देवेन्द्र स्वरूप नहीं रहे: एक प्रकाश स्तंभ का बुझ जाना

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देवेन्द्र स्वरुप

बिहार में ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ कार्य प्रचार होने के बिलकुल शुरूआती दौर की बात है। एक प्रचारक को बिहार में संघ कार्य शुरू करने के लिये भेजा गया था। एक किसी बड़े प्रभावशाली व्यक्ति से जब वो सम्पर्क करने गये तो कई दिनों बाद उनसे उनका मिलना हो सका। जब मिले तो उस व्यक्ति ने इस प्रचारक से पूछा:- जिस संघ का प्रचार करने आये हो उसका साहित्य क्या है? उसके आदर्श व्यक्तित्व कौन हैं और उसका दर्शन क्या है?

उस प्रचारक ने जो जबाब दिया उसके बस उस जबाब ने बिहार कार्य में संघ की मजबूत बुनियाद रख दी। उन्होंने उत्तर में कहा था :- संघ का साहित्य, आदर्श व्यक्तित्व और उसका दर्शन मैं, मेरा व्यवहार और मेरा चरित्र है।

उस समय संघ शैशवावस्था में था इसलिये उसका कोई साहित्य सृजित नहीं हुआ था, किसी बड़े नेता का नाम या चेहरा उसके पास नहीं था और न ही वैसा कोई दर्शन तो उस प्रचारक ने जो उत्तर दिया था वो यथार्थ ही था क्योंकि उस व्यक्तित्व और चरित्र में ही संघ का सबकुछ समाहित था और उसके उस उत्तर ने उस प्रभावशाली व्यक्ति का दिल एकदम से जीत लिया।

ये तो खैर उस दौर की बात थी पर जब संघ के लिये आवश्यक हो गया कि उसका कोई साहित्य भी हो जिससे लोग उसके बारे में जाने, उसका कोई शलाका पुरुष भी हो जिसके नाम को संघ विस्तार का जरिया बनाया जा सके और उसका कोई दर्शन भी हो जो संघ की ध्येय दृष्टि का परिचायक हो तो इसे पूरा करने का बीड़ा जिसने उठाया उनका नाम था “देवेन्द्र स्वरुप“.

देवेन्द्र स्वरुप
स्व. श्री देवेन्द्र स्वरूप

देवेन्द्र स्वरूप हर अर्थ में ऋषि थे, स्वयं तो संघ के प्रचारक थे ही साथ में माँ सरस्वती ने लेखन कला में भी निपुण बनाया था जिसका उपयोग उन्होंने केवल भारत माँ की महिमा गाने, हिन्दू पुरुषार्थ को जगाने और छद्म सेकुलर राजनीति के षड्यंत्रों से देश को सावधान करने में किया।

ऐसे लोगों की संख्या इस देश में लाखों में होगी जो पांचजन्य केवल देवेन्द्र स्वरूप का स्तंभ पढ़ने के लिये खरीदते थे। पूरे जीवन में लगभग पन्द्रह सौ लेख लिखे पर उनका हर लेख स्वयं में पूर्ण होता था। उनके किसी लेख को पढ़ने के बाद संबंधित विषय से जुड़ी कोई शंका बाकी रह जाये ऐसा शायद कभी नहीं हुआ।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने दीर्घ जीवन में कई बदलावों और प्रयोगों का साक्षी रहा है। संघ के प्रयोगों पर उनके अपने स्वयंसेवकों ने ही कई बार शंका की, सवाल उठाये पर देवेन्द्र स्वरूप इन सब प्रयोगों और बदलावों के बीच सदैव अविचल रहे। उनकी ध्येय निष्ठा कभी बदली नहीं। वो हमेशा कहते थे कि सवाल प्रयोग पर हो सकते हैं, उसके परिणामों पर हो सकते हैं पर स्वयंसेवक को अपने संगठन की नीयत पर कभी संदेह नहीं होना चाहिये।

देवेन्द्र स्वरूप वो थे जो अयोध्या मामले के कानूनी सुनवाई के बीच अर्जुन बनकर खड़े हो गये थे जब एक दर्जन से अधिक वामी इतिहासकार राममंदिर के विरुद्ध विष-प्रचार करने और झूठे तथ्य परोसने में लगे थे। देवेन्द्र स्वरूप वो भी थे जिन्होनें छद्म सेकुलर राजनीति के क्रूर चेहरे को भारत में तब सामने लाने का साहस दिखाया जब संघ विचार से जुड़े बुद्धिजीवियों को वामपंथी खेमा अपने पासंग बैठने देने लायक नहीं समझता था। जब बीबीसी और उसके जैसे भोंपू गुजरात काण्ड के बाद संघ परिवार को बदनाम करने में जुटे थे तब इस तरफ से उस दुष्प्रचार के खिलाफ देवेन्द्र स्वरूप ने ही मोर्चा खोला था। मुरली मनोहर जोशी जी ने जब मानव संसाधन विकास मंत्री रहते हुये शिक्षा में शुद्धिकरण का अभिनव प्रयास शुरू किया था तब अकेले देवेन्द्र स्वरूप थे जो वामपरस्त मीडिया से भीड़ गये थे। देवेन्द्र स्वरूप ने उस समय भी मोर्चा संभाला था जब भगवा आतंक के नाम पर संघ परिवार को फांसने की तैयारी हो रही थी। बड़ी की बात ये है कि ये सारे बड़े काम देवेन्द्र जी उस समय कर रहे थे जब वो अपनी आयु के उतरार्ध में थे यानि गंगापुत्र भीष्म की तरह से अविचल पथिक बनकर।

देवेन्द्र स्वरूप अब हमारे बीच नहीं है पर बड़े जतन से संभाल कर रखे उनके सैकड़ों आलेख हर घड़ी मेरे जैसे लाखों लोगों का दिशा-दर्शन करती रहेगी और उनके दिव्य तेज से आलोकित हमलोग किसी जुगनू की तरह भारत भक्ति की लौ जलाये रखेंगे और यही उनको सच्ची श्रद्धांजलि होगी। संघ विचार परिवार ने भले आज अपना एक प्रकाश स्तंभ खो दिया है पर ब्रह्मलीन होने के पश्चात् भी उनके तेज से कईयों को रौशनी मिलती रहेगी।

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