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क्यों बिगड़ रहे हैं युवा ? क्या सुधारने का कोई रास्ता है?

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    योगसूत्र के अनुसार कुसंस्कार बनते हैं पूर्व जन्म और इस जन्म के लगातार किए जा रहे बुरे कर्मों से। यह कुसंस्कार ही हैं वह कचरा जो कि चित्त पर इकट्ठा होता रहता है। इसलिए आजकल चित्त क्या बन गया है? डस्टबिन या डंपयार्ड!! कई बार न्यूज़ आती है कि कचरे का पहाड़ ढहने से इतने लोगों की मौत हो गई। उसी तरह चित्त के डस्टबिन में कुसंस्कारों का कचरा ओवरफ्लो होने से कहीं हमारा नाश न हो जाए उसके लिए उन कुसंस्कारों को हटाते रहना होगा ना? तो कैसे हटाएंगे? वह हटाते हैं तप से। तप क्या होता है? किसी भी चीज की शुद्धि के लिए जो साधन किया जाता है वह तप होता है। उदाहरण के लिए दूध को अग्नि पर तपाते हैं तो उबलकर दूध की अशुद्धियां नष्ट हो जाती हैं और वह पीने लायक बन जाता है। ऐसे ही स्वर्ण को खूब तपाया जाता है तब उसमें चमक आती है। यह साधन कष्टप्रद ही होता है, अग्नि में जलना किसे सहनीय है? पर सारे दोष अग्नि ही भस्म करती है। इसलिए शरीर का जो इन्द्रिय निग्रह है, उससे उत्पन्न अग्निस्वरूप कष्ट ही हमारे चित्त के कुसंस्कार रूपी अशुद्धियों को भस्म करता है और चित्त की शुद्धि करता है। इस तप के अनेक साधन हैं जैसे प्राणायाम या व्रत-उपवास। इन्द्रियों को वश में करना हमारे लिए सरल नहीं है, पर इन्द्रियाँ ही हैं जो पाप करके हमारे कुसंस्कार बढ़ाती हैं इसलिए उन्हें किसी प्रकार तो नियंत्रण में लाना होगा ना? तो उसका रास्ता भगवान ने गीता में उपवास करना बताया है। तप-उपवास की ज्यादा scientific details पर एक पृथक पोस्ट लिखूंगा। यहाँ मेरा विषय यह था कि आजकल लड़के सहित लड़कियां बहुत ज्यादा क्यों बिगड़ रही हैं। उन कूल डूड-डूडनियों की बात करते हैं।

    हिन्दू धर्म में अलग अलग चौथ, बारस, एकादशी, जन्माष्टमी, शिवरात्रि, शिवजी के सोमवार, हनुमानजी के मंगलवार, नवरात्रि आदि व दीपावली तक पर उपवास का विधान रहता है। सालभर किसी न किसी पर्व के माध्यम से उपवास का क्रम चलता रहता है। पर आजकल यह क्रम बहुत बुरी तरह प्रभावित हो रहा है। जो कहता है कि कृष्णजी के बर्थडे पर व्रत क्यों? बल्कि केक काटकर व 56 भोग खाना चाहिए उसके दिमाग में भूसे की मात्रा काफी अधिक है। अब dieting तो फैशन है पर व्रत-उपवास आउटडेटेड बन रहे हैं।

    समाज की धुरी नारी होती है, पूरी संस्कृति उसी नारी पर निर्भर है। नारी जितनी सुरक्षित, शिक्षित, श्रेष्ठ, धार्मिक और पवित्र है, धर्म का राज्य उतना ही सुरक्षित है। यही चिंता अर्जुन द्वारा श्रीकृष्ण से भी व्यक्त की गई थी कि युद्ध का सबसे बड़ा नुकसान होता है नारियों पर संकट और उनकी सुरक्षा के अभाव में उनका भ्रष्ट हो जाना। इसीलिए हिन्दू धर्म में पुरुषों से अधिक नारियों के उपवास हैं, यानी नारियां पुरुषों से अधिक तपस्वी हैं जो हज़ारों वर्षों से सनातन परम्परा से अपने परिवारों को जोड़े हुए हैं और श्रेष्ठ से श्रेष्ठ संतानों को जन्म दे रही हैं। पन्ना धाय जैसी वीरांगना कहीं और मिल सकती है क्या? वह सब वीरता कैसे अर्जित होती है कि अपने पुत्र को धर्म के लिए बलिदान दे दे? उसका उत्तर यही तप है।

    पुरुषों के उपवास स्त्रियों की तुलना में कम हैं इसलिए देखा जाता है कि पूर्वकाल में लड़के ज्यादा भ्रष्ट होते थे पर नारियां नहीं। और जो धर्मपरायण तप साधना करने वाले परिवार थे वे बहुत कम भ्रष्ट होते थे। केवल 100 साल पूर्व प्रेमचन्द के उपन्यास पढ़ने से ही पता चल जाएगा कि आचार भ्रष्ट लोग कैसी जातियों के थे। जिन जातियों में तप(व्रत/उपवास) का अभाव है। पर आजकल लड़कियां भी अर्थात् कूल-ड्यूडीनियाँ भी बहुतायत में भ्रष्ट हो रही हैं। दारू/सुट्टा/चरस/गांजा पीने वाली और 5-5 बॉयफ्रेंडों वाली, कम कपड़ों में शान समझने वालीयों की बाढ़ सी आ गयी है। इन्हें एक फेमिनिज़्म नाम की वीड भी चढ़ गई है।

    यह सब एकाएक क्यों बढ़ गया? क्योंकि फिल्मों आदि और वेस्टर्नाइज़ेशन से पाप तो बहुत बढ़ गया पर संस्कार/चित्त शुद्धि एकदम घट गई। पहले व्रत उपवासों में घर परिवार वाले इतनी छूट नहीं देते थे, पर अब एकदम खुला छोड़ रखा है। साल में दो दिन जन्माष्टमी और शिवरात्रि के उपवास में भी कूलडूड-डूडनियों को मौत आ जाती है, मज़ाक बनाते हैं। तप से ही दिमाग का भूसा झड़ता है, इसीलिए व्रत उपवास के द्वारा स्त्रियां पतन से सुरक्षित रहती हैं। पर इस मामले में बिल्कुल ही ढील दे दी गयी, उसीका परिणाम अब खूब दिख रहा है। इसलिए लड़के- लड़कियों को बचपन से ही विभिन्न त्यौहारों पर कठोर उपवास व्रत आदि कराने चाहिए ताकि कुसंस्कारों का नाश हो और सद्बुद्धि आए।

    जरा सा बच्चे को भूख लग आई तो चार तरह के बिस्किट लेकर दौड़ना कोई सही बात नहीं है। आजकल तो कोई बच्चा भी अगर व्रत करना चाहे तो नहीं करने देते हैं। इससे बच्चे के दिमाग में कचरा ही बढ़ेगा। एक दिन न खाने पीने से कोई मर नहीं जाता है, इतना कष्ट सहना ही चाहिए। पिज़्ज़ा-बर्गर देखकर दांत चियारते रहना ही जीवन का उद्देश्य नहीं है। जिसको भी दिमाग ठिकाने पर लाना है अपनी सामर्थ्यनुसार व्रत उपवास तप करना ही चाहिए। व्रत उपवास के द्वारा चित्तशुद्धि न करने से कूल ड्यूड ड्यूडिनीयों के दिमाग का कचरा बढ़ता ही रहता है और वे तरह तरह के नीच कर्म करते हैं, वामपंथी बनते हैं, फेमिनिस्ट बनते हैं। चित्तशुद्धि के अन्य भी रास्ते हैं जैसे योग प्राणायाम, सन्ध्यावंदन, सात्विक रहन-सहन, पूजा-पाठ आदि।

    धीरे धीरे करके बचपन से ही बच्चों को व्रत-उपवास का अभ्यास कराना चाहिए और उनका महत्व बताना चाहिए, सकारात्मक दृष्टिकोण देना चाहिए। इस स्वच्छन्दता के चक्कर में चौथ/बारस/ग्यारस आदि अनेक उपवास नष्ट हो रहे हैं। अगली पीढ़ी तक वे कैसे पहुंचेंगे? शहरों में अब यह चित्तशुद्धि के लिए उपवास वाले छोटे छोटे पर्व लुप्त हो रहे हैं। जो गिने चुने उपवास होते भी हैं उसपर भी बहुत सारे व्यंजन बनाकर पेटपूजा कर ली जाती है। फिर उसका मतलब ही क्या रह जाता है? यहाँ कोई ये न समझे कि भूखा रह रहकर मर जाना चाहिए, नहीं! बल्कि अपने सामर्थ्य के अनुसार शास्त्रीय विधि से व्रत उपवास करने चाहिए। शरीर को नुकसान देने वाले मनमाने व्रत नहीं करने चाहिए। ज्योतिष में भी इसीलिए अलग अलग वारव्रत होते हैं ताकि सम्बन्धित कुसंस्कार नष्ट होकर अशुभ कर्मफल से राहत मिले। व्रत उपवास द्वारा पाप/कुसंस्कार नष्ट होना पूरी तरह साइंटिफिक है।

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      Mudit Mittal

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