भारत की सात महान महिला शासिकाएं

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शासिका

रुद्रम्मा देवी

ये 13 वीं शताब्दी में काकतीय वंश की महिला शासिका थीं। इन्होंने अपने समय मे समाज के निचले तबके से लोगों को सेना में भर्ती किया और उन्हें जागीरें भी दीं। मुख्य रूप से इन्हें पहले पूर्वी गंग व यादव राजाओं से युद्ध लड़ना पड़ा कितुं रानी ने स्वयं युद्व में भाग लिया और विजय प्रप्त की।

रज़िया सुल्तान

यह तुर्क इतिहास की पहली महिला शासिका थीं। दरबार में पुरुषों की भांति जाती थीं। यह बात कट्टरपंथी लोगों को नागवार गुजरी। रजिया दिल्ली के ममलूक वंश के शासक सुलतान इल्तुतमिश (अल्तमश) की सुपुत्री थीं। सुल्तान इल्तुतमिश की मृत्यु के पश्चात उसके पुत्रों के योग्य नहीं होने के कारण उसकी पुत्री रज़िया सुल्तान को 1236 में दिल्ली के ममलूक राज सिंहासन पर विराजमान किया गया। रज़िया ने 1240 तक शासन किया था।

रानी दुर्गावती

ये कालिंजर के चंदेल राजाओं की बेटी व गोंडवाना के आदिवासी राज्य की रानी थीं। विवाह के कुछ ही वर्ष में पति की मृत्यु के बाद, रानी ने स्वयं शासिका ब। कितुं कुछ ही वर्षों बाद मालवा के मुस्लिम राजा बाजबहादुर ने कई हमले किये कितुं हर बार उसे पराजित ही होना पड़ा। तभी अकबर की बुरी नजर रानी पर गयी, अकबर ने रानी को अपने हरम में डालने के लिए अपनी बड़ी सेना भेजी। किन्तु जब युद्ध शुरू हुआ तो आदिवासी समाज ने अपनी रानी के सम्मान में मुगल सेना को गाजर मूली की तरह काट डाला। स्वयं रानी ने अकबर के सेनापति को युद्ध के मैदान में मौत के घाट उतार दिया। किन्तु अकबर की बड़ी सेना का सामना ज्यादा समय तक सम्भव नहीं था। अंत मे रानी ने सीने में कटार घोंप कर अपना आत्मबलिदान दे दिया। रानी के इस बलिदान को याद कर जबलपुर के गोंड़ आदिवासी आज भी उनकी समाधि स्थल पर श्रद्धसुमन अर्पित करते हैं।

अहिल्याबाई होल्कर

अगर आप इंदौर में कभी इस नाम को किसी के मुह से सुनेंगे तो वो पूरा नही लेंगे, सिर्फ माँ अहिल्या बोलते हैं। लगभग देवी जैसा ही सम्मान, वो महान शिवभक्तिन थीं। मराठा सूबेदार मल्हारराव होल्कर की बहू थीं। कितुं 19 वर्ष की आयु में विधवा हो गयी थीं। अहिल्याबाई ने काशीविश्वनाथ, सोमनाथ, महाकाल और अन्य शिवमंदिरों का पुनः निर्माण कराया। अंग्रेजों के समय सिर्फ होल्कर राजाओं ने अधीनता स्वीकार नहीं की, इसका सारा श्रेय अहिल्याबाई होल्कर को जाता है।

रानी लक्ष्मीबाई

सारा देश इनकी वीरता के बारे में सब जानता है फिर क्या लिखना? रानी के बारे में इतना ही काफी है, “ खूब लड़ी मर्दानी वो तो झाँसी वाली रानी थी”।

रानी चेन्नम्मा

यह मैसूर के कित्तूर राज्य की शासिका थीं। अंग्रेजो की राज्य हड़प नीति के विरोध में सशक्त विद्रोह किया था। पहले पति की मृत्यु फिर बेटे की मृत्यु के गम को रानी भूली ना थीं कि उन्हें अंग्रेजों से उत्तराधिकार को लेकर युद्ध में उतरना पड़ा। रानी ने अंग्रेजों के खूब दांत खट्टे किये किन्तु बाद में बंदी बना ली गईं और जेल में ही मृत्यु हुई।

बेगम हजरत महल

ये लखनऊ के अय्याश नवाब वाजिद अली की दूसरी पत्नी थीं। इनका जन्म फैजाबाद में हुआ, माता पिता ने इन्हें बेच दिया था। तब तवायफ़ का काम करती थी। किन्तु नवाब ने जब इन्हें शाही रखैल का पद दिया तब इन्हें बेगम का पद मिल गया। जब अंग्रेजो ने अवध को कुशासन के आधार पर हथियाने का प्रयास किया तो नालायक नवाब ने कुछ नहीं किया, किन्तु बेगम हजरत महल ने अपने लोगों को एकजुट कर युद्ध लड़ा। क्या हिन्दू क्या मुस्लिम सभी ने उनका साथ दिया। आज भी लखनऊ के लोगों में उनके प्रति गहरा सम्मान है।

साभार– श्री शरद सिंह, वाराणसी

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