श्रीमद्भागवत व अन्य पुराणों की ऐतिहासिकता और प्रामाणिकता

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वेदव्यास श्रीमद्भागवत पुराण vedvyasa bhagwat

कुछ भ्रमित व सांप्रदायिक द्वेषभाव वाले लोग पुराणों में शिरोमणि ‘श्रीमद्भागवत’ को महर्षि वेदव्यास रचित नहीं मानते और कहते हैं कि श्रीमद्भागवत को 13वीं शताब्दी में बोपदेव नामके एक पंडित ने लिखा था। हालाँकि ये कई जन्मों में भी इसका प्रमाण प्रस्तुत नहीं कर सकते। किन्तु व्यर्थ के शब्द-जाल बुनकर हिन्दुओं को भ्रमित करके, श्रद्धालुओं को शंकित करते है। इसलिए इस लेख में हम श्रीमद्भागवत की प्राचीनता एवं महर्षि वेदव्यास रचित होने के अकाट्य प्रमाण प्रस्तुत कर रहे हैं…

1. बोपदेव का जन्म 13वी शताब्दी में हुआ था, किन्तु उनसे पूर्व श्री माध्वमुनि कृत भाष्यों में श्रीमद्भागवत के श्लोक मिलते हैं, इसका क्या जवाब है?

2. श्री माध्व के भी पूर्ववर्ती श्रीमद् रामानुजाचार्य जी के ग्रन्थ रामतापिनी के भाष्य तथा सारसंग्रह में भागवत के श्लोक लिखे हुए कैसे मिल जाते हैं?

3. इनसे भी पूर्व आद्यगुरु भगवान् शंकराचार्य जिनको कि स्वयं स्वामी दयानंद ने चौथी शताब्दी का बताया है, उन्होंने श्रीविष्णुदिव्यसहस्त्रनाम के भाष्य में तथा अपनी अन्य टीकाओं में स्थान स्थान पर भागवत के श्लोक कैसे उद्धृत कर दिए?

4. आद्यशंकराचार्य के भी गुरु श्री गौड़पादाचार्य जी ने भी अपनी पंचीकरण व्याक्य में भागवत के श्लोक कैसे उद्धृत कर दिए?

5. 11वी शताब्दी की हस्तलिखित भागवत की प्रति काशी के सरस्वती भवन में रखी है| क्या बोपदेव टाईम-मशीन का आविष्कार करके भूतकाल में जाकर उस प्रति को वहाँ रख आये थे? कुल मिलाकर बोपदेव के जन्म से २००० वर्ष पूर्व तक के अनेकानेक आचार्यो के ग्रंथो में भागवत के श्लोक कैसे मिल जाते हैं?

6. दो हज़ार वर्ष पूर्व कालिदास के नाटक अनेक पुराणों की कथा के आधार पे ही लिखे हैं। कालिदास के पास पुराण कहाँ से पहुंचे?

7. कालिदास की महान रचना पद्मपुराण अंतर्गत एकादशी व्रत की कथा के आधार पे है। पुराणों के द्वेषी आर्यसमाजी इत्यादि पद्मपुराण को नवीन कहते हैं फिर कालिदास भविष्य में पहुंचकर पद्मपुराण कहाँ से लाए?

8. कालिदास से भी प्राचीन कवि हैं भास, 2400 साल पूर्व का इनका समय यूरोपियनों ने भी माना है। इन्होंने ‘बालचरित’ नाटक श्रीमद्भागवत के आधार पर लिखा है और प्रायः सारे नाटक महाभारत के आधार पर लिखे हैं। आक्षेपकर्ता इसका क्या उत्तर देंगे?

9. आपस्तम्ब धर्मसूत्र 2400 वर्ष पूर्वका यूरोपियनों ने भी माना है। आपस्तम्ब धर्मसूत्र में पद्मपुराण, ब्रह्माण्डपुराण के श्लोक उद्धृत हैं।

10. 2300 वर्ष पूर्व आचार्य चाणक्य ने कौटिलीय अर्थशास्त्र (अ.5, गद्य.13-14) में राजा को पुराण सुनने का उपदेश दिया। आचार्य ने विष्णुस्तुति से चाणक्यनीति का मंगलाचरण किया। पुराणों को नवीन कहने वाले क्या अब चाणक्य को भी झूठा कहेंगे?

11. ईसा की प्रथम शताब्दी में ग्रीक पर्यटक ‘डियोन क्रायस्टो स्टोन’ भारत आया। ग्रीक में ग्रीस इतिहास को इलियड कहा जाता है। वह भारत के मालाबार में रहा, उसने लिखा भारत में भी एक लाख श्लोक का इलियड है। इलियड मतलब इतिहास। यह इतिहास शतसहस्त्री सहिंता महाभारत ही है अन्य नहीं। आर्यसमाजियों का महाभारत को 90% झूठा कहना भी मिथ्या ही सिद्ध हुआ। महाभारत से ही एक पुराण हरिवंश पुराण निकला है। आर्यसमाजियों के संस्थापक स्वयं स्वामी दयानंद ने लिखा है रोज प्रातः रामायण और हरिवंशपुराण पढ़ना चाहिए।

12. भविष्य पुराण पर बहुत आरोप लगाते हैं कि उसमें भविष्य के राजाओं इत्यादि की बात पहले ही कैसे आई। तो उनको कहूंगा उसका नाम ही भविष्य पुराण है। सनातनी ज्योतिषविद्या तो कल्प कल्प का लेखा जोखा लिख डाले। ऋषि की वाणी अघटितघटनापटीयसि होती है। नास्तिक अब विज्ञान का प्रलाप करेंगे। भविष्य पुराण आज के 75% हिन्दूधर्म का आधार है। भविष्य पुराण की गवाही वेद दे रहा है। “भविष्यत्प्रति चाहरत्”(तैत्तिरीय ३.१२.६.३) यानि भविष्यपुराण में उत्तरकालीन वर्णनों से सृष्टि के इतिहास का उपसंहार किया गया है।

इसके अतिरिक भी अनेक प्रमाण हैं किन्तु आप पायेंगे इन सभी प्रश्नों के संतोषजनक उत्तर देने में आक्षेपकर्ता सर्वथा अक्षम हैं। अतएव सनातन धर्म शास्त्र व आचार्यों का ही अवलम्बन लेना चाहिए। श्रीमद्भागवत श्रीकृष्ण से भिन्न नहीं है, श्रीमद्भागवत ही साक्षात श्रीकृष्ण हैं।

तो सनातनियों के लिए पुराण क्या है? छान्दोग्य श्रुति ने पुराण को वेद का भी वेद कहा है !! पुराण का सम्मान वेदवत करना चाहिए क्योंकि सभी शास्त्रों में ब्रह्मा ने पुराण का स्मरण किया और उसके बाद वेद प्रादुर्भूत हुए। अर्थात् पुराण वेद से भी पहले उत्पन्न हुए। क्यों? तो इसको ऐसे समझें कि जैसे हमें एक गिलास पानी पीना है तो पहले हमारे मन में गिलास और पानी का चित्र खिंच जाता है फिर हम वाणी से कहते हैं कि, “एक गिलास पानी दो”, यानि शब्द से पहले उसका अर्थ प्रकट होता है, उसी तरह वेद का गूढ़ अर्थ पुराण में ही निहित है, इसलिए ब्रह्मा ने पहले ‘अर्थ’ अर्थात् पुराण का स्मरण किया तदनन्तर शब्द ब्रह्म के रूप में वेद का प्राकट्य हुआ। वेदों में सभी 18 पुराणों का नाम आया है। पुराण नित्य, अनादि, वेदों का वेद, पंचम वेद, हिन्दूओं का प्राणसर्वस्व ही है। पुराण की महानता जानने के लिए पढ़ें, ‘पुराण दिग्दर्शन‘, ‘पुराण परिशीलन‘।

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