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अल्लाउद्दीन खिलजी के राजस्व सुधार एवं हिन्दू

    reforms of allauddeen kgilji

    अल्लाउद्दीन खिलजी पहला मुसलमान शासक था जिसे इस्लाम के ध्वज को विन्ध्य पर्वत  के दक्षिण में फहराने का गौरव प्राप्त है. उससे पहले किसी भी मुसलमान ने भारत के इतने बड़े भूभाग का शासन नहीं किया था. यद्यपि उसकी यह विजय स्थायी नहीं सिद्ध हुई और बीस साल के भीतर ही उसका महाराज्य छिन्न भिन्न हो गया. परन्तु उसके साथ ही इस्लामिक राज्य जो सैकड़ों युद्धों के बावजूद उत्तर भारत के मैदानों तक ही सीमित था, दक्षिण के पठार एवं समुद्र तटों तक स्थापित हो गया और सरदार बल्लभभाई पटेल द्वारा निजाम को समूल नष्ट करने तक बना रहा.

    जाफर खान और मालिक काफूर के नेत्रित्व में इस  विस्तृत साम्राज्य विस्तार के अतरिक्त अपने चाचा की हत्या, मंदिरों का विध्वंश, नरसंहार एवं स्त्री लोलुपता के कारणों से अल्लाउद्दीन इतिहास में कुख्यात है. परन्तु  औपनिवेशिक काल से चले आ रहे सरकारी पाठ्यक्रम में अल्लाउद्दीन से सम्बंधित जो विषय सबसे अधिक चर्चा में रहता है वो उसके राजस्व सम्बन्धी सुधार एवं आर्थिक नीतियाँ हैं

    निष्पक्ष दृष्टि से देखें तो अल्लाउद्दीन एक अनपढ़,क्रूर एवं धूर्त व्यक्ति था जिसकी इस्लाम में गहरी निष्ठा थी. और उस युग में सुलतान होने के लिए यह सबसे बड़ी योग्यता थी. उसकी आर्थिक नीतियाँ एवं राजस्व सुधार  भी उसके इन्ही गुणों का परिणाम थीं, भले ही वामी एवं इस्लामी इतिहासकार बाल की खाल निकालकर उसे चाणक्य सिद्ध करने करने का प्रयास करें.

    अल्लाउद्दीन की आर्थिक नीतियों की तीन  मुख्य उद्देश्य थे:

    • विशाल साम्राज्य को नियंत्रित करने के लिए सेना का खर्चा एकत्र करना
    • हिन्दू प्रजा को इतना दरिद्र बना देना की वो विद्रोह की कल्पना भी नहीं कर सके
    • इस्लाम नहीं स्वीकार करने वाले धिम्मियों को कठोर दंड देना

    अपने इन तीन उद्देश्यों को पूरा करने के लिए अल्लाउद्दीन ने अपनी विशेष आर्थिक नीतियों को लागू किया. और पूरे इस्लाम सम्मत विधि से लागू किया. राज्य में हिन्दुओं की स्थिति क्या होनी चाहिए इसपर सुलतान ने बयाना के काजी मुगीसुद्दीन से परामर्श लिया, इसपर काजी ने सुलतान से कहा:

    ”शरा में हिन्दुओं को खराजगुजर (कर देने वाला) कहा गया है. जब कोई राजस्व विभाग का अधिकारी उनसे चांदी मांगे तो उनका कर्तव्य है कि बिना किसी पूछताछ के बड़ी नम्रता से उसे सोना दें. यदि अधिकारी उनके मुंह में थूके तो उसे लेने के लिए बिना हिचकिचाहट उन्हें मुंह खोल देना चाहिए. इसप्रकार के कार्यों से धिम्मी इस्लाम के प्रति अपनी आज्ञापालन की भावना का प्रदर्शन करता है. अल्लाह ने उन्हें अपमानित करने की आज्ञा दी है. पैगम्बर ने हमें उनका वध करने, लूटने तथा बंदी बनाने का आदेश दिया है. महान इमाम अबू हनीफा जैसे अधिकारी ने जिसके मार्ग का हम अनुसरण करते हैं हिन्दुओं पर जजिया लगाने की अनुमति दी है. इस्लामिक धर्माधीशों के अनुसार हिन्दुओं के केवल दो ही मार्ग हैं मृत्यु अथवा इस्लाम.”

    और अल्लाउद्दीन ने पूरी निष्ठा से काजी की शिक्षा का अनुसरण किया और निम्नलिखित राजस्व/प्रशासनिक  सुधार किये:

    चूंकि कृषक केवल हिन्दू थे, सुल्तान ने कृषि कर को पचास प्रतिशत लगा दिया इसके साथ ही साथ पशुओं, चरागाहों आदि पर भी अतिरक्त कर  लगाये और अहीर, गड़ेरी आदि निर्धन पशुपालक हिन्दुओं को भी दरिद्र बना दिया. राजाज्ञाएं निकाल कर हिन्दुओं की सम्पत्ति जब्त कर ली गयी. जजिया एवं जकात की दर दोगुनी कर दी गयी. खुत, मुकद्दम एवं पटवारी आदि छोटे राजस्व अधिकारी जो कि सभी हिन्दू थे उनके सारे विशेषाधिकार जब्त कर  लिए गये एवं दण्ड के बलपर अत्याचारी राजस्व कानूनों को मानने पर बाध्य किया गया. उनके लिए पशुओं एवं सम्पत्ति की सीमा निर्धारित कर दी गयी. विभिन्न करों के भुगतान के  पश्चात् कृषक हिन्दुओं के पास उपज का एक चौथाई हिस्सा ही बच पाता था.

    इसका परिणाम यह हुआ कि सम्पूर्ण हिन्दू प्रजा घोर दरिद्रता एवं भुखमरी की अवस्था में पहुँच गयी. इतिहासकार बरनी लिखता है,“हिन्दू घोड़े की सवारी करने, सुंदर पोषक पहनने, अस्त्र-शस्त्र धारण करने एवं पान खाने में असमर्थ हो गये.’’ वूल्जले हेग लिखते हैं,‘सम्पूर्ण राज्य में हिन्दू दुःख एवं दरिद्रता में डूब गये’

    समकालीन लेखक मुहद्दिस मौलाना शम्सुद्दीन तुर्क ने अल्लाउद्दीन की बड़ाई करते हुए लिखा है,

    ”सुलतान ने हिन्दुओं को लज्जित अपमानित एवं निर्धन बना दिया है. मैंने सुना है कि हिन्दुओं के बच्चे तथा औरते मुसलमानों के दरवाजों पर भीख माँगा करते हैं. ए बादशाह ए इस्लाम, तेरी  ये धर्मनिष्ठता सराहनीय है तूने मुहम्मद साहब के धर्म की भली भाँती रक्षा की है.”

    अल्लाउद्दीन जिस विचारधारा को मानता था और जिसके अनुसार उसे शासन करना था उसकी दृष्टि में यह सारे कार्य न्यायोचित ठहराए जा सकते हैं किन्तु आज के युग में जब तथाकथित मानवतावद के ध्वजवाहक बड़ी निर्लज्जता से उसके समर्थन में तर्क गढ़ते हैं तो उनसे भारतवर्ष, हिन्दू समाज एवं संस्कृति के प्रति घोर घृणा एवं द्वेष की दुर्गन्ध आती है.

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      Admin D

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