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आसान नहीं है ‘तीर्थ’ शब्द का अर्थ समझना. क्यों है प्रयाग तीर्थराज?

वाराणसी तीर्थ

तीर्थराज प्रयाग में अर्धकुम्भ मेला चल रहा है। क्या आप जानते हैं ‘तीर्थ’ शब्द का अर्थ क्या है? सामान्य रूप से किसी पुण्य स्थान को ‘तीर्थ’ कहते हैं, विशेषतः ‘ऋषिजुष्टजल’ अर्थात् ऋषियों द्वारा सेवित जल को ‘तीर्थ’ कहते हैं। बहुधा तीर्थस्थान में साधु होते हैं और जल भी रहता है, जैसा प्रयाग में है। पर ‘तीर्थ’ शब्द के अनेक अर्थ हैं और इसमें भाव गूढ है।

उणादि सूत्र (२.५) के अनुसार संस्कृत का ‘तीर्थ’ शब्द √तॄ धातु (‘तॄ प्लवनतरणयोः’) से ‘थक्’ प्रत्यय होने से बना है। इस धातु के दो अर्थ हैं “पार करना” (प्लवन) और “तैरना” (तरण)। हिन्दी की ‘तैरना’ धातु इसी √तॄ धातु से आई है। हिन्दी में swimming pool को ‘तरण ताल’ कहते हैं, ‘तरण’ भी √तॄ धातु से उत्पन्न संस्कृत शब्द है। सिक्खों के पवित्र स्थान ‘तरन-तारन’ का नाम संस्कृत के ‘तरण-तारण’ का तद्भव रूप है (‘तरण’, ‘तारण’ दोनों शब्द √तॄ धातु से हैं)। नाव को संस्कृत में ‘तरणि’ कहते हैं, यह शब्द भी इसी √तॄ धातु से आया है।

The Om Mala ॐ माला

नित्यानंद मिश्र द्वारा लिखित ‘ॐ माला’ एक ऐसी पुस्तक है जो सिर्फ एक शब्द- “” की व्याख्या करती है। संस्कृत के सबसे छोटे शब्दों में से एक है, और सबसे शक्तिशाली शब्द और, हिंदू रहस्यवादी मंत्र है। प्रस्तुत पुस्तक में के 108 अर्थों की व्याख्या की गई है। पुस्तक यहाँ से खरीदी जा सकती है।

‘तीर्थ’ शब्द की व्युत्पत्ति है “तरति पापं संसारं वाऽनेनास्मिन् वेति तीर्थम्”। “जिसके द्वारा या जिसमें पाप या संसार (=जन्म मरण के चक्र) को [साधक] पार करता है” वह तीर्थ है। यही कारण है कि ‘तीर्थ’ का अर्थ न केवल एक पवित्र स्थान है अपितु शास्त्र, यज्ञ, उपाय, गुरु, और अवतार को भी संस्कृत में ‘तीर्थ’ कहते हैं (मेदिनीकोश)। इन सब में तारने का सामर्थ्य है, ये सब तीर्थ हैं।

जी हाँ, गुरु को भी संस्कृत में ‘तीर्थ’ कहते हैं। इसका प्रमाण ‘सतीर्थ्य’ शब्द है। ‘सतीर्थ्य’ कहते हैं एक ही गुरु के पास रहकर विद्या सीखने वाले सहपाठी (fellow-student) को। ‘सतीर्थ्य’ शब्द ‘तीर्थ’ शब्द से ही आया है, “समाने तीर्थे वसति स सतीर्थ्यः” अर्थात् जो एक ही तीर्थ (गुरु) के पास रहता है वह ‘सतीर्थ्य’ है। काशिकाकार ने स्पष्ट कहा है, “तीर्थशब्देनेह गुरुरुच्यते” अर्थात् “यहाँ (सतीर्थ्य शब्द के संदर्भ में) तीर्थ शब्द गुरु का वाचक है”।

अब आप ‘तीर्थराज’ शब्द में छिपे अनेक गूढ अर्थों पर स्वयं विचार कर सकते हैं। ‘स तीर्थराजो जयति प्रयागः’ इति शम्।

विशेष:
“तीर्थं शास्त्राध्वरक्षेत्रोपायनारीरजःसु च, अवतारर्षिजुष्टाम्बुपात्रोपाध्यायमन्त्रिषु” (मेदिनीकोशः)।

प्रस्तुत लेख यहाँ से साभार लिया गया है।

श्री नित्यानंद मिश्र मुंबई में स्थित एक प्रसिद्ध लेखक हैं। लखनऊ में जन्मे मिश्र, IIM बैंगलोर से MBA हैं। वे भारतीय साहित्य, कला और संगीत पर लिखते हैं। उनकी प्रसिद्ध पुस्तकें  Kumbhaॐ माला (English & Hindi), और Mahaviri हैं। उन्होंने संस्कृत, हिंदी व अंग्रेजी में कुल ग्यारह पुस्तकों का संपादन और लेखन किया है।

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