रखें। मतलब कुँवारे लड़कों के लिए क्या अलार्म हो सकता है। मेरे अनुभव के हिसाब से कुछ पॉइंट्स रख रही हूँ। यह 100 % काम करेगा ऐसा कहा नहीं जा सकता पर फिर भी इसको बचाव के रूप में देखा जा सकता है – (याद रखिये इन के अपवाद मिल जायेंगे समाज में मगर सभी इतने खुशकिस्मत हो ऐसा नहीं होता )

1) कई बहनों वाले घर में विवाह से बचें। बहनें दूसरी बहन के जीवन में ज़रूर दख़लअंदाजी करती हैं।

2) जहाँ पिता की ना चलकर माँ की चलती हो वहां विवाह से बचें। माँ की दखल अंदाज़ी कभी सुखी गृहस्थी बसने नहीं देती।

3) जहाँ मेरा, “रिश्तेदार यह अफसर है, हमारी उस बड़े अधिकारी से जान-पहचान है” इस तरह की बातें होती हों वहां बिलकुल शादी ना करें।
4 ) 
जहाँ बहुत दिखावा हो वहां भी विवाह ना करें।

5 ) जहाँ बैंक में पैसे डालने पर ज़ोर दिया जाए वहां सतर्क रहें। आपकी इच्छा हैं चाहें तो लें या न लें अकाउंट में लेने से ५ लाख १० लाख नहीं हो पाएंगे इतना ही फायदा होगा। नहीं तो लडकी के अकाउंट में डालने को कहें।

6) यदि प्रेम विवाह है तो ऐसी लड़की से प्रेम में न पड़े जो बात बात पर गिफ्ट मांगे।

7) जो लड़की घड़ी – घड़ी फ़ोन कर के पूछे और आपको ज़रा भी स्पेस ना दे उससे दूर रहें।

8) जो हद से ज़्यादा possessive हो उसको भी दूर रखें। याद रखिये आप विवाह कर रहें हैं , जेल नहीं जा रहे।

9) शादी से पूर्व लड़की के बारे में अच्छे से पूछताछ कर लें कि लड़की को कोई मानसिक या शारीरिक समस्या तो नहीं है। ज़रा भी आशंका हो तो विवाह ना करे।

10) याद रखिये जो बड़े बुज़ुर्ग कहते थे सिर्फ लड़की ही नहीं उसका परिवार भी अच्छा होना चाहिए। यह बात कितनी भी अजीब लगे, है सोलह आने सच।

11) राजश्री, धर्मा, यश चोपड़ा, इम्तिआज़ अली की फिल्मे देख के शादी न करें। ऐसी लड़कियाँ सिर्फ फिल्मों में ही होती हैं।

12) बुज़ुर्ग लोगों का कहना सही है विवाह अपने स्टैण्डर्ड में ही करें। आप गांव पृष्ठभूमि के हों और लड़की शहर की हो तो समस्या होगी।

13) खुद शादी की इच्छा हो विवाह तभी करें किसी के दबाव में आकर कभी भी विवाह न करें। 

 – ज्योति तिवारी, पुरुष अधिकार कार्यकर्ता, लेखिका व सामाजिक सरोकार से जुड़े कार्य करती हैं. उनकी किताब ‘अनुराग‘ बेस्ट सेलर पुस्तक रही है.

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How to protect yourself against biased POSH laws

POSH law in India

Do you know what is POSH (Prevention of Sexual Harassment? This is a law to protect WOMEN from sexual harassment at workplace. Every office whether government or private has this policy. Some corporate offices do have a gender-neutral POSH policy but how many men really use it, I have a doubt about it. Now how women use this POSH policy?

1. If they do not work properly and get low ratings
2. If they have an affair at the workplace and they want to come out of it clean
3. If they have any personal grudge against any male colleague
4. If they are jealous of any male colleague
5. They want to leave job after a mess and they do not want to take responsibility for that mess ( remember feminism did not teach them responsibility )

Who is at most risk? ( See, If you are born with penis you are at risk)

1. If the man is having a casual sex with a female colleague
2. Men who talk casually with female colleagues …
3. Men having an office romance and that romance goes wrong …
4. Men who do not give attention to female colleagues
5. Men who try to help female colleagues ( the white knights, shoulder community )…
6. If man is a boss

Preventions –

1. Avoid too closeness with female colleagues ( greeting by hugging, touching, handshakes should be very formal, do not hold the hand for a long time ) Gone are the days of normal male – female relationships.
2. Never indulge in office romance, one night stands ( a strong never)
3. Never try to help a female colleague without being under CCTV camera coverage
4. Keep all records ( emails, messages, chats, call records )
5. Do not call at odd hours ( remember she is equal but with privileges)
6. Avoid words honey, sweetheart, dear. Simply use her name.

Process –

A committee is set up to investigate the allegations made by the woman. Cooperate with that committee.

After doing all this, still, you are at risk because the government has given unquestionable rights to women . Once a POSH case is proved wrong the woman is not chucked out. She is only given a warning. While man loses dignity till the case is on, he lives in a constant fear, woman is seen as the poor victim ( damsel in distress ). The rule should be, public humiliation for the woman and no job offer ever but this does not happen, so be very cautious. Well, if you are helping any such woman, next number will be yours, remember Karma Is A Bitch!

– Jyoti Tiwari, Men’s rights activist, social activist and a renowned author of best-selling novel ‘Anuraag’

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Are you getting suicide threats from your wife? If so, It’s a warning signal for you

gender inequality in india

Spousal fights are a common occurrence. But are you getting threats from your wife of suicide like that she would poison herself or cut her nerve? If so, then it’s a warning signal for you. And if your marriage is less than 7 years, then you are in for deeper trouble. Because, within, seven years, any death of a married woman is automatically considered as “Dowry Death”. What if, she cuts her nerve, just to scare you, but succumbs in the process; you, as a husband, would be doomed then. You will be booked under Section 304B of the Indian Penal Code i.e. Dowry Death and it’s next to impossible to get bail in such cases. And it’s not just you, but even for your mother and sister, there are special “Mother-in-law and Sister-in-law” cells in jail. Even on Facebook, you might have seen many pages like “Justice for blah blah girl” and all. Basically, when the girl is no more, she becomes a bigger victim. And the boy just loses all forms of sympathy, be it from his friends, relatives, media or the court. At the end of the day, you are just a dowry hungry monster, who was so blind in his greed that he not only tortured his wife for dowry but also killed her.

One could not but fathom the pain and misery of the man who not only lost his life partner but has also been tagged a criminal overnight. However, it doesn’t happen in a day, there are signs that keep coming, but men are mostly over-optimistic and they keep on dragging in the hope that the marriage would somehow survive.

On the other hand, if a married man dies, no one points a finger at his wife. On the contrary, she becomes eligible to receive a pension, insurance money etc. The courts do not see at this point of time, if the woman was actually a good wife or not. She gets all these rights, as technically, she is still a wife. As a matter of fact, it’s the boy’s mother who suffers a lot in cases where the husband dies, but still, the sympathy is for the young widow. Rare are the occurrences where we see the mother of a martyr receiving an award for her son’s gallantry.

Given the above backdrop, the most dangerous places are those so-called mediation centers who always advise reunion with the wife after a “kiss-and-make-up”. To reunite with a threatening wife is to invite a case under 304B in future. The Family Welfare Committees, being formed, as per Guidelines by Supreme Court are totally anti-male in nature. Till the time, such draconian laws are not reformed and we do not have a proper provision to punish liar women and their family members, there’s no respite in sight for men, these committees nonetheless keep forming.

– Jyoti Tiwari, Men’s rights activist, social activist and a renowned author of best-selling novel ‘Anuraag’

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