आदर्शवादी दायित्वों और नारीवादी व्यवस्था के बीच पिसते पुरुष का यथार्थ चित्रण -‘लड़का हुआ है’

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'लड़का हुआ है - ज्योति तिवारी

आचार्य जगन्नाथ के साहित्य बोध ‘रमणीयार्थ-प्रतिपादक: शब्द: काव्यं’ को आधुनिकता की कसौटी पर कसते हुए कहा जा सकता है- ‘सामाजिक पक्षों का यथार्थ चित्रण करने वाले लोककल्याण की भावनाओ को समेटे सुंदर अर्थ देने विचारों की श्रंखलाबद्ध प्रस्तुति ही साहित्य है।’

इस दृष्टिकोण से देखें तो ज्योति तिवारी जी का  ‘लड़का हुआ है’ कहानी संग्रह विभिन्न पृष्ठभूमियों के परिवारों के विघटन, सम्बन्धों के बीच अहम के भाव, सत्य-असत्य व परिणामों की चिंता किये बिना केवल अपने बेटे/बेटी का पक्ष लेने के दुष्परिणामों, लचर न्याय-व्यवस्था, छद्म नारीवाद और पारिवारिक जीवन की अन्य समस्याओं (जैसे लड़की का अपने ससुराल में सास-ननद के प्रति अविश्वास का भाव और मायके में अपनी भाभी से अपने प्रति पूर्ण निष्ठा और सम्मान की लालसा, परिवार के परिवेश और वास्तविकता से मुंह मोड़कर काल्पनिक लोक की यात्रा और दूसरे लोगों के कहने भर से अपने मन में मिथ्या धारणाएं बना लेना आदि) के बीच पिसते पुरुष वर्ग की नियति को सम्पूर्ण यथार्थ में उभारने का एक सराहनीय प्रयास है. कहानी संग्रह की कई कहानियां आपको निरर्थकता बोध से भर देंगी तो कुछ कहानियां गहरे स्तर तक सोचने पर मजबूर कर देंगी; कुछ कहानियों आपको अंदर तक झकझोरकर आपकी आंखें भी गीली कर देंगी. संवेदना के स्तर पर कहें तो ज्योति जी द्वारा  आधुनिक समाज की एक बड़ी समस्या को सहज रूप में उभारा गया है जो पुस्तक की भूमिका लिखने वाले श्री राहुल त्रिपाठी के शब्दों में ‘परिवार में आजादी’ और ‘परिवार से आजादी’ के अंतर्विरोधों में परिलक्षित होती है.

आधुनिक समाज की समस्याओं को उठाने और कहानियों को आम पाठक तक पहुंचाने में शिल्प की अहम भूमिका रही है. सरल, सहज और प्रवाहमयी भाषा मे आम बोलचाल के हिंदी, उर्दू, अंग्रेजी के शब्दों के प्रयोग ने इसकी बोधगम्यता को बढ़ाया है और संग्रह के सहज एवं स्वाभाविक चरित्र पाठक को अपने आस-पड़ोस के परिचित चरित्रों जैसे लगते हैं जिससे कहानियों से पाठक का जुड़ाव हो जाता है. साथ ही, सभी कहानियों का कथानक भी एकदम सरल है और हमारे अपने जीवन की घटनाओं से जुड़ा हुआ महसूस होता है. लेखिका का दर्शन भी कहानियों में थोपा हुआ प्रतीत नहीं होता, बल्कि रचनाओं में घुला हुआ है. दर्शन की एकाध पंक्ति जरूर बीच मे आती है लेकिन वो दर्शन लेखिका का निजी मत नहीं है, अपितु सामान्य समझ है और अनुभवों पर आधारित है जैसे चौथी कहानी ‘आजादी का सपना’ की ये पंक्तियां:
“जब हम अंदर किसी गहरे सदमे या दुख से गुजर रहे होते हैं तो हम उस दुख या सदमे को (ऐसे ही) एडवेंचर कर के भगाने की कोशिश करते हैं.”

समग्र रूप में कहें तो यह कहानी संग्रह पाठक को यथार्थ की सहज अनुभूति कराता है. एक ओर तो इसकी कुछ कहानियों में जीन पॉल सार्त्र व कामू के विचारों के विसंगत जीवन और निरर्थकता बोध का अनुभव होता है तो दूसरी ओर प्रेमचंद के चरम यथार्थ का.

-अनुराग पाठक

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