Hindi

जो सचमुच जानते थे “असंख्य” को : श्रीनिवास रामानुजन

22 दिसम्बर उन महान भारतीय गणितज्ञ श्रीनिवास रामानुजन का जन्मदिवस होता है, जो विश्व के महानतम गणितज्ञों में गिने जाते हैं और जिन्हें गणित के क्षेत्र में वही सम्मान प्राप्त है, जो विज्ञान के क्षेत्र में अल्बर्ट आइन्सटीन को| उनके लिखे कई सूत्र या प्रमेय आज भी हल नहीं किये जा सके है, या कहें कि उनकी उपपत्ति आज भी उपलब्ध नहीं है मगर उन सूत्रों का उपयोग विभिन्न क्षेत्रों में बहुत सफ़लता के साथ हो रहा है। पूरी दुनिया के तमाम महान वैज्ञानिक और गणितज्ञ रामानुजन के द्वारा लिखे गये सूत्रों पर आज भी गहन शोध कार्य कर रहे हैं।

श्रीनिवास रामानुजन का जन्म तमिलनाडु में इरोड में एक बहुत ही साधारण परिवार में 22 दिसम्बर, 1887 को हुआ था। वे बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि के बालक थे और अद्वितीय प्रतिभा, तर्कशक्ति और सृजनात्मकता के धनी थे। मद्रास विश्वविद्यालय से सन 1903 में उन्होंने दसवीं की परीक्षा कई पुरस्कारों के साथ पास की। हाई स्कूल के बाद ही उन्हें अत्यन्त प्रतिष्ठित “सुब्रयमण्यम छात्रवृत्ति” प्रदान की गयी जो कि उस समय गणित और अंग्रेजी के बहुत उत्कृष्ट छात्रों को दी जाती थी।

उनका मन गणित की कठिन से कठिन समस्याओं को सुलझाने में खूब लगता था और इसी कारण वे अन्य विषयों में उचित ध्यान न दे पाने की वजह से ग्यारहवीं कक्षा में फेल हो गये। 1906 में उन्होंने एक बार फिर मद्रास के पचियप्पा कॉलेज में ग्यारहवीं में प्रवेश लिया, और सन 1907 में उन्होंने बारहवी कक्षा की परीक्षा असंस्थागत विद्याथी के रुप में दी मगर पास नहीं हो पाये। उनकी परंपरागत शिक्षा यहीं समाप्त हो गयी पर ज़िन्दगी के विभिन्न पहलुओं और कष्टों को लगातार झेलते हुये भी उन्होंने गणित में अपना शोधकार्य सतत जारी रखा।

इसी बीच 14 जुलाई, 1909 को रामानुजम का विवाह कुंभकोणम के पास राजेन्द्रम गाँव के सम्भ्रान्त परिवार वाले श्री रंगास्वामी की पुत्री जानकीअम्मल से हो गयी। इसके बाद वे नौकरी की तलाश में निकल पडे, परन्तु बहुत प्रयास करने के बावजूद उन्हें सफलता नहीं मिली| बाद मे वे अपने पूर्व शिक्षक प्रोफेसर अय्यर की सिफारिश पर नैल्लोर के तत्कालीन जिलाधीश श्री आर. रामचंद्र राव से मिले जो कि उस समय इंडियन मैथमैटिकल सोसाइटी के अध्यक्ष भी थे।


srinivasa-ramanujan
आर. रामचंद्र राव ने श्रीनिवास रामानुजन की नोटबुक देखकर उनकी योग्यता समझते हुये उनके लिये पच्चीस रुपये प्रतिमाह की व्यवस्था कर दी थी। सन 1911 की शुरुआत से लगभग एक साल तक रामानुजम को यह पारितोषिक प्राप्त होता रहा। इसी साल रामानुजम का प्रथम शोध पत्र “जनरल ऑफ इंडियन मैथमेटिकल सोसाइटी” में प्रकाशित हुआ जिसमें उन्होंने बरनौली संख्याओं के बारे में अध्ययन किया था।

एक वर्ष तक की अवधि वाले पारितोषिक के खत्म होने के बाद 1 मार्च 1912 को उन्होंने जीवनयापन के लिये मद्रास पोर्ट ट्र्स्ट में क्लास 3, चतुर्थ ग्रेड के क्लर्क के बतौर मात्र तीस रुपये प्रति माह के वेतन पर नौकरी शुरु कर दी और इसी दौरण उन्होने विशुद्ध गणित के अनेक क्षेत्रों में स्वतंत्र रुप से शोध कार्य किया| मद्रास पोर्ट ट्रस्ट में रामानुजन के अधिकारियों का रवैया बहुत ही सौहार्द पूर्ण था, वे रामानुजन की गणितीय क्षमताओं के प्रशंसक थे और चाहते थे कि रामानुजन गणित के क्षेत्र में अपना कार्य जारी रखें।

रामचन्द्र राव भी रामानुजन का पूरा ध्यान रखते थे और उनके ही कहने पर मद्रास इंजीनियरिंग कालेज के प्रोफेसर सी.एल.टी. ग्रिफिथ ने रामानुजन के कार्य को विभिन्न प्रसिद्ध और जानकार गणितज्ञों के पास भेजा, जिनमें यूनीवर्सिटी कॉलेज लन्दन के प्रसिद्ध गणितज्ञ एम. जे. एम. हिल प्रमुख थे। प्रो. हिल ने रामानुजन को अपनी समझदारी और प्रस्तुतिकरण में सुधार के सम्बन्ध में कई बार बहुत अच्छे सुझाव दिये लेकिन उन्होंने रामानुजन को विशुद्ध गणित में शोध के क्षेत्र में स्थापित होने के लिये कोई अन्य महत्वपूर्ण प्रयास नहीं किये|

इसके बाद रामानुजन ने कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के प्रमुख गणितज्ञों को पत्र लिखने शुरु किये और इन पत्रों के साथ अपने शोध कार्य के कुछ नमूने भी भेजे ताकि वे उनके कार्य का प्रथम दृष्टतया मूल्याँकन कर सकें। इसी बीच रामानुजन के ही एक पूर्व शिक्षक प्रो. शेषु अय्यर ने उन्हें प्रो.जी.एच. हार्डी को पत्र लिखने की सलाह दी। 16 जनवरी 1913 को पहली बार रामानुजन ने प्रो. हार्डी को पत्र लिखा और साथ में स्वयं द्वारा खोजी गयी प्रमेयों को भी अलग से संलग्न किया। प्रो. हार्डी ने रामानुजन की प्रतिभा को स्वीकार करते हुये उन्हें इंग्लैंड बुलाने के लिये निमंत्रण भी भेजा मगर रामानुजन व्यक्तिगत कारणों से उस समय विदेश जाने को तैयार नहीं हुये पर हां, प्रो. हार्डी के साथ उनका पत्र व्यवहार चलता रहा।

बाद में 22 जनवरी, 1914 को प्रो.हार्डी को लिखे पत्र में वे इंग्लैड जाने के लिये सहमत हो गये और 17 मार्च 1914 को वह समुद्री जहाज से इंग्लैड के लिये रवाना हो गये। अप्रैल से कैम्ब्रिज में उन्होने प्रो. हार्डी से मिलकर शोधकार्य शुरु कर दिया। यहाँ उन्होंने गणित के सिद्धान्तों को और अच्छी तरह से समझने के लिये कुछ अच्छे प्रोफेसरों की कक्षाओं में जाना शुरु कर दिया। धीरे धीरे श्रीनिवास रामानुजन ने अपनी प्रतिभा से सबको प्रभावित करना शुरु किया।

मार्च 1916 में उन्हें कैन्ब्रिज विश्वविद्यालय के द्वारा अपने 62 पृष्ठों वाले अंग्रेजी में प्रकाशित शोध लेख “हाईली कम्पोजिट नम्बर्स” के आधार पर बी.ए. (शोध के द्वारा) की उपाधि दी गयी। सन 1915 से 1918 तक उन्होंने कई शोध पत्र लिखे। 6 दिसम्बर, 1917 को रामानुजन प्रो. हार्डी के प्रयासों से लंदन मैथमेटिकल सोसाइटी में चुन लिये गये। । इसके बाद, मई 1918 में श्रीनिवास रामानुजन को “रॉयल सोसाइटी ऑफ लन्दन” का फेलो चुन लिया गया, जो उन दिनों किसी भी भारतीय के लिये बहुत ही सम्मान की बात थी।

गिरते स्वास्थ्य के बीच भी उनका शोधकार्य अनवारत जारी रहा और अपने चार साल के अल्प प्रवास में उन्होंने असाधारण उपलब्धियाँ प्राप्त कीं | 27 मार्च, 1919 को रामानुजन बम्बई आ गए, परन्तु उनका शोधकार्य जारी रहा| अपने अन्तिम समय में उन्होंने मॉक थीटा फलन और फाल्स थीटा फलन पर शोध कार्य किया जो कि उनका सबसे महत्वपूर्ण और विशिष्ट कार्य माना जाता है।

26 अप्रैल, 1920 को श्रीनिवास रामानुजन लम्बे समय तक खराब स्वास्थ्य के कारण सुबह ही अचेत हो गये और कुछ घन्टों बाद वह चिर निद्रा में सो गये। भारतीय प्रतिभा के प्रतीक और सिरमौर, जो अपने शोध कार्य और गणितीय प्रतिभा के कारण अनन्त काल तक हमें प्रेरणा देते रहेंगे, ऐसे श्रीनिवास रामानुजन को शत शत नमन एवम् विनम्र श्रद्धांजलि|

विशाल अग्रवाल (लेखक भारतीय इतिहास और संस्कृति के गहन जानकार, शिक्षाविद, और राष्ट्रीय हितों के लिए आवाज़ उठाते हैं। भारतीय महापुरुषों पर लेखक की राष्ट्र आराधक श्रृंखला पठनीय है।)

यह भी पढ़ें,

आधुनिक विज्ञान से भी सिद्ध है पितर श्राद्ध की वैज्ञानिकता
आधुनिक विज्ञान की नजर में मटकों से सौ कौरवों का जन्म
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

The Analyst is India’s fastest-growing News & Media company. We track everything from politics to Finance, fashion to sports, Science to religion. We have a team of experts who do work around the clock to bring stories which matter to our audience.

Copyright © 2018 The Analyst. Designed & Developed by Databox

To Top