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दतिया के स्वामीजी, जिनके यज्ञ से युद्ध से पीछे हट गया था चीन

पीताम्बरा पीठ

भद्रं इच्छन्तः ऋषयः स्वर्विदः, तपो दीक्षां उपसेदु: अग्रे !
ततो राष्ट्रं बलं ओजश्च जातम्, तदस्मै देवा उपसं नमन्तु !!

अर्थववेद के इस मन्त्र में कहा गया है, दतिया

” आत्मज्ञानी ऋषियों ने जगत का कल्याण करने की इच्छा से सृष्टि के प्रारंभ में जो दीक्षा लेकर तप किया, उससे राष्ट्र निर्माण हुआ, राष्ट्रीय बल और ओज भी प्रकट हुआ. इसलिये सब इस राष्ट्र के सामने नम्र होकर इसकी सेवा करें “

इस आदेश का अनुपालन करते हुये भारत में कई ऐसे ऋषि हुये जिन्होनें अपने मोक्ष और व्यक्तिगत हानि-लाभ की चिंता छोड़कर अपना जीवन भारत के लिये अर्पण कर दिया. ऐसे ऋषियों की संख्या अनगिनत है जिन्होंनें इस राष्ट्र और इस धर्म के लिये अपनी अस्थियां गलाई और अपनी साधनाओं और तप की शक्ति का उपयोग इस राष्ट्र और धर्म की रक्षा के लिये किया. महर्षि दयानंद, स्वामी रामतीर्थ, संन्यासी विद्रोह के अनगिनत क्रांतिकारी, रामसिंह कूका, माधव सदशिव गोलवलकर समेत कई ऋषि थे जिन्होनें हिमालय की राह नहीं ली बल्कि इस समाज के अंदर रहे और राष्ट्र यज्ञ में अपने जीवन को होम कर दिया.

इन्हीं राष्ट्रऋषियों में एक युवक भी था जिसने 1929 में संन्यास ले लिया था और मध्यप्रदेश में झाँसी के पास स्थित दतिया नाम की एक छोटी सी जगह पर अपना आश्रय बनाया था. बाद में ईश्वरीय आदेश से उस संन्यासी ने उस स्थान पर ‘बगलामुखी देवी’ और धूमावती माई की प्रतिमा स्थापित करवाई थी. उसी स्थान पर “वनखंडेश्वर शिवलिंग” भी है जो महाभारत काल का माना जाता है और मान्यता है कि आज भी इस वनखंडेश्वर महादेव दतिया की आराधना करने यहाँ अश्वत्थामा आतें हैं.

दतिया

श्री स्वामीजी महाराज, पीतांबरापीठ दतिया

पीताम्बरा पीठ में रचाया राष्ट्रहित में यज्ञ

दतिया के “पीताम्बरा पीठ” के नाम से मशहूर आज इस स्थान की इतनी सिद्धि है कि यहाँ दुनिया भर से लोग और राजनेता आतें हैं. पीताम्बरा पीठ के प्रांगण में ही माँ भगवती धूमावती देवी का देश का एक मात्र मन्दिर है. इन दोनों देवियों की आराधना करने से साधक को विजय प्राप्त होती है और शुत्र पूरी तरह पराजित हो जाते हैं.

माँ बगलामुखी

माँ बगलामुखी

इस स्थान की सिद्धि काफी समय तक व्यक्तिगत जय-पराजय, मुकदमा और चुनावों में जय-पराजय तक ही सीमित थी पर इस स्थान की सिद्धि तब चर्चा में आई जब 1946 में यहाँ पर उस संन्यासी (जिन्हें दुनिया “पूज्य स्वामी जी महाराज” के नाम से जानती है) ने “लोक-कल्याण और राष्ट्ररक्षा” के लिये एक यज्ञ कराया था और उस यज्ञ के अगले ही वर्ष अंग्रेज भारत छोड़कर चले गये. फिर जब 1962 में चीन ने भारत पर आक्रमण किया तब “पूज्य स्वामी जी महाराज” चिंतित हो गये कि नव-स्वतंत्रता प्राप्त राष्ट्र अपने सीमित सैनिक संसाधन से इस असुर देश का मुकाबला कैसे करेगा और इसी चिंता में व्यापक राष्ट्रहित को ध्यान में रखकर पूज्य स्वामी जी ने दतिया के उस पवित्र स्थान पर एक वृहद यज्ञ-अनुष्ठान करने का संकल्प लिया और देशभर से 85 विद्वान पंडितों को जमा किया और उनको लेकर दुर्गा सप्तशती का संपुट पाठ करते हुये माँ पीताम्बरा और माँ घूमावती का आवाहन किया. पूरे यज्ञ-स्थल में किसी बाहर के व्यक्ति के प्रवेश की मनाही थी और स्वामी जी ने इस यज्ञ हेतू किसी से चंदा भी नहीं लिया था. पूज्य स्वामी जी ने इस संकट से निस्तारण का रास्ता निकाला और इस अनुष्ठान का संकल्प किया.

दतिया

आश्रम मे सामूहिक यज्ञोपवीत के दौरान उपनीत बटुकों के साथ श्री महाराज जी का चित्र

पंडितों द्वारा दतिया धाम में यज्ञ प्रारंभ किया गया. नौंवे दिन जब यज्ञ का समापन होने वाला था तथा पूर्णाहुति डाली जा रही थी, उसी समय ‘संयुक्त राष्ट्र संघ’ का नेहरू जी को संदेश मिला कि चीन ने आक्रमण रोक दिया है और चीन की सेना पीछे हट गई है.

एक जीत रहे युद्ध से चीन पीछे क्यों हटा ये आज भी रहस्य है. उसके पीछे हटने के बाद उसके अपने मित्र देशों से भी संबंध खराब होने लगे और आज दुनिया का कोई भी देश ऐसा नहीं है जो चीन का वास्तविक मित्र या हितैषी हो. बगलामुखी और धूमावती माता अपने शत्रुओं पर वज्र बनकर प्रहार करतीं हैं और उसे सभ्य समाज में रहने देने लायक नहीं छोड़ती ये इस बात का सबूत है.

यज्ञ की ये खबर और पूर्णाहुति के दिन चीन की सेना का रहस्यमयी ढंग से लौट जाने की बात को मुंबई के एक प्रसिद्ध साप्ताहिक पत्र “Illustrated Weekly of India” ने भी छापा और उस घटना के बाद इस मंदिर और स्वामी जी की कृति पूरे विश्व में फ़ैल गई. मन्दिर प्रांगण में वह यज्ञशाला आज भी बनी हुई है जहाँ आयोजित यज्ञ ने चीनी सेना को पीछे लौटने पर मजबूर कर दिया था.

भारत का उत्थान अतीत से ही आध्यात्मिकता के रास्ते पर चल कर हुआ है और इस उत्थान का अगुवा हमेशा “राष्ट्रऋषि” बने हैं जिसके प्रमाण में एक उदाहरण दतिया वाले “पूज्य स्वामी जी महाराज” का भी है.

 – श्री अभिजीत सिंह, लेखक भारतीय संस्कृति, हिन्दू, इस्लाम, ईसाईयत के गहन जानकार और राष्ट्रवादी लेखक हैं. 

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