पाकिस्तान का संविधान – एक विश्वस्तरीय मज़ाक

 

पाकिस्तान का निर्माण  मजहबी कट्टरता के उस सिद्धान्त के आधार पर हुआ जो यह मानता है कि इस्लाम किसी अन्य संस्कृति के साथ सह अस्तित्व से नही रह सकता। उसके संविधान का मुख्य प्रेरक तत्त्व भी यही सिद्धान्त रहा। मार काट हत्या बलात्कार के बीच हो रहे बँटवारे के बीच नवोदित इस्लामिक राज्य पाकिस्तान की संविधान सभा की पहली बैठक 11 अगस्त 1947 को हुई। बँटवारे का मुख्य कर्णधार मुहम्मद अली जिन्ना अपनी मृत्यु तक इसका अध्यक्ष रहा और उसके बाद  लियाकत अली इसका अध्यक्ष बना जिसके नेतृत्व में इसकी उद्देश्यिका तैयार हुई। इसका आधारभूत सिद्धान्त पाकिस्तान को इस्लाम के मजहबी सिद्धांतों पर चलने वाला राज्य बनाना था। संविधान सभा के गैर मुस्लिम सदस्यों ने इसका विरोध किया किन्तु उनको भान  नहीं था कि अब वे हिन्दू बहुल भारत में नहीं हैं और उनकी बातों का कोई महत्व नहीं है।  अक्तूबर 1951 में प्रधान मंत्री  लियाकत अली खान की हत्या कर दी गयी  जिसके बाद ख्वाजा निज़ामुद्दीन प्रधानमंत्री बना  । 

पहला संविधान 

इस दौरान पाकिस्तान की संविधान सभा भी अपना काम करती रही और नौ वर्षों के कठिन परिश्रम के बाद पाकिस्तान के महान संविधान का निर्माण किया जो कि अगले दो  वर्षों तक लागू रहा। 

खैर इस दौरान पाकिस्तान की संविधान सभा भी अपना काम करती रही और नौ वर्षों के कठिन परिश्रम के बाद पाकिस्तान के महान संविधान का निर्माण किया जो कि अगले दो  वर्षों तक लागू रहा। मार्च 1956 में पाकिस्तान का पहला संविधान लागू हुआ जिसके अनुसार पाकिस्तान को इस्लामिक गणराज्य घोषित किया गया। इस्कंदर मिर्जा इस संविधान के लागू होने के बाद पहला राष्ट्रपति बना। परंतु लोकतन्त्र का कोई स्वभाव और संस्कृति नहीं होने के कारण यह व्यवस्था ठीक से दो वर्ष भी नहीं चल पायी और 1958 में इसकंदर मिर्जा ने मार्शल ला लगा दिया। केंद्रीय विधानसभा और राज्य विधानसभाएँ बर्खास्त कर  दी गईं और संविधान का अंत कर दिया गया।  शासन सेनाध्यक्ष आयूब खान के हाथों में आ गया। आयूब खान अपनी इस स्थिति से संतुष्ट नहीं था। अक्तूबर 1958 में उसने इसकंदर मिर्जा को अपदस्थ करके सत्ता पर कब्जा कर  लिया और पाकिस्तान का तानाशाह बन बैठा। 

दूसरा संविधान 

सारी राजनीतिक पार्टियों को अवैध घोषित कर दिया गया। इस मूर्खतापूर्ण नियम के लागू होने के बाद जो चुनाव हुये उसके पश्चात जो लोग चुनकर आए उन्होने संसद के अंदर अपने गुट बना लिए। और जो पार्टियां संसद से बाहर अवैध थीं वही संसद के भीतर गुट के रूप में कार्य करने लगीं।

अपनी स्थिति को वैधानिक रूप प्रदान करने के लिए  अयूब खान ने 1960 में जनमत लेने की व्यवस्था की जिसमें पाकिस्तान की स्थानीय स्वशासन संस्थाओं ( ग्राम पंचायतों, नगर सभाओं आदि ) ने मतदान किया। इस प्रकार की 78720 संस्थाओं में से 75283 संस्थाओं ने आयूब खान के पक्ष में मत दिया।  इस प्रकार अपनी स्थिति सुदृढ़ करके आयूब ने संविधान निर्माण के लिए एक कमीशन की नियुक्ति की जिसका अध्यक्ष मंजूर कादर नाम का वकील था।  पाकिस्तान का दूसरा संविधान 1962 में प्रकाशित हुआ। इस संविधान का एक मुख्य प्रावधान था कि चुनावों में राजनीतिक पार्टियां नहीं होंगी और सारे प्रत्याशी स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ेंगे। सारी राजनीतिक पार्टियों को अवैध घोषित कर दिया गया। इस मूर्खतापूर्ण नियम के लागू होने के बाद जो चुनाव हुये उसके पश्चात जो लोग चुनकर आए उन्होने संसद के अंदर अपने गुट बना लिए। और जो पार्टियां संसद से बाहर अवैध थीं वही संसद के भीतर गुट के रूप में कार्य करने लगीं। इस प्रकार आयूब खान राजनीतिक दल विहीन संसद बनाने का तुगलकी सपना टूट गया। और इस जगहँसाई के बाद उन्हे समझ आ गया कि जिस देश में पार्लियामेंट होगी वहाँ राजनीतिक दल भी होंगे। 

तीसरा संविधान 

अप्रैल 1973 को यह संविधान लागू हुआ और जुल्फिकार अली भुट्टो इसके अंतर्गत पहला राष्ट्रपति बना। भुट्टो ने याह्या खान को नजरबंद करवा दिया। किन्तु पाँच वर्षों के अंदर ही जनरल  जिया उल हक ने भुट्टो का तख़्ता पलट करके संविधान को रद्द कर दिया और इच्छानुसार अभियोग चलवा कर भुट्टो को फाँसी चढ़वा दिया। 1988  में, एक षड्यंत्र के अंतर्गत  जिया उल हक़ भी  एक वायुयान दुर्घटना में मारा गया। 

पाकिस्तान के अधिकांश  नेता आयूब खान और 1962 के संविधान से संतुष्ट नहीं थे।  1965 के चुनावों में कई दलों ने आयूब के विरुद्ध मुहम्मद अली जिन्ना की बहन को खड़ा किया। किन्तु छल बल के प्रयोग से अयूब खान फिर चुनाव जीत गया। किन्तु अबतक आयूब को समझ आ गया था कि उसके दिन पूरे हो चुके हैं अतः उसने शासन की बागडोर जनरल याह्या खान के हाथों में दे दी और खिसक लिया। याह्या ने कठोर सैनिक शासन लागू किया और 1970 में आम चुनाव कराने की घोषणा की  जिसमें पाकिस्तान के इतिहास में पहली बार जनसाधारण को प्र्त्यक्ष रूप से वोट देने का अवसर मिला। इस दौरान पूर्वी पाकिस्तान में  सरकार प्रायोजित भीषण नरसंहार और बलात्कारों का तांडव चलता रहा जिसकी परिणिति भारत और पाकिस्तान के मध्य आरपार के युद्ध के रूप में हुई और इसमें पाकिस्तान की निर्णायक पराजय हुई और पूर्वी पाकिस्तान एक नए देश के रूप में उदित हुआ।  1972 में पाकिस्तान की केन्द्रीय असेंबली ने संविधान निर्माण के किए 25 सदस्यीय समिति नियुक्त की। अप्रैल 1973 को यह संविधान लागू हुआ और जुल्फिकार अली भुट्टो इसके अंतर्गत पहला राष्ट्रपति बना। भुट्टो ने याह्या खान को नजरबंद करवा दिया। किन्तु पाँच वर्षों के अंदर ही जनरल  जिया उल हक ने भुट्टो का तख़्ता पलट करके संविधान को रद्द कर दिया और इच्छानुसार अभियोग चलवा कर भुट्टो को फाँसी चढ़वा दिया। 1988  में, एक षड्यंत्र के अंतर्गत  जिया उल हक़ भी  एक वायुयान दुर्घटना में मारा गया।  1985 में यह संविधान पुनः स्थापित किया गया जिसे 1999 में नवाज शरीफ की सरकार का तख़्ता पलटने के बाद परवेज़ मुशर्रफ ने वर्षों तक रद्द किए रखा।  

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