तीन सगे चाफेकर भाई जो देश के लिए फांसी पर चढ़ गये

चाफेकर बंधु

उनका जन्म पेशवाओं की राजधानी रही पूना के पास चिंचवाड़ नामक गाँव में हरि विनायक चाफेकर और द्वारका चाफेकर के घर में एक चित्तपावन ब्राह्मण परिवार में हुआ था, जो मूलतः कोंकण के वेलानेश्वर से संबध रखता था। एक समय में यह परिवार धनाढ्य था पर परिस्थितयोंवश निर्धनता के भंवर में फंस गया था, जिस कारण हरि विनायक चाफेकर ने कीर्तनकार का कार्य करना शुरू कर दिया था और बचपन से ही तीनों भाई इस कार्य में अपने पिता का सहयोग करने लगे थे। परिवार के सबसे बड़े पुत्र दामोदर बचपन से ही खेलकूद के शौक़ीन थे और अनवरत अभ्यास और प्रशिक्षण के बल पर उन्होंने अपने शरीर को फौलाद का सा बना लिया था।

वह अपने हृदय की गहराइयों से राष्ट्रवादी थे और चाहते थे कि युवा पीढ़ी भारत को परम वैभव पर पहुंचाने के लिए अपना सर्वस्व समर्पित करने वाली बने। उनके जोशीले भाषणों, प्रभावशाली व्यक्तित्व और उत्कट राष्ट्रप्रेम से प्रभावित कितने ही युवा उनके संपर्क में आकर शारीरिक प्रशिक्षण एवं सैनिक अभ्यास प्राप्त किया करते थे ताकि समय आने पर वो देश के लिए कुछ कर सकने में समर्थ हो सकें। ऐसे भाई के अनवरत संपर्क में रहते वासुदेव में भी बचपन से राष्ट्र और धर्म के प्रति अत्यंत अभिमान और इनकी रक्षा के लिए कुछ कर गुजरने की भावना थी। राष्ट्रकार्य हेतु बड़े भाई दामोदर द्वारा गठित संस्था राष्ट्र हितेच्छु मंडल में वासुदेव भी सक्रिय सहयोग किया करते थे जिसमें युवाओं को अस्त्र-शस्त्र प्रशिक्षण दिया जाता था और उन्हें देश धर्म के लिए बलिदान होने की भावना से ओत प्रोत किया जाता था।

तिलक के विचारों के अनन्य भक्त चाफेकर बंधुओं के मन में अंग्रेजी शासन के प्रति कितनी घृणा थी, इसका पिता एक घटना से चलता है। उनके कीर्तनकार पिता हर चातुर्मास में मुंबई जाते थे और ऐसे ही एक बार उनके साथ दामोदर और बालकृष्ण भी मुंबई गए, जहाँ रानी विक्टोरिया की मूर्ति पर इन दोनों ने तारकोल पोत दिया और उसे जूतों की माला पहना दी। उस दौर में जब कांग्रेस का प्रत्येक अधिवेशन रानी की स्तुति और अंग्रेजी सरकार की चापलूसी से शुरू होता था, इस तरह की बात करने वाले बिरले ही थे। ऐसे निडर और देशभक्त बड़े भाइयों के सामीप्य ने वासुदेव को भी निडरता और देशभक्ति का पाठ बचपन से पढ़ा दिया और वे अपने इन अग्रजों द्वारा किये जाने वाले किसी भी कार्य को करने के लिए स्वयं को सदैव तत्पर रखते थे।

उन्हीं दिनों पूना में प्लेग का जबरदस्त आतंक फ़ैल गया जिससे निपटने के लिए सरकार ने भारतीय सिविल सेवा के अधिकारी डब्ल्यू . सी . रैंड को प्लेग कमिश्नर नियुक्त किया। रैंड व उसकी टीम को प्लेग नियंत्रण के नाम पर किसी के भी घर की तलाशी लेने का अधिकार था जिसका ये लोग अत्यंत दुरूपयोग कर रहे थे और भारतीयों को हद दर्जे तक प्रताड़ित करते थे, उनके घर की स्त्रियों की इज्जत के साथ खिलवाड़ करते थे, पूजा स्थलों को भ्रष्ट करते थे, जिससे लोगों में रैंड के प्रति विद्रोह की भावना बलवती होने लगी और वे उससे किसी भी कीमत पर छुटकारा पाने की प्रार्थना करने लगे। दामोदर ने रैंड के अत्याचारों का बदला लेने के लिए उसकी ह्त्या करने का निश्चय किया और उनके इस निश्चय में वासुदेव और बालकृष्ण ने भी पूरा साथ देने की सौगंध खायी। इस हेतु दामोदर ने बारूद और रिवाल्वर की भी व्यवस्था कर ली और उचित अवसर की प्रतीक्षा करने लगे।

इसके बाद शुरू हुया रैंड की पहचान तय करने का काम जिसके लिए तीनों चाफेकर बंधुओं और उनके साथियों में से कोई ना कोई अनवरत तीन महीने तक विभिन्न स्थानों पर उसका पीछा करते रहे । वासुदेव ने रैंड की आदतों और उसके आने जाने के स्थानों का गहन अध्ययन किया ताकि योजना में किसी की बाधा ना पड़े । रैंड की हत्या के लिए नियत तिथि के कुछ सप्ताह पहले बड़े भाई दामोदर ने रैंड के गाड़ीवान, उस इलाके के पोस्टमैन तथा अन्य सम्बन्धित व्यक्तियों के साथ मित्रता कर रैंड के घर, आफिस, आने जाने के समय तथा अन्य आदतों के बारे में काफी सूचनाएँ एकत्रित कर लीं ताकि किसी भी प्रकार की गड़बड़ी की कोई सम्भावना ना रहे और उनके इस कार्य में वासुदेव और बालकृष्ण बराबर साथ रहे। इस सबके बाद दामोदर ने अपने साथियों के साथ योजना को अंतिम रूप दिया और रानी विक्टोरिया के राज्यारोहण के 60 वीं वर्षगाँठ के समारोह वाले दिन रैंड की ह्त्या करने का निश्चय किया।

22 जून 1897 को सबसे पहले दामोदर के समूह ने नगर के कौंसिल हाल में दोपहर को रैंड को तलाश किया पर उसे वहां ना पाकर सेंट मैरी चर्च में उसे ढूँढा गया पर भीड़ होने की वजह से वहां कुछ ना किया जा सका। तब रात के 11.30 हो चुके थे जब गणेश खिंड स्थित गवर्नमेंट हाउस के गेट पर दामोदर ने खुद को छुपा लिया, छोटा भाई बालकृष्ण सडक पर दूसरी तरफ था और अब बस इन्तजार था रैंड के लौटने का। कुछ समय ही बीता था कि रैंड की बग्घी आती दिखी, किसी साथी ने पहचान कर पहले से नियत कोडवर्ड चिल्ला कर बोला कि गोंड्या आला रे और बालकृष्ण ने उछलकर बग्घी में बैठे व्यक्ति को गोली से उड़ा दिया पर वह रैंड ना होकर उसका मिलेट्री एस्कार्ट लेफ्टिनेंट आयेर्स्ट था। पर तुरंत ही दामोदर को गलती का आभास हो गया और महादेव विनायक रानाडे के साथ उन्होंने रैंड पर हमला कर दिया जिसमें वह बुरी तरह से घायल हो गया और 3 जुलाई 1897 को उसकी मृत्यु हो गयी। इस प्रकार बड़ा ही सुनियोजित तरीके से रची गयी यह पूरी योजना अपने लक्ष्य को पाने में सफल रही।

इस घटना से अंग्रेजी सरकार हिल गयी और अपने अपराधियों को पकड़ने के लिए उसने एक बड़ा अभियान चलाया। काफी दिन तक बचने के बाद द्रविड़ बंधुओं की गद्दारी के कारण अंततः 9 अगस्त को इस पूरी योजना के सूत्रधार और कर्ताधर्ता बड़े भाई दामोदर गिरफ्तार कर लिए गए और पुलिस ने उनके खिलाफ आरोपों की एक लम्बी चौड़ी सूची तैयार की । 14 अक्टूबर 1897 को दामोदर को मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया और उन पर कई संगीन धाराओं में मुक़दमे की कार्यवाही शुरू की गयी। 31 जनवरी 1898 को उनके मंझले भाई बालकृष्ण का मुकदमा भी उन्हीं के साथ सुनने के आदेश सरकार की तरफ से जारी किये गए। 3 फरवरी 1898 को ज्यूरी ने उन्हें ह्त्या का दोषी ना मानते हुए अपराध को बढ़ावा देने का दोषी करार दिया परन्तु एक अजीब घटनाक्रम में न्यायालय ने ज्यूरी का ही प्रतिपरीक्षण कर लिया ज्सिके बाद ज्यूरी ने दामोदर को हत्या का दोषी ठहराते हुए उन्हें फांसी की सजा सुनाई, जिसे 2 मार्च 1898 को उच्च न्यायालय से भी मंजूरी मिल गयी और यरवदा जेल में 18 अप्रैल 1898 को उन्हें फांसी पर चढ़ा दिया गया।

उधर दामोदर की गिरफ्तारी के बाद मंझले भाई बालकृष्ण हैदराबाद भाग गए पर किसी साथी की गद्दारी के कारण पकडे गए। वासुदेव और उनके साथियों महादेव विनायक रानाडे और खान्ड़ो विष्णु साठे ने दामोदर से विश्वासघात करने वाले गणेश द्रविड़ और उसके भाई से बदला लेने का निश्चय किया। उन्होंने जब अपनी माँ को इस निश्चय के बारे में बताया तो वह अपने इस तीसरे पुत्र को भी खो देने के विचारमात्र से दुःख के सागर में डूब गयी पर वाह रे वासुदेव, उन्होंने अपनी माँ से कहा कि माँ तेरे दो बेटे तो राष्ट्रकार्य के पथ के राही हो गए और उन्होंने स्वयं को राष्ट्रयज्ञ में समर्पित कर दिया तो ये सुख, ये गौरव मुझे क्यों नहीं। माँ, तू मुझे हँस कर विदा कर वरना जीवन भर मुझे ये दुःख सालता रहेगा कि मैं अपने बड़े भाइयों के पथ का अनुगामी ना बन सका। माँ द्वारा उन्हें भी राष्ट्रकार्य में अपनी आहुति देने की आज्ञा मिलते ही उनकी ख़ुशी का ठिकाना ना रहा।

उन्होंने अपने साथियों के साथ द्रविड़ बंधुओं की तलाश की और सरकारी गवाह होने के कारण उन्हें मिली अच्छी खासी सुरक्षा को धता बता उन्हें यमलोक पहुंचा दिया। वासुदेव और उनके दोनों साथी पकडे गए पर वासुदेव के मन में संतोष था कि जब भी इतिहास लिखा जायेगा, उन्हें उनके बलिदानी भाइयों से कम नहीं आंका जाएगा। उन पर मुकदमा चलाया गया और मौत की सजा सुनाते हुए 8 मई 1899 को फाँसी पर लटका दिया गया। 10 मई 1899 को महादेव विनायक रानाडे को भी फांसी दे दी गयी पर खान्ड़ो विष्णु साठे को उसकी किशोरावस्था के कारण फाँसी ना देकर 10 वर्ष के कारावास की सजा दी गयी। अंत में मंझले भाई बालकृष्ण को भी 12 मई 1899 को फांसी दे दी गयी और इस प्रकार तीनों भाई माँ भारती के चरणों में बलिदान हो गए।

अपनी शहादत के समय दामोदर 27 वर्ष के, बालकृष्ण 24 वर्ष के और वासुदेव मात्र 18 वर्ष के थे। दुनिया के इतिहास की ये विरलतम घटना है जहाँ एक ही परिवार के सभी बेटों ने मातृभूमि की बलिवेदी पर अपने प्राण अर्पित कर दिए हों। इन बलिदानों ने देश में युवाओं में अंग्रेजी साम्राज्य से लड़ने की प्रेरणा उत्पन्न की और वीर सावरकर जैसे क्रान्तिधर्मा को देश के लिए तैयार किया। चाफेकर बंधुओं को श्रद्धांजलि देते हुए लाला लाजपत राय ने कहा था कि वास्तव में चाफेकर बंधू भारत में क्रांतिकारी आन्दोलन के जनक थे और इस तरह के राजनैतिक कार्य के लिए भगवत गीता में अवलंबन ढूंढने वाले प्रथम हुतात्मा। भगिनी निवेदिता ने चिंचवाड़ा में चाफेकर बंधुओं के घर का दर्शन करने के बाद कहा था—-चाफेकर बंधुओं की स्वर्णनिर्मित मूर्तियाँ भारत में प्रवेश द्वार पर लगानी चाहिए जो युगों युगों तक आने वाली पीढयों को वीरता और आत्म-बलिदान का पाठ पढ़ाती रहेंगी।

दुर्भाग्य गाँधी की बकरी, गाँधी के चरखे और नेहरु की चिट्ठियों और जैकटों तक की चर्चा करने वाला ये कृतघ्न देश इन बलिदानियों को भुला बैठा। हाँ, 1979 में जयू पटवर्धन और नचिकेत पटवर्धन द्वारा निर्मित-निर्देशित मराठी चित्रपट 22 जून 1897 में चाफेकर बंधुओं की वीरता, बलिदान और समर्पण को बखूबी उकेरा गया। इस फिल्म को 1980 में राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देने वाली फिल्मों की श्रेणी में सर्वोत्तम फिल्म का पुरस्कार मिला था। इसी वर्ष इसे सर्वश्रेष्ठ फिल्म और सर्वश्रेष्ठ निर्देशक के महाराष्ट्र राज्य अकादमी के पुरस्कार भी मिले। अमेरिकन कांग्रेस की लाइब्रेरी में इसे उन चुनिन्दा भारतीय फिल्मों में जगह मिली जिन्हें वहां संग्रहीत किया गया है। पर सरकारी स्तर पर चाफेकर बंधुओं की स्मृति बनाये रखने हेतु कोई प्रयास नहीं किया गया।

उनकी स्मृतियों का साक्षी चिंचवाडा का उनका घर चाफेकर वाड़ा एक समय इस हालत में आ गया था कि शराबियों और जुआरियों को छोड़कर कोई भी वहां नहीं जाता था । संघ स्वयंसेवकों की निगाह जब इस पर गयी तो उन्हें बलिदानियों की इस स्मृति की दुर्दशा देख अतीव पीड़ा हुयी जिसके बाद उन्होंने इसका कायाकल्प कर इसे इसका पुराना स्वरूप देने का निश्चय किया। सबसे पहले वहां एक व्यायामशाला खोली गयी और फिर क्रांतिवीर चाफेकर विद्यालय जो आज कई स्थानों पर चल रहा है। लोगों के सहयोग और स्वयंसेवकों के अथक परिश्रम से धीरे धीरे चाफेकर वाड़ा अपने भव्य स्वरुप को प्राप्त कर सका और वह 11 अप्रैल 2005 का दिन था जब चाफेकर बंधुओं, वासुदेव बलवंत फडके, उमाजी नाइक, राजगुरु, अनंत कान्हेरे, विष्णु गणेश पिंगले और क्रान्तिसिंह नाना जी पाटिल जैसे बलिदानियों के वंशजों की उपस्थति में एक भव्य कार्यक्रम में संघ के तत्कालीन सरसंघचालक माननीय सुदर्शन जी ने इस पुनरुद्धार किये गए भवन एवं अन्य योजनाओं का लोकार्पण किया और सेनानियों के वंशजों को सम्मानित किया। इस पूरे परिसर को क्रान्तितीर्थ नाम दिया गया है। संघ और उसके स्वयंसेवकों का ये प्रयास स्तुत्य है, जिसमें नगर पालिका और अन्य व्यक्तियों और संस्थाओं के सहयोग को भी नकारा नहीं जा सकता। हुतात्मा वासुदेव हरि चाफेकर को कोटिशः नमन एवं विनम्र श्रद्धांजलि।

 विशाल अग्रवाल (लेखक भारतीय इतिहास और संस्कृति के गहन जानकार, शिक्षाविद हैं। भारतीय महापुरुषों पर लेखक की राष्ट्र आराधक श्रृंखला पठनीय है।)

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