प्रखर हिन्दू विचारक थे नोबेल पुरस्कार विजेता विद्याधर नायपॉल

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V.S. Naipol नायपॉल

कहते हैं कि जब घर में आग लग जाए तो उसे बुझाने के लिये घर से बाहर निकलना पड़ता है। घर में लगी आग की तीव्रता कितनी है इसे देखने के लिये बाहर निकलना ही पड़ता है क्योंकि घर के अंदर रहकर आप घर में लगी आग की तीव्रता नहीं देख सकते और न ही तदनुरूप उसे बुझाने का इंतजाम कर सकते और वैसे भी भारत भूमि तो अब धिम्मीपन की प्रगति के लिये उपजाऊ भूमि हो गई है।

2001 में साहित्य के लिए नोबेल पुरस्कार से सम्मानित विद्याधर सूरजप्रसाद नायपॉल अपने घर से बाहर थे इसलिये उन्हें अपने घर, अपने भारत में उठ रही आग की लपटें बहुत साफ़ दिखाई दे रही थी। नायपॉल ने भारत को बाहर से जैसा देखा उसके बाद इसके इतिहास, संस्कृति, सभ्यता और वर्तमान हिन्दू मन को उस रूप में समझा जो अमूमन हमें दिखाई नहीं देता और अपनी भावनाओं को उन्होंने ‘An Area of Darkness‘ और ‘India: A Wounded Civilization‘ जैसी किताबें लिखकर शब्द दिए।

नायपॉल की पुस्तकें

भारत के कथित हिन्दू नेता जिन्हें छह दिसम्बर पर प्रायश्चित और अपराध बोध है, उसी छह दिसम्बर को नायपॉल ने “इतिहास की स्वाभाविक अभिव्यक्ति” बताने का दम दिखाया था और कहा था कि ये तो होगा।

कश्मीर के बर्फ से ढंके हुए पहाड़ों के बीच भगवान भास्कर को समर्पित मार्तंड मंदिर आज से करीब 1,700 वर्ष पहले सूर्य वंश के राजा ललितादित्य मुक्तापीड के द्वारा निर्मित कराया गया था। इस बेहद खूबसूरत मंदिर को 15वीं शताब्दी में शाहमीर वंश के बर्बर सुल्तान सिकंदर ने नष्ट-भ्रष्ट कर दिया था। इसी तरह मध्यकालीन महान हिंदू राज्य विजयनगर साम्राज्य की वैभवशाली राजधानी हंपी कर्नाटक की तुंगभद्रा नदी के किनारे स्थित है जिसे 1565 में कालिकोट के युद्ध के बाद चार मुस्लिम राज्यों (गोलकुंडा, अहमदनगर, बीजापुर और विदर्भ) की संयुक्त सेनाओं ने विध्वंस कर दिया था। इस युद्ध में महान हिन्दू राज्य विजयनगर साम्राज्य की पराजय हुई और हम्पी शहर को उन आक्रमणकारियों ने जमकर लूटा।

मार्तंड मंदिर और महान हम्पी शहर के अवशेष आज भी इतने ध्वंस के बाबजूद हिन्दू गौरव का उद्घोष पूरे स्वर के साथ कर रहे हैं । नायपॉल जब अपनी भारत यात्रा के दौरान मार्तंड मंदिर और हंपी नगर की दुर्दशा देख रहे थे तो उसे देखने के बाद वो स्तंभित रह गये और मूर्तिवत वहीं खड़े नायपॉल की आँखों से हिन्दू जाति की इस अवनति को देखकर अनवरत अश्रु-धारा फूट पड़ी। नायपॉल उन चुनिंदा लोगों में से थे जिन्होंने भारत पर आक्रमण करने वालों की मनोवृत्ति को सबसे अधिक पहचाना था और कहा था कि, “ये मानसिकता पूरे दुनिया में एक जैसी है इसलिये कोई यह भ्रम न पाले कि विध्वंस वाली ये मानसिकता कहीं कम या कहीं ज्यादा हो सकती थी।” (जो दुर्भाग्य के आज के हमारे हिंदुवादियों के जेहन में है)

कश्मीर का मार्तंड सूर्य मंदिर, आक्रान्ताओं द्वारा इसका ध्वंस किया गया

उन्होंने स्पष्ट कहा था कि आक्रमणकारियों के मजहब के लिये भारत भूमि में कोई स्थान नहीं है। 1999 में अंग्रेज़ी पत्रिका आउटलुक को दिए इंटरव्यू में उन्होंने भारत के तमाम दुर्भाग्यों के मूल में इसी आक्रमण मानसिकता को देखा और ये कहने का दम दिखाया कि आक्रामक मानसिकता के आक्रमण के बाद प्रत्याक्रमण स्वाभाविक है और इसलिये जब 2004 में वो भारत यात्रा पर थे तब उन्होंने भाजपा कार्यालय में कहा था कि, “अयोध्या एक तरह का जुनून था और हर जुनून को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए. मैं हमेशा जुनून से बाहर आने वाले कार्यों का समर्थन करता हूं, क्योंकि ये रचनात्मकता को दर्शाता है।”

उस ध्वंस में रचनात्मकता देखने वाले नायपॉल ऐसा इसलिये कह रहे थे क्योंकि वो मानते थे कि दशकों से होती आ रही हिन्दुओं की हार ने हिन्दुओं को आत्मसमपर्ण करने वाला बना दिया है जिसे अब बदलना चहिये और अयोध्या उसका माध्यम बनेगा।

भारत रत्न श्री अटल बिहारी वाजपेयी और नोबल विजेता श्री विद्याधर नायपॉल

1971 में बुकर प्राइज़ और 2001 में साहित्य के लिए नोबेल पुरस्कार से सम्मानित नायपॉल कोई छोटी-मोटी हस्ती नहीं थे। आज किसी मामूली अखबार में छपने वाला भी सेकुलरिज्म और धिम्मीपन की बोली बोलने लगता है ऐसे में हौसले के साथ एक नोबेल विजेता का सनातन सत्य का उद्घोष करना उन्हें महान..और ..बहुत महान बना देता है। पूरी दुनिया को उन्होंने बर्बरता और सभ्यता के बीच के संघर्ष की पहचान का सूत्र दिया था। नायपॉल को हिंदुत्व के नायकों में चिन्हित कीजिए, दुनिया उनके लेखनी का उपयोग अपनी सुरक्षा, अपनी रणनीति निर्माण में कर रही है और दुर्भाग्य है कि हम हिन्दू उन्हें ठीक से जानते तक नहीं। उनके लेखनी के ऊपर विमर्श हो, शोध हो, संगोष्ठियाँ हों और अगर आपको लगता है कि इसकी जरूरत है तो फिर सहर्ष इस लेख को फैलाइए। सच तो यह है कि नोबल विजेता विद्याधर सूरजप्रसाद नायपॉल हिंदुत्व के विचारक और नायक हैं।

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