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फेमिनिज्म- घृणा पर आधारित विघटनकारी मानसिकता

    Feminism in India

    लगभग महीना भर पहले की बात है| मैं अपने कार्यस्थल से अपने घर आ रहा था कि देखा सड़क किनारे लोग भीड़ लगाए खड़े हैं और कुछ लोग उस तरफ दौड़ रहे हैं| ये समझ आ गया कि अभी अभी ही कुछ हुआ है और बाइक को और तेजी से दौड़ा कर भीड़ के पास पहुंचा| वहां देखा कि एक लड़की अपनी स्कूटी सहित सड़क किनारे के गड्ढे में भरे बरसाती पानी से बने दलदल में गिर गयी है और उसमें से निकलने की कोशिशों के लिए हाथ पैर मारते उसमें और फँसती जा रही है|

    मेन रोड के चलते भीड़ अच्छी खासी जमा थी जिसमें महिलाओं और युवतियों की संख्या भी ठीकठाक थी, पर बकबक और एक दूसरे से क्या हुआ, कैसे हुआ पूछने के सिवा कोई कुछ करता नहीं दिख रहा था| मैंने तुरंत अपने हेलमेट, बैग और LS बेल्ट को बाइक पर रखा, जूते-मोज़े उतारे और सड़क से नीचे गढ्ढे में उतर गया| चिकनी मिटटी की वजह से पैर टिकाना भी मुश्किल पड़ रहा था, पर कुछ तो करना ही था क्योंकि लड़की पूरी तरह बदहवास और लस्त-पस्त दिख रही थी| इतने में एक और बन्दा नीचे उतर आया और उसने पीछे से मेरा हाथ पकड़ा और फिर देखते ही देखते पूरी श्रृंखला बन गयी और मुझे स्वयं को संभालने की जद्दोजहद से मुक्ति मिल गयी| मैंने धीरे धीरे आगे बढ़कर उस लड़की को खींचने की कोशिश की पर संभव नहीं हुआ, तब उसे पकड़कर किसी तरह से नीचे से उठाया और उसके बाद बाहर खींच लिया| फिर उसकी स्कूटी, बैग, हेलमेट और चप्पलों को भी एक एक कर कीचड से निकाला क्योंकि सब उसमें धंस गए थे|

    उस लड़की को पकड़कर बाहर निकालते समय, अगर सच कहूं, तो मैं एक पल भी ये नहीं सोच पाया कि मैं उसे कहाँ से पकड़ रहा हूँ या मेरा हाथ उसके शरीर के किस अंग पर है क्योंकि उस समय दिमाग केवल एक ही बात बता रहा था कि किसी तरह इसे जल्द बाहर निकालो वरना दिक्कत हो जाएगी| मेरे पुरुष या उसके स्त्री होने को लेकर कोई विचार मन में फटका तक नहीं| पर आज सोचता हूँ कि नहीं ये सब भी ध्यान कर लेना चाहिए था क्योंकि वो तो गनीमत है कि वीडियो बनाने वालों में से किसी के सर पर नारीवाद का भूत सवार नहीं था या यूँ कहूं कि कोई प्रेस्टीट्यूट वीडियो नहीं बना रहा था वरना अब तक तो मोलेस्टेशन के मामले में जेल की हवा खा रहा होता|

    आप कहेंगे कि कहीं ऐसा भी होता है| मैं कहूंगा कि और कहीं नहीं, इसी हिन्दुस्तान में गलीज नारीवादियों के चलते ऐसा होता है| वरना क्या मज़ाल थी कि ‘दि हिन्दू’ की वो  पत्रकार वेदिका चौबे मात्र 8 सेकेण्ड की एक क्लिप के आधार पर एलफिन्सटन ब्रिज हादसे में मर रहे लोगों की मदद करते एक लड़के को मोलेस्टर ठहरा देती और उसे सदा के लिए शर्मसार कर देती| इस घटना विशेष का जो नया वीडियो सामने आया है, उसमें साफ़ साफ़ दिख रहा है कि वो और उसके जैसे कई लड़के पुल पर किसी तरह लटक कर उसमें दब कर अंतिम साँसे ले रहे लोगों की मदद करने की भरसक कोशिश कर रहे हैं| इस वीडियो में साफ़ दिख रहा है कि मोलेस्टर ठहरा दिया गया वो लड़का दम तोड़ती उस लड़की को पकड़ कर उसे खींच कर बाहर निकालने की कोशिश कर रहा है, पर असफल हो रहा है| एक क्षण के लिए भी कहीं से वो लड़का उस मरणासन्न लड़की से छेड़छाड़ करता या कोई हरकत करना नज़र नहीं आ रहा है|

    पर वाह रे नारीवाद, अपने अंध पुरुष विरोध में एक मददगार को ही तुमने मोलेस्टर ठहरा दिया| थू है ऐसे नारीवाद पर और थू है इसके समर्थकों पर| ये लोग कोढ़ हैं किसी भी समाज के लिए| ये किसी भी तरह से किसी स्त्री की कोई सहायता नहीं कर रहे, बल्कि एक ऐसी स्थिति ला रहे हैं जहाँ हम सड़क पर तड़प तड़प कर मरती किसी स्त्री की सहायता इसलिए नहीं करेंगे क्योंकि इनके जैसी कोई कमीनी कोई क्लिप दिखाकर हमें गुंडा, यौनपिपासु, मोलेस्टर, और ना जाने क्या क्या साबित करेगी| आज भले ही कइयों को ये बातें बुरी, कड़वी और भद्दी लगें, पर भगवान् ना करे कल जब ये स्थिति इनके या इनके परिवार की किसी महिला के साथ आएगी और हम दूर खड़े होकर मात्र तमाशा देखेंगे, तब इनको आज के दिन पर अफ़सोस होगा, पर तब तक बहुत देर हो चुकी

     विशाल अग्रवाल (लेखक भारतीय इतिहास और संस्कृति के गहन जानकार, शिक्षाविद, और राष्ट्रीय हितों के लिए आवाज़ उठाते हैं। भारतीय महापुरुषों पर लेखक की राष्ट्र आराधक श्रृंखला पठनीय है।)

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    Tags : Feminism
      Vishal Agrawal

      The author Vishal Agrawal

      श्री विशाल अग्रवाल भारतीय इतिहास के गहन जानकार, शिक्षाविद और हाशिये के लोगों को मुख्यधारा से जोड़ने में प्रयासरत सामाजिक कार्यकर्त्ता हैं

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