श्री राम का सत्य सर्वप्रिय धर्म स्वरूप..

यदि वेदव्यास, आद्य शंकराचार्य, स्वामी दयानन्द आदि वेदज्ञ ऋषि ज्ञान की किसी परोक्ष संस्कृति के किनारे हैं, यदि भगवान श्रीकृष्णचन्द्र अथाह प्रेम और गहन आध्यात्म की किसी अपूर्व धवल जाह्नवी के तट पर हैं, तो श्री राम धर्म, कर्म और करुणा की त्रिवेणी के हृदयंगम प्रयाग-संगम पर खेल रहे हैं।

अनन्त ब्रह्माण्डनायक ने संसार नाटक में श्रीराम के रूप में अपूर्व नायक बनकर सारे धर्म को स्वयं में समेट लिया। यदि सूर्य यथासमय उदित-अस्त होने का, चन्द्र प्रतिपक्ष घटने-बढ़ने का, ऋतुएं क्रम से आविर्भूत होने का अपना धर्म निभाती हैं तो वह श्रीराम के चरित्र से ही उन्होंने ग्रहण किया। संसार के इतिहास का सारा का सारा धार्मिक व्याख्यान भगवान श्री राम के जीवन में ही अन्तर्निहित है। धर्म क्या है? उसका स्वरूप क्या है? मनुष्यों से लेकर ऋषि भी इस सम्बन्ध में मोहित रहते हैं, इसलिए भगवान विष्णु ने जब राम रूप में धर्मावतार लिया, तो धर्म के मूल वेदों ने भी वाल्मीकि के माध्यम से रामायण के रूप में अवतार ग्रहण किया –“वेदवेद्ये परे पुंसि……रामायणात्मना।” राम साक्षात् मूर्तिमान धर्म हैं। भगवान राम के अवतार का मुख्य प्रायोजन क्या है, वेदव्यास जी कहते हैं, “मर्त्यावतारस्त्विह मर्त्यशिक्षणं…” श्री राम का अवतार मानव जीवन कैसा होना चाहिए, यही बताने के लिए हुआ। हिन्दू संस्कृति में हमेशा यही मान्यता रही है कि, बेटा हो तो राम जैसा, भाई हो तो राम लक्ष्मण जैसे, मित्र हो तो राम जैसे, स्वामी हों तो राम जैसे, पति हों तो राम जैसे, क्योंकि संसार में जितने भी परस्पर धर्म सम्भव हैं उन सबका स्त्रोत श्रीराम का ही चरित है।

श्रीराम की प्रतिज्ञा थी कि सीता के अतिरिक्त हर स्त्री मेरे लिए माता कौशल्या के समान है, यज्ञपूर्ति के लिए भी अन्य विवाह न कर सीताजी की स्वर्ण मूर्ति से कर्तव्यपूर्ति की| वहीं सीताजी ने भी राम जी को कह दिया, यदि आप मुझे वन लेकर नहीं चलेंगे तो मेरा मरा मुख देखेंगे| एक बार सीताजी को श्रीराम की याद में विह्वल देखकर उनकी सखी वासन्ती ने कहा, सखी! तुम ऐसे निष्ठुर पति राम के लिए क्यों इतने गहरे और लम्बे श्वास छोड़ रही हो तो तुरंत सीताजी बोलीं, “श्रीराम निष्ठुर नहीं हैं| मैं बहिरंग दृष्टि से ही उनसे दूर हूँ, वस्तुतः उनके हृदय की रानी मैं ही हूँ|” इसलिए रामजानकी का जोड़ा ही भारतीय आदर्श रहा है| जब तक यह जोड़ा भारत का आदर्श रहा, भारत का दाम्पत्य जीवन भी आदर्श और समृद्ध रहा, अब इस जोड़े पर प्रहार हो रहे हैं, सीता को राम से और राम को सीता से अलग दिखाया जा रहा है, उसका नतीजा सबको दिख ही रहा है|

श्रीराम गौ और ब्राह्मणों की रक्षा और देश के हित के लिए अपने गुरु की आज्ञा पालन में हमेशा उद्यत रहे, ‘गोब्राह्मणहितार्थाय देशस्य च हिताय च…’, ‘विप्र धेनु सुर संत हित, लीन्ह मनुज अवतार’| वसिष्ठ जी नेत्रों में अश्रु लाकर कैकेयी से कहने लगे,न हि तद्भविता राष्ट्रं यत्र रामो न भूपतिः।
तद्वनं भविता राष्ट्रं यत्र रामो निवत्स्यति।।
“जहाँ राम राजा नहीं हैं वह देश राष्ट्र नहीं है और जहाँ राम निवास करेंगे वह वन भी राष्ट्र हो जाएगा।”

वन जाते श्री राम

भारत की भूमि पर राज करने वाले न जाने कितने ही राजा हुए हैं, सब चले गए। धूल में मिल गए। किन्तु भगवान श्री राम, भारतवर्ष के हम सभी हिन्दूओं के हृदय के चिरंजीवी राजा हैं, जिनका राज अटल है। हमारे हृदय के सिंहासन पर अन्य कोई सत्ताधीश नहीं बैठ सकता। श्री राम केवल हमारी स्मृतियो में नहीं है, वह वर्तमान हैं, अमरभाव लीला हैं। इस राष्ट्र के अपान व हमारी संस्कृति के प्राण है श्री राम ।

श्रीराम का रामराज्य कैसा था इस पर महर्षि कम्ब ने लिखा है,

“वहाँ खेतों में हल जोतने पर सोना निकल पड़ता है, भूमि को समतल बनाने पर रत्न बिखर जाते हैं| बड़ी बड़ी नावें विदेशों से अनंत निधियां लाती हैं और धान की कटी बालियों का ढेर आसमान छूता पड़ा हुआ है| वहां कहीं भी कोई पाप-कृत्य नहीं होता, इसलिए किसी की अकाल मृत्यु नहीं होती| लोगों के चित्त विशुद्ध रहते हैं अतः किसी के मन में बैर या द्वेषभाव नहीं रहता| वहाँ के निवासी धर्मकृत्यों को छोड़ अन्य कोई कार्य नहीं करते अतः सदा प्रजा की उन्नति ही होती है| उस देश में दान का महत्व नहीं है क्योंकि वहाँ कोई याचक नहीं है| शूरता का महत्व नहीं है क्योंकि वहाँ युद्ध नहीं होते| सत्य का महत्व नहीं है क्योंकि वहाँ कोई असत्य भाषण करता ही नहीं| और पण्डितों का भी महत्व नहीं क्योंकि वहाँ सभी बहुश्रुत तथा ज्ञानी हैं| वहाँ लोग शीलवान हैं इसलिए उनका सौन्दर्य नित नवीन रहता है| वहाँ वर्षा समय पर होती है क्योंकि स्त्रियों का आचरण अत्यंत ही पवित्र है| वहाँ के निवासियों में चोरों का डर न होने से सम्पत्ति की रक्षा करने वाले रक्षक नहीं हैं| वहाँ कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं जो विद्यावान न हो, इसलिए वहाँ पृथक रूप से विद्याओं में पूर्ण पारंगत कहने योग्य व्यक्ति कोई नहीं है और सब विद्याओं में निपुण न होने वाला अपण्डित भी कोई नहीं है| वहाँ सब लोग सब प्रकार के ऐश्वर्यों से सम्पन्न हैं इसलिए पृथक रूप से धनिक कहने योग्य कोई व्यक्ति है ही नहीं, फिर निर्धन का तो प्रश्न ही नहीं….”

श्रीराम का जीवन बाल्यकाल से ही विलक्षण रहा, छोटी सी उम्र में उन्होंने ताड़का को मार गिराया, बला और अतिबला जैसी विद्याएँ ग्रहण कीं, वहीं युगों से शिला बनी गौतमपत्नी अहिल्या का उद्धार कर दिया, असंख्य राजा जिस धनुष को हिला न सके, क्षणभर में ही उसे तोड़ डाला, जानकी जी का हृदय पुलकित हो उठा और पैर धोने वाले राजा जनक को रोमांच हो गया, विश्मामित्र जिन्हें गले से लगाकर तृप्त हो गए, परशुराम जी के हृदय से भी जिन्होंने प्रेम का सोता बहा दिया, देवता उन्हें देखने की होड़ करते वहीं लताएं भी उन्हें पति मानतीं, ब्रह्मा केवल आठ ही आँखों से उन्हें देख पाने के कारण पछताते हैं, वहीं इंद्र सहस्रनेत्रों के श्राप से धन्य हो गए, राजतिलक हो या वनवास, एक टेढ़ी रेखा जिनके मस्तक पर नहीं आई, वन की ओर जाते देखने वालों की दृष्टि भी वन में पहुँच गई, पर खींचकर लाने का वे साहस न कर सके, जिनके वन जाने से गायें भी रोयीं, बछड़े भी, उपवन और पक्षी भी, घोड़े और हाथी भी रोने लगे, अपने लक्ष्यभूत परमतत्व को आते देख गंगा के मुनि तपस्या छोडकर भाव विह्वल से हो गए, केवट जिनके पैर धोकर अपनी दो दो नैया पार लगाता है, उसे कुछ दे न सके यह सोचकर राम लज्जित होते हैं, जानकी के पैरों में चुभे कांटे हाथ से निकालकर अश्रुओं से उन्हें धो रहे हैं, अनंत ब्रह्मांडों का पालक पर्णकुटी में ठहरा है, सर्वानन्द परमात्मा अपनी प्रिया के वियोग में पेड़ पौधों को व्यथा कहने लगा, शबरी के बेर खाकर भगवान में बड़ी तृप्ति है और शबरी की इसी में तृप्ति है, वन काननों को लाखों दुष्टों से हीन करने वाले, मुनियों के सामने विनत हैं, हनुमान को जिन्होंने हृदय में स्थान दिया और खुद हनुमान के हृदय में जा बैठे, पक्षी जटायु का भी पिता समान पिंडदान करने वाले, धर्मरक्षा के लिए नीति से बाली को मारने वाले, उद्दंड वानरों को भी धर्म कार्य में उद्दत कर देने वाले, जिनके नाममात्र से पत्थर पानी में कमल के जैसे खिलने लगे, सारे राक्षस समुदाय का हृदय कम्पित है, मारीच की तरह कुम्भकर्ण भी श्रीविष्णु को जानता है, पर उनके हाथों मरने का उत्साह है, जिनके चरणों में आकर विभीषण पार हो गया, रावण का वध कर सारे भूमण्डल का भार जिन्होंने उतार डाला, सियाजी को पाकर जिनका रोम रोम पुलकित है, और भक्तों के आनन्द का पार नहीं है, भरत का भार उतारने तुरंत ही चल पड़े, अवधपुरी में ऐसा आनन्द समाया कि संसार की दीवाली करोड़ों साल में भी खत्म नहीं हुई, ऐसे अनन्तकोटि ब्रह्माण्डनायक अशरण शरण अकारण करुण कृपण कृपावत्सल करुणा वरुणालय भगवान परात्पर परब्रह्म श्री रामचन्द्र राघवेन्द्र जानकीवल्लभ परमानन्दकन्द का नाम लेना ही पर्याप्त है, यही श्रुतियों का रहस्य है।

भगवान श्री राम जिन्होंने एक पत्नीव्रत का मानवीय आदर्श संसार में चलाया, रावण के अधर्म से संसार का त्राण किया, भारत के आर्यसाम्राज्य को शास्त्र की कल्याणकारिणी आज्ञाओं में कसकर रामराज्य का महान आदर्श बनाया,  उन्हीं भारतरक्षक, धर्मोद्धारक, पापसंहारक श्री राम की विभूति के समक्ष समस्त भारत ने सर झुकाया व झुका रहा है।

आज श्री राम को अनेक प्रकार से कुछ वास्तविक व कुछ काल्पनिक धारणाओं द्वारा जाना जाता हो, किन्तु रामायणकार ने हमें मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम का जो रूप प्रत्यक्ष कराया है, वह सबका ही पूजनीय है, विश्ववंद्य है, परमोज्जवल, पूर्ण सत्य, स्तुत्य और अनुकरणीय है।

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