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गोकुल जाट- भारतीय इतिहास के एक भूले हुए नायक

विश्व की सभ्यताओं तथा संस्कृतियों के सृजन तथा विकास में भारत का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। प्राचीनतम देशों में होने के कारण यह देश विश्व की अनेक घुमक्कड़ जातियों, कबीलों तथा काफिलों की शरणस्थली रहा है। यूनानी, ईरानी, शक, हूण, पठान तथा मुगल समय-समय पर भारत में घुसपैठ करते रहे हैं, परन्तु वे सभी शीघ्र ही या तो यहां के जनजीवन में समरस हो गये या पराजित होकर भाग गये। 16वीं शताब्दी के प्रारम्भ में मुगल बाबर भी भारत में एक विदेशी, आक्रमणकारी तथा लुटेरे के रूप में आया था। उसने मजहबी उन्माद तथा जिहाद की भावना से इस देश के कुछ भाग में लूटमार की, परन्तु वह यहां के जनजीवन को अस्त-व्यस्त न कर सका।

यदि केवल बाबर से लेकर औरंगजेब (1526-1707 ई.) के काल की कुछ प्रमुख घटनाओं का विश्लेषण करें तो सहज ही जानकारी हो जाएगी कि उस समय यहां के प्रमुख हिन्दू समाज ने उसका तीव्र प्रतिकार तथा संघर्ष किया था। यह संघर्ष राजनीतिक तथा सांस्कृतिक, दोनों ही धरातलों पर था और इसी कारण मुगल आक्रमणकारी न तो इस देश को दारुल हरब से दारुल इस्लाम ही बना सके और न ही यहां के सांस्कृतिक जीवन को नष्ट-भ्रष्ट कर सके। हिन्दुओं का महानतम संघर्ष तथा प्रतिकार मतान्ध तथा क्रूर अत्याचारी औरंगजेब के काल में हुआ। यह प्रतिकार उत्तर तथा दक्षिण भारत दोनों ही जगह हुआ। विदेशी आक्रांताओं के विरुद्ध किये गए हिन्दू अस्मिता के इस संघर्ष और प्रतिकार के नायकों में से एक हैं वीरवर गोकुल सिंह (लोग उन्हें गोकला जाट नाम से जानते हैं), जिन्होंने अपनी संगठन क्षमता, साहस और अदम्य पराक्रम के बल पर औरंगजेब जैसे क्रूर शासक की चूलें हिलाकर रख दीं और जिनका 1 जनवरी को बलिदान दिवस था।

Gokul Jaat

ऐसा माना जाता है कि उनका जन्म सिनसिनी में हुआ था और वह जाट साम्राज्य को नयी ऊँचाइयाँ देने वाले देने वाले इतिहास प्रसिद्द महाराजा सूरजमल के पूर्वज थे। उनके पिता का नाम मादू था, जिनके चार पुत्र थे-सिंधुराज, ओला, झमन और समन। मादू का यही द्वितीय पुत्र ओला बाद में हिन्दू प्रतिकार के प्रतीक गोकुल सिंह उर्फ़ गोकुला जाट के नाम से जाना गया। सन 1650-51 के आसपास मादू और उनके चाचा सिंघा ने मुगल शासन से सहायता प्राप्त राजपूत राजा जयसिंह के विरुद्ध भीषण संघर्ष किया जिसमें मादू के बड़े बेटे सिंधुराज की मृत्यु हो गयी और सिंघा अन्य जाट इसके बाद परिवारों के साथ यमुना के पार गिरसा नामक किले की तरफ चला गया। मादू की विरासत को सँभालने का उत्तरदायित्व गोकुला पर आ पड़ा था और वो भी सिंघा के साथ इसी किले में आ गए। सन 1660-70 के दशक में वो तिलपत नामक इलाके के प्रभावशाली ज़मींदार के रूप में माने जाने लगे। सच तो ये है कि गोकुल सिंह मथुरा, वृन्दावन, गोवर्धन तथा हिंडौन और महावन की समस्त हिंदू जनता के नेता थे और तिलपत की गढ़ी उनका केन्द्र थी ।

वो सन 1666 का समय था, जब इस्लामिक राक्षस औरंगजेब के अत्याचारोँ से हिन्दू जनता त्राहि-त्राहि कर रही थी। मंदिरों को तोड़ा जा रहा था, हिन्दू स्त्रियों की इज्जत लूटकर उन्हें भ्रस्ट कर जबरदस्ती मुसलमान बनाया जा रहा था। औरंगजेब और उसके सैनिक पागल हाथी की तरह हिन्दू जनता को मथते हुए बढते जा रहे थे। हिंदुओं पर सिर्फ इसलिए अत्याचार किए जाते थे क्योंकि वे हिन्दू थे। औरंगजेब अपने ही जैसे क्रूर लोगों को अपनी सेना में उच्च पद देकर हिंदुस्तान को दारुल हरब से दारुल इस्लाम में तब्दील करने के अपने सपने की तरफ तेजी से बढता जा रहा था। मुगल साम्राज्य के राजपूत सेवक भी अन्दर ही अन्दर असंतुष्ट होने लगे थे परन्तु जैसा कि “दलपत विलास” के लेखक दलपत सिंह ने स्पष्ट कहा है कि राजपूत नेतागण मुगल शासन के विरुद्ध विद्रोह करने की हिम्मत न कर सके। ऐसे में असहिष्णु धार्मिक नीति के विरुद्ध विद्रोह का बीड़ा उठाने का श्रेय उत्तर प्रदेश के कुछ जाट नेताओं और जमींदारों को प्राप्त हुआ। शाहजहाँ के अन्तिम वर्षों में उत्तराधिकार युद्ध के समय जाट नेता वीर नंदराम ने शोषण करने वाली धार्मिक नीति के विरोध में लगान देने से इंकार कर दिया था और विद्रोह का झंडा फहराया था। उनके बाद उनका स्थान उदयसिंह तथा गोकुलसिंह ने ग्रहण किया। आज मथुरा, वृन्दावन के मन्दिर और भारतीय संस्कृति की रक्षा का तथा तात्कालिक शोषण, अत्याचार और राजकीय मनमानी की दिशा मोड़ने का यदि किसी को श्रेय है तो वह केवल और केवल ‘गोकुलसिंह’ को है।

इतिहास गवाह है कि मुसलमानों की धर्मान्धतापूर्ण नीति के फलस्वरूप मथुरा की पवित्र भूमि पर सदैव ही विशेष आघात होते रहे हैं क्योंकि दिल्ली से आगरा जाने वाले राजमार्ग पर स्थित होने के कारण मथुरा की ओर सदैव विशेष ध्यान आकर्षित होता रहा है। वहां के हिन्दुओं को दबाने के लिए औरंगजेब ने अब्दुन्नवी नामक एक कट्टर मुसलमान को मथुरा का फौजदार नियुक्त किया। सन 1678 के प्रारम्भ में अब्दुन्नवी के सैनिकों का एक दस्ता मथुरा जनपद में चारों ओर लगान वसूली करने निकला। अब्दुन्नवी ने पिछले ही वर्ष गोकुलसिंह के क्षेत्र के पास एक नई छावनी स्थापित की थी और सभी कार्यवाही का सदर मुकाम यही था। सरदार गोकुल सिंह के आह्वान पर जब किसानों ने लगान देने से इनकार कर दिया, तब मुग़ल सैनिकों ने लूटमार से लेकर किसानों के ढोर-डंगर तक खोलने शुरू कर दिए और अंततः संघर्ष शुरू हो गयाl इसी समय औरंगजेब का मुगलिया शैतानी फरमान आया – “काफ़िरों के मन्दिर गिरा दिए जाएं”। फलत: ब्रज क्षेत्र के कई अति प्राचीन मंदिरों और मठों का विनाश कर दिया गयाl कुषाण और गुप्त कालीन निधि, इतिहास की अमूल्य धरोहरों को तहस-नहस कर दिया गया। सम्पूर्ण ब्रजमंडल में मुगलिया घुड़सवार और गिद्ध चील उड़ते दिखाई देते थे और साथ ही दिखाई देते थे धुंए के बादल और लपलपाती ज्वालायें- उनमें से निकलते हुए शाही घुडसवार। अब्दुन्नवी और उसके सैनिक हिन्दू वेश में नगर मेँ घूमते थे और मौका पाकर औरतों का अपहरण करके भाग जाते थे। अब जुल्म की इंतेहा हो चुकी थी।

तभी दिल्ली के सिंहासन के नाक तले समरवीर धर्मपरायण जाट योद्धा गोकुला जाट और उसकी किसान सेना ने आततायी औरंगजेब को हिंदुत्व की ताकत का अहसास दिलाया। मई 1669 में अब्दुन्नवी ने सिहोरा गाँव पर हमला किया और उस समय वीर गोकुला गाँव में ही था। भयंकर युद्ध हुआ लेकिन इस्लामी शैतान अब्दुन्नवी और उसकी सेना सिहोरा के वीर जाटों के सामने टिक ना पाई और सारे गाजर-मूली की तरह काट दिए गए। उस अत्याचारी अब्दुन्नवी की चीखें दिल्ली की आततायी सल्तनत को भी सुनाई दी थी और मुगलों की जलती छावनी के धुँए ने औरंगजेब को अंदर तक हिलाकर रख दिया। दिखाई भी क्यों नही देतीं, आखिर साम्राज्य के वजीर सादुल्ला खान (शाहजहाँ कालीन) की छावनी का नामोनिशान भी मिट गया था। मथुरा ही नही, आगरा जिले से भी शाही झंडे के निशाँ जमींदोज़ हो गए थे। औरंगजेब भी डर गया क्योंकि गोकुला की सेना में जाटों के साथ गुर्जर, अहीर, ठाकुर, मेव इत्यादि भी थे। वहीँ निराश और मृतप्राय हिन्दुओं में जीवन का संचार हुआ क्योंकि उन्हें दिखाई दिया कि अपराजय मुग़ल-शक्ति के विष-दंत तोड़े जा सकते हैं। उन्हें दिखाई दिया अपनी भावी आशाओं का रखवाला-एक पुनर्स्थापक गोकुलसिंह।

औरंगजेब ने सैफशिकन खाँ को मथुरा का नया फौजदार नियुक्त किया और उसके साथ रदांदाज खान को गोकुल का सामना करने के लिए भेजा। इसके बाद पाँच माह तक भयंकर युद्ध होते रहे, पर मुग़लों की सभी तैयारियां और चुने हुए सेनापति प्रभावहीन और असफल सिद्ध हुए। क्या सैनिक और क्या सेनापति सभी के ऊपर गोकुलसिंह का वीरता और युद्ध संचालन का आतंक बैठ गया। अंत में बिल्कुल निराश होकर औरंगजेब ने सैफशिकन खाँ के मार्फ़त महावीर गोकुला के पास संधि-प्रस्ताव भेजा कि यदि वह उस लूट को लौटा दें जो उन्होंने जमा कर ली है, तो उन्हें क्षमा कर दिया जाएगा। भविष्य में सदाचरण का आश्वासन भी माँगा गया पर गोकुला ने औरंगजेब का प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया क्योँकि वे कोई सत्ता या जागीरदारी के लिए नहीँ बल्कि धर्मरक्षा के लिए लङ रहे थे और औरंगजेब के साथ संधि करने के बाद ये कार्य असंभव था। गोकुलसिंह ने पूछा मेरा अपराध क्या है, जो मैं बादशाह से क्षमा मांगूगा? तुम्हारे बादशाह को मुझसे क्षमा मांगनी चाहिए, क्योंकि उसने अकारण ही मेरे धर्म का बहुत अपमान किया है, बहुत हानि की है। दूसरे उसके क्षमा दान और मिन्नत का भरोसा इस संसार में कौन करता है? इसके आगे संधि की चर्चा चलाना व्यर्थ था क्योंकि गोकुलसिंह ने कोई गुंजाइश ही नहीं छोड़ी थी|

अब औरंगजेब स्वयं एक बड़ी सेना, तोपों और तोपचियों के साथ अपने इस अभूतपूर्व प्रतिद्वंदी से निपटने चल पड़ा और दिल्ली से चलकर 28 नवंबर 1669 को मथुरा जा पहुँचा। औरंगजेब ने यहीं पर अपनी छावनी बनाई और अपने सेनापति हसन अली खान को एक मजबूत एवं विशाल सेना के साथ मुरसान भेजा। गोकुलसिंह के अनेक सैनिक और सेनापति जो वेतनभोगी नहीं थे और क्रान्ति भावना से अनुप्राणित लोग थे, रबी की बुवाई के सिलसिले में पड़ौस के आगरा जनपद में चले गए थे। ऐसे में हसन अली खाँ ने गोकुला की सेना की तीन गढियों/गाँवों रेवाङा, चंद्ररख और सरकरु पर सुबह के वक्त अचानक धावा बोला। औरंगजेब की शाही तोपों के सामने ये छोटी गढ़ियाँ ज्यादा उपयोगी सिद्ध न हो सकीं और बड़ी जल्दी टूट गयी। किसान योद्धा भी अपने मामूली हथियारों के सहारे ज्यादा देर तक टिक ना पाए और जाटों की पराजय हुई। इस जीत से उत्साहित औरंगजेब ने अब सीधा गोकुला से टकराने का फैसला किया।

उसने हसन अली खाँ की सफलताओं से खुश होकर सैफशिकन खान के स्थान पर उसे मथुरा का फौजदार बना दिया और उसकी सहायता के लिए आगरा परगने से अमानुल्ला खान, मुरादाबाद के फौजदार नामदार खान, आगरा शहर के फौजदार होशयार खाँ को भी बुलवा लिया\ यह विशाल सेना चारों ओर से गोकुलसिंह को घेरा लगाते हूए आगे बढ़ने लगी। गोकुलसिंह के विरुद्ध किया गया यह अभियान, उन आक्रमणों से विशाल स्तर का था, जो बड़े-बड़े राज्यों और वहां के राजाओं के विरुद्ध होते आए थे। इस वीर के पास न तो बड़े-बड़े दुर्ग थे, न अरावली की पहाड़ियाँ और न ही महाराष्ट्र जैसा विविधतापूर्ण भौगोलिक प्रदेश। इन अलाभकारी स्थितियों के बावजूद उन्होंने जिस धैर्य और रण-चातुर्य के साथ, एक शक्तिशाली साम्राज्य की केंद्रीय शक्ति का सामना करके बराबरी के परिणाम प्राप्त किए, वह सब अभूतपूर्व है।

वीर गोकुला के विरुद्ध औरंगजेब का ये अभियान शिवाजी जैसे महान राजाओं के विरुद्ध छेङे गए अभियान से भी विशाल था। दिसंबर 1669 के अन्तिम सप्ताह में तिलपत से 20 मील दूर गोकुलसिंह ने शाही सेनाओं का सामना किया| औरंगजेब की तोपों, धर्नुधरों, हाथियों से सुसज्जित विशाल सेना और गोकुला की किसानों की 20000 हजार की सेना में तिलपत का भयंकर युद्ध छिङ गया। 4 दिन तक भयंकर युद्ध चलता रहा और गोकुल की छोटी सी अवैतनिक सेना अपने बेढंगे व घरेलू हथियारों के बल पर ही अत्याधुनिक हथियारों से सुसज्जित और प्रशिक्षित मुगल सेना पर भारी पङ रही थी। इस लङाई में सिर्फ पुरुषों ने ही नहीँ बल्कि उनकी चौधरानियों ने भी पराक्रम दिखाया था। सुबह से शाम तक युद्ध होता रहा पर कोई निर्णय नहीं हो सका| दूसरे दिन फ़िर घमासान छिड़ गया| जाट अलौकिक वीरता के साथ युद्ध कर रहे थे| मुग़ल सेना तोपखाने और जिरहबख्तर से सुसज्जित घुड़सवार सेनाओं के होते हूए भी गोकुलसिंह पर विजय प्राप्त न कर सकी| भारत के इतिहास में ऐसे युद्ध कम हुए हैं जहाँ कई प्रकार से बाधित और कमजोर पक्ष, इतने शांत निश्चय और अडिग धैर्य के साथ लड़ा हो| हल्दी घाटी के युद्ध का निर्णय कुछ ही घंटों में हो गया था, पानीपत के तीनों युद्ध एक-एक दिन में ही समाप्त हो गए थे, परन्तु वीरवर गोकुलसिंह का युद्ध तीसरे दिन भी चला|

मनूची नामक यूरोपिय इतिहासकार ने जाटों और उनकी चौधरानियों के पराक्रम का उल्लेख करते हुए लिखा है कि “अपनी सुरक्षा के लिए ग्रामीण कंटीले झाडियों में छिप जाते या अपनी कमजोर गढ़ियों में शरण लेते, स्त्रियां भाले और तीर लेकर अपने पतियों के पीछे खड़ी हो जातीं। जब पति अपने बंदूक को दाग चुका होता, पत्नी उसके हाथ में भाला थमा देती और स्वयं बंदूक को भरने लगती थी । इस प्रकार वे उस समय तक रक्षा करते थे,जब तक कि वे युद्ध जारी रखने में बिल्कुल असमर्थ नहीं हो जाते थे । जब वे बिल्कुल ही लाचार हो जाते, तो अपनी पत्नियों और पुत्रियों को गरदनें काटने के बाद भूखे शेरों की तरह शत्रु की पंक्तियों पर टूट पड़ते थे और अपनी निश्शंक वीरता के बल पर अनेक बार युद्ध जीतने में सफल होते थे”।

मुगल सेना इतने अत्याधुनिक हथियारों, तोपखाने और विशाल प्रशिक्षित संख्या बल के बावजूद जाटों से पार पाने मेँ असफल हो रही थी। 4 दिन के युद्ध के बाद जब गोकुल की सेना युद्ध जीतती हुई प्रतीत हो रही थी पर तभी हसन अली खान के नेतृत्व में 1 नई विशाल मुगलिया टुकङी आ गई और इस टुकङी के आते ही गोकुला की सेना हारने लगी। तिलपत की गढी की दीवारें भी शाही तोपों के वारों को और अधिक देर तक सह ना पाई और भरभराकर गिरने लगी। युद्ध में अपनी सेना को हारता देख जाटों की औरतों, बहनों और बच्चियों ने भी अपने प्राण त्यागने शुरु कर दिए। हजारों नारियां जौहर की पवित्र अग्नि में खाक हो गई। तिलपत के पतन के बाद गोकुला और उनके ताऊ उदयसिंह को 7 हजार साथियों सहित बंदी बना लिया गया। इन सभी को आगरा लाया गया। लोहे की बेड़ियों में सभी बंदियों को औरंगजेब के सामने पेश किया गया तो औरंगजेब ने कहा “जान की खैर चाहते हो तो इस्लाम कबूल कर लो और रसूल के बताए रास्ते पर चलो। बोलो क्या इरादा है इस्लाम या मौत?” अधिसंख्य धर्म-परायण जाटों ने एक सुर में कहा – “बादशाह, अगर तेरे खुदा और रसूल का का रास्ता वही है जिस पर तू चल रहा है तो हमें तेरे रास्ते पर नहीं चलना।”

अगले दिन अर्थात 1 जनवरी 1670 के दिन गोकुलसिंह और उदयसिंह को आगरा कोतवाली पर लाया गया-उसी तरह बंधे हाथ, गले से पैर तक लोहे में जकड़ा शरीर। गोकुल की बलशाली भुजा पर जल्लाद का बरछा चला तो हजारों चीत्कारों ने एक साथ आसमान को कोलाहल से कंपा दिया। बरछे से कटकर चबूतरे पर गिरकर फङकती हुई गोकुला की भुजा चीख-चीखकर अपने मेँ समाए हुए असीम पुरुषार्थ और बल की गवाही दे रही थी। लोग जहाँ इस अमानवीयता पर काँप उठे थे वहीँ गोकुला का निडर और ओजपूर्ण चेहरा उनको हिंदुत्व की शक्ति का एहसास दिला रहा था। गोकुला ने एक नजर अपने भुजाविहीन रक्तरंजित कंधे पर डाली और फिर बङे ही घमण्ड के साथ जल्लाद की ओर देखा कि दूसरा वार करो। दूसरा बरछा चलते ही वहाँ खङी जनता आर्तनाद कर उठी और फिर गोकुला के शरीर के एक-एक जोङ काटे गए। अनेकों ने आँखें बंद कर ली, अनेक रोते हुए भाग निकले| कोतवाली के चारों ओर मानो प्रलय हो रही थी| एक को दूसरे का होश नहीं था| इधर आगरा में गोकुलसिंह का सिर गिरा, उधर मथुरा में केशवरायजी का मन्दिर। यही हाल उदयसिंह और बाकी बंदियों का भी किया गया। यह कोतवाली अब जौहरी बाजार का पोस्ट ऑफिस बन गया है।

गोकुल सिर्फ़ जाटों के लिए शहीद नहीं हुए थे, न उनका राज्य ही किसी ने छीना लिया था, न कोई पेंशन बंद कर दी थी, बल्कि उनके सामने तो अपूर्व शक्तिशाली मुग़ल-सत्ता, दीनतापुर्वक, सन्धि करने की तमन्ना लेकर गिड़-गिड़ाई थी। पर शर्म आती है कि हम ऐसे अप्रतिम वीर को कोई भी सम्मान नहीं दे सके। सच तो ये है कि अधिकांश हिन्दू जानते भी नहीं कि उनके पूर्वजों को मुगलों के क्रूर शासन से बचाने के लिए अपना सर्वस्व बलिदान करने वाले गोकुलसिंह कौन थे। परन्तु सौभाग्य का विषय है कि राजस्थान के ओजस्वी और मनस्वी कवि श्री बलवीर सिंह ‘करुण’ ने ‘समरवीर गोकुला’ नामक प्रबन्ध काव्य की रचना कर सत्रहवीं सदी के इस उपेक्षित अध्याय को पुनः जीवंत कर दिया है। समरवीर गोकुला सत्रहवीं सदी की किसान क्रान्ति का राष्ट्रीय प्रबन्ध काव्य है।

कवि ने भूमिका में लिखा है- ‘महाराणा प्रताप, महाराणा राज सिंह, छत्रपति शिवाजी, हसन खाँ मेवाती, गुरु गोविन्द सिंह, महावीर गोकुला तथा भरतपुर के जाट शासकों के अलावा ऐसे और अधिक नाम नहीं गिनाये जा सकते जिन्होंने मुगल सत्ता को खुलकर ललकारा हो। वीर गोकुला का नाम इसलिए प्रमुखता से लिया जाए कि दिल्ली की नाक के नीचे उन्होंने हुँकार भरी थी और 20 हजार कृषक सैनिकों की फौज खडी कर दी थी जो अवैतनिक, अप्रशिक्षित और घरेलू अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित थी। यह राज्य विस्तार के लिए नहीं बल्कि राष्ट्र की रक्षा हेतु प्राणार्पण करने आये थे।’

आठ सर्गों का यह प्रबन्धकाव्य इक्कीसवीं सदी के प्रथम दशक का महत्त्वपूर्ण अवदान है। कवि ने मथुरा के किसान कुल में जनमे गोकुल के संघर्ष की उपेक्षा की पीडा को सहा है। उस पीडा ने राष्ट्रीय सन्दर्भ में उपेक्षित को काव्यांजलि देने का प्रयास किया है। आदि कवि की करुणा का स्मरण करें फिर कवि ‘करुण’ की पीडा की प्रेरणा का महत्त्व स्पष्ट हो जायेगा। इसीलिए कवि ने प्रथम सत्र में गोकुल के किसान व्यक्तित्व को मुगल बादशाह के समक्ष प्रस्तुत किया है। कवि ने दूसरे सर्ग में युग की विषम स्थितियों और भारतीय आशावाद को ऐतिहासिक और प्राकृतिक सन्दर्भ में अपनी काव्यकला द्वारा चित्रित कर दिया है। तीसरा सर्ग गोकुल के किसान जीवन की चित्रावली है-बिंबों एवं चित्रों में, जबकि प्रत्यक्ष अत्याचार से रोष-आक्रोश और विद्रोह का वर्णन चौथे सर्ग में किया है। कवि ने आगे की तीन सर्गों में गोकुल और उसकी किसान क्रांति सेना के स्वातंत्रय संग्राम का प्रामाणिक वर्णन किया है। राष्ट्रीय दृष्टि से मुगल हुकूमत के दमनकारी रूप, किसानों का आक्रोश और संकलित संघर्ष के शौर्य का वर्णन इस युद्ध की विशेषताएँ हैं। कवि ने पाँचवें तथा छठे सर्ग में सादाबाद और तिलपत के भीषण संघर्ष को अपनी चिरपरिचित वर्णन शैली में बिम्बपूर्ण शिल्प से प्रत्यक्ष कर दिया है। सप्तम सर्ग प्रमाण है। अष्टम सर्ग- अन्तिम सर्ग प्रबन्धकाव्य का उत्कर्ष है।

कवि ने स्वातंत्रय-संग्राम के कारण घोषित प्राणदंड की भूमिका के रूप में प्रकृति, प्रकृति की रहस्यचेतना तथा भारतीय चिंतन के अनुसार आत्मा की अमरता का आख्यान सुनाया है। कवि कहता है-
तुम तो एक जन्म लेकर बस
एक बार मरते हो
और कयामत तक कर्ब्रों में
इन्तजार करते हो
लेकिन हम तो सदा अमर हैं
आत्मा नहीं मरेगी
केवल अपने देह-वसन ये
बार-बार बदलेगी।
अतः गोकुल अपने धर्म का परित्याग नहीं करेगा। बल्कि वह तो दंडित होकर अमर हो जाना चाहता है।

गोकला भले ही पराजित हो गए थे पर उनका रक्त व्यर्थ नहीं बहा था। उन्होंने जाटों के हृदय में स्वतन्त्रता के नए अंकुर में पानी दिया और साथ ही पूरे देश को यह सन्देश भी कि अपराजेय समझी जाने वाली मुगलिया फ़ौज अपराजेय नहीं है। इस भावना ने भविष्य के प्रतिकारों की नींव रखी, जिसके बाद सतनामियों ने शहादत दी, 1674 में शिवाजी का संघर्ष सफल हुआ, 1675 में गुरु तेगबहादुर ने कश्मीर के लिए बलिदान दिया, बाद में भरतपुर के महाराज सूरजमल ने स्वातंत्रय ध्वज को फहरा दिया। शायद इसी संघर्ष-श्रंखला का परिणाम रहा सन् 1947 का पन्द्रह अगस्त। इतिहास को इस संघर्ष-श्रंखला को भूलना नहीं देना है और बलवीर सिंह ‘करुण’ का यह प्रबंधकाव्य यहीं पर अपना औचित्य सिद्ध कर रहा है।

एक बार फिर वो समय आ गया है कि हम अपने पूर्वज वीर गोकुला के जैसा पराक्रम दिखाकर अपने देश धर्म और स्वाभिमान की रक्षा करेँ। किसी चमत्कार की उम्मीद करने वाला समाज मिट जाता है क्योंकि भगवान भी उसी का साथ देता है जो खुद अत्याचार का सामना करने के लिये आगे आता है। अब समय आ गया है कि हम भूल जाएँ अव्यवहारिक अहिंसा को और मिटा दें अतिसहिष्णुता को जिसने हमें नपुंसक बना दिया है।

इन पंक्तियों के साथ महावीर गोकुला को कोटिशः नमन एवं विनम्र श्रद्धांजलि कि—
यह गाल पिटे वह गाल बढ़ाओ, यह तो आर्यों की नीति नही,
अन्यायी से भी प्रेम अहिंसा, यह कब गीता की नीति रही।
हे राम बचाओ जो कहता, वह कायर है, अपना हत्यारा है,
जो करे वीरता और अति साहस, बस वही राम का प्यारा है।

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