तालाब, कुँओं और बावड़ियों के पिता, ‘अनुपम मिश्र’

अनुपम मिश्र

अपनी नाभि में छिपी कस्तूरी को पाने के लिए हिरण इधर से उधर भागता रहता है. पर कभी उसे संतोष नहीं मिलता. ऐसे ही इंसान विकास के पीछे भागता रहता है. पर उसकी महत्वाकांक्षा पूरी नहीं होती. इस दौड़भाग में इंसान ने जिस नाभि में विकास छिपा था उसे भी नष्ट करने में कोई कसर नहीं रखी. भूमि रूपी नाभि का शोषण करके उसे दयनीय स्थिति में ला पटका. साँस लेने को अच्छी हवा नहीं छोड़ी. पीने को अच्छा पानी नहीं छोड़ा और खाने के लिए फसल भी जहर से सींच दी है. प्रकृति के हर अंग को नोंच नोंच कर उसे कुरूप बना डाला है. हमारे पूर्वजों ने करोड़ों वर्षों तक पृथ्वी से ऐसा सम्बन्ध बनाया था कि दोनों लाभान्वित होते थे. प्रकृति को बिना हानि पहुंचाए सबकी जरूरतें पूरी होती थीं. पर विकास के अंधों ने पृथ्वी माता से वेश्या जैसा व्यवहार किया.

प्राचीन भारत में जल का महत्व

अतीत में भारत ने प्रकृति संरक्षण के हर सम्भव प्रयास किए थे. बल्कि प्रकृति को जिया था. उससे एक दोस्त जैसा व्यवहार किया था. जो उससे जितना लेता है तो उतना दे देने की इच्छा मन में रखता है. उन्होंने पृथ्वी को माता मानकर उसकी सेवा भी की थी और पर्जन्य को पिता मानकर व्यवहार किया था. अथर्ववेद में पृथ्वी की उत्पत्ति भी इस जल से ही कही गई है. जल से पृथ्वी माता सन्तानों को जन्म देती है. जल से अन्न औषधि उत्पन्न कर सन्तानों का पालन करती है. जल का पृथ्वी से परमान्तरंग घनिष्ठ सम्बन्ध है. इसलिए जल की अत्यंत महत्ता भारतीय सनातन संस्कृति में मानी गई है. इसलिए ‘जल ही जीवन है’ यह कोई सोचने वाली बात नहीं है.

Related image

भारतियों ने जल संरक्षण के लिए एक से एक प्रयास किए . जिनमें तालाबों, कुण्डों, झीलों, बावड़ियों का निर्माण मुख्य रूप से किया गया था. जल प्रबंधन के इन उपायों से भूजल का स्तर कभी कम नहीं होता था और सालभर पीने का पानी सुलभ रहता था. भारत के बहुत से गांवों, कस्बों में आज भी जल संरक्षण और प्रबंधन की ये प्राचीन भारतीय तकनीकें देखीं जा सकतीं हैं. पर पश्चिमी विकास के प्रभाव में इन सिद्ध तकनीकों को उपेक्षा के भाव से देखा गया और अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी मारी गई.

अनुपम मिश्र जी का जल संघर्ष

प्रख्यात पर्यावरणविद अनुपम मिश्र जी विशेष आदर के पात्र हैं जिन्होंने भारत के प्राचीन अद्भुत जल प्रबंधन की तरफ जनता और सरकार का ध्यान प्रभावशाली ढंग से खींचा और समाज को इन प्राचीन जल प्रबंधन तकनीकों का लोहा मानने पर विवश कर दिया. उनकी किताब ‘आज भी खरे हैं तालाब‘ और ‘राजस्थान की रजत बूंदें‘ ने जल संरक्षण के दृष्टिकोण में भारतीय दृष्टि के मेल का ‘अनुपम’ कार्य किया था. वह अलग बात है कि आलसी और कामचोर सरकारों ने हर क्षेत्र की तरह यहाँ भी अपनी निष्क्रियता ही दिखाई. और देश को और बड़े जल संकट की ओर धकेला.

अनुपम मिश्र

अनुपम जी के शोध के अनुसार, आज से 100 साल पहले देश में करीब 11 से 12 लाख तालाब थे. जो वर्षा ऋतु में पूरे भर जाया करते थे. सोचिए उस समय की जनसंख्या क्या थी? और उस हिसाब से क्या इससे बेहतर जल प्रबंधन किसी भी देश में हो सकता था? नहीं के अतिरिक्त कोई जवाब नहीं मिल सकता. इसके सिवाय राजस्थान जैसे सूखे प्रान्त ने ‘आवश्यकता ही अविष्कार की जननी है‘ इस सूत्र पर बावड़ियों के रूप में जल संरक्षण का नायाब अविष्कार किया था. जिसमें प्रत्येक घर में ऐसे सीढ़ीनुमा कुंड का निर्माण किया जाता था कि सारा वर्षा जल उस कुण्ड में इकट्ठा हो जाता और सालभर की जल समस्या खत्म हो जाती.

उनकी कोशिश से सूखाग्रस्त अलवर में जल संरक्षण का काम शुरू हुआ जिसे दुनिया ने देखा और सराहा। सूख चुकी अरवरी नदी को उन्हीं ने पुनर्जीवित किया। इसी तरह राजस्थान और उत्तराखण्ड में परंपरागत जल स्रोतों के पुनर्जीवन की दिशा अनुपम मिश्र ने महत्वपूर्ण काम किया। भारत सरकार की संस्था सीएसई (पर्यावरण व विज्ञान केंद्र) को स्थापित करने में उनका बड़ा योगदान रहा। जल पुरुष कहे जाने वाले राजेन्द्र सिंह के भी अनुपम मिश्र प्रेरणास्त्रोत व सहयोगी रहे।

आज भी खरे हैं ‘तालाब’

जल संरक्षण, प्रबंधन और संवर्धन के ऊपर उनकी किताबें, ‘आज भी खरे हैं तालाब‘ और ‘राजस्थान की रजत बूंदें‘ केवल किताब नहीं हैं, भारतीय जल चेतना और उसके जल संरक्षण के उत्तरदायित्वों के प्राचीन उत्कृष्ट निर्वहन के शोध ग्रन्थ हैं. जो भारत के जल संकट को मिटाने के लिए टॉर्च का काम करते रहेंगे. बशर्ते सरकारों में जल संकट को पूरी तरह मिटा देने की ऐसी इच्छाशक्ति हो. जल रक्षा के सिपाहियों को ये किताबें पढ़कर बहुत मार्गदर्शन मिल सकता है.

अनुपम मिश्र

अनुपम मिश्र जी का 19 दिसम्बर 2016 को निधन हुआ. यह भारतीय पर्यावरण संरक्षण के आंदोलन की गहरी क्षति थी. भारतीय जनता के साथ विश्व समुदाय का यह दायित्व है कि मिश्र जी की जल संकट को लेकर जो पीड़ा थी, जो दर्द था उसे समझे व पारंपरिक जल संरक्षण पर ध्यान दें. तालाबों के ‘पिता’ मिश्र जी तालाबों के जल में हमेशा जीवित रहेंगे, उन्हें कृतज्ञ श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ. जल है तो कल है.

 – मुदित मित्तल

यह भी पढ़ें,

कोर्ट के भी पहले से हिन्दू क्यों मानते हैं गंगा-यमुना को जीवित

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here