महामारी जनित उपसर्गों का शास्त्रोक्त विवरण एवं शमन

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॥ नमः प्रकृत्यै ।।

लेखक:- पण्डित गङ्गाधर पाठक ‘वेदाद्याचार्य’
मुख्याचार्य- श्रीरामजन्मभूमिशिलापूजन, अयोध्या
मार्गदर्शक:-  श्रीसर्वेश्वर जयादित्य पञ्चाङ्गम्, जयपुर  

श्रीरामजन्मभूमि भूमिपूजन अयोध्या 5 अगस्त 2019 गंगाधर पाठक नरेन्द्र मोदी
प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी से अयोध्या में श्रीरामजन्मभूमि मन्दिर का शिलान्यास करवाते मुख्य पुरोहित आचार्य श्री गंगाधर पाठक

शिवदूति महाकालि भैरवि प्रलयेश्वरि ।
रक्ष रक्ष जगन्मातर्मा मां स्पृशतु कोपतः ॥

        वेदादिशास्त्रों में आधिभौतिक आधिदैविक आध्यात्मिक अथवा भौम दिव्य आन्तरिक्ष तापों एवं मारी-महामारीजन्य सकल उत्पातों के साङ्गोपाङ्ग विवरणसहित शमन के विविध उपाय उपलब्ध हैं । प्रकृत निबन्ध में महामारीजन्य उपसर्गों के कुछ स्वरूपों एवं यथोक्ता को प्रस्तुत किया जा रहा है ।

विश्वप्रसिद्ध श्रीदुर्गासप्तशती के बारहवें अध्याय में स्पष्ट है-

व्याप्तं तयैतत्सकलं ब्रह्माण्डं मनुजेश्वर ।
महाकाल्या महाकाले महामारीस्वरूपया ।।
सैव काले महामारी सैव सृष्टिर्भवत्यजा ।
स्थितिं करोति भूतानां सैव काली सनातनी ॥

        महाप्रलय के समय महामारी का स्वरूप धारण करने वाली भगवती महाकाली ही इस समस्त चराचर ब्रह्माण्ड में व्याप्त हैं । वे ही बलि- होमादि की अप्राप्ति से कुपित हो प्रलयकाल में महामारीरूपेण विश्व को अपना ग्रास बना लेना चाहती हैं। वे ही अजा होने पर भी सृष्टि-स्थिति बन जाती हैं तथा वही सनातनी देवी भगवती महामाया सम्यक् आराधना-उपासना से प्रसन्न होनेपर सम्पूर्ण जीवों की रक्षा भी करती हैं ।

        प्राधानिकरहस्य में जब भगवती महाकाली ने आद्याशक्ति महालक्ष्मी से अपने नाम और कर्मों के बारे में पूछा तब महालक्ष्मी ने- “महामाया महाकाली महामारी क्षुधा तृषा” महाकाली को अनेक नाम देते हुए एक नाम ‘महामारी’ भी दिया, जिनका कर्म संसार में बलि- होमादि और भगवन्नाम संकीर्तनादि से रहित दुष्ट पापात्मा को व्यापकरूपेण प्रलयङ्कारी सामूहिक दण्ड देना है । पुनः मूर्तिरहस्य के अनुसार भी- “सा महामारीति गीयते” भगवती महाकाली ही महामारी देवी के नाम से जानी जाती हैं ।

श्रीदुर्गासप्तशती के शान्तनवी आदि प्रबुद्ध टीकाकारों ने विविधप्रकारेण महामारी शब्द का व्युत्पत्तिलभ्य रहस्यात्मक परिचय प्रकट किया है —

महांश्चासौ अकालश्चेति महाकाल: अनिष्टकाल: अकालः कालाग्निरुद्रः तस्मिन्नुपस्थिते महाकाले संहारसमये समुपस्थिते सति । महांश्चासौ कालः कालाग्निरुदः संहारकमहाकालः तस्येयं स्त्री महाकाली तथा मारयति संहरति मारः  । पचाद्यच् । महांश्चासौ मारश्च संहारक महामार कालाग्निरुद्र: तस्येयं स्त्री महामारी सा स्वरूपं यस्याः सा देवी महामारीस्वरूपा । यद्वा ‘मह उद्धव उत्सवः’ महानुत्सवानासमन्तान्मारयति नाशयति महामारी महाप्रलयानलज्वाला तस्या इव स्वरूपं यस्याः सा महामारीस्वरूपा ‘मृत्युजिह्वा महामारी जगत्संहारकारिणी महारात्रिर्महानिदा महाकाल्यतितामसी ॥ सैव कालानलज्वाला सैव विद्या तमः प्रसूः । सैव मोहप्रसूमृत्युः सैव सर्वाधिदेवता || महामारी संहृतिक्रिया । महती मारी महामारी महामारी संहारशक्तिः । महाकाली एव महाप्रलयसमये तमोगुणमयी सती महामारी इति कथ्यते । काले द्विपरार्द्धान्ते महतो ब्रह्मादीनपि मारयति इति महामारी महाप्रलयकारिणीशक्तिः ।

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कहीं इस महामारी को मरक, मारि, मारक या माड़क भी कहा गया है —
प्रियन्ते जना यस्मात् । मृ+अपादाने अप् । ततः स्वार्थे संज्ञायां वा कन् ।
यद्वा मृ+भावे अप् | मरो मरणमिति शब्देन कायति शब्दायते इति । कै+कः मरकः ।

        किम्बहुना, उपर्युक्त शास्त्रीय व्युत्पत्तियों से सिद्ध है जब संसार में विविधविध याग-बलि- होमादि एवं भगवन्नामजपादि सात्त्विक वृत्तियों का अभाव हो जाता है तब तमोगुणमयी भगवती महाकाली ही सर्वसंहारिणीशक्ति मृत्युजिह्वा महामारी आदि के रूप में विश्व को अपना बलि आहार बना लेना चाहती हैं । ब्रह्मवैवर्त्तमहापुराण में उद्धवजी ने महामारीदेवी के नाम से श्रीराधारानी की स्तुति की है। प्रायः सभी देवियों के सहस्रनामावलियों में मारी या महामारी नाम आये हैं। ब्रह्मवैवर्त्तमहापुराण एवं श्रीमद्देवीभागवतमहापुराण के अनुसार गीताप्रेस के व्रतपरिचय नामक अङ्क में भी महामारी के शान्ति का किञ्चित् विधान दिया गया है । विभिन्न श्रुति स्मृतियों एवं तन्त्रागमों के अनुसार महामारी से उत्पन्न विविध महोपसर्गों के शान्तिविधान की चर्चा की जाय तो एक स्वतन्त्र साहित्य प्रकट हो जायगा ।

आश्चर्य तो तब होता है जब महाशक्ति के कोप से समुत्पन्न प्रलयकालीन भयङ्कर परिस्थिति में भी श्रीराम कृष्ण से सुसेवित भारत जैसे धर्मप्राणदेश के शास्त्रविश्वासविहीन शासकसमुदायादि केवल अवैदिक भौतिकतन्त्र के सहारे महामारीजन्य महोपसर्गों को अपने अशास्त्रीय बल से जीतना और अपराजिता महाशक्ति को हराना चाहते हैं, जो सर्वथा हास्यास्पद और असम्भव है । प्रकृतिकोपजन्य महारोगों के निदान में चिकित्सकीय भौतिकतन्त्र को भी शास्त्रोक्त शान्तिविधान से ही बल मिलेगा, यह निश्चित है। सावधान- महाशक्तिशालिनी महामारी विविधविध शास्त्रोक्त आराधन-उपासन से शीघ्र शान्त होंगी अन्यथा अपना लक्ष्य पूरा करके ही दम लेंगी ।

राजाओं के किये महापापों के प्रभाव से प्रजाओं में महामारी आदि दारुण और असहनीय उपद्रव हुआ करते हैं, किञ्चित् भी प्रजारक्षण की चिन्ता करनेवाले शासक प्रशासकगण उनके उपशमनार्थ आस्तिकबुद्धि से सम्पन्न हो वेद-शास्त्र की विशुद्धरीति से राष्ट्रियस्तर पर व्यापकरूपेण महोपसर्गशान्तियज्ञ का समायोजन करें एवं अधीनस्थों के द्वारा करायें, तभी देश और विश्व का कल्याण होगा। यदि वर्णाश्रमधर्मनिष्ठाविहीन सेक्युलर सरकारें सार्वजनिकरूपेण वेद-शास्त्रोक्त धर्मकृत्यों के सम्पादन में सक्षम नहीं हो पा रही हैं, तो भव्यसमारोहपूर्वक अहर्निश “यज्ञो विश्वस्य जीवनम्” का उपदेश देते रहनेवाले इस धर्मदेश के लाखों कुबेरतुल्यमठाधीश या अन्य सक्षमसनातनी यज्ञ के मूलाधार गोवंश और वेदज्ञ ब्राह्मणों के यथोचित संरक्षण-संवर्द्धनद्वारा शास्त्रोक्त प्रयोगशाला में विश्वकल्याणकारी यज्ञविज्ञान का प्रयोग एवं शोध क्यों नहीं कराते ? दूषित अल्कोहल आदि के सैनिटाइजेशन की अपेक्षा विशुद्ध पारम्परिक पञ्चगव्य या विविध तीर्थजल एवं महौषधि आदि से संयुक्त समन्त्रक तैयार किये सर्वरोगहर दीर्घायुप्रद कलशजल के छिड़काव में क्या आपत्ति है ?

        कामन्दकीयनीतिसार १४।२० २१ के अनुसार अग्नि, जल, व्याधि, दुर्भिक्ष और मरक ये पाँच प्रकार के प्रलयकारक भयङ्कर दैवकोप होते हैं, जिनकी शान्ति के लिये राजा प्रजा के द्वारा अथर्ववेदोक्त शान्तिविधान एवं श्रीदुर्गाराधनादि कर्मसम्पादन को अनिवार्य बताया गया है ।

हुताशनो जलं व्याधिर्दुभिक्षं मरकस्तथा ।
इति पञ्चविधं दैवं व्यसनं मानुषं परम् ।।
दैवं पुरुषकारेण शान्त्या वा प्रशमं नयेत् ।
उत्थायित्वेन नीत्या वा मानुषं कार्यतत्त्ववित् ॥

        शब्दकल्पद्रुम में उद्धृत ज्योतिस्तत्त्वम् के वचन में इनके उत्पन्न होने के कतिपय ज्योतिषीय कारण भी बताये गये हैं, जिनमें मकरराशि में शनि का रहना भी एक कारण है —

यावन्मार्त्तण्डसूनुर्गवि धनुषि झषे मन्मथे वास्ति नार्य्या 
तावहुर्भिक्षपीडा भवति च मरकं संक्षयं यान्ति लोकाः ।
हाहाकारा तथोर्व्वो मनुजभयकरी फेरुरावैश्च भीमैः ।
शून्यग्रामा भवेयुर्नरपतिरहिता भूरिकङ्कालमाला ॥

        पुराण, महाभारत, ज्योतिष एवं आयुर्वेदादि के निर्देशानुसार विविध कारणों से उत्पन्न महामारी की शान्ति के लिये श्रद्धापूर्वक देवीमाहात्म्यपाठ, वटुकभैरवस्तवपाठ और तुलसी से श्रीविष्णुभगवान् का सहस्रार्चन स्वयं या ब्राह्मणद्वारा करके सभी कष्टों को हरनेवाले ब्रह्मपुराणोक्त “ॐ नमस्ते बहुरूपाय विष्णवे परमात्मने स्वाहा” इस मन्त्र का यथासाध्य जप एवं हवन करना कराना चाहिये । महामारीजन्य सकल उपद्रवों की शान्ति के लिये धर्म एवं शास्त्रप्रयोगनिष्ठ अप्रमादी विद्वान् ब्राह्मणों के द्वारा “सौम्यानि यानि रूपाणि त्रैलोक्ये विचरन्ति ते । यानि चात्यन्तघोराणि तैरक्षास्मांस्तथा भुवम् ॥” अथवा “उपसर्गानशेषांस्तु महामारीसमुद्भवान् । तथा त्रिविधमुत्यातं माहात्म्यं शमयेन्मम ||” आदि से प्रतिमन्त्रसम्पुटित श्रीदुर्गासप्तशती का यथासामर्थ्य नवचण्डी, शतचण्डी, सहस्रचण्डी, अयुतचण्डी या लक्षचण्डीयाग का सम्पादन कराना चाहिये; इन दोनों मन्त्रों का यथासाध्य जप भी लाभदायक है। अप्रमादी वेदज्ञ ब्राह्मणों के द्वारा श्रीमहामृत्युञ्जयमन्त्र का जप एवं इससे सम्पुटित श्रीदुर्गासप्तशती का यथासंख्य पाठ भी अतिशय लाभकारी है।

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शास्त्रों में महामारीशान्ति के लिये नृसिंहमन्त्रजप, रुद्रयाग, भैरव भैरवी की उपासना, गोघृत शाकल्य एवं अमृता आदि विषघ्न औषधियों से अधिकाधिक हवन, श्रीसीतारामनाम का नवाहसङ्कीर्तन, विविधदान-धर्म और ब्राह्मणभोजन आदि उपाय भी बताये गये हैं । श्रीदुर्गासप्तशती के चतुर्थ अध्याय के “शूलेन पाहि नो देवि ……. तैरस्मान्रक्ष सर्वतः ।।” इन चार मन्त्रों का अधिकाधिक जप अतिशीघ्र लाभप्रद है, इन्हीं मन्त्रचतुष्टय को मूल चण्डीकवच कहा जाता है। शिखा यज्ञोपवीतधारी द्विज “ॐ महामार्यै नमः” या “ॐ ह्रीं महामार्यै नमः” इस मायाबीजसमन्वित महामारी के मूलमन्त्र का यथाविधि चार लाख जप करे कराये एवं दशांश हवनादि भी सम्पन्न करे। शिखा सूत्ररहित श्रद्धालु “श्रीमहामार्यै नमः” का उतना ही जप करे । “आपदामपहर्तारं दातारं सर्वसम्पदाम् । लोकाभिरामं श्रीरामं भूयो भूयो नमाम्यहम् ॥” का जप या इससे सम्पुटित श्रीमद्वाल्मीकीयरामायण का पाठ महत्त्वपूर्ण है । साधक यथाधिकार श्रीरामचरितमानस, सुन्दरकाण्ड एवं श्रीहनुमच्चालीसा का पाठ करे। अपने श्वासों को भगवन्नाममय बना ले, सभी विपत्तियों में सबसे बड़ा रक्षक भगवान् का नाम ही है ।

विश्वकल्याणार्थ ब्राह्मण स्वयं भी प्रमादरहित हो निष्ठापूर्वक इन अनुष्ठानों को करें । सङ्कल्प लेकर एक घण्टा में दोसहस्र से अधिक श्रीमहामृत्युञ्जयमन्त्र का जप और डेढ़-दो घण्टे में चतुश्चत्वारिंशदक्षरात्मक मन्त्र से प्रतिमन्त्रसम्पुटित श्रीदुर्गासप्तशती का पाठ या उतने ही समय में श्रीमद्भागवतमहापुराण का सप्ताहपारायण कर देने से काम नहीं चलेगा। सावधान हो जायँ देवताओं एवं भगवद्विग्रहस्वरूप मन्त्र या ग्रन्थ को ठगने का परिणाम बहुत भयङ्कर होता है “नास्ति यज्ञसमं मित्रं नास्ति यज्ञसमो रिपुः” एवं “विधिहीनस्य यज्ञस्य सद्यः कर्ता विनश्यति” आदि परिणामों का सदैव स्मरण रखें ।

आयुर्वेदादि के अनुसार भी महामारियों का प्रकोप अधर्मजन्य है । इन संक्रामकरोगों के निरोध के लिये यथाविधि धर्मकृत्य, यज्ञानुष्ठान, हवन, धर्मोपदेश, भगवन्नामकीर्त्तन एवं स्वास्थ्योपदेशादि की अनिवार्यता है सविधि हवन से अनेक प्रकार के लौकिक लाभ भी विज्ञानसिद्ध हैं, यथा- वायु का शुद्ध होना, दूषित विषाणु जीवाणुओं (Virus-Bacteria) का नष्ट होना, आरोग्य एवं बल की प्राप्ति होना, जीवनीशक्ति प्रदान करने योग्य प्राणप्रदयुक्त (Oxygen आदि से संयुक्त) सुगन्धित वायु का उत्पन्न होना आदि । वेदों एवं उपवेदों में धूमचिकित्सा की बड़ी महत्ता है । चरक ने चिकित्सास्थान ८ | १८९ में आरोयप्राप्ति के लिये वेदविहित यज्ञों को अनिवार्य बताया है। चरक ने वहीं १७।१७ में रोगी के कमरे में यज्ञधूम से विषाक्त यक्ष्माणु-कीटाणुओं को नष्ट करने पर बल दिया है। घर में नित्यहोम करना चाहिये । ऋग्वेदसंहिता १०।१६१।१ एवं अथर्ववेदसंहिता दीर्घायुः प्राप्तिसूक्त ३ | ११११ में यज्ञहोम से विषाणु यक्ष्माणु के नष्ट होने का विवरण है —

मुञ्चामि त्वा हविषा जीवनाय कमज्ञातयक्ष्मादुत राजयक्ष्मात् ।

गोपथब्राह्मण ३ | १२१६ में यज्ञ को सर्वरोगहर महौषध बताया गया है —
भैषज्या यज्ञा वा एते । तस्मादूतुषु सन्धिषु प्रयुज्यन्ते, ऋतुसन्धिषु व्याधिर्जायते ॥

चरकसंहिता विमानस्थान ३।६।१५ १८ में भी एतद्विषयक प्रचुर वर्णन हैं —
सत्यं भूते दया दानं बलयो देवतार्चनम् ।
सद्वृत्तस्यानुवृत्तिश्च प्रशमो गुप्तिरात्मनः ।।
हितं जनपदानां च शिवानामुपसेवनम् ।
सेवनं ब्रह्मचर्यस्य तथैव ब्रह्मचारिणाम् ।।
सङ्ख्या धर्मशास्त्राणां महर्षीणां जितात्मनाम् ।
धार्मिकैः सात्त्विकैर्नित्यं सहास्या वृद्धसम्मतैः ॥
इत्येतद्भेषजं प्रोक्तमायुधः परिपालनम् ।
येषामनियतो मृत्युस्तस्मिन् काले सुदारुणे ।।

        भगवान् वेदव्यास के अनुसार विशुद्ध गोवंश के नाश से यज्ञ का नाश, यज्ञनाश से देव पितरों के हव्य-कव्यों का नाश तत्पश्चात् देवताओं के प्रलयङ्कर कोप से संसार का सर्वविनाश होना निश्चित है —

गोषु प्रनष्टमानासु यज्ञो नाशं गमिष्यति ।
यज्ञे नष्टे देवनाशस्ततः सर्व प्रणश्यति ॥

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भारत सरकार को विश्वकल्याणार्थ शीघ्र ही आधिकारिकरूपेण पूरे देश में गोवधबन्द करने की घोषणा कर देनी चाहिये- “विनश्यत्याशु तदाष्ट्रं यस्मिन् राष्ट्रे गवां वधः” जिस राष्ट्र में गोवध होता है, वह राष्ट्र शीघ्र ही विनष्ट हो जाता है। श्रौत स्मार्तयज्ञों के मूलाधार हव्य-कव्यप्रद गोवंश और मन्त्रधारण करनेवाले ब्राह्मणों के संरक्षण से विश्व का कल्याण होगा, क्योंकि वेदादि सकल शास्त्रों में सर्वश्रेष्ठकर्म श्रौत स्मार्तयज्ञ को ही विश्व का सुखमय जीवन सिद्ध किया गया है- “यज्ञो वै श्रेष्ठतमं कर्म”, “यज्ञो विश्वस्य जीवनम्” आदि

सुश्रुताचार्य ने तो सुश्रुतसंहिता ६।२० एवं ६ | २१ में स्पष्टरूपेण महामारी फैलने का प्रधान कारण अधर्म, यज्ञ का न करना, पापाचार में रत रहना आदि बताया है। दूषित देश, दूषित जल-वायु और दूषित औषध आदि से दो प्रकार के रोग उत्पन्न होते हैं- सामान्य तथा मरक । इनके प्रतीकारार्थ स्थानपरित्याग, शान्तिकर्म, प्रायश्चित्त मङ्गलार्थ जप- होम, तप, यम-नियम, देवर्षिपितृपूजन, भगवन्नामजप संकीर्तन आदि सत्कर्मानुष्ठानादि करने चाहिये । सुश्रुतसंहिता के निदानस्थान में संक्रामकरोग उत्पन्न होने के अन्य विविध कारण भी बताये गये हैं

प्रसङ्गागात्रसंस्पर्शान्निः श्वासात्सहभोजनात् ।
एकशय्यासनाच्चापि वस्त्रमाल्यानुलेपनात् ।।
कुष्ठं ज्वरश्च शोषश्च नेत्राभिष्यन्द एव च ।
औपसर्गिकरोगाश्च संक्रामन्ति नरान्नरम् ।।

गरुडमहापुराण १९५।६ में भी —

आलापागात्रसंस्पर्शात्संसर्गात्सहभोजनात् ।
आसनाच्छयनाद्यानात्यापं संक्रमते नृणाम् ।।

        संक्रमित व्यक्ति के साथ बैठने-उठने से, गात्रस्पर्श से, निःश्वास से, सहभोजन से, एक शय्या या एक आसन पर लेटने-बैठने से, किसी लघुयान में एकसाथ यात्रा करने से, उनके वस्त्र माला उपानद् आदि धारण कर लेने से, अथवा रोगी के लगाये चन्दनादि द्रव्यों का लेप करने से, कुष्ठ, आन्त्रिकज्वर, प्रवाहिका, विसूचिका एवं महामारीजन्य अन्य औपसर्गिकरोग एक मनुष्य से दूसरे मनुष्य में प्रवेश कर जाते हैं। सुश्रुत ने इन संक्रामक रोगों की चिकित्सा भी बताई है “देशत्यागाज्जपाद्धोमान्महामारी प्रशाम्यति” संक्रमित क्षेत्र का त्याग, विविधमन्त्रजप एवं विधिवत् हवन करने से महामारी शान्त हो जाती है ।

        श्रीमद्देवीभागवत की टीका में महाविद्वान् आचार्य नीलकण्ठ ने प्लेग (Plague ) यानी आचारभ्रष्टता के कारण मूषक को निमित्त बनाकर उत्पन्न हुए भयङ्कर दैवकोप के बारे में लिखा है- “मूषकं पतितोत्थं च मृतं दृष्ट्वा च यद्गृहे । तद्गृहं तत्क्षणं त्यक्त्वा सकुटुम्बो वनं व्रजेत् ॥” जिस घर में चूहे को गिरकर उछलकर प्राणत्याग करते देखा जाय, तत्क्षण ही उस घर को छोड़कर प्राणप्रदवायु की प्राप्ति के लिये सपरिवार वन चला जाय। सर्वप्राणरक्षार्थ वनसंरक्षण परमावश्यक है ।

मनुष्य जब मिथ्याहार-विहार से अपनी क्षमताशक्ति (Vitality) को नष्ट कर देता है और उसकी व्याधिप्रतीकारकशक्ति भी नष्ट हो जाती है, तब वह सांसर्गिक महामारियों से ग्रस्त हो जाता है । सम्प्रति भारतवर्ष में उपयुक्त आहार-विहार के अत्यन्ताभाव से दयनीय दुर्दशा हो रही है । विशुद्ध गोवंश के विनाश से दुग्ध घृतादि का अभाव-सा हो गया है और उसके स्थान पर कृत्रिम दुग्ध घृतादि का उपयोग होने से फुफ्फुसीय रोग, श्वास, कास, प्रतिश्याय, दृष्टिदौर्बल्य, असमय में बाल का झड़ना पकना, मन्दाग्नि तथा वीर्यसम्बन्धी रोग उत्पन्न हो रहे हैं । बलकारक खाद्य-पेयसामग्री के अभाव से मनुष्यों में रोगनिरोधकशक्ति के ह्रास होने से महामारियों का प्रकोप होता है ।

        गरुडपुराणादि में इन बातों की बहुत चर्चा है। अग्निपुराण के १३७वें अध्याय में युद्ध के समय राजाओं के द्वारा शत्रुपक्ष को छिन्न-भिन्न कर देने के लिये आभिचारिक प्रयोग के रूप में महामारीविद्या का विस्तृत वर्णन है । १९५०-६० के दशक में रचित श्रीलक्ष्मीनारायणसंहिता के द्वितीय खण्ड के ९०-९१वें अध्यायों में शिवदूती महामारी का साङ्गोपाङ्ग वर्णन आधेयरूप यज्ञादि सकल सत्कर्मों के मूल आधार भगवान् श्रीराम कृष्णादि के सर्वसिद्धिप्रद मङ्गलमय पावन नाम हैं। भगवान् के नाम में पापहरण की जितनी क्षमता है, आजतक कोई महापापी उतना पाप कर ही नहीं पाया है- “नाम्नोऽस्ति यावती शक्तिः पापनिर्हरणे हरेः । तावत्कर्तुं न शक्नोति पातकं पातकी जनः ॥ ” भगवान् के नाम में विष को भी अमृत बना डालने की अद्भुत सामर्थ्य है । आनन्दरामायण जन्मकाण्ड ६४३ में विषपान करते हुए सर्वसक्षम शिवजी ने स्वयं कहा था —

“श्रीरामनामामृतमन्त्रबीजं सञ्जीवनी चेन्मनसि प्रविष्टा ।
हालाहलं वा प्रलयानलं वा मृत्योर्मुखं वा विशतां कुतो भीः ॥ “

महामारी सुरक्षित, महामारी शान्ति
मंत्रमय तपोजनित दैवीय सुरक्षा कवच में साधक

भगवान् श्रीराम का नाम सम्पूर्ण मन्त्रों का बीज यानी मूल है। मरे को भी जीवित कर देनेवाली श्रीरामनामरूपिणी यह सञ्जीवनी जिस भाग्यवान् के अन्तःकरण में प्रविष्ट हो गई, उसके लिये हालाहलविष हो, प्रलयानलज्वाला हो या साक्षात् मृत्युमुख ही क्यों न हो- उसमें भी प्रवेश कर जाने में भय कहाँ ? यह कहते हुए शिवजी ने महाविष का पान कर लिया। श्रीरामनामा के प्रभाव से विष भी अमृत हो गया, शिवजी को नीलकण्ठ की उपाधि मिली। श्रीरामनामरूपी महौषध के अनिर्वचनीय लोकोत्तर प्रभाव से चराचर जगत् के प्राणियों के प्राणरक्षण हुए श्रीकृष्णनाम के प्रभाव से मीराबाई के विष का विषत्व नष्ट हो गया । भगवन्नामरूपी महौषध के सामने कोई भी विषाणु-जीवाणु तुच्छातितुच्छ ही है। इसीलिये तो भगवान् श्रीवेदव्यास ने वेदादि सकलशास्त्रों का बार-बार मन्थन करके अन्तिम निर्णय के रूप में स्पष्ट ही कर दिया है

“नामसङ्कीर्तनं यस्य सर्वपापप्रणाशनम् ।
प्रणामो दुःखशमनस्तं नमामि हरिं परम् ॥”,
“रामनामजपतां कुतो भयम्”, “हरिस्मृतिः सर्वविपद्विमोक्षणम्” आदि ।

भगवान् तो हमारे परमाभ्युदय और निःश्रेयस के लिये सदैव बाँहें फैलाकर खुली घोषणा करते रहते हैं-

“मामेकं शरणं व्रज अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥”
“सकृदेव प्रपन्नाय तवास्मीति च याचते ।
अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतद् व्रतं मम ||”

        समर्पितहृदय जीव अहैतुकीकृपा करनेवाले करुणावरुणालय भगवान् से केवल एकबार कह दे- “हे नाथ ! मैं तुम्हारा हूँ ।” क्योंकि भगवान् चाहते हैं कि जीव मुझसे रक्षा की अपेक्षा करे- “रक्षापेक्षामपेक्षते” पुनः उस परमसौभाग्यवान् जीव का कभी बाल भी बाँका नहीं हो सकता । जिस श्रीकृष्ण ने स्वजनों की रक्षा के लिये विनाशकारी दावानल का पान कर लिया था, विश्वासपूर्वक आर्त्तभाव से पुकारने पर आज भी वे प्रलयानलज्वाला का पान कर लेंगे । आयुर्वेद ने तो सुस्पष्टरूपेण डिण्डिम घोषणा कर दी है —

“अच्युतानन्तगोविन्दनामोच्चारणभेषजात् ।
नश्यन्ति सकला रोगाः सत्यं सत्यं वदाम्यहम् ।।”

ॐ अच्युताय नमः । ॐ अनन्ताय नमः । ॐ गोविन्दाय नमः ।
—– श्रीराम जय राम जय जय राम —–

— पण्डित गङ्गाधर पाठक ‘वेदाद्याचार्य’ —
मुख्याचार्य- श्रीरामजन्मभूमिशिलापूजन, अयोध्या
मार्गदर्शक:-  श्रीसर्वेश्वर जयादित्य पञ्चाङ्गम्, जयपुर  

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