कपड़े तो धुल गए हैं अब सोचती हूँ किस बात पर पुरुष और पितृसत्ता को कोसा जाए!

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पितृसत्ता

चार दिन से सोसाइटी के दो ब्लाक में लाइट नहीं थी, दोनों ब्लाक पॉवर बैक-उप पर चल रहे थे।किसी काम में अड़चन नहीं थी बस वाशिंग मशीन चल नहीं रही थी तो whatsapp ग्रुप पर महिलाएं परेशान थी। कपड़ों का ढेर लग रहा है और बिजली कब आएगी कुछ पता नहीं। मैंने स्थिति भांप कर थोड़े-थोड़े कपड़े हाथ से ही धोने शुरू कर दिए। दाहिने हाथ का दो बार ऑपरेशन होने के कारण जोर ज़रा कम लगता है मगर काम चल जाता है। तीसरे दिन महिलाओं के सब्र का बाँध टूट गया और फैसिलिटी ऑफिस (जिसका काम है इस तरह की गड़बड़ को ठीक करना ) पर धावा बोलने की तैय्यारी होने लगी। खैर चौथे दिन रात को बिजली आ गयी और ग्रुप में शांति हो गयी। सुबह मैंने देखा सबकी बालकनी गीले कपड़ों से भरी हुई थी। मैंने भी चादर, पैंट जैसे भारी कपडे धोने को डाले और सोचने लगी वो भी क्या दिन थे जब मशीन नहीं थी या आम आदमी के बस की नहीं थी। पितृसत्ता 

हमारी माएँ कपड़ों का ढेर धोते धोते कमर दुखा लेती थी और उनको कोई प्रताड़ना नहीं नज़र आती थी। आज हमारे पास वाशिंग मशीने हैं, फ्रिज है, मिक्सी है और हम तब भी दुखी हैं। ना जाने कौन सी आज़ादी खोज रही हैं। वो आज़ादी जो ना हाथ आती है ना समझ में आती है। देश के कई कोनों में आज भी महिलाएं सब काम अपने हाथों से करती हैं और घर की पूरी ज़िम्मेदारी लेती हैं। उनको भी आज़ादी का सपना दिखाया जा रहा है, वो भी काल्पनिक आज़ादी मिलने के बाद हमारी तरह कंफ्यूज ही रहेंगी। उत्तर आधुनिक काल में जितने भी अविष्कार हुए सब का हिसाब लगा लीजिये, आप पाएंगे इससे महिलाओं का काम आसान हुआ है। अब अगर कोई यह बहस करे कि घर संभालना महिलाओं का ही काम क्यों है तो उसके लिए उत्तर यह है कि आदमी के सामने आपने चुनाव छोड़ा है क्या ? आप कहेंगे कार का अविष्कार हुआ मैं कहूँगी ज़रूर हुआ मगर उसमे बैठकर ज़्यादातर आदमी नौकरी की जद्दोजहद करते हैं। पितृसत्ता 

कुछ एक अपवादों को छोड़कर महिलाएं ही घर संभालती आयी हैं और घर सम्लभाने का काम इन मशीनों ने आसान बना दिया है। मगर पुरुष के जीवन में अंतर नहीं आया वो कल भी घर के लिए कमाने और खाने का जुगाड़ करता था, आज भी वही कर रहा है। महिलाएं कमा भी रही हैं तो उनमे से कितनी है जो सचमुच वैसे खर्च करती हैं जैसे पुरुष करता है। आज भी खतरे वाले सब काम पुरुषों के ही हिस्से में हैं, वे सबसे ज़्यादा टैक्स भरते और गाली सहते हैं। जिस जेंडर वॉर की फेमिनिस्टों ने बिना सोचे समझे शुरुआत की उसका सबसे ज़्यादा नुक्सान पुरुषों को हुआ है। और आने वाले दिनों में महिलाओं को भी यह नुकसान देखने को मिलेगा क्योंकि पुरुषों से इतर कोई दुनिया नहीं हो सकती और आज़ादी का सपना दिखाने वाले महिलाओं को ज़िम्मेदारी लेना नहीं सीखा रहे। पितृसत्ता 

ज़रा ध्यान से समझियेगा इस चाल को कि किसी बड़ी कॉर्पोरेट कंपनी में दिन रात जान देने वाली महिलाओँ को वो लोग सबल मानते हैं और अपने घर के लिए दिन रात जान देने वाली महिलाओं को प्रताड़ित कहते हैं। मैंने कई महिलाओं को यह कहते हुए सुना है कि इतनी पढ़ाई क्या घर सँभालने और बच्चे पैदा करने के लिए की थी। बच्चे पैदा करना उनको अच्छी परवरिश देना और घर को सुघड़ बनाना एकदम निकृष्ट काम है, ऐसी विचारधारा को महिलाओं के दिमाग के अंदर भरने में बाजार या दूसरे शब्दों में कहे फेमिनिज्म सफल रहा है। महिलाएं जब तक समझेंगी तब तक बहुत देर हो चुकी होगी ऐसा मुझे लगता है। खैर,कपड़े तो धुल गए हैं अब सोचती हूँ किस बात पर पुरुष और पितृसत्ता को कोसा जाए। पितृसत्ता 

– ज्योति तिवारी, पुरुष अधिकार कार्यकर्ता, लेखिका व सामाजिक सरोकार से जुड़े कार्य करती हैं. उनकी किताब ‘अनुराग‘ बेस्ट सेलर पुस्तक रही है.

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