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क्या 12 स्थानों पर होता था कुम्भ?

कुछ विद्वानों का मत है कि कुम्भ के 4 नहीं अपितु 12 स्थल हैं और ये विद्वान् इन शेष 8 स्थलों पर कुम्भ-मेले प्रारम्भ करवाने के लिए प्रयासरत हैं। इस आन्दोलन में अखिल भारतीय सर्वमंगला अध्यात्म योग विद्यापीठ, सिमरियाघाट (बेगूसराय, बिहार) के संस्थापक स्वामी चिदात्मन जी महाराज सर्वाधिक मुखर हैं।

स्वामी चिदात्मन जी महाराज ने तर्क दिया है कि रुद्रयामलतन्त्र नामक सुप्रसिद्ध प्राचीन ग्रन्थ के तीर्थयात्रासारोद्धार अथवा अमृतीकरणप्रयोग के नाम से एक पांडुलिपि मिथिला में प्राप्त हुई है, जिसमें तुर्कों के आक्रमण की कथा के सन्दर्भ में द्वादश कुम्भ-स्थलों का उल्लेख है। स्पष्ट है कि यह अंश 12वीं शताब्दी से 15वीं शताब्दी के मध्य लिखा गया है और रुद्रयामलतन्त्र के अंश के नाम से प्रचलित किया गया है। प्रचलित रुद्रयामलतन्त्र में ऐसा कोई अंश नहीं मिलता है। द्वादश कुम्भ-स्थलों के पैरोकार इस अमृतीकरणप्रयोग अध्याय का उल्लेख करते हैं। रुद्रयामलोक्तामृतीकरणप्रयोग : द्वादशकुम्भविवेचन के नाम से 2011 में प्रकाशित इस ग्रन्थ का अनुवाद, सम्पादन और प्रकाशन कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय के आचार्यद्वय प्रो. विद्येश्वर झा एवं डॉ. श्रवण कुमार चौधरी ने किया है। इस ग्रन्थ के तथाकथित कुम्भ-सम्बन्धी श्लोक नीचे उद्धृत किए जा रहे हैं :

किंचिद्दूरन्ततो गत्वा गहनं शाल्मलीवनम्।
वीक्ष्य तस्थुर्बलिमुख्याः गंगा यत्रोत्तरां गता॥58॥
मायया देवदेवस्य विष्णोरतुलतेजसः।
दैत्याः विमोहिताः सर्वे कुम्भं संस्थाप्य ननृतुः॥59॥
जगुर्गीतं जयमिश्रमुच्चैः शाल्मलीवने।
तत्रैवामृतपानाय बभूवर्हतबुद्धयः॥60॥

वहाँ कुछ दूर जाने के बाद गहन सेमरवन (शालमलीवन) को देखकर बलि जिनके प्रधान थे, वे असुर वहीं ठहर गये, जहाँ गंगा उत्तरवाहिनी थीं। देवाधिदेव भगवान् विष्णु की माया से वे सभी दैत्यगण विमोहित होकर वहीं अमृत-कुम्भ को रखकर नृत्य करने लगे। वहीं सेमरवन (शाल्मलीवन) में वे दैत्यगण गीत गान करने लगे, बीच-बीच में जोर से जयकार शब्द करने लगे। अमृतपान के लिए वे सभी हतबुद्धि हो गये।

एतस्मिन्नन्तरे काले विष्णुर्नारायणः स्वयम्।
मोहिनीरूपमासाद्य ययौ दैत्यान् विमोहितान्॥61॥
सर्वलक्षणसम्पन्नां भासयन्तीं दिशं त्विषा।
विचरन्तीं वने दृष्ट्वा स्तनभारभराकुलाम्॥62॥
तामेकां सुन्दरीं तत्र गहने शाल्मलीवने।
विस्मयेन समाविष्टा बभूवस्तृषितेक्षणाः॥63॥

इस समय में स्वयं व्यापक श्रीमन्नारायण मोहिनी का रूप धारण कर विमोहित दैत्यों के पास गये। सभी महिलोचित गुणों से परिपूर्ण अपने प्रकाश से दिशाओं को प्रकाशित करती हुई, स्तनद्वय के भार से व्यग्र सेमरवन में चिरण करती हुई मोहिनी को दैत्यों ने देखा। उस गहन शाल्मली (सेमर) वन में एकमात्र उस सुन्दरी को देखकर आश्चर्यचकित रूपलावण्य के पिपासु बन गये।

मोहिनी अवतार

तां सम्मान्य तदा दैत्यराजो बलिरुवाच ह।
सुधा त्वया विभक्तव्या सर्वेषां सममेव च॥64॥
शीघ्रं त्वं महाभागे कुरुष्व वचनं मम।
विष्णोर्माया भगवती तदोवाच बलिं प्रति॥65॥
दिव्यममृतपानन्तु कर्तव्यं नाद्य भूपते।
वर्णाश्रमाणां धर्माणां पालयद्भिर्महाजनैः॥66॥

तब दैत्यराज बलि ने उस मोहिनी को सम्मानित कर कहा कि हम सबों में अमृत का बँटवारा समान रूप से तुम्हीं करो। हे महाभागे! तुम शीघ्र मेरे वचनों का पालन करो। व्यापक भगवान् की माया-मोहिनी ऐसा सुनने के बाद बलि को कहा। हे भूपते! वर्णाश्रमधर्म का पालन करनेवाले आप श्रेष्ठ पुरुषों को आज के दिन दिव्य अमृत का पान नहीं करना चाहिये।

अद्योपवासः कर्तव्यः सुधापानसमुत्सुकैः।
रात्रौ जागरणं कृत्वा स्नातव्यं स्वर्णदीजले॥67॥
ततः पारणरूपेण पानं कार्यं महाशयैः।
एवं विष्णोर्वचः श्रुत्वा बलिदै्र्रत्यपतिः सुधीः॥68॥
आज्ञापयामास मयं कर्तुं प्रासादसंहतिम्।
क्षणान्मयासुरस्तत्र गंगायाश्चोत्तरे तटे॥69॥
चकार नगरं रम्यं शाल्मलीवनसंस्थितम्॥70॥

सुधा-पान के समुत्सकों को आज उपवास करना चाहिये और रात्रि में जागरण करके गंगा नदी में स्नान करना चाहिये। उसके बाद पारण के रूप में आप महाशयों को अमृतपान करना चाहिये। इस प्रकार मोहिनीरूप विष्णु का वचन सुनकर दैत्यों के पालक बुद्धिमान बलि ने मय दानव को अट्टालिकाओं का समूह (नगर) बनाने की आज्ञा दी, और वहीं गंगा के उत्तर तट पर कुछ ही क्षणों में मय दानव ने शाल्मली वन (सेमर वन) में स्थित रमणीय नगर का निर्माण किया।

नद्यास्तीरं समाश्रित्य स्नानं कुर्याद् विचक्षणः।
अस्मिन्नमृतयोगे तु स्नात्वा तीर्थे फलं महत्॥120॥

उसके बाद सूर्य और चन्द्रमा तुला-राशि का आश्रय लेकर गुरु को कहा। और गुरु ने इस सप्तम राशिस्थ राहु के सभी संचार को जानकर विष्णु को इसकी जानकारी के लिए कहा कि— सूर्य के साथ चन्द्रमा का योग जब शुभ कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी-तिथि में होता है, तब अमृत योग कहलाता है। हे प्रिये! उस समय नदी के तीर का आश्रय लेकर बुद्धिमान को स्नान करना चाहिये। इस अमृतयोग में तीर्थ में स्नानकर महान् फल को प्राप्त करता है।

गुरोरपि यदा योगस्तस्य पुण्यं न वर्ण्यते।
मासं यावद् भवेत्तीर्थं तदामृतमयं शुभे॥121॥
देवाश्चागत्य मज्जन्ति तत्र मासं वसन्ति च।
तस्मिन् स्नानेन दानेन पुण्यमक्षय्यमाप्नुयात्॥122॥
सिंहे युतौ च रेवायां मिथुने पुरुषोत्तमे।
मीने ब्रह्मपुत्रे च तव क्षेत्रे वरानने॥123॥

इसमें यदि गुरु का भी योग हो, तब तो उस पुण्य का वर्णन नहीं किया जा सकता। हे सुन्दरी! ऐसे योग में मासपर्यन्त वह तीर्थ अमृतमय हो जाता है। ऐसे योग में देवगण मासपयन्त उस तीर्थ में स्नान करते हैं और वहाँ निवास करते हैं। उस योग में स्नान-दान से मनुष्य अक्षय पुण्य को प्राप्त करता है। सिंह-राशि में ऐसा योग होने पर रेवा में, मिथुन-राशि में पुरुषोत्तम क्षेत्र जगन्नाथपुरी में, मीन-राशि में ब्रह्मपुत्र में (गुवाहाटी में) हे वरानने! जो तुम्हारा क्षेत्र (कामाख्या) है उसमें।

धनूराशि स्थिते भानौ गंगासागर संगमे।
कुम्भराशौ तु काबेर्यां तुलार्के शाल्मलीवने॥124॥
वृश्चिके ब्रह्मसरसि कर्कटे कृष्णशासने।
कन्यायां दक्षिणे सिंधौ यत्राहं रामपूजितः॥
अथाप्यन्योऽपि योगोऽस्ति यत्रस्नानं सुधोपमम्125॥
मेषराशिस्थिते भानौ कुम्भे च गुरौ स्थितौ।
गंगाद्वारे भवेद्योगो भुक्तिमुक्तिप्रदः शिवे॥126॥

जब सूर्य धनुराशिस्थ होते हैं, तब गंगा और सागर के संगम में, कुम्भ-राशि में सूर्य के रहने पर कावेरी में, तुलार्क में शाल्मलीवन (सेमरिया), वृश्चिक-राशि में ब्रह्मसरोवर (कुरुक्षेत्र) में, कर्क-राशि में कृष्णशासन (द्वारकापुरी) में, कन्या-राशि में दक्षिणसिंधु (रामेश्वरम्) में, जहाँ मैं राम के द्वारा पूजित हूँ और अन्य भी योग हैं जिसमें स्नान अमृतोपम होता है। मेष राशिगत सूर्य रहने पर और कुम्भराशिगत गुरु होने पर हे शिवे! गंगाद्वार में यह योग होता है जो भोग और मोक्ष प्रदान करता है।

मेषेगुरौ तथा देवि मकरस्ये दिवाकरे।
त्रिवेण्यां जायते योगः सद्योऽमृतफलं लभेत्॥127॥
शिप्रायां मेषगे सूर्ये सिंहस्थे च बृहस्पतौ।
मासं यावन्नरः स्थित्वामृतत्त्वंयान्ति दुर्लभम्॥128॥
पार्वत्युव्वाच
कथमेताः महापुण्याः नद्यो योगेषु भाषिताः।
तत्सर्वं श्रोतुमिच्छामि त्वत्तो देव नमोऽस्तु ते॥129॥

हे देवि! मेष-राशि में बृहस्पति और मकर-राशि में सूर्य के रहने पर यह योग त्रिवेणी-संगम पर होता है, जो सद्यः अमृतफल देनेवाला होता है। मेषगत सूर्य के होने पर और सिंहगत बृहस्पति के होने पर शिप्रा में यह योग मासपर्यन्त रहता है और वहाँ मासपर्यन्त रहकर लोग दुर्लभ अमृतत्त्व को प्राप्त करता है। पार्वती बोली- हे देव! आपको नमस्कार हो। कैसे ये नदियाँ इन योगों में महापुण्या कही गई हैं, वह सब मैं आपसे सुनना चाहती हूँ।

ईश्वर उवाच
सुधावितरणे देवि घटारूढे गुरावपि।
विष्णुर्दृष्टवान् क्षिप्रं राहु च देवमध्यगम्॥130॥
चमसं सुधया पूर्णं धारयन् दक्षिणे करे।
राहोश्चाग्रस्थिते पात्रेऽमृतं वीक्ष्य च शाश्वतम्॥131॥
विष्णुरादेशयाँचक्रे चक्रं नाम सुदर्शनम्।
छिन्धिच्छिन्धीति शब्दोऽभूत् पद्मापतिमुखाग्रतः॥132॥

ईश्वर ने कहा- हे देवि! अमृत के बँटवारे के समय में गुरु को भी घट (कुम्भ) पर आरूढ़ होने के कारण शीघ्र ही विष्णु ने देवों के मध्य में राहु को देखा। उस समय विष्णु ने सुधा से पूर्ण चमस को (परिवेषण-पात्र) दाहिने हाथ में धारण करते हुए राहु को आगे में स्थित और शाश्वत अमृत को देखकर सुदर्शन नाम से प्रसिद्ध चक्र को आदेशित किया। उसी समय पद्मापति नारायण को सामने ‘मारो’, ‘काटो’— यह शब्द होने लगा।

समुद्र मंथन
समुद्र मंथन

चक्रश्च तं द्विधा चक्रे यावत्पिबति सोऽमृतम्।
तथाप्यमृतलेशस्तु कण्ठे जातः क्षणेन हि॥133॥
राहोः कबन्धः सहसा दधावोत्थाय मोहिनीम्।
विष्णुश्चाप्यसुरोत्पातान् वीक्ष्य दैत्यकृतान् तदा॥134॥
चमसं दक्षिणे हस्ते वामे कुम्भं गुणोज्जवलम्।
द्वित्राणां देवमुख्यानामंश आसीत्तदा घटे॥135॥
आरुरोह वैनतेये ततो दिव्युत्पपात ह।
कलशन्तु विचिक्षेप तत्रैव जाह्नवीजले॥136॥

विष्णु के चक्र ने उसी समय जब राहु अमृत पी रहा था, राहु को दो टुकड़े में विभक्त कर दिया। फिर भी अमृत के कुछ अंष कुछ क्षण में उसके कण्ठ में चले गये। उस समय राहु का कबन्ध (शिरकटा शरीर) सहसा उठकर मोहिनी को दबोचा, विष्णु ने भी दैत्यों के द्वारा मचाए गए उत्पात को देखकर जिस घट में केवल दो-तीन प्रमुख देवों को देने योग्य कुछ अंश बचे थे, उस कुम्भ को जो गुणों से उज्ज्वल लग रहे थे, बायें हाथ में धारण कर और चमस (परिवेषन-पात्र) को दाएँ हाथ में धारण करके विनतानन्दन गरुड पर चढ़कर ऊपर की ओर छलांग लगा दिया और अमृत-कलश को (कुम्भ को) वहीं जाह्नवी जल में प्रक्षिप्त कर दिया।

ऋषीणां पितृणाञ्चैव मुनीनाञ्चैव देहिनाम्‌।
सुधापानार्थमुद्दिश्य कुम्भन्तत्रोत्ससर्ज ह॥137॥
तस्मात्‌ शाल्मलीतीर्थे जलम जलमस्ति सुधामयम्।
चमसे यदमृतं देवि तद्देशेषु पपात ह॥138॥
तस्मादेतेषु तीर्थेषु जलं नद्याः सुधोपमस्॥139॥
पार्व्वत्युवाच
ततः किमकरोद्राहुः किञ्चित्पीतसुधालवः।
दैत्याश्चामृतपानाद्धि वञ्चिताः परमेश्वर॥140॥

ऋषियों, पितरों, मुनियों और देहधारियों को सुधापान के उद्देश्य से उस कुम्भ को विष्णु ने वहीं छोड़ दिया। इसलिए शाल्मली वन में (सेमरिया में) जाह्नवीजल सुधामय हैं, और हे देवि! चमस में (करछुल में) जो अमृत था, उसको दूसरे-दूसरे स्थानों में गिराया। इसलिए तत्तत् तीर्थों में नदी का जल अमृत के समान है। पार्वती बोली— उसके बाद राहु ने थोड़ा-सा अमृत का कण पी लिया था; पर क्या? और हे परमेश्वर! अमृत-पान से वंचित दैत्यों ने उसके बाद क्या किया?

ईश्वर उवाच
राहो: कबन्ध उत्प्लुत्य शान्तोऽभूद्देवसन्निधौ।
कण्ठादूध्र्वं तु लोकेस्मिन्नमर: कण्ठगतामृतात्‌॥141॥

ईश्वर ने कहा— राहु का जो कबन्ध था, वह देवताओं के सान्निध्य में शान्त हो गया और कण्ठ से ऊपर का भाग कण्ठगत अमृत होने के कारण इस लोक में अमर हो गया।

पटना के प्रसिद्ध संस्कृत-विद्वान् पं. भवनाथ झा ने अनेक प्रमाण देकर इस ग्रन्थ को 14वीं शताब्दी से 16वीं शताब्दी के मध्य रखने का सुझाव दिया है।

अमृत कलश

विष्णुयाग में उद्धृत है कि देवताओं के लिए बारह दिनों पर तथा मनुष्यों के बारह वर्षों पर बारह की संख्या में कुम्भ-पर्व होते हैं। उनमें मनुष्यों के पापों को धोने के लिए चार भारतभूमि पर हैं और आठ दूसरे लोक में हैं, जहाँ केवल देवताओं की ही पहुँच है, दूसरों की नहीं—

देवानां द्वादशाहोभिर्मत्यैद्र्वादशवत्सरैः।
जायन्ते कुम्भपर्वाणि तथा द्वादशसंख्यया॥
तत्राघनुत्तये नृणां तुर्यः स्युभुवि भारते।
अष्टौ लोकान्तरे प्रोक्ता देवैर्गम्या न चेतरैः॥

आगे कहा गया है— भारत में चार जगहों पर अमृत गिरने के कारण पृथिवी पर कुम्भ-योग के चार भेद कहे गए हैं। हरिद्वार, प्रयाग, धारानगरी एवं गोदावरी-तट पर शंकराचार्य आदि के द्वारा कलश (कुम्भ) नामक योग कहा गया है—

पृथिव्यां कुम्भयोगस्य चतुर्धा भेद उच्यते।
चतुःस्थले निपतनात् सुधाकुम्भस्य भारते॥
गंगाद्वारे प्रयागे च धारागोदावरीतटे।
कलशाख्यो हि योगोऽयं प्रोच्यते शंकरादिभिः॥

इसके अतिरिक्त किसी भी पंचांग और ज्योतिषशास्त्रीय ग्रन्थ में उपर्युक्त चार स्थानों के अतिरिक्त किसी अन्य स्थान पर कुम्भ लगने की बात नहीं कही गई है इस प्रकार हम देखते हैं कि भारत में चार जगहों के अतिरिक्त अन्यत्र ‘कुम्भ’ नाम से किसी भी पर्व का कोई ठोस शास्त्रीय आधार नहीं है।

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