2078 राक्षस नाम संवत्सर ही शास्त्रीय

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राक्षस नाम संवत्सर 2078
◆वर्ष २०७८ राक्षस नाम संवत्सर ही शास्त्रीय◆
डॉ. पारसनाथ ओझा, प्रधान सम्पादक, श्रीआदित्य पञ्चाङ्ग वाराणसी
 
◆ प्रभवादि संवत्सर का आनयन-
आचार्यों ने सौरमान, चान्द्रमान तथा मध्यम गुरूमान से प्रभवादि सवत्सरों की प्रवृत्ति माना है।
 
◆ प्रभवादि संवत्सर विवेचन- यथा महर्षि नारदमुनि, “गृह्यते सौरमानेन प्रभवाद्यब्द लक्षणम्”, “सौरस्तु मेषादि मीनान्तः।” अर्थात् सौरमेषादि के समय स्पष्टगुरू का जिस प्रभवादि संवत्सर प्रवेश होता है, वहाँ सौर प्रभवादि संवत्सर होता है। इसका विचार दक्षिण भारत में या पश्चिम के देशों में जिस स्थान पर सौरमेषादि से पंचाङ्ग गणना की जाती है वहाँ सौर प्रभवादि संवत्सर होता है।
“तस्यास्तु दक्षिणे भागे सौरमानेन वर्तते ।
एवं संवत्सरो पूर्णे कुर्यादुद्यापन क्रियाम् ||”
इच्छुक पाठकों को इस सन्दर्भ में विशेष कालमाधव आदि में देखना चाहिये ।
 
◆ चान्द्रप्रभवादि संवत्सर विवेचन-
“तत्र चान्दः संवत्सरश्चैत्रशुक्ल प्रतिपदादि फाल्गुनदर्शान्तः।” अर्थात् चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन स्पष्टगुरू मान से जो प्रभवादि संवत्सर का प्रवेश होता है वहीं प्रभवादि संवत्सर चान्द्र प्रभवादि संवत्सर होता है जो वर्षपर्यन्त संकल्पादि में ग्राह्य है तथा स्पष्टगुरू मान से जो मास तथा प्रभवादि संवत्सर होता है उसी का फल विचार संहिता ग्रन्थों में ग्राह्य है।
निर्णय सिन्धु में महर्षि आर्ष्टिवेण के अनुसार सभी शुभकार्यों में चान्द्रप्रभवादि को ही ग्रहण करना चाहिये।
यथा- (निर्णयसिन्धु) (वृ.सं०गुरू चा०अ०श्लो०-१)
स्मरेत्सर्वत्र कर्मादौ चान्द्रसंवत्सरं सदा।
नान्यं यस्माद्वत्सरादौ प्रवृत्तिस्तस्य कीर्तिताः।।
नक्षत्रेण सहोदयमुपगच्छति येन देवपतिमन्त्री।
तत्संज्ञ वक्तव्यं वर्ष मासक्रमेणैव ।।
माधवाचार्य के अनुसार भी पाँच कालमान मानव के दैनिक उपयोग में आते हैं यथा–
तत्राब्दो माधवमते पञ्चधा सावनः सौर: चान्द्रो नाक्षत्रो बार्हस्पत्य इति।
यद्यपि ज्योतिषे गुरोर्मध्यराशिभोगेन प्रभवादीनां मघादी प्रवृतिरूक्ता, तथापि प्रभवादीनां चान्द्रत्वमप्यस्ति ।
व तत्र चान्द्रोऽब्दः षष्टिभेदः ।
निर्णयसिन्धौ प्रथम परिच्छेद गर्गेणोक्तम् यथा- प्रभवो विभवशुक्ल – क्रोधन क्षयरिति।
 
◆ गुरूप्रभवादि संवत्सर विवेचन- “मध्यगत्या भभोगेन गुरो गौरववत्सरः” इत्यादि कथनानुसार गुरु मध्यम गति से एक राशि भोगकर दूसरी राशि प्रवेश करता है तो उस प्रवेश काल तक एक बार्हस्पत्य
वर्ष या बार्हस्पत्य संवत्सर होता है। उस समय प्रभवादि षष्टि संवत्सरों का गणितागत जो संवत्सर हो उसका प्रवेश होता है।
 
सूर्यसिद्धान्त अ.१४ में ब्रह्म, दिव्य, पैत्र्य, प्राजापत्य, गौरव, सौर, सावन, चान्द्र एवं नक्षत्र काल में नव प्रकार के काल मानों की चर्चा है। इन नव विधकाल मान में कुछ आचार्यों के मत से मानव जीवन में चार प्रकार के कालमान तथा कुछ आचार्यों के मत से पाँच प्रकार के कालमान का व्यवहार होता है। अर्थात् सौर, सावन, चान्द्र एवं नाक्षत्र कालमान में मानव के दैनिक उपयोग में आते हैं। इसलिये आचार्यों ने इन चार कालमानों को मुख्य माना है। सामान्यतया गुरू एक राशि पर तेरह मास रहता है। इसलिये गौरव (बार्हस्पत्य) मान को स्थूल मानकर इसका ग्रहण नहीं किया जाता है। किन्तु कुछ आचार्यों ने गौरवकाल ग्रहण किया है। इस प्रकार गौरव (बृहस्पति) काल को लेकर पाँच कॉलमोन मानव जीवन के दैनिक उपयोग में आते हैं।
 
◆यथा
ब्राह्मं दिव्यं तथा पैत्र्यं प्राजापत्यं च गौरवम्।
सौरञ्च सावनं चान्द्रमार्क्षं मानानि वै नव।।
चतुर्भिव्यवहारोऽत्र सौर चान्द्रार्क्ष सावनैः।
बार्हस्पत्येन षष्ट्यब्द ज्ञेयं नान्यैस्तु नित्यशः।।
पञ्चभिर्व्यवहारः स्यात् सौरचान्द्रार्थसावनैः।
बार्हपत्येन मर्त्यानां नान्यमानेन सर्वदा।।
गुरू के मध्यम गति मान से जो मास तथा गुरु के मध्यमगति मान से जो मास तथा प्रभवादि सवत्सर की प्रवृत्ति होती है वह मास तथा प्रभवादि संवत्सर मध्यम होता है। शास्त्रानुसार वर्तमान में मध्यममान से किया गया फलादेश मानव जीवन में घटित नहीं होता। अतः भास्कराचार्य ने सिद्धान्त शिरोमणि में स्पष्ट लिखा है–
 
बृहस्पतेर्मध्यमराशिभोगात्संवत्सरं सांहितिका वदन्ति ।
ज्ञेयं विमिश्रं तु मनुष्मानं मानेश्चतुर्भिः व्यवहारवृत्ते ||
राक्षस संवत्सर अखिल भारतीय विद्वत्परिषद वाराणसी
अखिल भारतीय विद्वत्परिषद, वाराणसी ने लगाई राक्षस संवत्सर पर मुहर
 
◆ सूर्यसिद्धान्त में भी कहा गया है कि, “चतुर्भिर्व्यवहारोऽत्र सौर चान्द्रार्क्ष सावनैरिति”, बृहज्ज्यौतिषसार में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि मध्यममान से जो भी प्रवृत्त सौर, सावन, चान्द्र, नाक्षत्र एवं प्रभवादि मान है, उन सभी कालमानों (पाँच कालमानों) का मानव के व्यवहारिक जीवन मे उपयोग नहीं होता। सौरादि पाँच कालमानों की गणितीय शुद्धि कर बुद्धिमान को यज्ञ, विवाहादि समस्त शुभकार्यों को करना चाहिये।
◆यथा– प्रभवाद्यब्दमाने तु बार्हस्पत्यं प्रकीर्तितम् । एतच्छुद्धिं विलोक्यैव बुधः कर्म समारभेत्।। (वृ.ज्यो.सा. का. श्लोक-२३)
 
भास्कराचार्य आदि ने जो मध्यम गुरू राशि भोग को प्रभवादि संवत्सर कहा है वह सत्य है परन्तु फल निर्देश स्पष्टगुरू भोग राशि के अनुसार होता है। यथा- (बृहद् दैवज्ञरञ्जन प्र.भा.च.प्र. श्लो-४२)
“बृहस्पतेमध्यमित्यनेन मध्यमगुरुराशिपूरण समय एवं प्रभवादिषष्ट्यब्दप्रवृत्तिरितिसूचितम् ।
फल निर्देशस्तु गुरूमानोत्पन्नप्रभवादिसंवत्सराणा मित्येवाह ।।”
 
मध्यम गुरू द्वारा जो प्रभवादि संवत्सर होता है उसका दैनिक जीवन में उपयोग न होने से तथा फलादि के अभाव होने से तृतीय पक्ष (मध्यम गुरू से उत्पन्न संवत्सर) का त्याज्य किया गया है।
◆ यथा दैवज्ञरञ्जन चतुर्थ प्रकरण
“तृतीयपक्षस्तु फलाभावादुपेक्ष इत्यपल्यते।”
◆ शुद्धसंवत्सर की परिभाषा – यथा बृहज्ज्यौतिषसार
“स्फुटेज्येऽजादिगे यो यो वत्सरः परिपूर्यते ।
सृष्टितो विजयाद्यास्तेऽथवा चाश्विन पूर्वकाः।।
यत्रैक राशिसञ्चारो भवेन्मार्गगतेः गुरोः।
शुद्धः संवत्सरः स स्यात्सर्वेषां च शुभप्रदः।।”
 
◆◆◆अर्थात् स्पष्टगुरू मेषादि राशि में रहने पर जो संवत्सर पूर्ण होता है वे ही सृष्टयादि से विजय (प्रभव) आदि साठ संवत्सर अथवा आश्विन्यादि १२ मास होते हैं। यही शुद्ध संवत्सर होता है। शुद्ध संवत्सर ही सभी के लिये शुभ फलदायक होता है। इससे स्पष्ट होता है कि मध्यम गुरू मान से मध्यम संवत्सर तथा स्पष्ट गुरूमान से शुद्ध संवत्सर की पूर्ति होती है। जो चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन स्पष्ट गुरूमान से जो प्रभवादि संवत्सर की प्रवृत्ति होती है वही पञ्चाङ्गों में लिखे जाते हैं तथा वर्षपर्यन्त संकल्पादि में प्रयोग किये जाते हैं।◆◆◆
 
◆ अतिचार गुरू के लक्षण–
यत्र वर्षे द्विचारः स्यादतिचारः स उच्यते।
तदा कर्मशुभं त्याज्यमष्टाविंशति वासरान् ||
जिस संवत्सर में स्पष्ट गुरू का दो राशि में सञ्चार हो वह अतिचारी कहलाता है।
गुरु के द्विचार होने पर शुभकार्यों में अट्ठाईस दिन तक त्याज्य होता है।
 
◆लघ्वातिचार तथा लुप्तसंवत्सर विचार
अतिचारी गुरूवक्रो भूत्वाऽऽगच्छति पूर्वभम्।
तदा लघ्वतिचारः स्यादन्यथा लुप्तवत्सरः ||
यस्मिन् राशौ स्फुटेज्यस्य वत्सरान्तो न जायते।
तदाशिवत्सरस्यैव नाम्नो लोपः प्रजायते ।
 
जिस संवत्सर में स्पष्ट गुरू तीन राशियों का भोग करें वहाँ महातिचारी होता है। अतिचारी तथा महातिचारी होने पर गुरू वक्री होकर पूर्व राशि में आ जाय तो लघ्वातिचारी होता है। गुरू के लघ्वातिचारी की स्थिति में संवत्सर का लोप नहीं होता। गुरू के महातिचारी (एक संवत्सर में गुरू के तीन राशियों का स्पर्श) की स्थिति में ही सवत्सर का लोप होता है।
 
मु०चि० शुभाशुभ प्र०श्लो०-५३ के अनुसार- मेष, वृष, कुम्भ और मीन राशियों के अतिरिक्त शेष आठ राशियों में गुरू तीन राशियों का स्पर्श कर यदि गुरु वक्री होकर पुनः पूर्व राशि में नहीं आता है तो लुप्त संवत्सर होता है। इसका दोष गंगा और रेवा नदी के बीच स्थान में लगता है।
 
◆ अन्यञ्च – (वृ.द.र.प्र.३४ श्लोक १२, १४)
“एकस्मिन्वत्सरे जीवः स्पृशेद्राशित्रयं यदि। लुप्तसंवत्सरो नाम निन्दितः सर्वकर्मसु।। अतिचार गतो जीवस्तं राशिं नैति चेत्पुनः। लुप्त संवत्सरो ज्ञेयो गर्हितः सर्वकर्मसु।।”
 
उपर्युक्त शास्त्रवचनों से स्पष्ट है कि गुरू के मध्यममान से लुप्तसंवत्सर का निर्णय नहीं होता तथा चान्द्रसंवत्सर में जो स्पष्ट गुरूमान से चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से प्रभवादि संवत्सर की प्रवृत्ति होती है उससे ही पञ्चाङ्गों में फलादेश लिखा जाता है।
 
◆ सूर्यसिद्धान्तानुसार संवत् २०७४ शकाब्द १९३९ स्पष्ट गुरु की स्थिति
 
शुक्ल प्रतिपदा बुधवार (दि० २९ मार्च २०१७ ई०) को वक्री स्पष्ट गुरु ०५:२७:५०:५२ पर था। भाद्रपद शुक्ल त्रयोदशी सोमवार (दि० ४ सितम्बर २०१७ ई०) को सायं ०६:२५ पर तुला में प्रवेश | फाल्गुनकृष्ण षष्ठी मंगलवार (दि० ६ फरवरी २०१८ ई०) को दिवा १०:४३ पर वृश्चिक में प्रवेश | चैत्रकृष्ण अमावस्या शनिवार (दि० १७ मार्च २०१८ ई०) को मार्गी स्पष्ट गुरु ०७:०१:४१:२१ पर था। संवत् २०७४ में स्पष्ट गुरू तीन राशियों का स्पर्श कर पुनः वक्री होकर पूर्व राशि (तुला) राशि) में नहीं आया है। अतः लुप्तसंवत्सर परिभाषा के उपर्युक्त शास्त्रवचनानुसार संवत् २०७४ में संवत्सर का लोप किया गया था। अतः उसके बाद से क्रमानुसार इस वर्ष संवत् २०७८ में राक्षस संवत् प्राप्त होता है। अखिल भारतीय विद्वत्परिषद, वाराणसी ने भी वर्ष २०७८ को राक्षस संवत्सर ही घोषित किया है। विश्व पञ्चाङ्ग (काशी हिन्दू विश्वविद्यालय) के अनुसार भी राक्षस संवत्सर ही है। इसलिए संकल्पादि में राक्षस संवत् का ही प्रयोग करें। राक्षस संवत्सर २०७८।

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