क्या है ‘योग’ और ‘क्षेम’ का अर्थ

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1946

योग, क्षेम, वृद्धि, निक्षेप [हिन्दी + आङ्ग्ल]
‘yoga’, ‘kṣema’, ‘vṛddhi’ and ‘nikṣepa’ [Hin + Eng]

बहुधा हम ‘योग’ और ‘क्षेम’ शब्द साथ में सुनते हैं। अप्राप्त का लाभ होना ‘योग’ है (अलब्धस्य लाभो योगः) और प्राप्त का रक्षण ‘क्षेम’ है (लब्धस्य रक्षणं क्षेमः)। ‘याज्ञवल्क्य-स्मृति’ में याज्ञवल्क्य इनके साथ ‘वृद्धि’ और ‘निक्षेप’ की भी बात करते हैं। जो रक्षित है उसका वर्धन ‘वृद्धि’ है (रक्षितस्य वर्धनं वृद्धिः) और जो वृद्ध (बढ़ा हुआ) है उसका सुपात्रों में दान ही ‘निक्षेप’ है। योग, क्षेम, वृद्धि, और निक्षेप धन आदि सांसारिक अर्थों के लिए भी और विद्या आदि पारमार्थिक अर्थों के लिए भी उपयुक्त है। याज्ञवल्क्य कहते हैं—

We hear the words ‘yoga’ and ‘kṣema’ together many a time. ‘Yoga’ is acquisition of that which we do not have (अलब्धस्य लाभो योगः) and ‘kṣema’ is protection of that which has been acquired (लब्धस्य रक्षणं क्षेमः). In the ‘Yājñavalkya Smṛti’, Yājñavalkya talks about two more concepts, ‘vṛddhi’ and ‘nikṣepa’. ‘Vṛddhi’ is increasing that which has been protected (रक्षितस्य वर्धनं वृद्धिः) and ‘nikṣepa’ is giving that which has increased to a worthy recipient (वृद्धस्य सुपात्रे दानं निक्षेपः). This can apply to both worldly pursuits like wealth and higher pursuits like knowledge. Says Yājñavalkya—

अलब्धमीहेद्धर्मेण लब्धं यत्नेन पालयेत्।
पालितं वर्धयेन्नीत्या वृद्धं पात्रेषु निक्षिपेत्॥
(याज्ञवल्क्यस्मृतिः १.३१७)

alabdhamīheddharmeṇa labdhaṃ yatnena pālayet।
pālitaṃ vardhayennītyā vṛddhaṃ pātreṣu nikṣipet॥
(yājñavalkyasmṛtiḥ 1.317)

“जो अलब्ध हो उसे धर्म द्वारा पाने का यत्न करे। [इस प्रकार] जो लब्ध हो उसकी यत्न द्वारा रक्षा करे। जो रक्षित हो उसका नीति द्वारा वर्धन करे। और जो वृद्ध (बढ़ा हुआ) हो उसे सुपात्रों में दे।”

“With dharma, one should strive/yearn for that which one does not have. With effort, one should protect that which is obtained. With wisdom, one should increase that which is protected. One should donate that which has increased to those who deserve.”

भगवान श्री कृष्ण गीता में कहते हैं _

अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।

तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्।।9.22।। ( भगवद्गीता)

“जो अनन्य भक्त मेरा चिन्तन करते हुए मेरी उपासना करते हैं? मेरेमें निरन्तर लगे हुए उन भक्तोंका योगक्षेम (अप्राप्तकी प्राप्ति और प्राप्तकी रक्षा) मैं वहन करता हूँ।”

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