‘मन्त्र’ का अर्थ, प्रयोग और उसके फल

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वेद मंत्र मन्त्र ब्राह्मण ऋग्वेद यजुर्वेद सामवेद अथर्ववेद

मन्त्र :-

मन के साधन को “मन्त्र” कहते हैं | अर्थात मन जो “संकल्प” ले उसे सत्य बनाने के साधन को मन्त्र कहते हैं | किसी भी वैदिक संहिता में “मन्त्र” नहीं होते | ऋग्वेद में ऋचाएं हैं जिनका प्रयोग यज्ञ में स्तुति हेतु होता है, सामवेद के साम का गान होता है, यजुर्वेद के यजुः से हवि दी जाती है, अथर्ववेद का मौन मनन ब्रह्मा नाम के पुरोहित को करना चाहिए, किन्तु अब अथर्ववेद का प्रयोग होता ही नहीं है | मन्त्र इन सबसे पृथक वस्तु है | मन्त्र की दीक्षा और प्रयोग की विधि गोपनीय है, केवल दीक्षित व्यक्ति को ही दी जाती है |

ब्राह्मण-ग्रन्थों और कल्पसूत्रों की सहायता से प्रशिक्षित पुरोहित आवश्यकतानुसार वैदिक छन्दों से मन्त्र बनाते हैं | उदाहरणार्थ, “गायत्री” नाम की ऋचा ऋग्वेद में है, उसी नाम का यजुः यजुर्वेद में है, उसी नाम का साम सामवेद में है, इन तीनों की वर्तनी (हिज्जे, स्पेल्लिंग) एक जैसी है किन्तु उच्चारण में बहुत अन्तर होता है | व्याहृतियाँ जोड़कर और कभी-कभी अतिरिक्त पदों को जोड़कर विधिवत विनियोग करने पर “मन्त्र” कहलाता है | एक ही गायत्री के सीधे और उलटे पाठ से अनेक प्रकार के मन्त्र बनते हैं |

गायत्री यजुः में वैदिक तान्त्रिक व्याहृतियाँ जोड़कर विशेष पद्धतियों द्वारा सात प्रकार के भिन्न-भिन्न उलटे क्रम से पाठ करने पर सात दिव्यास्त्रों के मन्त्र बनते हैं जो कुपात्रों को नहीं दिए जाते | यदि उनकी विधि विस्तार से बता भी दी जाय तो आज के युग में उतना कठोर तप कोई नहीं कर पायेगा जो उन दिव्यास्त्रों की सिद्धि हेतु अनिवार्य है | दिव्यास्त्रों की सिद्धि केवल यजुर्वेदीय गायत्री यजुः से बने मन्त्रों द्वारा ही हो सकती है, अन्य वेदों की गायत्री से नहीं, क्योंकि धनुर्वेद तो यजुर्वेद का उपवेद है, धनुर्वेद में अन्य वेदों का उपयोग वर्जित है |

किन्तु जब आयुर्वेद में किसी मन्त्र, जैसे कि गायत्री, का प्रयोग करना पड़े तो ऋग्वेद की गायत्री नाम की ऋचा में व्याहृतियाँ जोड़कर मन्त्र बनाने पड़ेंगे, तब यजुर्वेद या सामवेद कार्य नहीं करेगा, क्योंकि ऋग्वेद का उपवेद ही आयुर्वेद है | आयुर्वेदीय दिव्य मन्त्रों की सिद्धि आज के युग में किसी वैद्य को नहीं है, बालकृष्ण या रामदेव ने तो ये बातें कभी सुनी भी नहीं है | सामवेद के मन्त्रों का प्रयोग तो सबसे कठिन है, उसकी लय पर तो सातों लोक नाचते हैं | कलियुग में सामवेद की हज़ार शाखाओं में केवल तीन ही बचे हैं और उनमें भी मन्त्र-प्रयोग कोई नहीं जानता |

मन्त्र ब्राह्मण

मेरी शाखा शुक्ल यजुर्वेद की वाजसनेयी संहिता की माध्यन्दिन शाखा है | इस शाखा के अनेक मन्त्रों का प्रयोग मैं जानता हूँ किन्तु बताना वर्जित है | मन्त्र के जप की संख्या और प्रयोग की विधि में मनमाना परिवर्तन नहीं किया जा सकता | वैदिक मन्त्र की सिद्धि हेतु एक विशेष प्रकार के प्राणायाम के दौरान निर्दिष्ट संख्या में जप करना पड़ता है जो अत्यधिक कठिन है | उदाहरणार्थ, ब्रह्मास्त्र की सिद्धि में एक निखर्व बार गायत्री के विपरीत पाठ के एक विशेष क्रम का तान्त्रिक व्याहृति सहित जप करना पड़ता है, किन्तु कलियुगी लोगों ने “निखर्व” पर अनेक लड्डू बिठाकर इतनी बड़ी संख्या बना दी कि भर दिन कठोर प्राणायाम में जप करते रहे तब भी लगभग बीस लाख वर्ष लग जायेंगे — अतः निखर्व का आधुनिक अर्थ बकवास है! आजकल वाममार्गी तन्त्र के नाम पर जो मन्त्र प्रचलित हैं और उनका जिस वाममार्ग के द्वारा प्रयोग की विधियां ग्रन्थों में मिलती हैं, वे हिन्दू संस्कृति के पतन काल में (गुप्त काल के बाद) लिखी गयीं और हानिकारक हैं |

उपरोक्त जानकारी कोई नहीं देगा, मैंने इसलिए लिखी है क्योंकि इन मन्त्रों का सही प्रयोग करने वाले बालक अब पढने योग्य उम्र में पँहुच रहे हैं , वे 16अप्रैल से 9 मई के बीच 2003 में पैदा हुए थे जब छ-सात ग्रह उच्च में थे | किसी वैदिक मन्त्र का उचित विधि से प्रयोग करने पर उस मन्त्र के देवता फल देते हैं | किन्तु आर्यसमाज तो देवताओं को मानता ही नहीं, अतः मन्त्रों और उनके जप को आर्यसमाज अन्धविश्वास कहता है, जिस कारण मन्त्रों का लाभ आर्यसमाजी नहीं उठा सकते | आर्यसमाज पाणिनी की अष्टाध्यायी को प्रमाण मानता है, जिसमें जप का सस्वर पाठ होना चाहिए ऐसा उल्लेख है | यह वैदिक मन्त्र के जप के बारे में ही कहा गया है | अतः जिस अष्टाध्यायी को आर्यसमाज प्रमाण मानता है, उसी के अनुसार जप की प्रामाणिकता सिद्ध होती है और आर्यसमाज की मान्यता असत्य सिद्ध होती है |

वैदिक मन्त्र का ज्ञान केवल सच्चे ब्राह्मण को ही देना चाहिए, जो आज के युग में दुर्लभ हैं | ब्राह्मण को धन के लिए वैदिक विद्याओं का कभी भी प्रयोग नहीं करना चाहिए, धन घटे तो भीख माँगना चाहिए, शास्त्रों में बताये ब्राह्मणों वाले कर्म करने चाहिए (गौतम बुद्ध ने भी ब्राह्मणों के लिए यही बात कही है)| नौ ब्रह्म-कर्मों का वर्णन गीता में श्रीकृष्ण ने किया है | जिसमे ये गुण नहीं है वह किसी भी जाति में पैदा हो, ब्राह्मण नहीं है |

“गायन” को वेद मन्त्रों के पाठ में दोष माना जाता है | केवल सामवेद में गान है, किन्तु वहाँ भी आप संगीत के राग लय ताल आदि अपनी ओर से नहीं ठूँस सकते | “मन्त्र” की मनमानी व्याख्या नहीं करनी चाहिए , “मन्त्र” “मन्” धातु से बना है | केवल ब्रह्मा जी और वैदिक ऋषियों के मन में स्वतः मन्त्र प्रकट होते हैं और उनका दिव्य चक्षु द्वारा उन्हें दर्शन होता है, किन्तु उनको भी वेदमन्त्रों को मनमाने तौर पर रचने या उत्पन्न करने का अधिकार नहीं है | ब्रह्मा जी की आयु है 72000 कल्प, जिसके बाद नए ब्रह्मा जी विष्णु-नाभि से निकलते हैं , अतः ब्रह्मा-पद कर्मदेव का पद है, सूर्य की भाँति आजानदेव (अनश्वर) नहीं | किन्तु वेद नश्वर नहीं है | अतः ब्रह्मा जी लोक में वेद को ऋषियों के मन में प्रकट करते हैं, ब्रह्मा जी वेद रचते नहीं हैं | वैदिक “शब्द” नित्य और नियत अर्थ के होते हैं, उनके व्याकरण पर मनमाने विचार थोपने से पाप लगता है | बलपूर्वक ब्रह्मज्ञानी दिखने के लोभ से बचें, जो थोड़ी सी ईश्वर प्राप्ति की सम्भावना कुण्डली में होगी वह भी नष्ट हो जायेगी | योगमार्ग में सिद्धियाँ स्वतः मिलती हैं, किन्तु उनपर धान देने सेआध्यात्मिक प्रगति अवरुद्ध हो जाती है | जो जानबूझकर सिद्धियों के पीछे भागते हैं, उन्हें सिद्धियाँ नहीं मिलतीं, मिलती भी हैं तो क्षणिक, और आध्यात्मिक प्रगति तो उल्टी दिशा में ही होती है |

मन्त्र से लाभ

मन्त्रविद्या द्वारा मैंने बहुतों को लाभ पँहुचाया है, जिनमे कई राष्ट्रीय स्तर के प्रसिद्ध लोग भी हैं | किन्तु सदैव मैंने ब्रह्मचारी बालकों द्वारा ही मन्त्रजप कराया, स्वयं कभी किसी के लिए मैंने कोई जप नहीं किया, अपने लिए भी नहीं, क्योंकि गुरु के आदेश से मैं आत्मकल्याणार्थ जप करता हूँ जो दशकों पहले अजपा जप बन गया, दूसरा कोई भी मन्त्र जपने से वह टूट जाएगा | और भी कई लोगों को मैं जानता हूँ जो मन्त्रविद्या का सदुपयोग करते हैं | मैं ऐसे लोगों को भी जानता हूँ जो बिना मन्त्र के भी बहुत कुछ कर सकते हैं, सिद्ध पुरुष हैं | किन्तु वे भी दुष्टों को लाभ पँहुचाने में असमर्थ हैं, क्योंकि दुष्टों के लिए वेद विद्याएँ नहीं होतीं |

वैदिक सभ्यता के समूचे इतिहास में आजतक कोई असभ्यता द्वारा कोई भी विद्या प्राप्त नहीं कर सका और न ही कोई लाभ ले सका | विद्या प्राप्त करने या विद्या से लाभ उठाने का मार्ग कैसा होना चाहिए यह हर पढ़ा-लिखा भारतीय जानता है | श्रीकृष्ण ने बहुत प्रयास किया दुर्योधन को सुधारने की, नहीं सुधार सके | विष्णु के सारे अवतार यही सीख देते हैं कि दुष्टों और मूर्खों को बात से समझाना असम्भव है | वे बातों के भूत नहीं है | बचपन में ही अत्यधिक पढने और भोजन आदि पर ध्यान न देने से मुझे -3.75 पॉवर का चश्मा लग गया | दवाओं का कोई लाभ नहीं हुआ तो कुछ वर्षों के बाद दवा भी छोड़ दिया | किन्तु जब मैंने 344 प्राणायाम प्रतिदिन करना आरम्भ किया तो कुछ महीनों के पश्चात चश्मा लगाने पर आँखों में दर्द होने लगा, जाँचने पर पता चला कि पॉवर घटकर -1.5 पर आ गया था, जबकि भोजन अत्यधिक घटा दिया था और सोना तो लगभग गायब ही हो गया था, घूमना-फिरना और व्यायाम पूर्णतः बन्द थे, केवल सिद्धासनऔर शवासन ! न तो मैंने किसी मन्त्र का प्रयोग किया और न ही डॉक्टरों के बताये मार्ग का अनुसरण किया, देह की मुझे कभी चिन्ता नहीं रही | बीमार पड़े कई दशक हो गए थे | किन्तु अत्यधिक यात्राओं और दूषित जल के कारण कुछ मास पहले जोड़ों में दर्द आरम्भ हो गया | दवाओं का कोई प्रभाव नहीं पडा तो दवा छोड़ा | ज्योतिष के अनुसार ग्रहदशा देख ली और निश्चिन्त हो गया – ग्रह का समय बीतने पर स्वतः ठीक हो गया | मुझे किसी का गुरु बनने का शौक नहीं है, मैंने फेसबुक पर भी कई बार लिखा है कि मुझे “गुरु” कहलाना अच्छा नहीं लगता |

– आचार्य श्री विनय झा

1 COMMENT

  1. आपका कथन मुझे बहुत अच्छा लगा मैं सदा आपका आभार प्रकट करूंगा

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