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पैडमैन – पुरुष-विरोधी मानसिकता का नंगा नाच

padman

अगर बात सिर्फ सेनेटरी नैपकिन की होती तो कोई बात नहीं थी अगर बात सिर्फ शौचालय बनाने की होती तो भी कोई बात नहीं थी| मगर हर बात में स्वतः ही पुरुष के प्रति घृणा कहाँ से आ जाती है यह समझ से परे है| जब शौचालय पर फिल्म की तब भी आदमी को गाली दी बल्कि शौच करते हुए आदमी की फोटो तक सोशल मीडिया पर डाल दी, आदमी की इज्ज़त होती नहीं ना| हर चीज़ को आदमी के अत्याचार से जोड़ दो शौचालय बनाना चाहिए क्योंकि हमारे पुरुष शौच करती हुई महिला तक को नहीं छोड़ते हैं| किस प्रकार का लॉजिक है यह ?

मैं उस ज़माने की हूँ जब सेनेटरी नैपकिन भारत में कदम रख रहे थे| यह उस समय की बात है जब केयरफ्री नाम का संभवतःएक ही ब्रांड आता था| वो भी किसी काम का नहीं था विशेषतौर पर मेरी जैसी लडकियों के लिए क्योंकि हम स्कूल जाती थी, साईकल चलाती थी और कबड्डी भी खेलती थी| सेनेटरी नैपकिन नहीं थे तो काम कैसे चलता था ? छोटे गाँव और कस्बों में कपडे की दुकान पर सस्ते सूती कपडे के थान मिलते थे और रूई तो थी ही| मैं ऐसे स्कूल में भी पढ़ी हूँ, जहाँ ढंग का टॉयलेट भी नहीं था| मतलब पैड बदलने की कोई व्यवस्था नहीं थी| मगर मुझे याद नहीं कि मैं या मेरे साथ की किसी लड़की ने कभी इसके लिए पूरी पुरुष जाति को ज़िम्मेदार ठहराया हो| हमने उसमें से रास्ता निकाला और आगे बढ़ते गए| सूती कपडे के साथ-साथ घर के पुराने सूती कपड़ों का भी इस्तेमाल होता था, जिसको फिल्म वाले ओल्ड रग्स यानी चीथड़े बताएँगे| फिर आया मिस यूनिवर्स का दौर जब सुष्मिता सेन मिस यूनिवर्स बनी| सुष्मिता सेन के मिस यूनिवर्स और ऐश्वर्या राय के मिस वर्ल्ड बनने के बाद ताबड़तोड़ कॉस्मेटिक और सेनेटरी नैपकिन के ब्राण्ड भारत में आये| हमारे लिए राहें आसन हुई मगर दुष्प्रचार के साथ कि हम भारत की स्त्रियाँ गन्दगी से मासिक धर्म का निर्वाह करती है, हम बेचारी गरीब और सताई हुई हैं इत्यादि| सेनेटरी नैपकिन बेचने का यह तरीका था और इसके लिए सिस्टेमेटिक ब्रेनवाशिंग की गयी| हम सूती कपडे और रूई इन्स्तेमाल करते थे, इन्होने प्रचार किया कि हम गन्दा कपड़ा और गन्दा कागज़ इस्तेमाल करते हैं|

खैर सेनेटरी नैपकिन चल पड़े बाज़ार में क्योंकि इनकी ज़रुरत भी थी| तरह तरह के प्रचार से इनको बेचा गया छू लो दुनिया, कर लो सब मुट्ठी में जैसे अगर वो 3 दिन रुक गयी तो दुनिया हाथ से निकल जाएगी| ध्यान देने की बात यह है कि menstrual कप, पीरियड पैनटी जैसे अन्य तरीकों का ज़्यादा प्रचार नहीं किया गया| क्योंकि उनको बार- बार खरीदना नहीं पड़ता, बाज़ार आगे कैसे बढेगा|

क्या हम गन्दी चीज़ें प्रयोग करती थी –

व्यक्तिगत साफ़ सफाई सबकी अलग-अलग होती है| कोई रोज़ नहाता है तो कोई हफ्ते में एक बार, कोई कपड़े धोये और प्रेस किया बिना नहीं पहनता तो कोई मुचड़े कपड़ो में प्रसन्न है| कहने का अर्थ यह है कि जो वैसे साफ सुथरी नहीं रहती वो मासिक धर्म के दौरान भी गन्दी ही रहेगी| एक औरत अगर गन्दगी से रहती है तो यह पूरे भारत की स्त्रियों की समस्या नहीं है| मगर ठीक है आपको पैड बेचना है तो कुछ भी कहिये| मज़े की बात यह कि इन् लोगों ने प्रचार किया कि यह लोग बेचारी पैड बनाती, धोती, सुखाती हैं फिर प्रयोग करती है| अब इनसे पूछिए कि पीरियड पैनटी को भी तो धोया जाता है और आजकल रीयूज़ेबल पैड भी आते हें है| वो क्या हें, उनको भी धोया, सुखाया जाता है|

सेनेटरी नैपकिन पर टैक्स क्यों –

सस्ते नैपकिन खरीदेंगी महिलाये? मेरे मोहल्ले में एक सस्ते लोकल नैपकिन बेचने वाली महिला आई थी जिस से किसी ने भी नहीं खरीदा, पैड में कोई खराबी नहीं थी बस उस पर कोई बड़ा ब्रांड का नाम नहीं था| यहाँ शनेल ब्राण्ड की फर्स्ट कॉपी खरीदने वाली महिला जब सेनेटरी नैपकिन पर टैक्स की बात करती है तो हंसी आती है| हजारों रुपये ब्रांडेड कास्मेटिक पर लगा देने के बाद सेनेटरी नैपकिन पर टैक्स याद आया है| सरकार कह रही है कि सेनेटरी नैपकिन बनाने के लिए जिस कच्चे माल की आवश्यकता होती है वो महँगा है| हर बात पर सरकार और पुरुषों पर दोष मढने वाली महिला को यह बात नहीं समझ आएगी| दोष देने से बेहतर होता रास्ता तलाश करना जिससे कच्चा माल भारत में पैदा हो सके मगर इतनी मेहनत कौन करे दोष देना आसान है| और दोष भी कैसा ज़रा भाषा का चुनाव देखिये –

इनका मानना है कि सेनेटरी नैपकिन पर टैक्स है वियाग्रा पर नहीं क्योंकि ज़्यादातर नीति बनाने वाले 65 साल के वृद्ध हैं जिनको स्तंभन दोष हो चुका होता है| जैसा कि मैंने आरम्भ में कहा कि किसी भी चीज़ को बेचने के लिए यह लोग किसी भी स्तर तक गिर जाते हैं| एक फेमिनिस्ट की सोच वियाग्रा, सेक्स, स्तन, लिंग से आगे नहीं बढ़ पाती| किसी भी विषय पर बात करवा लीजिये यह घूमकर इसी पर आ जायेंगी|

फ्री ब्लीडिंग से सेनेटरी नैपकिन तक –

कुछ साल पहले किरण गाँधी नाम की एक महिला लन्दन में बिना पैड पहने मैराथन दौड़ी थी और उसको बहुत बहादुर मानकर पुरस्कार भी दिया गया था| एक तरफ फेमिनिट्स लोग पुरुष पर सब दोष मढ़कर सेनेटरी नैपकिन का प्रचार करते हैं दूसरी तरफ यह महिला बिना पैड के दौड़ती है| कोई इनसे पूछे सशक्तिकरण का अर्थ यदि आदिम काल में लौटना है जहाँ ना कपड़े हों ना सुविधाएँ तब तो सबको सशक्त करना आसान है| इसको फेमिनिस्ट्स ने फ्री ब्लीडिंग का नाम दिया है| उसने अपना अनुभव बताया था कि कैसे उसको पुरुषों ने टोका कि, “मैडम आपके कपड़ों पर दाग हैं|” यह उनको पितृसत्ता का दमन लगा था| इस प्रकार के तर्क के हिसाब से यदि मैं किसी को टोकूं कि आपके कपड़ों की सिलाई खुली है या दाग है तो उसे मातृसत्ता का दमन माना जाये|

इनके लॉजिक से चलने वाली महिलाएं बहस करती हैं तो कहती हैं कि आप लोग नहीं जानते कितना दर्द है माहवारी और बालक को जन्म देने में| तो पुरुष का दर्द क्या आप समझती हैं ? आप खुद कंफ्यूज है कि करना क्या है फ्री ब्लीडिंग या सेनेटरी नैपकिन|

पीरियड टैबू का ढिंढोरा पीटने वाली महिलाओं से पूछे कोई कि इसको टैबू बनाया किसने? स्वयं महिलाओं ने ही ना, घर के पुरुष को तो पता भी नहीं चलता कि लड़की को माहवारी शुरू हो गयी है| एक और बात कि पीरियड्स के बारे में बात नहीं कर सकते, यह बिलकुल गलत है जहाँ ज़रुरत होती है वहां करते हैं| सड़क चलते पीरियड, सेक्स बात क्यों क्यों ज़रूरी है पहले कोई यह बताये? वो सब करना पाश्चात्य संस्कृति का हिस्सा जहाँ हर बात यही से शुरू होकर यही ख़तम होती है| कभी मुश्किल में पुरुष से कह कर देखिये, आपको सहायता ही मिलेगी, यह मेरा निजी अनुभव है|

 मेन्स्ट्रुअल मैन-

पैडमैन नाम की यह फिल्म आपको बताएगी कि कैसे माहवारी, महामारी है और इससे बड़ी समस्या भारतवर्षे, आर्यावर्ते, जम्बुद्वीपे में हो ही नहीं सकती| यह फिल्म अरुणाचलम मुरुगुनाथम नाम के व्यक्ति पर बनी है जिसने सस्ते सेनेटरी नैपकिन बनाने का बीड़ा उठाया| इसके लिए उनको समाज से बहिष्कृत भी किया गया| उनकी पत्नी तक ने उनका साथ छोड़ दिया और अपनी माँ के घर वापिस चली गयी| पर किसी भी कर्मठ पुरुष की तरह अरुणाचलम अपने लक्ष्य तक पहुँच कर माने| और हम स्त्रीयों ने क्या दिया उनको बदले में, वही पुरुष के प्रति घृणा और पुरुष सत्ता को गाली| पुरुषसत्ता जब खुद पर प्रयोग कर के सेनेटरी नैपकिन बनाती है तो अच्छी लगती है मगर वही पुरुष सत्ता जब अपने लिए थोडा सा प्यार और सम्मान चाहती है तो ख़राब लगने लगती है|

जिस तरह ट्विंकल खन्ना पैडमैन फिल्म का प्रचार कर रही हैं उससे उनकी कुंठित मानसिकता का पता चलता है| फेमिनिस्म, महिलाओं को किस तरह एहसानफरामोश होना सिखाता है यह भी साफ़ दिखता है| गौरतलब है कि मेन्स्त्रुअल मैंन नाम की एक डाक्यूमेंट्री पहले ही अरुणाचलम पर बन चुकी है, इस  फिल्म में तथ्यों से छेड़छाड़ अवश्य की गयी होगी| फिल्म का ट्रेलर देखिये अक्षय कुमार कहते हैं, “ब्लडी मेन अगर आधे घंटे खून बहे तो मर जाये|” यह वो अक्षय कुमार हैं जो आर्मी आर्मी किया करते हैं| सरहद के जवानों की कहानी यह बोलते समय भूल गए| क्योंकि जब इज्ज़त मन में ना हो सिर्फ दिखावा हो तो जुबां फिसल ही जाती है| यही नहीं उन्होंने यह तक कहा कि सेना की सब्सिडी घटाकर महिलाओं को सेनेटरी नैपकिन उपलब्ध कराये जाएँ| इससे उनके मानसिक दिवालियेपन का पता चलता है| कांस्टेबल नितिन BSF का हिस्सा थे, लगातार खून बहते हुए भी गोली चलाते रहे और अंततः शहीद हुए| उनकी वजह से सीमा तोड़कर आने वाले आतंकवादी भाग खड़े हुए| यह केवल एक कहानी है, ज़रा ढूंढ कर देखिये ऐसी सैंकड़ों कहानियां मिल जाएगी हर समाज, हर देश में| पुरुषों की लाशों पर सभ्यताएं बनी हैं और आप सिर्फ एक सेनेटरी नैपकिन वाली फिल्म बेचने के लिए इतनी बेहूदी बात कर रहे हैं ? मैं फेमिनिज्म को बढ़िया आन्दोलन मान लेती अगर इस एक लाइन को हटाने के लिए महिलाएं आन्दोलन कर देती कि हमारे पुरुष ऐसे नहीं हैं| पूरा ट्रेलर देखंगे तो पायेंगे कि औरत हर जगह रो रही है, जैसे महिलाएं ही बीमार होती हैं बस पुरुष को कोई बीमारी पकड़ती ही नहीं|

कैंसर में भी केवल स्तन कैंसर की चर्चा होती है जबकि प्रोस्टेट कैंसर उससे कहीं ज्यादा होता है और पुरुष शर्म से बता भी नहीं पाते| लेकिन नहीं प्रचार तो यह है कि शर्म, लाज केवल महिला के लिए है पुरुष निरा लम्पट निर्लज्ज है| सिगरेट पर पैसे खर्च करता है मगर सेनेटरी नैपकिन पर नहीं, वाह लॉजिक! पुरुष घर खर्च के लिए पैसे देता है तो उसमे कितना झोल झाल करती हैं महिलाएं इसका कोई अंदाज़ा है क्या? मगर आप यह कह भी नहीं सकते क्योंकि महिला गँगा की भांति पवित्र होती है और पुरुष दानव| औरत खुद अपनी प्राथमिकता तय नहीं कर पाई इसमें पुरुष समाज क्या करे? पुरुष ने हर तरह की सुविधाएँ दे डाली मगर फिर भी महिला पुरुष को दोष देती घूम रही है| ट्विंकल खन्ना, सोनम कपूर और अक्षय कुमार को इस तरह की वाहियात बात करते कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि उनको एक फिल्म बेचनी है| फुल्लू नाम की फिल्म इसी विषय पर आई थी, उसमे भी यह लाइन थी, “जो औरत का दर्द नहीं समझता उसको भगवन मर्द नहीं समझता|” आप समझते रहिये औरत का दर्द, बदले में वही औरत आपके खिलाफ नफरत फैलाती रहेगी|

फेमिनिस्म के नाम पर साबुन, तेल, शैम्पू, सब बिक रहा है आपकी यह पैडमैन फिल्म भी बिक जाएगी, रह जायेगा तो सवाल क्या पुरुष को कठघरे में खड़ा करना ज़रूरी था, क्या सेना के जवानों के खून का अपमान ज़रूरी था?

– ज्योति तिवारी, पुरुष अधिकार कार्यकर्ता, लेखिका व सामाजिक सरोकार से जुड़े कार्य करती हैं. उनकी किताब ‘अनुराग‘ बेस्ट सेलर पुस्तक रही है.

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केन्द्रीय विद्यालयों में संस्कृत प्रार्थना पर बैन क्यों?

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असतो मा सदगमय ॥ तमसो मा ज्योतिर्गमय ॥ मृत्योर्मामृतम् गमय ॥

(हमको) असत्य से सत्य की ओर ले चलो । अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो ।। मृत्यु से अमरता की ओर ले चलो ॥।

Lead me from falsehood to truth, Lead me from darkness to light, Lead me from death to the immortality.

बृहदारण्यक उपनिषद् से उद्धृत इन सूत्रों की बचपन से अनवरत प्रार्थना करते आये मेरे जैसे न जाने कितने लोग, पर आज तक ये नहीं पता चला कि इसमें भी कोई धार्मिक एंगिल हैं क्योंकि हमें हमेशा यही बताया गया और हमने यही समझा भी कि ये धर्म, सम्प्रदाय, जाति, लिंग जैसे विभेदों से बहुत ऊपर मानवमात्र के उत्थान के लिए सर्वशक्तिमान से प्रार्थना करने वाले वाक्य हैं| वसुधैव कुटुंबकम के मूलमंत्र को अपने जीवन में उतारने वाली सनातन संस्कृति के प्राचीन ग्रंथों में इस तरह की प्रार्थनायें बार बार मिलती हैं क्योंकि यह संस्कृति वो रही जिसने कभी मात्र स्वयं के लिए कुछ माँगा ही नहीं, जब भी माँगा समस्त चराचर जगत के कल्याण के लिए माँगा| परन्तु अब स्वतंत्रता के भी 70 वर्षों बाद हमें ये बताया जा रहा है कि हमारे जीवन दर्शन का आधार रहे ये सूत्र देश की धर्मनिरपेक्षता पर चोट करते हैं क्योंकि ये एक धर्म विशेष के प्राचीन ग्रंथ से लिए गए हैं|

आश्चर्य इस पर नहीं कि किसी धूर्त को इस तरह की याचिका सर्वोच्च न्यायालय में डालने की सूझी क्योंकि इस देश की प्राचीन सांस्कृतिक विरासत, मूल्यों, परम्पराओं और हर उस बात को जो सनातन संस्कृति से जुडी है, हानि पहुँचाने के लिए कितने ही हिन्दू नामधारी पर विधर्मी कामधारी दिन रात एक किये दे रहे हैं| आश्चर्य न्याय के उस कथित मंदिर में बैठे स्वघोषित भगवानों पर है जिनके लिए कभी हिन्दू एक जीवन पद्धति थी और आज उन्हें हिन्दुओं से जुडी हर बात पर आपत्ति है| वरना क्या कारण है कि जिस सर्वोच्च न्यायालय में 1 नवम्बर 2017 के आंकड़ों के अनुसार 55,259 मामले पेंडिंग हैं, जहाँ से न्याय पाने एक आदमी की पीढ़ियों की पीढ़ियाँ गुज़र जाती हैं, जहाँ जायज मामलों को लेकर न्याय पाने की उम्मीद रखने वाले लोगों को अपनी बात कहने के 2 मिनट नहीं मिलते; वहाँ अभारतीयता और हिन्दू विरोध से ग्रस्त लोगों के मामले न केवल बड़ी आसानी से सुनवाई पर आते हैं, बल्कि उन पर ये सबसे ऊँची अदालत सरकारों से जबाव तलब भी कर लेती है|

सर्वोच्च न्यायालय में बैठे न्याय के इन कथित भगवानों को ये पता होना चाहिए कि अगर केवल सनातन संस्कृति के किसी ग्रन्थ का भाग होने एवं संस्कृत में होने के कारण ‘असतो मा सद्गमय’ जैसा मंत्र देश के धर्मनिरपेक्ष चरित्र पर चोट पहुँचाने वाला माना जाएगा और उसके केंद्रीय विद्यालयों में प्रार्थना में शामिल होने पर प्रश्न खड़े किये जाएंगे तो केरल शासन, बेहरामपुर विश्वविद्यालय उड़ीसा, उस्मानिया विश्वविद्यालय आंध्र प्रदेश, कन्नूर विश्वविद्यालय केरल, राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान कालीकट केरल, राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान श्रीनगर, आईआई टी कानपुर और सी बी एस ई इन सभी पर बैन लगा देना होगा क्योंकि इन सभी के आदर्श वाक्य भी बृहदारण्यक उपनिषद् के उपरोक्त वाक्यों में से ही कोई ना कोई हैं|

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फिर तो इस देश में और भी बहुत कुछ बदलना होगा क्योंकि स्वयं इस देश के राष्ट्रीय वाक्य से लेकर यहाँ की रग रग में इस तरह के सूत्र वाक्य समाये हुए हैं| किस किस को खत्म करोगे अन्यायमूर्तियों, किस किस पर बैन लगाओगे?

भारतीय गणतंत्र और उसके राज्यों पर—–

भारतीय गणतंत्र–सत्यमेव जयते–मुंडकोपनिषद
केरल शासन–तमसो मा ज्योतिर्गमय–बृहदारण्यक उपनिषद्
गोवा शासन–सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद्दुःखभाग्‌भवेत्— गरुड़ पुराण

भारत की सैन्य, सामरिक और पुलिस शक्ति पर—-

भारतीय नौसेना–शं नो वरुणः–तैत्तिरीय उपनिषद
भारतीय वायुसेना–नभः स्पृशं दीप्तम्— भगवद्गीता
भारतीय तटरक्षक बल–वयं रक्षामः–बाल्मीकि रामायण
रिसर्च एन्ड एनालिसिस विंग (RAW)–धर्मो रक्षति रक्षित–मनुस्मृति
उत्तर प्रदेश पुलिस–परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्–भगवतगीता

भारत की शिक्षण संस्थाओं पर—-

मैसूर विश्वविद्यालय–ना हि ज्ञानेन इति सदृशं–भगवतगीता
गुजरात राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय–आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः–ऋग्वेद
केंद्रीय विद्यालय–तत् त्वं पूषन्नपावृणु–ईशावास्य उपनिषद
नेशनल एकेडमी ऑफ़ लीगल स्टडीज एंड रिसर्च यूनिवर्सटी–धर्मे सर्वं प्रतिष्ठितम्–महानारायण उपनिषद

भारतीय गणतंत्र के संस्थानों पर—-

जीवन बीमा निगम–योगक्षेमं वहाम्यहम्–भगवतगीता
भारतीय पर्यटन विकास संस्थान–अतिथि देवो भवः–तैत्तिरीय उपनिषद
भारतीय रिजर्व बैंक (बैंकर्स ट्रेनिंग कॉलेज)–बुद्धौ शरणमन्विच्छ–भगवतगीता
भारतीय मौसम विज्ञान विभाग–आदित्यात् जायते वृष्टिः–मनुस्मृति

ये तो कुछ उदाहरण भर हैं और ऐसे अनगिनत संस्थान और संगठन हैं जो भारत की धर्मनिरपेक्षता के लिए ‘खतरा’ हैं; तो ऐसा करो ‘अ’न्याय के ‘भगवानों’, धर्मनिरपेक्षता का ढिंढोरा पीटने के लिए इन सब को बंद कर दो| पर उससे पहले अपने उस कथित मंदिर को भी जिसमें बैठ कर तुमलोग धतकरम कर रहे हो| आखिर उसका आदर्श वाक्य ‘यतो धर्मस्ततो जयः’ भी तो हिन्दुओं के ही ग्रन्थ महाभारत से ही लिया गया है|

 विशाल अग्रवाल (लेखक भारतीय इतिहास और संस्कृति के गहन जानकार, शिक्षाविद, और राष्ट्रीय हितों के लिए आवाज़ उठाते हैं। भारतीय महापुरुषों पर लेखक की राष्ट्र आराधक श्रृंखला पठनीय है।)

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ब्राह्मण और क्षत्रिय के बीच का अन्योन्याश्रय संबध

brahmin and kshatriyas

सोशल मीडिया  पर एक गैंग तैयार हो गया है जो ब्राह्मण और राजपूतों के मध्य  मतभेद तैयार कर रहा है।आज कई ग्रंथो से खोज-खबर करने के बाद उनकों उत्तर देना चाहुंगा। ऐसे तो खोज-खबर करने के बाद 25-30 श्लोक और कई प्रसंग मिला जो ब्राह्मण और क्षत्रिय का अन्योन्याश्रय संबध बताता है। लेकिन लेख की सीमा देखते हुए दो चार ही प्रस्तुत कर पाऊंगा।

यजुर्वेद का एक मंत्र है,

“यत्रं ब्रह्मचक्षत्रं च सम्यंचौ चरतः सह। तं लोकं पुण्यं प्रज्ञेषं यत्र देवाः सहाग्निना।”

जिसका अर्थ है- जहाँ ब्रह्मतेज और क्षत्रबल एक साथ मिले हुए क्रियाशील हैं, जहाँ देव (ब्राह्मण) अग्नि (क्षत्रिय) के साथ है, मैं उस देश को पुण्य जानूं तथा वहीं रहूँ।

महाभारत के वनपर्व में भी अनेक श्लोक हैं–

“ब्रह्मक्षत्रेण संसृष्ट क्षत्रं च ब्रहम्णा सह। उदीर्णे दहतः शत्रून् वनानीवानिमारूत्तौ।”

अर्थ – ब्रह्मक्षत्र से तथा क्षत्र ब्रह्म से मिला हुआ हो तो प्रचण्ड ये दोनों सभी शत्रुओं को ऐसे जला डालते है जैसे अग्नि और वायु वनों का।

“ब्राह्मण्यनुपमा दृष्टिः क्षात्र मप्रतिबलम्। तौ यदा चरतः सार्ध तदा लोकः प्रसीदति।”

अर्थ – ब्राह्मण की ज्ञाण दृष्टि अनुपम है और क्षत्रिय का बल बेजोङ है। जब ये दोनों साथ रहते हैं तो संसार प्रसन्न रहता है।

“अग्रतः चतुरो वेदाः प्रष्ठतः सशरोधनु। इंदं ब्राह्मां इदं क्षात्रं  शास्त्रदपि स्वराष्ट्रधर्मपि।”

अर्थ – चारों वेदों की प्रमाणिकता और धनुष बाण के बल से धर्म की पुष्टि करो। ब्राह्मण शास्त्र के बल पर और क्षत्रिय शस्त्र बल से स्वधर्म और स्वदेश की रक्षा करे।

ब्राह्मणों ने क्षत्रियों ने पुत्र से भी बढकर माना है

इस प्रसंग में रघुवंश और महाभारत से एक-एक प्रसंग रखना चाहूँगा। “एक ब्राह्मण के घर पर क्षत्रिय बालक नीति ज्ञान ले रहा था। उस ब्राह्मण देव के घर पङा अन्न तेज बारिश में बह जाता है। जिसके कारण उस ब्राह्मण का बच्चा और क्षत्रिय बालक भूख से व्याकुल हो उठते हैं। उन दोनों बालकों को भूखा देखकर ब्राह्मण भिक्षा मांगकर दो रोटी लाते हैं। तभी उनको याद आता है कि आज घर पर भोजन नहीं पका है, इसलिए गो-ग्रास भी नही दिया है। तो वे एक रोटी अपनी गैय्या को खिला देते हैं। बाकी एक रोटी अपनी पत्नी के हाथ पर रख देते हैं। दोनों पति-पत्नी विचार करते हैं दोनों बच्चों को ही खिला दिया जाए। पत्नी जब पहले अपने पुत्र को रोटी खिलाने लगती है तभी वह ब्राह्मण कहते हैं- “रुको देवी! यह अधर्म है इस पूरी रोटी पर अधिकार उस क्षत्रिय बालक का है। क्योंकी वह एक भविष्य का राजा है। वह भूख का शिकार हो जाएगा तो राज्य अनाथ रहेगा। राजसिंहासन सूना रहेगा। वही हमारा बालक शिकार होगा तो केवल यह हमारे लिए। यह कहकर उस रोटी को अपनी पत्नी से छीन लेते हैं और जाकर उस क्षत्रिय बालक को खिला देते हैं। आगे चलकर वह बालक राजा दिलीप बनते हैं और ब्राह्मण के उस परोपकारी रोटी का कमाल यह था कि राजा दिलीप इतने परोपकारी होते हैं कि एक गाय को बचाने के लिए अपना शरीर शेर को देने के लिए तैयार हो जाते हैं।

दूसरा प्रसंग महाभारत का है –” एक बार अश्वथामा अपने पिता गुरू द्रोणाचार्य के पास यह कहने लगता है पिता जी आप महर्षि परशुराम के बाद सबसे अच्छा धनुर्धारी है यदि सर्वश्रेष्ठ धनुर्धारी आपको बनाना ही है तो अर्जुन के बजाए मुझे बनाइये तब द्रोणाचार्य बोलते हैं, “अश्वत्थामा तुम तो केवल मेरे पुत्र हो। लेकिन अर्जुन समूचे हस्तिनापुर का पुत्र है। तुम सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर बन भी जाओगे तो क्या करोगे? किंतु अर्जुन बनेगा तो वह देश और धर्म की रक्षा करेगा।

जब कभी क्षत्रिय वंश के आस्तित्व खतरे में पङा तब ब्राह्मणों ने आगे आकर रक्षा की

(1) सूर्यवंश के राजा वेन जो निःसंतान ही परलोक सुधार गये तो ऋषियों ने उनके शरीर को मंथन कर मंत्रबल से पृथु को प्रकट किया जिन्होने पूरी पृथ्वी पर शासन किया था।

(2) ठीक इसी तरह सूर्यवंश के दूसरे धरा के निःसंतान राजा के शरीर को मथ कर ऋषियों ने मिथि को उत्पन्न किया गया जिन्होनें मिथिला राज्य की स्थापना की।

(3) राजा दशरथ को पुत्र नहीं हो रहा था तो ब्राह्मण जमाता मुनि की युक्ति से वंश की रक्षा हुई।

(4) चंद्र वंश क्षत्रियों की तो उत्पति ही एक ब्राह्मण तपस्वी से हुई है। महर्षि अत्रि के पुत्र हुए चंद्र और उनसे जो वंश चला वह चंद्रवंश के रूप में ख्यात हुआ।

(5) भीष्म के ब्रह्मचर्य रहने के प्रतिज्ञा के कारण जब भरत वंश के आस्तित्व पर संकट आया तो महर्षि वेदव्यास ने उस वंश की रक्षा की।

राजपूत भी ब्राह्मणों को रक्षा करने के लिए खुद के जान दांव पर लगा देते थे

वें ब्राह्मणों के रक्षा के लिए प्राथमिकता देते थे। ग्रंथो में तो अनेक वृतांत है किंतु इस पर मध्यकालीन इतिहास से चर्चा करना चाहुंगा।

(1) एक बार महाराणा प्रताप और शक्ति सिंह लङ रहे थे तभी बिच बचाव करने राजपुरोहित नारायणदास पालीवाल को शक्ति सिंह की तलवार लग गई इस घटना से महाराणा प्रताप इतने नाराज हो गये कि उन्होने तत्काल अपने भाई सिंह को राज्य से निकाल दिया।

(2) राजा कान्हङदेव अपने पुत्र विरमदेव की शादी खिलजी के बेटी फिरोजा से करने को इंकार कर दिया तो खिलजी ने 1310 बाङमेर पर आक्रमण कर भव्य महावीर मंदिर को तोङ दिया और भीनमाल से 45 हजार श्री माली वेद पाठी ब्राह्मणों को बंदी बना कर मेवाङ के खुडाला गांव में बंद कर दिया। तब उन ब्राह्मणों को छुङाने के लिए राजा कान्हङदेव चौहान ने आस-पास के सभी राजाओं को निमंत्रण भेजा जिसमें सोलंकी, गोहिल, राठौर ,परमार चंदेल और चावङा राजाओं ने राजा कान्हङदेव के साथ मिलकर खुडाला गांव में खिलजी के सेना पर आक्रमण कर 45 हजार ब्राह्मणों को छुङवाया। इस युद्ध में साल्हा सिंह ,शोभीत लाखन सिंह और अजय सिंह मोल्हावाल मारे गये थे।

(3) मेवाङ से हार के बाद लौटते समय महमूद ने 30 नवम्बर 1442 को कुंभलगढ के पास केलवाङा गांव के निकट बाणमाता मंदिर पर आक्रमण कर मंदिर तोङ डाला और मंदिर के पास रहने वाले 50 ब्राह्मण परिवारों के 140 लोगों को बंदी बना लिया। तब दो राजपूत सरदार भाला सिंह परिहार और वीर दीप सिंह ने घनघोर युद्ध कर ब्राह्मणों को तो छुङा लिया लेकिन इतने घायल हो गये थे कि वीरगति प्राप्त हो गये।

(4) 16 अगस्त 1679 को औरंगजेब के फौजदार तहवार खां ने जब पुष्कर तिर्थ पर आक्रमण कर दिया और वहां रहने वाले 80 ब्राह्मण परिवारों को बंदी बना लिया तो आलणियावास के राज सिंह राठौङ ,हरि सिंह राठौङ तथा केसरी सिंह राठौङ ने तीन दिनों तक घोर युद्ध कर पुष्कर तिर्थ की रक्षा की और 80 ब्राह्मण परिवारों को छुङवाया।

(5) 1679 में कारतलब खां और दराब खां ने खण्ठोले मंदिर पर जब आक्रमण कर मंदिर के 11 पूजारीयों को बंदी बनाकर खजाने के लिए पूछताछ करने लगा तो सुजान सिंह शेखावट, इंद्रभाण सुजान सिंह आदी ने अपना बलिदान देकर आक्रमण को निष्फल किया और ब्राह्मणों को छुङवाया।

अतः संक्षेप रूप से यह कहना चाहुंगा ब्राह्मण और क्षत्रिय के बीच  अन्योनाश्रय संबध है दोनों ने एक-दूसरे को मान-सम्मान दिया है जो क्षत्रिय इतिहास और राजाओं के वीरता पर अंगुली उठा रहा है उसका DNA कदापि ब्राह्मण का नहीं हो सकता और जो क्षत्रिय ब्राह्मणों का मान-सम्मान और निरादर कर रहा हो उसका DNA एक क्षत्रिय का नही हो सकता।

 – संजीत सिंह

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क्षमा कीजिएगा, आपका फिल्मी डांस कला नहीं काला है

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आदरणीय शिव कुमार जी ने फिल्मों में बढ़ती अश्लीलता को लेकर कल उचित चिन्ता व्यक्त की है। एक और विधा की तरफ ध्यान देने की आवश्यकता है। टीवी पर तो विशेषकर रियलिटी डांस शोज की भरमार आ गई है। नंगा नाचने वाले ये लोग खुद को कलाकार कहते हैं और अपने देहसटाओ प्रतियोगिता को नृत्य।

क्या dance और नृत्य एक ही बातें हैं?  

आचार्य धनंजय ने दशकरुपक(1/9) में नृत्य को परिभाषित करते हुए लिखा है कि
“नृत्य भावों पर आश्रित होता है- ‘भावाश्रयं नृत्य’।”

अभिनय दर्पण (श्लोक 16) के अनुसार नृत्य रस, भाव तथा व्यंजना का प्रदर्शित रूप है। इस नृत्य का आयोजन सभा और राजदरबार में किया जाना चाहिए।

“रस भावव्यंजनादियुक्तम नृत्यमितीर्यते।
एतन्नृत्यं महाराज सभायां कल्पयेत सदा॥”

मंदिर कितने महत्वपूर्ण होते हैं ये इस ऐतिहासिक तथ्य से जानिए कि भारतवर्ष के लगभग सभी नृत्य शैलियों का आविष्कार और विकास मंदिरों में हुए। और फिर वहाँ से राज-दरबार होते हुए आमजन तक पहुंचे। यह भी कि मंदिर केवल प्रार्थनास्थल नहीं होते।

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नृत्य भारतीय सँस्कृति का एक अभिन्न हिस्सा है

मनुष्य का सामाजिक,धार्मिक जनजीवन नृत्य से अछूता नहीं रह सकता। वैदिक काल से नृत्य का भारतीय जनमानस से किसी न किसी प्रकार का सम्बँध रहा है। सँस्कृत के ऐक श्लोक के माध्यम से, नृत्य का महत्व, यों बतलाया गया है….

यो नृत्यति प्रहृष्टात्मा भावैरत्यन्तभक्तितः
स निर्दहति पापानि जन्मान्तरगतैरपि ।।

अर्थात जो प्रसन्नचित्त हो, श्रद्धा भक्तिपूर्वक, निशच्छल भाव से नृत्य करते हैं, वे सौ जन्मों के पापों से मुक्त हो जाते हैं।

इतना ही नहीं हमारे,धर्मगृँथ, और काव्यशास्श्त्र, यहॉ तक कि वेद भी नृत्य की महिमा से भरे हैं।
ऋग्वेद का एक श्लोक है..

“अधि-पेशॉसि वपते नूतूरिव…”

अर्थात, जिस प्रकार नर्तकी, अनेक मुद्राओं से अनेक रूप धारण करती है, वैसे ही प्रातःकाल पूर्व ऊषा अनेक रूप भरती है.

नृत्य की बॉंकी अदाओं, नर्तकियों की सुरदुर्लभ चितवन ने हमारे कवियों को भी आकर्षित किया है….

कवि केशव कहते हैं..

“नूपुर के सुरन के अनुरूप ता नै लेत पग
तल ताल देत अति मन भायौ री ।..”

यानि कि हे सखि ,उसे घुँघरूओं के सुर(ध्वनि)के अनुरूप पदचाल,और उस पर तालियॉ बजाने में बडा आनन्द आया है.

विद्यापति तो नृत्य को परिभाषित करने में काफी आगे निकल गये हैं.वह कहते हैं…..

डम-डम डम्फ डिमिक डिम मादल,रून-झुन मँजिर बोल
किँकिन रन रनि बलआ कनकनि,निधुबन रास तुमुल उतरोल।

पूरा अर्थ समझना तो मेरे लिये कठिन है,पर जितना समझ पाया हूँ,उसके अनुसार वे कहते हैं..डमरू की थाप और मँजीरो की मधुर ध्वनि के साथ,मिट्टी और बालू(रेत) के कण-कण में कृष्ण के नृत्य से मन भर गया।

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हिंदी सिनेमा में, हमारे किशोरावस्था की वयःसंधि में कभी मीनाक्षी शेषाद्रि और माधुरी दीक्षित के नृत्य को देख ‘क्रश’ हो आया था।

आज का फिल्मी नृत्य तो जुगुप्सा उत्पन्न करता है ..अजब गजब अश्लील डांस लासा सालसा चिपक चिपकू चिपकाउ ..पता नहीं क्या क्या।

आज का नृत्य सर्कस में तब्दील हो चुका है..उस पर भरतमुनि का प्रभाव कम वात्स्यायन का प्रभाव ज्यादा है.. मानसरोगों में वृद्धि करते ये ‘डांस’ अगली पीढ़ी को अस्वस्थ कर सकते हैं..वर्तमान नाट्यविधा का उद्देश्य क्या रह गया है? भरतमुनि सोच रहे होंगे….-

दु:खार्तानां श्रमार्तानां शोकार्तानां तपस्विनाम्
विश्रान्ति जननं लोके नाट्यमेतद् भविष्यति…

समर्थक और ऐसे नाचने नचाने वाले कुछ भी तर्क दे सकते हैं। सही भी है,किसी भी कला के श्रेष्ठ होने का मापदण्ड क्या है? यह कौन तय करेगा कि एक प्रकार की कला दूसरे की तुलना में श्रेष्ठ है? यह विवाद कि शास्त्राीय कलाएं लोक कलाओं से श्रेष्ठ हैं, और लोक कलाऐं शास्त्राीय कलाओं के मुकाबले आम इंसान के जीवन के ज्यादा करीब हैं, देखा जाए तो यह सारे विवाद बेबुनियाद, खोखले और अनावश्यक हैं।

नृत्य का परिणाम सुख होता था,
डांस का परिणाम, शारीरिक चोट और अवसाद होता है।

एक बहुत सुंदर श्लोक याद आ गया नाट्यसंग्रह ग्रन्थ का-

यतो हस्तस्ततो दृष्टिः यतो दृष्टिस्ततो मनः।
यतो मनस्ततो भावो यतो भावस्ततो रसः॥

जहाँ हाँथ जाता है वहाँ आँख जाती है जहाँ आँख वहाँ मन जहाँ मन वहाँ भाव जहाँ भाव वहाँ रस… नृत्य का यही रहस्य है !!

वहीदा रहमान, मधुबाला, आशा पारिख, हेमा मलिनी, साधना, औऱ वो,
“होठों में ऐसी बात मै दबाकर चली आई” गाने पर नृत्य करने वाली हिरोइन, जिनका नाम भूल रहा हूँ, से लेकर मीनाक्षी शेषाद्रि औऱ माधुरी दीक्षित तक।
बस यही है हिन्दी फिल्मों का स्वर्णिम नृत्य इतिहास।
समझने वाली बात तो ये है कि इनके पूर्ववर्ती कलाकार अधिकाँश तवायफों के परिवार से थी लेकिन इन लोगों ने फिल्मों में अपनी अलग मर्यादा बनाया। नैतिकता के उच्च मापदंड स्थापित किये।

एक आजकल की हीरोइनें हैं, अच्छे खासे परिवार से आकर वैश्या जैसे चरित्र निभा रही हैं। नृत्य के नाम पर उभरते कूल्हे औऱ वक्ष दिखा रही हैं। सम्भोग की मुद्रा में नृत्य दिखा रही हैं।

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क्या अब मान ही लिया जाय कि शास्त्रीय नृत्य का स्वर्णिम काल समाप्ति कि ओर है ?
अब हमें उघडे जाँघ, उभरे वक्ष औऱ बेतरतीब कमर औऱ नितम्ब मटकाने को ही नृत्य मान लेना चाहिए ?

अर्थातुराणाम न सुह्रिन्न बन्धु: – कामातुराणाम न भयं न लज्जा
चिंतातुराणाम न सुखं न निद्रा –
क्षुधातुराणाम न बलं न तेजः।

किसी देश को बर्बाद करना हो तो सबसे सस्ता और सरल तरीका है कि उस देश के बच्चों को बाल्यावस्था में ही कामातुर बना दो।
और यह काम बड़े मनोयोग से मीडिया , सिनेमा, टीवी एवं देशी खाल ओढ़े हुए विदेशी शासकों द्वारा किया जा रहा है।

क्षमा कीजिएगा आपका फिल्मी डांस कला नहीं है, काला है !!

 – डॉ. मधुसूदन उपाध्याय, लेखक भारतीय संस्कृति, इतिहास, कला, धर्म एवं आध्यात्म के गहन जानकार हैं।

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अल्लाउद्दीन खिलजी के राजस्व सुधार एवं हिन्दू

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अल्लाउद्दीन खिलजी पहला मुसलमान शासक था जिसे इस्लाम के ध्वज को विन्ध्य पर्वत  के दक्षिण में फहराने का गौरव प्राप्त है. उससे पहले किसी भी मुसलमान ने भारत के इतने बड़े भूभाग का शासन नहीं किया था. यद्यपि उसकी यह विजय स्थायी नहीं सिद्ध हुई और बीस साल के भीतर ही उसका महाराज्य छिन्न भिन्न हो गया. परन्तु उसके साथ ही इस्लामिक राज्य जो सैकड़ों युद्धों के बावजूद उत्तर भारत के मैदानों तक ही सीमित था, दक्षिण के पठार एवं समुद्र तटों तक स्थापित हो गया और सरदार बल्लभभाई पटेल द्वारा निजाम को समूल नष्ट करने तक बना रहा.

जाफर खान और मालिक काफूर के नेत्रित्व में इस  विस्तृत साम्राज्य विस्तार के अतरिक्त अपने चाचा की हत्या, मंदिरों का विध्वंश, नरसंहार एवं स्त्री लोलुपता के कारणों से अल्लाउद्दीन इतिहास में कुख्यात है. परन्तु  औपनिवेशिक काल से चले आ रहे सरकारी पाठ्यक्रम में अल्लाउद्दीन से सम्बंधित जो विषय सबसे अधिक चर्चा में रहता है वो उसके राजस्व सम्बन्धी सुधार एवं आर्थिक नीतियाँ हैं

निष्पक्ष दृष्टि से देखें तो अल्लाउद्दीन एक अनपढ़,क्रूर एवं धूर्त व्यक्ति था जिसकी इस्लाम में गहरी निष्ठा थी. और उस युग में सुलतान होने के लिए यह सबसे बड़ी योग्यता थी. उसकी आर्थिक नीतियाँ एवं राजस्व सुधार  भी उसके इन्ही गुणों का परिणाम थीं, भले ही वामी एवं इस्लामी इतिहासकार बाल की खाल निकालकर उसे चाणक्य सिद्ध करने करने का प्रयास करें.

अल्लाउद्दीन की आर्थिक नीतियों की तीन  मुख्य उद्देश्य थे:

  • विशाल साम्राज्य को नियंत्रित करने के लिए सेना का खर्चा एकत्र करना
  • हिन्दू प्रजा को इतना दरिद्र बना देना की वो विद्रोह की कल्पना भी नहीं कर सके
  • इस्लाम नहीं स्वीकार करने वाले धिम्मियों को कठोर दंड देना

अपने इन तीन उद्देश्यों को पूरा करने के लिए अल्लाउद्दीन ने अपनी विशेष आर्थिक नीतियों को लागू किया. और पूरे इस्लाम सम्मत विधि से लागू किया. राज्य में हिन्दुओं की स्थिति क्या होनी चाहिए इसपर सुलतान ने बयाना के काजी मुगीसुद्दीन से परामर्श लिया, इसपर काजी ने सुलतान से कहा:

”शरा में हिन्दुओं को खराजगुजर (कर देने वाला) कहा गया है. जब कोई राजस्व विभाग का अधिकारी उनसे चांदी मांगे तो उनका कर्तव्य है कि बिना किसी पूछताछ के बड़ी नम्रता से उसे सोना दें. यदि अधिकारी उनके मुंह में थूके तो उसे लेने के लिए बिना हिचकिचाहट उन्हें मुंह खोल देना चाहिए. इसप्रकार के कार्यों से धिम्मी इस्लाम के प्रति अपनी आज्ञापालन की भावना का प्रदर्शन करता है. अल्लाह ने उन्हें अपमानित करने की आज्ञा दी है. पैगम्बर ने हमें उनका वध करने, लूटने तथा बंदी बनाने का आदेश दिया है. महान इमाम अबू हनीफा जैसे अधिकारी ने जिसके मार्ग का हम अनुसरण करते हैं हिन्दुओं पर जजिया लगाने की अनुमति दी है. इस्लामिक धर्माधीशों के अनुसार हिन्दुओं के केवल दो ही मार्ग हैं मृत्यु अथवा इस्लाम.”

और अल्लाउद्दीन ने पूरी निष्ठा से काजी की शिक्षा का अनुसरण किया और निम्नलिखित राजस्व/प्रशासनिक  सुधार किये:

चूंकि कृषक केवल हिन्दू थे, सुल्तान ने कृषि कर को पचास प्रतिशत लगा दिया इसके साथ ही साथ पशुओं, चरागाहों आदि पर भी अतिरक्त कर  लगाये और अहीर, गड़ेरी आदि निर्धन पशुपालक हिन्दुओं को भी दरिद्र बना दिया. राजाज्ञाएं निकाल कर हिन्दुओं की सम्पत्ति जब्त कर ली गयी. जजिया एवं जकात की दर दोगुनी कर दी गयी. खुत, मुकद्दम एवं पटवारी आदि छोटे राजस्व अधिकारी जो कि सभी हिन्दू थे उनके सारे विशेषाधिकार जब्त कर  लिए गये एवं दण्ड के बलपर अत्याचारी राजस्व कानूनों को मानने पर बाध्य किया गया. उनके लिए पशुओं एवं सम्पत्ति की सीमा निर्धारित कर दी गयी. विभिन्न करों के भुगतान के  पश्चात् कृषक हिन्दुओं के पास उपज का एक चौथाई हिस्सा ही बच पाता था.

इसका परिणाम यह हुआ कि सम्पूर्ण हिन्दू प्रजा घोर दरिद्रता एवं भुखमरी की अवस्था में पहुँच गयी. इतिहासकार बरनी लिखता है,“हिन्दू घोड़े की सवारी करने, सुंदर पोषक पहनने, अस्त्र-शस्त्र धारण करने एवं पान खाने में असमर्थ हो गये.’’ वूल्जले हेग लिखते हैं,‘सम्पूर्ण राज्य में हिन्दू दुःख एवं दरिद्रता में डूब गये’

समकालीन लेखक मुहद्दिस मौलाना शम्सुद्दीन तुर्क ने अल्लाउद्दीन की बड़ाई करते हुए लिखा है,

”सुलतान ने हिन्दुओं को लज्जित अपमानित एवं निर्धन बना दिया है. मैंने सुना है कि हिन्दुओं के बच्चे तथा औरते मुसलमानों के दरवाजों पर भीख माँगा करते हैं. ए बादशाह ए इस्लाम, तेरी  ये धर्मनिष्ठता सराहनीय है तूने मुहम्मद साहब के धर्म की भली भाँती रक्षा की है.”

अल्लाउद्दीन जिस विचारधारा को मानता था और जिसके अनुसार उसे शासन करना था उसकी दृष्टि में यह सारे कार्य न्यायोचित ठहराए जा सकते हैं किन्तु आज के युग में जब तथाकथित मानवतावद के ध्वजवाहक बड़ी निर्लज्जता से उसके समर्थन में तर्क गढ़ते हैं तो उनसे भारतवर्ष, हिन्दू समाज एवं संस्कृति के प्रति घोर घृणा एवं द्वेष की दुर्गन्ध आती है.

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जिन्होंने संघ को देशव्यापी बनाया : पूर्व सरसंघचालक बालासाहब देवरस

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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तृतीय सरसंघचालक श्री मधुकर दत्तात्रेय देवरस उपाख्य बालासाहब देवरस ‘सामाजिक समरसता और सेवाकार्यों द्वारा सामाजिक उत्थान’ के पुरोधा के रूप में जाने जाते हैं। बाल्यकाल से जीवन के अंतिम क्षण समाज में फैले कुरीतियों, विषमताओं और अभावों को दूर करने के लिए उन्होंने अनेक योजनाएं बनाईं, उन्हें कार्यान्वित करने के लिए लोकशक्ति का निर्माण किया और समाज का प्रबोधन किया। ऐसे बालासाहब देवरस का जन्म 11 दिसम्बर 1915 में नागपुर में हुआ था। नागपुर के न्यू इंगलिश स्कूल मे उनकी प्रारम्भिक शिक्षा हुई। संस्कृत और दर्शनशास्त्र विषय लेकर मौरिस कालेज से उन्होंने 1935 मे बी. ए. किया। दो वर्ष बाद उनहोंने विधि की परीक्षा उत्तीर्ण की। कुशाग्र बुद्धि के धनी बालासाहब ने विद्यार्थी जीवन में सभी परीक्षाएं प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना के कुछ समय बाद ही वे डॉ. हेडगेवार के सम्पर्क में आए। उन्हें नागपुर के मोहिते के बाड़े में लगने वाली सायं शाखा के ‘कुश पथक’ में शामिल किया गया, जिसमे विशेष प्रतिभावान छात्रों को ही रखा जाता था। विधि स्नातक करने के बाद उन्होंने नागपुर के ‘अनाथ विद्यार्थी वसतिगृह’ में दो वर्ष तक अध्यापन कार्य भी किया। इसी अवधि में इन्हें नागपुर के नगर कार्यवाह का दायित्व दिया गया, जिसे उन्होंने बखूबी निर्वहन किया। संघ से उनकी निकटता बढ़ती गई और डॉ. हेडगेवार की प्रेरणा से उन्होंने अपना पूरा जीवन संघ के माध्यम से राष्ट्रकार्य में लगाने का निश्चय किया।

1939 में वे प्रचारक बने, तो उन्हें संघकार्य के विस्तार हेतु बंगाल भेजा गया; पर 1940 में डा. हेडगेवार के देहान्त के बाद उन्हें वापस नागपुर बुला लिया गया। इसके बाद लगभग 30-32 साल तक उनकी गतिविधियों का केन्द्र मुख्यतः नागपुर ही रहा। नागपुर से प्रचारकों की एक बहुत बड़ी फौज तैयार कर पूरे देश में भेजने का श्रेय बालासाहब देवरस को ही जाता है। यहाँ से जो प्रचारकों की खेप पूरे देश में भेजी गई उसमें स्वयं उनके भाई भाऊराव देवरस भी शामिल थे, जिन्हें उत्तर प्रदेश भेजा गया था। भाऊराव ने लखनऊ में रहकर संघ कार्य को गति प्रदान की और एकात्म मानववाद के प्रणेता पण्डित दीनदयाल उपाध्याय और अटल बिहारी वाजपेयी जैसे लोगों को संघ से जोड़ा।

बालासाहब देवरस
1948 में जब गांधी हत्या का झूठा आरोप लगाकर संघ पर प्रतिबन्ध लगाया गया, तो उसके विरुद्ध सत्याग्रह के संचालन तथा फिर समाज के अनेक प्रतिष्ठित लोगों से सम्पर्क कर उनके माध्यम से प्रतिबन्ध निरस्त कराने में बालासाहब देवरस की प्रमुख भूमिका रही। संघ के संविधान, गणवेश, शारीरिक एवं बौद्धिक कार्यक्रम और गणगीत आदि निश्चित करने में उनकी मुख्य भूमिका रही।

वे 1965 में सरकार्यवाह बनें तथा श्री गुरुजी के देहान्त के पश्चात् 1973 में सरसंघचालक बने। इसके पश्चात संघ कार्य को गति देने के उद्देश्य से देश भर में प्रवास किया। दो वर्ष के पश्चात ही इन्दिर गांधी की घृणित राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं में 4 जुलाई 1975 को संघ पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया। उनके नेतृत्व में संघ ने इस प्रतिबन्ध का बड़े धैर्य से सामना किया और उन्हीं की प्रेरणा से कांग्रेस व साम्यवादियों को छोड़कर अन्य सभी सामाजिक, धार्मिक एवं राजनीतिक संगठनों ने मिलकर आपातकाल के विरूद्ध देशव्यापी जबरदस्त सत्याग्रह किया। परिणामस्वरूप संघ से प्रतिबन्ध हटाया गया और 1977 के चुनाव में कांग्रेस की जबरदस्त पराजय हुई।

सन 1983 में मीनाक्षीपुरम (तमिलनाडु) के हिन्दुओं का इस्लाम पंथ में सामूहिक मतांतरण हुआ। इस घटना ने पूरे देश के हिन्दुओं को झकझोर कर रख दिया। इस चुनौती का सामना करने के लिए बालासाहब देवरस के मार्गदर्शन में देशभर में एकात्मता यात्रा निकाली गई। इस यात्रा के माध्यम से देश में अभूतपूर्व जनजागरण हुआ।

बालासाहब देवरस
सरसंघचालक रहते हुए बालासाहब ने संघकार्य में अनेक नए आयाम जोड़े। इनमें सबसे महत्वपूर्ण है निर्धन बस्तियों में चलने वाले सेवा कार्य। इससे वहां चल रही धर्मान्तरण की प्रक्रिया पर रोक लगी। स्वयंसेवकों द्वारा प्रान्तीय स्तर पर अनेक संगठनों की स्थापना की गई थी। बालासाहब ने वरिष्ठ प्रचारक देकर उन सबको अखिल भारतीय रूप दे दिया। बालासाहब देवरस के ही कार्यकाल में संघ का विस्तार देशभर में तहसील स्तर तक पहुंचा। देशभर में एक ओर जहां शाखाओं का व्यापक स्तर पर विस्तार हुआ वहीं उनके 21 वर्षों के कालखण्ड में अपने सहयोगी संगठनों की शक्ति में भी पर्याप्त वृद्धि हुई।

बालासाहब देवरस ने कारंजा (बालाघाट) की अपनी पैतृक संपत्ति को बेचकर उससे प्राप्त धनराशि से नागपुर-वर्धा मार्ग पर स्थित खापरी में 20 एकड़ भूमि खरीदी थी, जिसे 1970 में उन्होंने भारतीय उत्कर्ष मंडल को दान कर दिया। इस भूमि पर ग्रामीण बालक-बालिकाओं के लिए भारतीय उत्कर्ष मंदिर (विद्यालय), गोशाला और स्वामी विवेकानन्द मेडिकल मिशन नामक अस्पताल ग्रामवासियों के सेवार्थ कार्यरत है।

मधुमेह रोग के बावजूद 1994 तक सरसंघचालक के रूप में उन्होंने दायित्व निभाया। जब उनका शरीर प्रवास योग्य नहीं रहा, तब उन्होंने प्रमुख कार्यकर्ताओं से परामर्श कर यह दायित्व श्री रज्जू भैया को सौंप कर पद त्याग का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किया। इतना ही नहीं सन 1996 में अपना शरीर छोड़ने के पूर्व ही उन्होंने निर्देश दिया कि उनका दाह संस्कार सामान्य व्यक्ति की भांति सार्वजनिक स्थल पर किया जाए। इसके पीछे उद्देश्य था कि उनकी स्मृति में किसी स्मारक का निर्माण न हो। अपने जीवित रहते हुए ही उन्होंने जो पत्र लिखा था उसमें दो बातें प्रमुख थी। एक कि उनके नाम पर कहीं भी स्मारक का निर्माण न कराया जाए और दूसरा यह कि आद्य सरसंघचालक डॉ. हेडगेवार और द्वितीय सरसंघचालक गुरूजी के अलावा अन्य किसी सरसंघचालक का चित्र नहीं लगाया जाएगा। 17 जून 1996 में बालासाहब इस संसार से विदा हो गए। उन्हें कोटिशः नमन एवं विनम्र श्रद्धांजलि।

 विशाल अग्रवाल (लेखक भारतीय इतिहास और संस्कृति के गहन जानकार, शिक्षाविद, और राष्ट्रीय हितों के लिए आवाज़ उठाते हैं। भारतीय महापुरुषों पर लेखक की राष्ट्र आराधक श्रृंखला पठनीय है।)

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जो सचमुच जानते थे “असंख्य” को : श्रीनिवास रामानुजन

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22 दिसम्बर उन महान भारतीय गणितज्ञ श्रीनिवास रामानुजन का जन्मदिवस होता है, जो विश्व के महानतम गणितज्ञों में गिने जाते हैं और जिन्हें गणित के क्षेत्र में वही सम्मान प्राप्त है, जो विज्ञान के क्षेत्र में अल्बर्ट आइन्सटीन को| उनके लिखे कई सूत्र या प्रमेय आज भी हल नहीं किये जा सके है, या कहें कि उनकी उपपत्ति आज भी उपलब्ध नहीं है मगर उन सूत्रों का उपयोग विभिन्न क्षेत्रों में बहुत सफ़लता के साथ हो रहा है। पूरी दुनिया के तमाम महान वैज्ञानिक और गणितज्ञ रामानुजन के द्वारा लिखे गये सूत्रों पर आज भी गहन शोध कार्य कर रहे हैं।

श्रीनिवास रामानुजन का जन्म तमिलनाडु में इरोड में एक बहुत ही साधारण परिवार में 22 दिसम्बर, 1887 को हुआ था। वे बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि के बालक थे और अद्वितीय प्रतिभा, तर्कशक्ति और सृजनात्मकता के धनी थे। मद्रास विश्वविद्यालय से सन 1903 में उन्होंने दसवीं की परीक्षा कई पुरस्कारों के साथ पास की। हाई स्कूल के बाद ही उन्हें अत्यन्त प्रतिष्ठित “सुब्रयमण्यम छात्रवृत्ति” प्रदान की गयी जो कि उस समय गणित और अंग्रेजी के बहुत उत्कृष्ट छात्रों को दी जाती थी।

उनका मन गणित की कठिन से कठिन समस्याओं को सुलझाने में खूब लगता था और इसी कारण वे अन्य विषयों में उचित ध्यान न दे पाने की वजह से ग्यारहवीं कक्षा में फेल हो गये। 1906 में उन्होंने एक बार फिर मद्रास के पचियप्पा कॉलेज में ग्यारहवीं में प्रवेश लिया, और सन 1907 में उन्होंने बारहवी कक्षा की परीक्षा असंस्थागत विद्याथी के रुप में दी मगर पास नहीं हो पाये। उनकी परंपरागत शिक्षा यहीं समाप्त हो गयी पर ज़िन्दगी के विभिन्न पहलुओं और कष्टों को लगातार झेलते हुये भी उन्होंने गणित में अपना शोधकार्य सतत जारी रखा।

इसी बीच 14 जुलाई, 1909 को रामानुजम का विवाह कुंभकोणम के पास राजेन्द्रम गाँव के सम्भ्रान्त परिवार वाले श्री रंगास्वामी की पुत्री जानकीअम्मल से हो गयी। इसके बाद वे नौकरी की तलाश में निकल पडे, परन्तु बहुत प्रयास करने के बावजूद उन्हें सफलता नहीं मिली| बाद मे वे अपने पूर्व शिक्षक प्रोफेसर अय्यर की सिफारिश पर नैल्लोर के तत्कालीन जिलाधीश श्री आर. रामचंद्र राव से मिले जो कि उस समय इंडियन मैथमैटिकल सोसाइटी के अध्यक्ष भी थे।


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आर. रामचंद्र राव ने श्रीनिवास रामानुजन की नोटबुक देखकर उनकी योग्यता समझते हुये उनके लिये पच्चीस रुपये प्रतिमाह की व्यवस्था कर दी थी। सन 1911 की शुरुआत से लगभग एक साल तक रामानुजम को यह पारितोषिक प्राप्त होता रहा। इसी साल रामानुजम का प्रथम शोध पत्र “जनरल ऑफ इंडियन मैथमेटिकल सोसाइटी” में प्रकाशित हुआ जिसमें उन्होंने बरनौली संख्याओं के बारे में अध्ययन किया था।

एक वर्ष तक की अवधि वाले पारितोषिक के खत्म होने के बाद 1 मार्च 1912 को उन्होंने जीवनयापन के लिये मद्रास पोर्ट ट्र्स्ट में क्लास 3, चतुर्थ ग्रेड के क्लर्क के बतौर मात्र तीस रुपये प्रति माह के वेतन पर नौकरी शुरु कर दी और इसी दौरण उन्होने विशुद्ध गणित के अनेक क्षेत्रों में स्वतंत्र रुप से शोध कार्य किया| मद्रास पोर्ट ट्रस्ट में रामानुजन के अधिकारियों का रवैया बहुत ही सौहार्द पूर्ण था, वे रामानुजन की गणितीय क्षमताओं के प्रशंसक थे और चाहते थे कि रामानुजन गणित के क्षेत्र में अपना कार्य जारी रखें।

रामचन्द्र राव भी रामानुजन का पूरा ध्यान रखते थे और उनके ही कहने पर मद्रास इंजीनियरिंग कालेज के प्रोफेसर सी.एल.टी. ग्रिफिथ ने रामानुजन के कार्य को विभिन्न प्रसिद्ध और जानकार गणितज्ञों के पास भेजा, जिनमें यूनीवर्सिटी कॉलेज लन्दन के प्रसिद्ध गणितज्ञ एम. जे. एम. हिल प्रमुख थे। प्रो. हिल ने रामानुजन को अपनी समझदारी और प्रस्तुतिकरण में सुधार के सम्बन्ध में कई बार बहुत अच्छे सुझाव दिये लेकिन उन्होंने रामानुजन को विशुद्ध गणित में शोध के क्षेत्र में स्थापित होने के लिये कोई अन्य महत्वपूर्ण प्रयास नहीं किये|

इसके बाद रामानुजन ने कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के प्रमुख गणितज्ञों को पत्र लिखने शुरु किये और इन पत्रों के साथ अपने शोध कार्य के कुछ नमूने भी भेजे ताकि वे उनके कार्य का प्रथम दृष्टतया मूल्याँकन कर सकें। इसी बीच रामानुजन के ही एक पूर्व शिक्षक प्रो. शेषु अय्यर ने उन्हें प्रो.जी.एच. हार्डी को पत्र लिखने की सलाह दी। 16 जनवरी 1913 को पहली बार रामानुजन ने प्रो. हार्डी को पत्र लिखा और साथ में स्वयं द्वारा खोजी गयी प्रमेयों को भी अलग से संलग्न किया। प्रो. हार्डी ने रामानुजन की प्रतिभा को स्वीकार करते हुये उन्हें इंग्लैंड बुलाने के लिये निमंत्रण भी भेजा मगर रामानुजन व्यक्तिगत कारणों से उस समय विदेश जाने को तैयार नहीं हुये पर हां, प्रो. हार्डी के साथ उनका पत्र व्यवहार चलता रहा।

बाद में 22 जनवरी, 1914 को प्रो.हार्डी को लिखे पत्र में वे इंग्लैड जाने के लिये सहमत हो गये और 17 मार्च 1914 को वह समुद्री जहाज से इंग्लैड के लिये रवाना हो गये। अप्रैल से कैम्ब्रिज में उन्होने प्रो. हार्डी से मिलकर शोधकार्य शुरु कर दिया। यहाँ उन्होंने गणित के सिद्धान्तों को और अच्छी तरह से समझने के लिये कुछ अच्छे प्रोफेसरों की कक्षाओं में जाना शुरु कर दिया। धीरे धीरे श्रीनिवास रामानुजन ने अपनी प्रतिभा से सबको प्रभावित करना शुरु किया।

मार्च 1916 में उन्हें कैन्ब्रिज विश्वविद्यालय के द्वारा अपने 62 पृष्ठों वाले अंग्रेजी में प्रकाशित शोध लेख “हाईली कम्पोजिट नम्बर्स” के आधार पर बी.ए. (शोध के द्वारा) की उपाधि दी गयी। सन 1915 से 1918 तक उन्होंने कई शोध पत्र लिखे। 6 दिसम्बर, 1917 को रामानुजन प्रो. हार्डी के प्रयासों से लंदन मैथमेटिकल सोसाइटी में चुन लिये गये। । इसके बाद, मई 1918 में श्रीनिवास रामानुजन को “रॉयल सोसाइटी ऑफ लन्दन” का फेलो चुन लिया गया, जो उन दिनों किसी भी भारतीय के लिये बहुत ही सम्मान की बात थी।

गिरते स्वास्थ्य के बीच भी उनका शोधकार्य अनवारत जारी रहा और अपने चार साल के अल्प प्रवास में उन्होंने असाधारण उपलब्धियाँ प्राप्त कीं | 27 मार्च, 1919 को रामानुजन बम्बई आ गए, परन्तु उनका शोधकार्य जारी रहा| अपने अन्तिम समय में उन्होंने मॉक थीटा फलन और फाल्स थीटा फलन पर शोध कार्य किया जो कि उनका सबसे महत्वपूर्ण और विशिष्ट कार्य माना जाता है।

26 अप्रैल, 1920 को श्रीनिवास रामानुजन लम्बे समय तक खराब स्वास्थ्य के कारण सुबह ही अचेत हो गये और कुछ घन्टों बाद वह चिर निद्रा में सो गये। भारतीय प्रतिभा के प्रतीक और सिरमौर, जो अपने शोध कार्य और गणितीय प्रतिभा के कारण अनन्त काल तक हमें प्रेरणा देते रहेंगे, ऐसे श्रीनिवास रामानुजन को शत शत नमन एवम् विनम्र श्रद्धांजलि|

विशाल अग्रवाल (लेखक भारतीय इतिहास और संस्कृति के गहन जानकार, शिक्षाविद, और राष्ट्रीय हितों के लिए आवाज़ उठाते हैं। भारतीय महापुरुषों पर लेखक की राष्ट्र आराधक श्रृंखला पठनीय है।)

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स्वामी श्रद्धानंद का बलिदान याद है?

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वैदिक धर्म, वैदिक संस्कृति, और आर्य जाति की रक्षा के लिए, मरणासन्न अवस्था से उसे पुनः प्राणवान एवं गतिवान बनाने के लिए और उसे सर्वोच्च शिखर पर पहुंचाने के लिये आर्य समाज ने सैंकड़ों बलिदान दिए हैं और उसमें प्रथम पंक्ति के प्रथम पुष्प हैं स्वामी श्रद्धानंद सरस्वती जिनका 23 दिसम्बर को बलिदान दिवस है| स्वामी श्रद्धानंद का नाम देश, धर्म और संस्कृति की रक्षा करने वाले उन महान बलिदानियों में बहुत ही आदर के साथ लिया जाता है जिन्होंने अपनी जान की परवाह किए बगैर खुद को देश-समाज के लिये समर्पित कर दिया। धर्म, संस्कृति और देश पर बलिदान होना सबसे बड़ा कर्म माना जाता है और यह तब और भी बड़ा हो जाता है जब ये महान कार्य बगैर किसी स्वार्थ के किए जाएं।

स्वामी श्रद्धानंद ऐसे ही निस्वार्थ कार्य करने वाले महान धर्म और कर्म योद्धा थे। उनका श्रद्धानंद नाम उनके काम के मुताबिक पूरी तरह सही बैठता है। उन्होंने स्वराज्य हासिल करने, देश को अंग्रेजी दासता से छुटकारा दिलाने और विधर्मी बने हिंदुओं का शुद्धिकरण करने, दलितों को उनका अधिकार दिलाने और पश्चिमी शिक्षा की जगह वैदिक शिक्षा प्रणाली गुरुकुल के मुताबिक शिक्षा का प्रबंध करने जैसे अनेक कार्य करने मे स्वयं को तिल तिल गला दिया।

18वीं शती में हिंदू और मुसलमानों का यदि कोई सर्वमान्य नेता था तो वे स्वामी श्रद्धानंद ही थे। 4 अप्रैल 1919 को मुसलमानों ने स्वामी जी को अपना नेता मानकर भारत की सबसे बड़ी ऐतिहासिक जामा मस्जिद के बिम्बर पर बैठाकर स्वामी जी का सम्मान किया था। दुनिया की यह महज एक घटना है जहां मुसलमानों ने गैर मुसलिम को मस्जिद की बिम्बर पर उपदेश देने के लिए कहा। स्वामी जी ने अपना उपदेश त्वं हि नः पिता वसो त्वं माता शत् क्रतो बभूविथ वेद मंत्र से शुरु किया और शांति पाठ के साथ अपने उपदेश को खत्म किया।

महर्षि दयानंद सरस्वती के अनन्य भक्त और उनके उद्देश्यों के प्रति पूर्णतः समर्पित, क्रांतिकारी विचारों के निष्ठावान समाज-सुधारक श्रद्धानंद का जन्म 22 फरवरी सन् 1856 (फाल्गुन कृष्ण त्रयोदशी, विक्रम संवत् 1913) को पंजाब प्रान्त के जालंधर जिले के पास बहने वाली सतलुज नदी के किनारे बसे प्राकृतिक सम्पदा से सुसज्ज्ति तलवन नगरी में हुआ था। उनके पिता, लाला नानक चन्द, ईस्ट ईण्डिया कम्पनी द्वारा शासित यूनाइटेड प्रोविन्स (वर्तमान उत्तर प्रदेश) में पुलिस अधिकारी थे।

उनके बचपन का नाम वृहस्पति और मुंशीराम था, किन्तु मुन्शीराम सरल होने के कारण अधिक प्रचलित हुआ। वे पड़ने में मेधावी परन्तु बड़े ही उदंड स्वभाव के थे| पिता का ट्रान्सफर अलग-अलग स्थानों पर होने के कारण उनकी आरम्भिक शिक्षा अच्छी प्रकार नहीं हो सकी। काशी विश्वनाथ मंदिर के कपाट सिर्फ रीवा की रानी के लिए खोलने और साधारण जनता के लिए बंद किए जाने व एक पादरी के व्यभिचार का दृश्य देख मुंशीराम का धर्म से विश्वास उठ गया और वह बुरी संगत में पड़ गए और हर किस्म की बुरी आदतों का शिकार हो गये| सच तो ये है कि स्वामी श्रद्धानंद उर्फ मुंशीराम उन महापुरुषों में से एक हैं जिनका जन्म ऊंचे कुल में होने के बावजूद प्रारंभिक जीवन की बुरी लतों के कारण बहुत ही निकृष्ट किस्म का था।

बालक के नास्तिक होने के कारण पिता जी बड़े ही असहज महसूस करते थे और इस चिंता मे रहते थे कि कैसे पुत्र को बुराइयों से दूर कर धर्म के मार्ग पर लाएं| सम्बत 1936 में महर्षि दयानंद सरस्वती बरेली पधारे तो नानकचन्द भी अपने पुत्र मुंशीराम को आग्रहपूर्वक साथ लेकर स्वामी दयानन्द का प्रवचन सुनने पहुंचे। उनके उपदेशो को सुनकर मुंशीराम प्रभावित ही नहीं हुए बल्कि उनके प्रति श्रद्धा भाव उत्पन्न हो गया| स्वामी दयानन्द जी के तर्कों और आशीर्वाद ने मुंशीराम को दृढ़ ईश्वर विश्वासी तथा वैदिक धर्म का अनन्य भक्त बना दिया और वे आर्यसमाज के निकट आ गए| स्वामी दयानंद सरस्वती के साथ बरेली में हुए सत्संग ने उन्हें जीवन का अनमोल आनंद दिया, जिसे उन्होंने सारे संसार को वितरित किया।

अपनी जीवन गाथा कल्याण मार्ग का पथिक में उन्होंने लिखा था-

“ऋषिवर! तुम्हें भौतिक शरीर त्यागे 41 वर्श हो चुके, परंतु तुम्हारी दिव्य मूर्ति मेरे हृदय पटपर अब तक ज्यों-की-त्यों है। मेरे निर्बल हृदय के अतिरिक्त कौन मरणधर्मा मनुष्‍य जान सकता है कि कितनी बार गिरते-गिरते तुम्हारे स्मरणमात्र ने मेरी आत्मिक रक्षा की है। तुमने कितनी गिरी हुई आत्माओं की काया पलट दी, इसकी गणना कौन मनुष्‍य कर सकता है? परमात्मा के बिना, जिनकी पवित्र गोद में तुम इस समय विचर रहे हो, कौन कह सकता है कि तुम्हारे उपदेशों से निकली हुई अग्नि ने संसार में प्रचलित कितने पापों को दग्ध कर दिया है। परंतु अपने विषय में मैं कह सकता हूं कि तुम्हारे सत्संग ने मुझे कैसी गिरी हुई अवस्था से उठाकर सच्चा लाभ करने के योग्य बनाया।’’

मुंशी राम से स्वामी श्रद्धानंद  बनाने तक का उनका सफ़र पूरे विश्व के लिए प्रेरणादायी है। स्वामी दयानंद सरस्वती से हुई एक भेंट और पत्नी शिवादेवी के पतिव्रत धर्म तथा निश्छल निष्कपट प्रेम व सेवा भाव ने उनके जीवन को क्या से क्या बना दिया।

कल्याण मार्ग का पथिक

वकालत के साथ आर्य समाज के जालंधर जिला अध्यक्ष के पद से उनका सार्बजनिक जीवन प्रारम्भ हुया| महर्षि दयानंद के महाप्रयाण के बाद उन्होने स्वयं को स्वदेश, स्व-संस्कृति, स्व-समाज, स्व-भाषा, स्व-शिक्षा, नारी कल्याण, दलितोत्थान, स्वदेशी प्रचार, वेदोत्थान, पाखंड खडंन, अंधविश्‍वास उन्मूलन और धर्मोत्थान के कार्यों को आगे बढ़ाने मे पूर्णत समर्पित कर दिया। गुरुकुल कांगड़ी की स्थापना, अछूतोद्धार, शुद्धि, सद्धर्म प्रचार पत्रिका द्वारा धर्म प्रचार, सत्य धर्म के आधार पर साहित्य रचना, वेद पढने व पढ़ाने की ब्यवस्था करना, धर्म के पथ पर अडिग रहना, आर्य भाषा के प्रचार तथा उसे जीवीकोपार्जन की भाषा बनाने का सफल प्रयास, आर्य जाति के उन्नति के लिए हर प्रकार से प्रयास करना आदि ऐसे कार्य हैं जिनके फलस्वरुप स्वामी श्रद्धानंद अनंत काल के लिए अमर हो गए|

उन्होने गुरुकुल प्रारंभ करके देश में पुनः वैदिक शिक्षा को प्रारंभ कर महर्षि दयानंद द्वारा प्रतिपादित सिद्धांतों का प्रचार-प्रसार किया व उन्हें कार्यरूप में परिणित किया और उनके जरिए देश, समाज और स्वाधीनता के कार्यों को आगे बढ़ाने का युगांतरकारी कार्य किए। शुद्धि आंदोलन के जरिए विधर्मी जनों को आर्य(हिंदू) बनाने के लिए आंदोलन चलाए। दलितों की भलाई के कार्य को निडर होकर आगे बढ़ाया, साथ ही कांगेस के स्वाधीनता के आंदोलन का बढ़-चढ़कर नेतृत्व भी किया। कांग्रेस में उन्होंने 1919 से लेकर 1922 तक सक्रिय रूप से अपनी महत्त्वपूर्ण भागीदारी की।

1922 में अंग्रेजी सरकार ने गिरफ्तार किया, लेकिन उनकी गिरफ्तारी कांग्रेस के नेता होने की वजह से नहीं हुई बल्कि सिक्खों के धार्मिक अधिकारों की रक्षा के लिए सत्याग्रह करते हुए बंदी हुए थे। कांगेस में तुष्टीकरण के महात्मा गांधी के विचारों से मतभेद होने की वजह से उन्होंने त्यागपत्र दिया था। लेकिन देश की स्वतंत्रता के लिए कार्य वे लगातार करते रहे। हिंदू-मुसलिम एकता के लिए स्वामी जी ने जितना कार्य किए, उस वक्त शायद ही किसी ने अपनी जान जोखिम में डालकर किया हो। वे ऐसे महान युगचेता महापुरुष थे जिन्होंने युग की धड़कन को पहचानकर समाज के हर वर्ग में जनचेतना जगाने का कार्य किया। धर्म के सही स्वरूप को महर्षि दयानंद ने जनता में जो स्थापित किया था, स्वामी श्रद्धानंद ने उसे आगे बढ़ाने का निडरता के साथ कदम बढ़ाया।

महर्षि दयानंद ने राष्ट्र सेवा का मूलमंत्र लेकर आर्य समाज की स्थापना की। कहा कि ‘हमें और आपको उचित है कि जिस देश के पदार्थों से अपना शरीर बना, अब भी पालन होता है, आगे होगा, उसकी उन्नति तन मन धन से सब जने मिलकर प्रीति से करें ‘ । स्वामी श्रद्धानंद ने इसी को अपने जीवन मूलाधार बनाया। समाज सुधारक के रूप में उनके जीवन का अवलोकन करें तो पाते हैं कि उन्होंने प्रबल विरोध के बावजूद स्त्री शिक्षा के लिए अग्रणी भूमिका निभाई।

स्वयं की बेटी अमृत कला को जब उन्होंने ‘ईसा-ईसा बोल, तेरा क्या लगेगा मोल ‘ गाते सुना तो घर – घर जाकर चंदा इकट्ठा कर गुरुकुल कांगडी विश्वविद्यालय की स्थापना हरिद्वार में कर अपने बेटे हरीश्चंद्र और इंद्र को सबसे पहले भर्ती करवाया। स्वामी जी का विचार था कि जिस समाज और देश में शिक्षक स्वयं चरित्रवान नहीं होते उसकी दशा अच्छी हो ही नहीं सकती। उनका कहना था कि हमारे यहां टीचर हैं, प्रोफ़ेसर हैं, प्रिसिंपल हैं, उस्ताद हैं, मौलवी हैं पर आचार्य नहीं हैं। आचार्य अर्थात् आचारवान व्यक्ति की महती आवश्यकता है। चरित्रवान व्यक्तियों के अभाव में महान से महान व धनवान से धनवान राष्ट्र भी समाप्त हो जाते हैं।

जात-पात व ऊंच-नीच के भेदभाव को मिटाकर समग्र समाज के कल्याण के लिए उन्होंने अनेक कार्य किए। प्रबल सामाजिक विरोधों के बावजूद अपनी बेटी अमृत कला, बेटे हरिश्चद्र व इंद्र का विवाह जात-पात के समस्त बंधनों को तोड कर कराया। उनका विचार था कि छुआछूत को लेकर इस देश में अनेक जटिलताओं ने जन्म लिया है तथा वैदिक वर्ण व्यवस्था के द्वारा ही इसका अंत कर अछूतोद्धार संभव है।

वह हिन्दी को राष्ट्र भाषा और देवनागरी को राष्ट्रलिपि के रूप में अपनाने के पक्षधर थे। सतधर्म प्रचारक नामक पत्र उन दिनों उर्दू में छपता था। एक दिन अचानक ग्राहकों के पास जब यह पत्र हिंदी में पहुंचा तो सभी दंग रह गए क्योंकि उन दिनों उर्दू का ही चलन था। त्याग व अटूट संकल्प के धनी स्वामी श्रद्धानंद ने यह घोषणा की कि जब तक गुरुकुल के लिए 30 हजार रुपए इकट्ठे नहीं हो जाते तब तक वह घर में पैर नहीं रखेंगे। इसके बाद उन्होंने भिक्षा की झोली डाल कर न सिर्फ़ घर-घर घूम 40 हजार रुपये इकट्ठे किए बल्कि वहीं डेरा डाल कर अपना पूरा पुस्तकालय, प्रिंटिंग प्रेस और जालंधर स्थित कोठी भी गुरुकुल पर न्योछावर कर दी।

उनका सर्बाधिक महानतम कार्य था, वह शुद्धि सभाओं का गठन| उनका विचार था कि अज्ञान, स्वार्थ व प्रलोभन के कारण धर्मांतरण कर बिछुड़े स्वजनों की शुद्धि करना देश को मजबूत करने के लिए परम आवश्यक है, इसलिये जहाँ-जहाँ आर्य समाज थे, वहाँ-वहाँ शुद्धि सभाओं का गठन कराया गया और धीरे धीरे शुद्धि के इस प्रयास ने आन्दोलन का रूप ले लिया| स्वामी जी ने पश्चिम उत्तर प्रदेश के 89 गांवों के हिन्दू से हुए मुसलमानों को पुनः हिन्दू धर्म में शामिल कर आदि गुरु शंकराचार्य के द्वारा शुरू की परंपरा को पुनर्जीवित किया और समाज में यह विश्वास उत्पन्न किया की जो विधर्मी हो गए हैं, वे सभी वापस अपने हिन्दू धर्म में आ सकते हैं| देश में हिन्दू धर्म में वापसी के वातावरण बनने से इस तरह के प्रयासों की एक लहर सी आ गयी|

एक बार शुद्धि सभा के प्रधान को उन्होंने पत्र लिख कर कहा कि ‘अब तो यही इच्छा है कि दूसरा शरीर धारण कर शुद्धि के अधूरे काम को पूरा करूं ‘| उन्होने भारतीय हिंदू शुद्धि सभा की स्थापना कर दो लाख से अधिक मलकानों को शुद्ध किया और यही उनके लिये घातक सिद्ध हो गया| कुछ कट्टरपंथी मुसलमान इनके शुद्धिकरण के कार्य के खिलाफ हो गए थे और उनके बनाये दूषित माहौल के चलते एक धर्मांध मुस्लिम युवक अब्दुल रशीद ने छल से 23 दिसम्बर 1926 को चांदनी चौक दिल्ली में गोलियों से भूनकर हत्या कर दी। इस तरह धर्म, देश, संस्कृति, शिक्षा और दलितोत्थान का यह युगधर्मी महामानव मानवता के लिए शहीद हो गया।

वह निराले वीर थे। लौह पुरुष सरदार बल्लभ भाई पटेल ने कहा था ‘स्वामी श्रद्धानंद की याद आते ही 1919 का दृश्य आंखों के आगे आ जाता है। सिपाही फ़ायर करने की तैयारी में हैं। स्वामी जी छाती खोल कर आगे आते हैं और कहते हैं- ‘ लो, चलाओ गोलियां । इस वीरता पर कौन मुग्ध नहीं होगा? ‘ महात्मा गांधी के अनुसार ‘ह वीर सैनिक थे। वीर सैनिक रोग शैय्या पर नहीं, परंतु रणांगण में मरना पसंद करते हैं। वह वीर के समान जीये तथा वीर के समान मरे

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राष्ट्र धर्म को बढ़ाने के लिए वे चाहते थे कि,

“प्रत्येक नगर में एक ‘ हिंदू-राष्ट्र मंदिर” होना चाहिए जिसमें 25 हजार व्यक्ति एक साथ बैठ सकें और वहां वेद, उपनिषद, गीता, रामायण, महाभारत आदि की कथा हुआ करे। मंदिर में अखाड़े भी हों जहां व्यायाम के द्वारा शारीरिक शक्ति भी बढ़ाई जाए। प्रत्येक हिन्दू राष्ट्र मंदिर पर गायत्री मंत्र भी अंकित हो।”

देश की अनेक समस्याओं तथा हिंदोद्धार हेतु उनकी एक पुस्तक ‘ हिंदू सॉलिडेरिटी-सेवियर ओफ़ डाइंग रेस ‘अर्थात् ‘ हिंदू संगठन – मरणोन्मुख जाति का रक्षक ‘ आज भी हमारा मार्गदर्शन कर रही है। राजनीतिज्ञों के बारे में स्वामी जी का मत था कि भारत को सेवकों की आवश्यकता है लीडरों की नहीं। श्री राम का कार्य इसीलिए सफ़ल हुआ क्योंकि उन्हें हनुमान जैसा सेवक मिला। स्वामी दयानन्द का कार्य अधूरा पड़ा है जो तभी पूरा होगा जब दयानन्द रूपी राम को भी हनुमान जैसे सेवक मिलेंगे। वह सच्चे अर्थों में स्वामी दयानन्द के हनुमान थे जो राष्ट्र की सेवा के लिए तिल-तिल कर जले। महर्षि दयानन्द के इस अपूर्व सेनानी को शत शत नमन एवम् विनम्र श्रद्धांजलि| भारतीय महापुरुषों पर लेखक की राष्ट्र आराधक श्रृंखला पठनीय है।

विशाल अग्रवाल (लेखक भारतीय इतिहास और संस्कृति के गहन जानकार, शिक्षाविद, और राष्ट्रीय हितों के लिए आवाज़ उठाते हैं। भारतीय महापुरुषों पर लेखक की राष्ट्र आराधक श्रृंखला पठनीय है।)

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अद्भुत है गंगा जी में अस्थि विसर्जन की दिव्य परंपरा!

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बात 1999 की है मुझसे बड़े भईया को खुनी पाईल्स हुए। और हर स्तर का इलाज कराते हुए इस पाइल्स ने Hemorrhoids(गुदचीर) का रूप ले लिया। इसमें गुदा छिल जाती है। कल्पना जी जा सकती है ये कितनी कष्ट कर बीमारी है। दिल्ली के यूनानी तिब्बिया कॉलेज में गुदा सम्बन्धी तमाम बीमारियों का सॉलिड इलाज होता है। लेकिन वहां भी इलाज फायदा नहीं कर पाया। 8 महीने का कष्ट झेल हर पैथी को आजमा कर भईया ऑपरेशन कराने की तैयारी कर ही रहे थे कि यूँ ही एक मिलने वाले ने एक इलाज बताया।

इलाज बड़ा अजीब सा लगा। श्मशान से अस्थियों के फूल लाकर उनको पीसकर, कपड़े में छानकर, असली घी में मिलाकर, उसका लड्डू सा बनाकर, लंगोट की सहायता से गुदा द्वार पर बाँध कर रखना था। हम परिजन पहले तो इस इलाज को तैयार नहीं हुए। आखिर हमारे यहाँ उठावनी में जाने पर भी घर के दरवाजे पर ही कपड़े उतार कर प्रवेश कर स्नान करना होता है। या भयंकर जाड़े में कम से कम गंगा जल के छींटे तो मारने ही मारने होते थे। वहाँ शंशान से दूसरे के अस्थि फूल से तमाम भूत प्रेत भटकती आत्माओं के प्रकोप या यूँ ही आफत लगने की आशंका प्रगट होना स्वाभाविक ही था। पर हमारे एक मित्र ने अस्थी फूल ला हमारे ही यहां पीस छानकर जब दे दिया तो उस मित्र के इस स्नेह को हम लोग इग्नोर नहीं कर पाये। और वो अस्थि और घी का लड्डू भैया ने बाँध ही लिया।

चमत्कार हो गया जी!! पहले ही दिन आधा फायदा दीखा और एक सप्ताह में उस Hemorrhoids का नामो निशान नहीं रहा। इसके बाद तो हम लोगों ने ना जाने कितने लोगों को वो औषधी बिना राज खोले ही बना बना कर दी। और वे ठीक हुए। भैया को जो बीमारी साल में दो बार परेशान करती थी वो आज तक फिर नहीं हुयी। एक बार जब बाबा रामदेव पर मानव और पशु अस्थियों की भस्म का आरोप लगाया जा रहा था। तब मैं चीख चीख कर अपना ये अनुभव बताना चाह रहा था। लेकिन तब मैं फेसबुक व्हाट्सऐप को जानता ही नहीं था।

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एक बात और याद आती है। जब हमारे घरों में शौच के हाथ धोने से लेकर रसोई और पूजा तक के बर्तन राख से मांजे जाते थे। एक बार नकली हिजड़े बनाने का किस्सा धर्मयुग में पढ़ा कि उनका गुप्तांग काट कर घाव पर राख भर दी जाती थी। मुसलमानों में खतने के बाद आज भी राख थोपी जाती है। किसान खेत पर काम करते और उनके फांवड़े या खुरपी से चोट लग जाती तो किसान या मजदूर तुरत फुरत वहीं कहीं अगिहाने की राख लेकर उस कटे पर थोप लेता था। किसान छोटी पौध को बीमारी से या दीमक से बचाने को राख का छिड़काव करते रहे हैं। राख से बड़ा कोई Germicide, Anti pesticide, या Anti septic कुछ होता ही नहीं था।

अब आप सोच रहे होंगे कि मैं ये क्या गांवों के देशी इलाज पुराण लेकर बैठ गया। लेकिन मेरा ये सब बताने का कारण है नरेन्द्र मोदी जी के मंत्री सत्यपाल सिंह का गंगा जी में अस्थि और भस्मी विसर्जन को लेकर आपत्ति दिखाने वाला बयान। आखिर गंगाजी में औषधीय गुण से पूर्ण अस्थियों या राख के विसृजन से कौन सी गन्दगी होगी? जिस अग्नि में ताप कर सब कुछ पवित्र हो जाता है, उस अग्नि के अवशेषों से मंत्री जी को क्यों आपत्ति हो रही है? क्या मंत्री जी कभी श्रद्धापूर्वक गंगा जी के स्नान को गए हैं?

अभी मैं कुछ दिन पहले गंगा जी गया था। काफी कुछ साफ़ हो चुकी गंगा जी में तमाम बच्चे बड़े बीच धार में स्नान कर रहे थे। तभी एक डैड बॉडी के अवशेष भी वहां बहते हुए आ गए। विश्वास कीजिये वहां कोई भी महिला बच्चे उस डैड बॉडी को देख कर डरने की बजाय कौतुहल से उसे देखते रहे फिर स्नान आचमन में लग गए। गंगाजी स्थान ही एसा है कि जहां पर पहुँचते ही नास्तिक से नास्तिक व्यक्ति के मन आध्यात्म का भाव, तो सांसारिक आसक्ति वाले भौतिकवाद में फंसे लोगों के मन में विरक्ति या मोक्ष जैसा भाव स्वतः ही उत्पन्न हो जाता है। एक ओर जलते शव वहीं समीप ही स्नान या आचमन करने में कोई भी भय या हेय भाव पैदा नहीं होता। वरन उल्टे उस समय तो मृत्यु से भय ही खत्म हो जाता है।

हर की पौड़ी

मंत्री जी ने कहा कि शास्त्रों में गंगा में अस्थि विसर्जन कोई वर्णन नहीं है। तो हे मंत्री! जी गंगाजी का अवतरण तो, हुआ ही राजा सागर के 60हजार पुत्रों की अस्थि विसर्जन के लिए था। और तब से हिन्दू धर्म में गंगाजी का महत्व केवल मोक्ष प्राप्ति के लिए ही तो बना हुआ है। यही एसा स्थान है जो मृतक के परिजनों को उनके प्रिय की सद्गति के लिए आश्वस्त करता है।

हमको स्वच्छता चाहिए। अपनी मोक्षदायिनी गंगा माँ के उस अंक की। जिसमें कुछ देर के लिए हम अपने सांसारिक दुख दर्दों को भूल आध्यात्मिक अनुभूति कर सकें। ना कि, किन्हीं धनिक और विदेशीयों के लिए पारदर्शी जल में किसी बोटिंग या उड़ान भरते सी प्लेन, ड्रग्स लेते और हिप्पियों के डवलप होने वाले घाटों वाले किसी पिकनिक स्पॉट के लिए।

जय हो गंगा मैया की!

श्री गिरधारी लाल गोयल, लेखक ‘राष्ट्रीय अग्रवाल महासभा’ के अध्यक्ष व हिन्दू अधिकारों एवं राष्ट्रीय हितों के लिए सजगता से आवाज़ उठाते हैं।

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सनातन धर्म के चार वर्णों में श्रेष्ठ कौन?

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शूद्र

वर्तमान समय मे शूद्र फटे फूटे कपड़े पहनने वाले, गरीब, गंदे या व्यसनी लोग समझे जाते होंगे, तभी शूद्र कहलाने में कई जातियों को समस्या होती है। आगे का मैं अपना मत दूँ, इससे पहले में एक बात स्पष्ट कर दूं, कल को मुझे कोई मेरा सही इतिहास बताकर यह कह दे कि तुम्हारी जाति “शूद्र ” में आती है, तो वह भी मुझे सहर्ष स्वीकार होगा। एक सेकेंड के लिए भी मैं अपने मन में हीन भावना नहीं लाऊंगा, क्योंकि मैं जानता हूँ, शूद्र उतना ही पवित्र है, जितना कि ब्राह्मण !

शूद्र नाम की यह दयनीय दशा इस्लामी आक्रमण के बाद हुई है। वैदिक समाज में तो दिन भर कमाई में विविध व्यवसाय करने वाले शूद्र बड़े धनवान हुआ करते थे। क्योंकि उनकी कमाई के ऊपर ऐसा प्रतिबंध नही था, जैसा अन्य तीन वर्णों पर था। वैदिक समाज के अनुसार सामाजिक सेवा के कार्य जो सबसे ज़्यादा करता, उसे उतनी ही ज़्यादा सहूलियत दी जाती थी। आप अपने घर पर ही देख लीजिए, माता पिता के लिए कमाऊ ज्येष्ठ पुत्र से भी ज़्यादा प्रिय उनकी सेवा करने वाला कनिष्ठ पुत्र होता है। वैदिक समाज में तो शूद्र समाज के लिए दंड प्रावधान भी अन्य वर्णों से कम था। इसका कारण यही था, की शासन को सबसे प्रिय यह शूद्र होते थे। उपर के तीनों वर्णों का तेल तो हर काल मे निकला है।

ब्राह्मण

ब्राह्मण प्रतिदिन अन्य सभी जातियों से 2 या 3 घण्टे पहले प्रातः उठता था। उसके बाद वह नित्यकर्म, स्नान, सूर्यनमस्कार, अन्य योगासन, स्वाध्याय तथा पूजापाठ करता था। यह आदर्श आचरण, वैदिक संस्कृति में ब्राह्मणों से लेकर, शूद्र तक सबको विहित था। लेकिन ब्राह्मण के लिए यह अनिवार्य था। ब्राह्मणों के पास शिक्षा, न्याय, ज्योतिष, वैद्य, समाज व्यवस्था आदि का कार्य था ।

वैश्य

वैश्यों के दिन की शुरुवात भी ब्राह्मणों की तरह ही थी। उसके बाद वे खेती व्यापार आदि के कार्यों में व्यस्त हो जाते थे। रात के 9 बजे तक वैदिक परंपरा के सारे लोग सो जाते थे। किसी भी व्यापार में ६ प्रतिशत से ज़्यादा मुनाफा नही कमा सकते थे। यह फिक्स था। उस सीमित आय से जो धन वैश्यों के पास एकत्रित होता, वही धन वे समाज को दान कर देते थे। आज भी वैश्यों के बनाये विशाल भवन भारत भूमि की सुंदरता में चार चांद लगा रहे हैं। स्वतंत्रता का एक उदाहरण देता हूँ आपको, राजस्थान में चुरू जिले में वैश्यों की शासन के साथ अनबन हो गयी। वैश्यों ने शासन को चुनोती देते हुए, पास में ही ” रामगढ़ सेठान ” नाम से नगर बसा लिया। और उसमें विशाल भवनों का निर्माण करवा उस नगरी को उस समय की सबसे सुंदर नगरी बना दिया। रामगढ़ और चूरू का राजा भी एक, राजा से रूठ के बनिये अलग हुए, वो भी उसी राजा के दूसरे नगर में, उसी राजा से सुंदर नगर बनाने की चुनौती देकर। और उसी राजा की जमीन पर। और राजा ने वो सब आराम से होने दिया। कोई द्वेष नही रखा। क्या आज का लोकतंत्र, और मुस्लिम शासन ऐसा करने देता ? और इसे ही आजादी कहते हैं।

वैश्य समाज के लक्षण

क्षत्रिय

जनता को क्षति से बचाने वाला, अपने नागरिकों की सुरक्षा की चिंता करने वाला क्षत्रिय कहलाता था। उसके आचरण के स्तर उच्चकोटि के होते थे। जैसे पीठ पर शत्रु के वार करना, कायरता का द्योतक समझा जाता था। राजा के राज्याभिषेक होते ही वह किसी शत्रु पर चढ़ाई करता था। शत्रु ना होता, तो शिकार करता। उद्देश्य था, ऐसे संघर्ष में, प्रत्येक व्यक्ति की वीरता, साहस, स्वामीनिष्ठा, बुद्धिमानी आदि के गुण आजमाएं जा सकें। न्याय के लिए युद्ध करना, क्षत्रिय बड़े गर्व की बात समझते थे। मानो जैसे स्वर्ग का द्वार उनके स्वागत के लिए अपने आप ही उनके लिए खुल गया हो। जनता की रक्षा के लिए राष्ट्र सम्पति की रक्षा के लिए अपने प्राणों की बाजी लगा देना, क्षत्रियों का धर्म होता था ।

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शूद्र समाज का सेवक था। गौ माता का सेवक था, राष्ट्र का सेवक था। वैश्य राष्ट्र का पालक था। ब्राह्मण राष्ट्र और धर्म का मस्तिष्क था। और क्षत्रिय राष्ट्र का रक्षक था। अब इनमें से किसे श्रेष्ठ कहें ? अपनी दो आंखों में से ज़्यादा प्रिय आंख कौनसी है ? निर्णय आपका…!!

गुरुदेव राम पुरोहित जी , लेखक धर्म और समाज के लिए जीवन समर्पित करने वाले, व हिन्दू इतिहास और संस्कृति के गहन जानकार हैं।

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