Gender Issues

भारत में लोग सिर्फ बेटा ही क्यों चाहते हैं ?

फेमिनिस्ट्स का बड़ा रोना होता है कि भारत में लोग सिर्फ बेटा ही चाहते हैं। हाँ तो चाहेंगे ही आप बचपन से बेटों को बंधुआ मज़दूर जो बनाते हो। बेटा जाओ दूध ले आओ, आंटी को घर छोड़ आओ, बहन का फॉर्म ले आओ, बैंक में आकउंट खुलवा कर दो. और बेटी अरे वो तो परी है ज़िन्दगी भर बेचारी को काम करना है अभी आराम दो इसको। इसका बोझ भी वही बेटा उठाएगा, बेटा नौकरी ढूंढ लो बहन की शादी करनी है। राखी आ गयी बहन के घर शगुन लेकर जाना है , कुछ सोने का देना शादी के बाद की पहली राखी है। एक बेटे के चक्कर में पांच बेटियां पैदा कर ली। अब बेटा सारी ज़िन्दगी इनके चक्कर में मज़दूर बना रहेगा। फिर यह भी सुनेगा अरे तुम तो लड़के हो तुम्हरी तो ऐश है। इस बेटे को खूब खिला पिला कर तंदुरुस्त रखा जाता काम जो आएगा आगे। असल में वो बेटा नहीं भविष्य का निवेश होता है, कोल्हू का बैल टाइप।

यहाँ तक कि यदि आपका पुत्र आपका बुढ़ापे में ध्यान न रखे तो आप उसको धारा 125 लगाकर कोर्ट में घसीट सकते हो। मगर बेटी से गुज़ारा भत्ता नहीं मांग सकते, वो तो परी है ना। देखा है कभी किसी फेमिनिस्ट को यह मांग करते हुए कि 125 में रेस्पोंडेंट बेटी को भी बनाया जाए। बस पितृसत्त्तात्मक सोच है बेटा चाहिए होता बोलकर उनका काम ख़तम हो जाता है। मरती भी पितृसत्ता है, कभी धर्म रक्षा के नाम कभी देश के नाम पर। कोई क्यों नहीं चाहेगा कि उसके घर बेटा हो ?

सौ पुत्रों के वरदान का अर्थ अब लगाइये आपको एहसास होगा कि वो सौ पुत्र कभी अपना जीवन नहीं जी पाते. सोच कर देखिये कौन ज़्यादा प्रताड़ित है !

और एक बात ज्यादातर महिलाएं बेटा चाहती हैं, यह मैं नहीं कह रही National Family Health Survey कहता है.

 – ज्योति तिवारी, पुरुष अधिकार कार्यकर्ता, लेखिका व सामाजिक सरोकार से जुड़े कार्य करती हैं. उनकी किताब ‘अनुराग‘ बेस्ट सेलर पुस्तक रही है.

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