मोहनजोदड़ो और हड़प्पा की आसुरी सभ्यता की वास्तविकता

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हड़प्पा मोहनजोदड़ो सिंधु घाटी पशुपति महिषासुर

यूरोप के तथाकथित ‘विद्वानों’ ने मोहनजोदड़ो और हड़प्पा ‘सभ्यता’ को भारतीय सभ्यता की प्राचीनतम आधारशिला बताया और उसे वैदिक पशुपालक लोगों की तुलना में विकसित तथा पुरातन घोषित कर दिया, जिसे आजतक हमारे नीति-निर्धारक और तथाकथित बुद्धिजीवी स्वीकारते आ रहे हैं, खासकर वामपन्थी इतिहासकार। इतिहास की पुस्तकों में ‘वैदिक युग’ के अन्तर्गत जो कुछ भी पढ़ाया जाता है उसमें वेदों में क्या है यह छोड़कर बाँकी सबकुछ पढ़ाया जाता है। ऐसी पुस्तकें पढने से जो थोड़ा-बहुत ज्ञान मस्तिष्क में बचा-खुचा है वह भी नष्ट हो जाएगा।

इस मान्यता के विरुद्ध कई हिन्दू-राष्ट्रवादी खड़े हुए हैं जो हड़प्पा ‘सभ्यता’ को ही वैदिक सिद्ध करने में लगे हैं, ये लोग यूरोपियन तथा वामपन्थियों से भी अधिक बुरे हैं क्योंकि तथ्यों को विकृत करके सत्य को सिद्ध करना मूर्खता है, और कहावत है कि मूर्ख मित्र से बेहतर समझदार शत्रु होता है, क्योंकि मूर्ख कब क्या करेगा यह कोई नहीं जान सकता, अक्सर मूर्ख तो अपने ही गोल में गेन्द डाल देते हैं। इन दोनों खेमों के लोग कट्टर भौतिकवादी हैं, अतः वैदिक सभ्यता को समझ ही नहीं सकते। अतः सबसे पहले “सभ्यता” शब्द को ही परिभाषित कर लें।

ऑक्सफ़ोर्ड के प्रोफेसर जी.एम. रोबर्ट्स ने Civilization की परिभाषा दी है: ‘जहाँ नगरों, व्यापार-वाणिज्य, आदि का विकास हो’ (उनके शब्दों का सार मैंने दिया है)। लैटिन भाषा में civilis (civil) का अर्थ है ‘related to civis (citizen) and civitas (city)’ ; उससे 16वीं शती में फ्रेंच शब्द civilisé (civilized) बना और इस फ्रेंच शब्द से दो सौ वर्षों के बाद अंग्रेजी शब्द Civilization 18वीं शती में बना। बहुत से आधुनिक लोगों को यह जानकार आश्चर्य होगा कि आजकल जिसे अंग्रेजी में ‘Civilization’ तथा हिन्दी में ‘सभ्यता’ कहते हैं उसे प्राचीन रोमन साम्राज्य की भाषा लैटिन में “History” कहते थे, और उस प्राचीन लैटिन History की संकल्पना में प्राचीन भारतीयों की “सत-त्रेता-द्वापर-कलि” युगों के समानान्तर “स्वर्ण-रजत-कांस्य-लौह” युगों की अवधारणा थी। शेक्सपियर के युग में भी “मॉडर्न” शब्द का अपमानजनक अर्थ में प्रयोग होता था, प्राचीन के प्रति सम्मान की भावना थी। विकासवाद का भूत तो भौतिकवादी विकास का फल है जो भारत की लूट से आरम्भ हुए औद्योगिक क्रान्ति के बाद की चीज है।

रोमन “History” को सिद्ध करने का प्रयास भौतिकवादियों ने किया, किन्तु स्वर्ण तथा रजत युगों को प्रमाणित नहीं कर पाए, अतः आजकल केवल कांस्ययुग तथा लौहयुग ही इतिहास में पढ़ाये जाते हैं! केवल एक धातु के आधार पर सम्पूर्ण युग को परिभाषित करने वाले भूल गए कि इस चतुर्युगी अवधारणा का स्रोत ऋग्वैदिक ग्रन्थ ऐतरेय आरण्यक में वर्णित “सत-त्रेता-द्वापर-कलि” की अवधारणा है जो भौतिक धातुओं या भौतिक विकास पर नहीं बल्कि सत-बनाम-असत नैतिक मूल्यों के आधार पर सभ्यता और संस्कृति को परिभाषित करने वाले जीवन-दर्शन पर आधारित है। “सभ्य” शब्द का उल्लेख अथर्ववेद आदि में मिलता है जहाँ इसका प्रयोग आधुनिक यूरोपियन अर्थ में नहीं बल्कि प्राचीन अर्थ में किया गया है : सभा में भाग लेने योग्य (सुसंस्कार वाले) व्यक्ति”। निजी स्वार्थ के वशीभूत होकर भौतिकता की ओर लपकने वाली आधुनिक मानसिकता के विपरीत सहयोग और सामञ्जस्य का वैदिक जीवन-दर्शन ही सच्ची सभ्यता का आधार है। अतः यदि नगर-व्यापार आदि भौतिक मानदण्डों को ही सभ्यता का पैमाना मानें तो भौतिकता को त्यागकर अध्यात्म को महत्त्व देने वाले सारे ऋषि-मुनि और बुद्ध-महावीर से लेकर विवेकानन्द जैसे लोग असभ्य थे ! प्राचीन भारतीय ग्रन्थों में असुरों के जीवन-दर्शन, रहन-सहन और मूल्य-मानकों की जाँच करें तो ‘सभ्यता’ की जो आधुनिक अवधारणा आजकल इतिहासकारों में प्रचलित है उसे “आसुरी” इतिहास-दर्शन का अंग मानने के लिए बाध्य होना पडेगा।

असुर महिषासुर की पूजक थी हड़प्पा सभ्यता

दुम नीचे लगाया जाय या ऊपर, दुम तो दुम ही है, भले ही ऊपर वाले दुम को “श्रृंग” कहकर श्रृंगार-रस का लक्षण घोषित कर दें! राजमहिषी के पति सिर पर महिष का श्रृंग लगाने वाले महिषासुर कहलाते थे जिनकी बलि देकर उन्हें सदाशिव घोषित करने की आसुरी प्रथा जहाँ से आरम्भ हुई उस नरबलि के मुख्य केन्द्र को लोग “मुर्दों का टीला” कहने लगे थे — सिन्धी भाषा में ‘मुआँ जो दड़ो’ जिसे मलेच्छों ने ‘मोहनजोदड़ो’ बना दिया और वहाँ के महिषासुरी राजमुद्रा को ‘पशुपति सील’ घोषित किया। इस तथाकथित ‘पशुपति सील’ में जो चित्र है वह पशुपति महादेव का नहीं, बल्कि महिष (नर भैंस) का सींग लगाए पूर्ण नग्न महिषासुर का है, पशुपति न तो नग्न होते हैं और न महिष का सींग सिर पर पहनते हैं। वाममार्गी हिंसात्मक दुर्गापूजा की जो विधि आज भी प्रचलित है उसे ‘वर्षकृत्य’ ग्रन्थ में चौखम्बा विद्याभवन ने प्रकाशित किया है, उसमें ‘आश्विनकृत्ये शारदीय-दुर्गा-पूजा-पद्धतिः’ अध्याय के अन्तर्गत ‘अथ दुर्गावाहनादि-पूजाविधिः’ में देखें, पहले दुर्गावाहन सिंह की पूजा है जिसके बाद महिषासुर के ध्यान का निम्न मन्त्र मिलेगा :-

“ॐ महिषस्त्वं महावीर शिवरूप सदाशिव। अतस्त्वाम् पूजयिष्यामि क्षमस्व महिषासुरः।|”
“ॐ हे महिषः तुम महावीर शिवरूप सदाशिव हो! अतः तुम्हें पूजूंगा, क्षमा करो हे महिषासुर (क्योंकि तुम्हारी बलि दूँगा)”|

ध्यान के बाद महिषासुर की प्राणप्रतिष्ठा इस मन्त्र द्वारा होती है :-
“ॐ ह्रीं ह्रीं हूँ महिषासुर इहागच्छ इह तिष्ठेत्यावाह्य , ॐ महिषासुराय नमः।”
वसिष्ठ धनुर्वेद के अनुसार युद्धारम्भ होने पर ‘ह्रीं ह्रीं हूँ’ जैसी तान्त्रिक व्याहृतियों का प्रयोग किया जाना चाहिए, यहाँ महिषासुर की पूजा हेतु आवाहन और नमस्कार का प्रसंग है, अतः तन्त्र का विधिवत ज्ञान नहीं रखने वाले किसी मूर्ख ने ये मन्त्र रचे हैं।

तत्पश्चात महिषासुर की पूजा पञ्चोपचार सहित इस मन्त्र द्वारा की जाती है :-
“ॐ महिषस्त्वं महावीर इन्द्रादिदेवमर्दक। देव्यस्त्रताडितो भूत्वा गतः स्वर्गम् नमोSस्तु ते।”
“हे महिष, तुम महावीर इन्द्रादि देवों के मर्दक हो, देवी के अस्त्र से ताडित होकर स्वर्ग जाते हो, तुम्हें नमन है !”

यह वाममार्गी दुर्गापूजा वेदविरोधी असुरों में प्रचलित थी जो इनके मन्त्रों से ही स्पष्ट है — इन्द्रादि देवों के मर्दक महावीर महिषासुर की देवी के अस्त्र द्वारा ताडित होने पर स्वर्ग जाकर वहाँ सदाशिव के रूप में स्थित होने की कामना सहित महिषासुर की बलि दी जाती है!

हड़प्पा मोहनजोदड़ो महिषासुर पशुपति
तथाकथित पशुपति सील जिसपर वास्तविकता में महिषासुर का अंकन है

मुर्दों के टीले में इसी महिषासुर की मुद्रा प्राप्त हुई जो मरणोपरान्त स्वर्ग में पशुपति बनने की कामना से अपनी ही बलि दिलाते थे! अब महिषासुर तो रहे नहीं, अतः केवल उसके वाहन महिष की बलि से ही मूर्ख लोग संतुष्ट हो लेते हैं! पूछने पर कहेंगे कि सूक्ष्म रूप में महिषासुर की बलि होती है, उसे देखने के लिए दिव्य चक्षु चाहिए! इसी पूजा में महिष की बलि देते समय गायत्री की इस आसुरी पैरोडी को भैंसा के कान में जपते हैं :-

“ॐ पशुपाशाय विद्यमहे विश्वकर्मणे धीमहि। तन्नो महिषः प्रचोदयात्।”
“ॐ पशुपाश के लिए जानता हूँ (और) विश्व भर के कर्मों में ध्यान करता हूँ उस (जानकारी और ध्यान को) हमें प्रेरित करें हे महिष”!

गायत्री मन्त्र में सविता देव से ऐसी बुद्धि मांगते हैं जो सवितादेव के पापनाशक ब्रह्मतेज (भर्ग) का ध्यान करते रहने का सामर्थ्य दे, किन्तु आसुरी दुर्गापूजा में सविता देव से बुद्धि (धी) नहीं मांगते, देवों को तो ‘महावीर इन्द्रादिदेवमर्दक’ महिषासुर मार भगाते हैं, अतः देवों से प्रेरणा न मांगकर भैंसा से प्रेरणा मांगते हैं :- “…तत् नः महिषः प्रचोदयात्” — हे महिष, हमें प्रेरित कीजिये (कि हम भी मानसिक रूप से भैंस बनकर) पशुपाश को जानकर विश्व के समस्त कर्मों में ध्यान लगाएं, अर्थात संसार के सारे कर्म पशु के पाश को जानकार वैसी ही भैंस-बुद्धि से करें! स्वर्ग में महिषासुर पशुपति बनेंगे तो महिषासुर के अनुचरों को भी भैंस बनकर उनकी सेवा में जाना पड़ेगा न! देवों को भगाकर स्वर्ग में भैंस ही भैंस! जिधर देखों उधर भैंस!

कुछ वाममार्गी अर्थ लगायेंगे कि यहाँ “पाशमुक्ति” अर्थ लगाना चाहिए, किन्तु वाममार्गियों के ग्रन्थों में पाशमुक्ति का भी अर्थ था सांसारिक नैतिकता के पाशों से मुक्त होकर पशुवत आचरण करना और स्वयं को पाशमुक्त-शिव घोषित करना। महिषासुर के अनुयायी जिन क्षेत्रों में सर्वाधिक थे वे भूभाग अब त्रिपुरासुर के अवतार महामद के अनुयायियों और उनके सेक्युलर समर्थकों से भरा हुआ है। आज भी महिषासुर की पूजा होती है जिसके कुछ मन्त्र मैंने ऊपर उद्धृत किये हैं! ये मन्त्र और पूजन की यह विधि कलियुगी असुरों ने कुछ पुराणों में जोड़ दी, ये अंश प्रक्षिप्त हैं, क्योंकि वेदव्यास जी धार्मिक कृत्यों में हिंसा के विरोधी थे, महाभारत में उन्होंने स्पष्ट लिखा है कि वैदिक यज्ञ में हिंसा वर्जित है किन्तु त्रेता युग में (रावण जैसे) कुछ “धूर्तों” ने यज्ञ में हिंसा आरम्भ कर दी।

‘मुआँ जो दड़ो’ के पुरातात्विक उत्खनन की रिपोर्ट मेरे पास है। पुरातात्विक रिपोर्ट तो कहती है कि ‘मुआँ जो दड़ो’ में 69 संरचनात्मक स्तरों का पता चला था जिनमें से केवल 30 स्तरों की खुदाई हो सकी क्योंकि नीचे के 39 स्तर भूगर्भ जल में डूबे हुए हैं ! किन्तु आज भी पाठ्यपुस्तकों में जानबूझकर झूठ पढ़ाया जाता है कि ‘मुआँ जो दड़ो’ की ‘सभ्यता’ अति विकसित अवस्था में किसी अज्ञात स्थान से आकर वहाँ अचानक स्थापित हो गयी। इतना बड़ा झूठ — ताकि भारतीय को पढ़ाया जा सके कि भारत की भूमि में कोई सभ्यता पैदा ही नहीं हो सकती! मलेच्छों का वश चलता तो समूचे ‘मुआँ जो दड़ो’ को ही उठाकर इंग्लैंड या ग्रीस ले जाते। दूसरा महत्त्वपूर्ण तथ्य है कि जिन 30 स्तरों की खुदाई हो सकी है उनमें भी कुल प्राचीन टीलों में से केवल 13% स्थलों की ही खुदाई की जा सकी। यह तथ्य भी रिपोर्ट में दबा रह गया, पुस्तकों में पढ़ाया नहीं जाता। पुस्तकों में तथ्य नहीं पढाये जातें, धूर्तों के विचार पढाये जाते हैं जिन्हें वे (काल्पनिक) तथ्य के तौर पर प्रस्तुत करके लोगों को बेवकूफ बनाते हैं।

फ़िनलैंड और रूस के कई पुरातत्ववेत्ताओं के शोधकार्य मैंने अपने कॉलेज के दिनों में ही ढूँढकर पढ़े थे जिनमे लिखा था कि ‘मुआँ जो दड़ो’ का राजघराना भैंस के गोत्र वाला था जिसकी राजमुद्रा थी भैंस के सींग वाला वह सील जिसे अंग्रेजों ने ‘पशुपति सील’ की गलत संज्ञा दी। वह ‘महिषासुर सील’ है, ‘पशुपति सील’ नहीं। उन्हीं पुरातत्ववेत्ताओं ने यह भी लिखा था कि उस भैंस गोत्र वाले राजघराने का राजमहल जहाँ है उसपर ईसापूर्व चार-पाँच शती पूर्व बौद्ध स्तूप बना दिया गया, अतः खुदाई असम्भव है। इतने प्राचीन बौद्ध स्तूप को तोड़ने पर संसार भर के बौद्ध हंगामा मचा देंगे। ऐसे पुरातत्ववेत्ताओं के कार्यों और विचारों का यूरोप और भारत के वेद-विरोधी तथाकथित ‘बुद्धिजीवी’ उल्लेख तक नहीं करते।

हड़प्पा सभ्यता की लिपि

हड़प्पा संबंधित मुद्राओं पर जो लिपि मिली है उसमें कुछ अन्ध-राष्ट्रवादियों ने वेदमन्त्र होने की कल्पना की है। हड़प्पा सभ्यता के स्थलों में वैदिक यज्ञकुण्ड नहीं मिले हैं। कालीबंगा में सोलह कुण्ड मिले जिनमें “गोजातीय” पशु की हड्डियाँ आदि मिले यह मैंने रिपोर्ट में पढ़ा, किन्तु रिपोर्ट ने यह स्पष्ट नहीं किया कि वे अवशेष बैल के थे या नर-भैंस के। उस लिपि की चार विशिष्टाएँ हैं:-

(1) वह लिपि द्विमार्गी थी (boustrophedic), पहली पंक्ति देवनागरी की तरह बांये से दाहिने की ओर दक्षिणमार्गी थी, और दूसरी पंक्ति खरोष्ठी की तरह वाममार्गी थी।
(2) उसमें पृथक चिह्नों की कुल संख्या उतनी ही है जो ब्राह्मी या देवनागरी में संयुक्ताक्षरों को मिलाकर समस्त अक्षरों (syllables) की संख्या है।
(3) इस लिपि का प्रयोग केवल कुल (खानदान) के बीजमन्त्र हेतु ही होता था, अतः दो मुद्राओं में समान वाक्य नहीं मिलते।

इसका अर्थ यह है कि वाममार्गी कौलमार्गी आसुरी तन्त्र इन हड़प्पा के असुरों का सम्प्रदाय था। गोस्वामी तुलसीदास जी ने चौदह प्रकार के मनुष्यों में सबसे बुरा कौलमार्गियों को ही कहा। कौलमार्गी कैसे होते थे इसका एक उदाहरण उनके प्रमुख ग्रन्थ ‘कुलार्णव तन्त्र’ (7-100) से प्रस्तुत है :-

“पीत्वा पीत्वा पुनः पीत्वा यावत् पतति भूतले। पुनरुत्थाय वै पीत्वा पुनर्जन्म न विद्यते।|”
अर्थ :— “पीओ पीओ फिर से पीओ जबतक भूतल पर न गिर जाओ / (तीन बार) उठकर भी पीओ (तो) पुनर्जन्म न होवे (मोक्ष मिल जाएगा)!”

दयानन्द सरस्वती जी ने इस तान्त्रिक श्लोक का विरोध तो किया, किन्तु यह नहीं देख सके कि श्रीमद्-भगवत-गीता के एक श्लोक में परमात्मा की भक्ति को हटाकर शराब पीने को मोक्ष का उपाय इन कौलियों ने बताया ; गीता का वह श्लोक है :-
आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनो-अर्जुन। मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते।|8-16||

जिस प्रकार गायत्री में “हे सविता देव हमें प्रेरणा दीजिये…” वाली बात को हटाकर “हे भैंसा हमें प्रेरणा दीजिये…” किया गया, वैसे ही गीता के उपरोक्त श्लोक से भगवत-भक्ति को हटाकर अत्यधिक शराब पीने को मोक्ष-प्राप्ति का उपाय बताया गया, जिसका साक्ष्य है अन्तिम तीन शब्दों की चोरी (“पुनर्जन्म न विद्यते”)। यह चोरी दयानन्द जी नहीं पकड़ पाए।

(4) हड़प्पा की लिपि की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि आमलोगों को लेखन कला से पूर्णतया वञ्चित रखा जाता था, केवल सत्ताधारी वर्ग के कौलिक बीजमन्त्रों के लिए ही इसका प्रयोग होता था जिन्हें व्यापारिक वस्तुओं एवं अन्यान्य सामग्रियों की रक्षा हेतु वाममार्गी तन्त्र की यान्त्रिक आकृतियों के साथ वस्तुओं से युक्त किया जाता था।

यह आसुरी ‘असभ्यता’ भौतिकवाद से पूर्णतया ओत-प्रोत थी और आमलोगों के शोषण द्वारा सत्ताधारी असुरों के आमोद-प्रमोद के सिवा किसी भी आध्यात्मिक वा बौद्धिक प्रयास का इस असभ्यता में सर्वथा अभाव था। सिन्ध के एक हड़प्पा सभ्यता के स्थल का आज तक नाम है “असुरकोट” ! ‘असुर’ कोई पृथक नस्ल नहीं था। उदाहरणार्थ, कंस और श्रीकृष्ण एक ही वंश के थे, किन्तु कंस असुर था। आधुनिक सीरिया देश का नाम लैटिन “असीरिया” से बना है जिसका वास्तविक उच्चारण “असुर” था, ग्रीक वर्ण upsilon (u) को लैटिन में “y” लिखने और उसमें प्रदेश-वाचक लैटिन प्रत्यय -ia जोड़ने से अपभ्रंश शब्द “Assyria” बना जहाँ की अपनी भाषा में “राज्य, राज्य के देव, और राजा” इन तीनों को “असुर” कहा जाता था। मध्यपूर्व तथा मिस्र की प्राचीन लिपियों को भी आधुनिक पश्चिम के ‘विद्वानों’ ने इसी तरह विकृत करके पढ़ा और पढ़ाया है ताकि वैदिक संस्कृति से विश्व की प्राचीन संस्कृतियों के सम्बन्ध को छुपाया जाय।

मिस्र की प्राचीनतम पिरामिडों की दीवारों पर वैदिक यज्ञ के हवि से देवों की क्षुधा-तृप्ति का भित्ति-चित्र मिलता है तो उसे कोकेन पीने वाले पुरोहितों का चित्र बतलाया जाता है! कालीबंगा से मिले हड़प्पा सभ्यता के यज्ञकुण्ड को रोमिला थापर ने तन्दूर की भट्ठी कहा, यद्यपि यज्ञकुण्ड की ज्यामिति कैसी होती है यह शुल्वसूत्र के प्राचीन वैदिक ग्रन्थों में स्पष्ट उल्लिखित है। यह दूसरी बात है कि हड़प्पा सभ्यता के यज्ञकुण्ड वैदिक नहीं बल्कि आसुरी तन्त्र के कुण्ड हैं। रोमिला थापर को इस बात की जानकारी होती कि वे वैदिक नहीं बल्कि आसुरी हैं तो आज हमारे पाठ्यपुस्तकों में “जय महिषासुर” के अध्याय पढ़ाये जाते और वैदिक आर्यों को विदेशी घोषित करके पूरे भारत को आर्यावर्त के बदले असुरावर्त बनाने का प्रयास किया जाता। इन वामपन्थी मूर्खों को वाममार्गी ‘मुआँ जो दड़ो’ के महिषासुरी सम्बन्ध की जानकारी नहीं है तब तो महिषासुर-जयन्ती मनाते हैं! जानकारी हो जाय तो क्या करेंगे ? यही सोचकर पिछले तीस वर्षों से उपरोक्त तथ्यों और विचारों की जानकारी होने पर भी मैं लिपिबद्ध नहीं करता था। अब वातावरण में हल्का सा सुधार आया है। किन्तु आज भी हिन्दुओं में भारी बहुमत है अध्यात्म-विरोधी भौतिकवाद को जीवन-दर्शन मानने वालों का। लगभग तीन दशक पहले मैंने लोथल (गुजरात) के हड़प्पा सभ्यता के जार आदि मृद्-भाण्डों पर आकृतियों के अर्थ के बारे में एक विस्तृत शोध लेख लिखा था जिसमें मिस्र तथा क्रीट और मेहरगढ़ से लेकर प्राचीन एवं आधुनिक भारत के पारम्परिक लोककला का तन्त्र से सम्बन्ध को स्पष्ट किया था, किन्तु प्रकाशित करने की इच्छा नहीं थी, अतः पाण्डुलिपि खो गयी।

हड़प्पा सभ्यता को सर्वाधिक प्राचीन कहना एक षड्यंत्र

जब सिन्ध जैसे सूखे प्रदेश में ‘मुआँ जो दड़ो’ की खुदाई केवल सात सौ वर्षों की गहराई तक ही हो सकी, तो अनुमान लगाया जा सकता है कि गंगा घाटी के प्राचीन स्थल भूगर्भ जल में कितने गहरे में डूबे होंगे! बिहार के मधुबनी जिले में असुरराज बलि के गढ़ (बलिराजगढ़) की खुदाई भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण (ASI) ने की तो वहाँ के तत्कालीन सांसद ने रिपोर्ट माँगी। केन्द्र में कांग्रेस का राज था। उनको चौथाई पेज का एक संक्षिप्त रिपोर्ट ASI ने भेज दिया जिसमें लिखा था कि उस स्थल का प्राचीनतम स्तर ईसापूर्व 150 का है। सांसद प्राचीन इतिहास और संस्कृत आदि के विद्वान थे, उनको विश्वास नहीं हुआ, बारम्बार पूछताछ करने पर ASI ने पुनः पत्र भेजा कि भूगर्भ जल के कारण NBPW का जो स्तर मिला उससे नीचे खुदाई सम्भव नहीं है! NBPW (Northern Black Polished Ware) एक विशेष प्रकार का मृद्-भाण्ड है जिसका काल ईसापूर्व 600 से ईसापूर्व 150 तक का माना जाता है।

ASI ने जानबूझकर गलत रिपोर्ट क्यों भेजी? क्योंकि पश्चिम से आर्य-आक्रमण के यूरोपियन सिद्धान्त का खण्डन करने का साहस ASI के लोगों में नहीं था; उन्हें सिद्ध करना था कि आर्यावर्त में आर्यों की सभ्यता गौतम बुद्ध से पहले थी ही नहीं या अत्यन्त अल्प थी। ASI में प्रोफेसर ब्रजवासी लाल (B.B. Lal) जैसे निष्पक्ष विद्वान भी रहे हैं, किन्तु वामपन्थियों और नव-उपनिवेशवादियों के संगठित गिरोह ऐसे विद्वानों की बातों को दबा देते हैं और रोमिला थापर या रामशरण शर्मा जैसे जो लोग पुरातत्व का ककहरा भी नहीं जानते वे विशेषज्ञों की बातों को अपनी बकवास से विस्थापित कर देते हैं।

बलिराजगढ़ से कुछ ही दूर पर वैशाली (बसाढ) तथा बनारस में PGW (Painted Grey Ware) दशकों पहले मिल चुके हैं, किन्तु आजतक पाठ्यपुस्तकों में यही पढ़ाया जाता है कि PGW यजुर्वेद से महाभारत काल तक के काल का मृद्-भाण्ड है जो केवल पश्चिम भारत में मिला है। पाठ्यपुस्तकों में PGW को उत्तर-वैदिक कालीन सभ्यता (यजुर्वेद से उपनिषद और महाभारत काल तक) का प्रतीक माना जाता है, जबकि PGW की खोज करने वाले प्रोफेसर ब्रजवासी लाल, जो कि ASI के निदेशक थे, ने महाभारत के मुख्य कथानक के प्रमुख स्थलों की सूची बनायी और उत्खनन कराया तो उन सभी स्थलों पर PGW प्राप्त हुआ, जिस कारण ब्रजवासी लाल जी ने PGW को महाभारत-कालीन माना। PGW का यजुर्वेद या उपनिषदों से सम्बन्ध जोड़ने का कोई कारण नहीं है, सिवा नस्लवादी आर्य-आक्रमण की प्राकल्पना के।

वामपन्थी इतिहासकार रामशरण शर्मा का एक ग्रन्थ है ‘Material Culture and Social Formations in Ancient India’ जिसके परिशिष्ट में पुरातात्विक स्थलों की सूची है। उस पूरी सूची में प्राचीनतम PGW स्थल पश्चिम भारत का नहीं, बल्कि विश्व के प्राचीनतम नगर का है — काशी, जहाँ रामशरण शर्मा ने लिखा है कि कार्बन डेटिंग से बनारस के PGW स्तर का काल ईसापूर्व 33 शताब्दी का सिद्ध हुआ है, किन्तु रामशरण शर्मा ने अपनी ओर से जोड़ दिया कि इतना प्राचीन PGW का होना सम्भव नहीं है, अतः सम्भवतः किसी भूकम्प में PGW के स्तर की कुछ वस्तुएं नीचे के स्तर में चली गयी होंगी! भूकम्प में कोई स्थल तहस-नहस होता है तो पुरातात्विक विशषज्ञों को यह जानने में कठिनाई नहीं होती, रामशरण शर्मा तो पुरातत्व के विशेषज्ञ नहीं थे, उन्हें ऐसे विषय में अपना “एक्सपर्ट ओपिनियन” देने का अधिकार किसने दिया जिसका उनको कोई ज्ञान नहीं था ? उक्त पुस्तक का आरम्भ ही हुआ है भारोपीय परिवार के तुलनात्मक भाषाविज्ञान पर रामशरण शर्मा के अनेक व्यक्तिगत “एक्सपर्ट ओपिनियन” से, जबकि उस पूरे भाषाई परिवार की किसी प्राचीन भाषा का उन्हें कोई ज्ञान नहीं था। संस्कृत भी बिलकुल नहीं जानते थे, किन्तु प्राचीन ग्रीक या लैटिन पर भी बेशर्मी से “एक्सपर्ट ओपिनियन” देते थे।

इतिहास के छात्रों को पता नहीं है कि जो इतिहास उन्हें पढ़ाया जाता है वह दुष्टों और मूर्खों द्वारा लिखा हुआ कूड़ा-कर्कट है। भौतिकवादी (हड़प्पा सभ्यता के) संस्कृति के भौतिक अवशेष बचे हैं, जिन्हें आज के भौतिकवादी प्रमाण मानते हैं। बौद्धिक-आध्यात्मिक संस्कृति के बौद्धिक (ग्रन्थादि) अवशेष बचे हैं जिन्हें आज के भौतिकवादी इतिहासकार प्रमाण मानने से इनकार करते हैं, उनकी जिद है कि ऋषियों के ग्रन्थों को प्रामाणिक तभी माना जायगा जब ऋषियों के महल, नगर, व्यापार-वाणिज्य, आदि के “सभ्य” प्रमाण मिल जायेंगे, अन्यथा उन्हें पशुपालक ही माना जायगा!

ऋग्वेद के जिस नदी-सूक्त के आधार पर पश्चिम भारत में सप्तसिन्धु के होने की बकवास ये लोग करते रहे हैं, उसमें तीन सप्तसिन्धुओं, अर्थात इक्कीस महान नदियों का वर्णन है, न कि केवल एक सप्तसिन्धु का, और उस सूची में किसी भी नदी का नाम सिन्धु नहीं है (उसमें सुषोमा नाम की नदी है जो निरुक्तकार यास्क मुनि के अनुसार यास्क के काल में सिन्धु कहलाई)! उन तीनों सप्तसिन्धुओं में मुख्य सप्तसिन्धु गंगा-यमुना-सरस्वती की घाटी का नाम था (क्योंकि महाभारत में सप्तसिन्धु को पूर्व की ओर बहने वाली कहा गया है), न कि पाकिस्तान की नदी-घाटी का। इसपर विस्तार से मेरा लेख फेसबुक पर मिल जाएगा।

हड़प्पा सभ्यता का काल

हड़प्पा “सभ्यता” कलियुग की है, महाभारत द्वापर के अन्त की घटना है। हड़प्पा “सभ्यता” में दो आसुरी वंशों के 26 असुर राजाओं ने 728 वर्षों तक राज किया (यह मेरा मत है)। 2200 BC विश्वव्यापी सांस्कृतिक परिवर्तन का समय था जिसके पश्चात सम्पूर्ण विश्व पर असुरों का एकक्षत्र राज हो गया (यह भी मेरा मत है)| कुल 728 वर्षों तक कुल 26 महिषासुर” पदवी वाले दो राजवंशों के राजाओं ने भारतीय असुर साम्राज्य पर राज किया। पहले राजवंश का नाश स्कन्दकुमार के नेतृत्व में देवों और उनके भक्तों ने लगभग ईसापूर्व 2114 (± 4 वर्ष) में किया, किन्तु तत्क्षण दूसरे वंश ने महिषासुर पदवी धारण करके गद्दी सम्भाल ली जिसका नाश सात सौ शक्ति-उपासक जनपदों ने मिलकर ~1750 ईसापूर्व में किया। महाभारत में दो पृथक अध्याय हैं, एक में स्कन्दकुमार के नेतृत्व में महिषासुर वध की कथा है जिसमें दुर्गा की चर्चा भी नहीं है, और दूसरे अध्याय में दुर्गा देवी द्वारा महिषासुर वध की कथा है जो अधिक प्रचलित हुई क्योंकि इस बार समूल नाश किया गया। दोनों अध्याय प्रक्षिप्त हैं, महाभारत में बाद में जोड़े गए, किन्तु असत्य नहीं हैं। दोनों में मामूली साम्प्रदायिक मतभेद है, क्योंकि स्कन्दकुमार को ही कार्तिकेय भी कहते हैं जो शिव जी के पुत्र हैं। अतः एक कथा शैव मत की है तो दूसरी शाक्त मत की। किन्तु सनातन धर्म में विभिन्न मत एक साथ सह-अस्तित्व रखते हैं। किन्तु इतिहासकारों का भी कहना है कि हड़प्पा “सभ्यता” का काल 1750 BC से 2350 BC का है, छ सौ वर्षों का, और 2350 BC से पहले भी कुछ काल बीता होगा जिसमें असुरों ने जड़ें जमाई होंगीं। सारी जनता असुर थोड़े ही थी!

महिषासुर की पूजा करने वाले नष्ट नहीं हुए, आज भी दसियों करोड़ हैं। कुछ लोगों कष्ट होगा है कि हड़प्पा की ऐसी ‘महान सभ्यता’ को असभ्यता कहने से भारत का गौरव घटेगा! जिन क्षेत्रों में ऐसी पूजन पद्धति आज भी प्रचलित है वे तो यह लेख पढने के बाद मेरी ही बलि देने की भी योजना बनायेंगे। लेख में मैंने पूजा-पद्धति के जिस ग्रन्थ ‘वर्षकृत्य’ का उल्लेख किया है वह दुर्गा-पूजा मनाने वाले लोगों में से भारी बहुमत आज भी प्रयुक्त करते हैं, भले ही मन्त्रों का अर्थ न जानते हों।

महाभारत में ही श्रीकृष्ण और कंस सम्बन्धी थे, किन्तु कंस असुर हो गए। असुर पृथक नस्ल नहीं था। नस्लवादी इतिहास-दृष्टि अंग्रेजों की थी। दुर्योधन के साथ समस्त आसुरी प्रवृत्तियाँ रखने वाले लोग थे। आधुनिक पाकिस्तान के जितने भी राज्य उस काल में थे वे दुर्योधन के साथ हो गए, यहाँ तक कि नकुल-सहदेव के मामा शल्य भी, जिसका कारण है मद्र की अश्लील संस्कृति जिसका कर्ण ने खोलकर वर्णन किया। सिन्धु, सौवीर, गांधार, यवन, आदि भी दुर्योधन के साथ थे। महाभारत युद्ध 3101 BC से पहले की घटना है, हड़प्पा “सभ्यता” बहुत बाद की चीज है। शासक वर्ग असुर था, आम जनता नहीं। सात सौ जनपदों ने चारों ओर से सम्मिलित आक्रमण करके महिषासुरी राज्य को नष्ट किया, उन जनपदों की अधिष्ठात्री देवियाँ संख्या में 700 थी। कुछ वन्यजातियाँ उन्हीं असुरों की विरासत ढो रहे हैं। एक वन्यजाति का नाम भी “असुर” है। बहादुरशाह ज़फर के वंशज आज चांदनी चौक में दर्जी हैं, तो हजारों वर्ष पहले के असुरों के बचे-खुचे वंशज किस अवस्था में होने चाहिए ? वनवासी को “आदिवासी” न कहें, आदिवासी तो ऋषि और उनके वंशज हैं।

“मुआँ-जो-दड़ो” में महिषासुर के राजप्रासाद के ठीक ऊपर बने मौर्यकालीन बौद्ध स्तूप इस वेबपेज के ठीक मध्य में है (नक़्शे को माउस से घसीटकर स्थल के अन्य भाग भी देखे जा सकते हैं)। मेहरगढ़ (ईसापूर्व 7000 से), अभी तक 1974 में खोजे गए मेहरगढ़ को ही हड़प्पा सभ्यता की संस्कृति का स्रोत माना जाता था। पश्चिम के तथाकथित विद्वान बायोलॉजी का हवाला देकर सिद्ध करते थे कि पश्चिम एशिया के आसपास से लोग वहाँ आये थे। किन्तु 2014 ईस्वी में हरयाणा की प्राचीन सरस्वती घाटी के स्थल भिर्ड़ाना (Bhirrana या Bhirdana) का काल मेहरगढ़ से भी लगभग छ सौ वर्ष पहले का सिद्ध हुआ है।

जिन्होंने प्राचीन भारत (और मिस्र, ईराक, आदि) के पुरातात्विक उत्खनन की रिपोर्टें नहीं पढ़ीं हैं उन्हें भ्रम है कि यूरोप के पुरातत्ववेता बहुत कुशल और ज्ञानी थे। एकाध अपवाद के सिवा ये लोग नस्ली पूर्वाग्रह से ग्रस्त पुरातत्व से अनजान लोग थे। मोहनजोदड़ो और हड़प्पा पर आपलोग यदि इन्टरनेट भी ठीक से खोजें तो अनेक ऐसे शोधलेख मिल जायेंगे जिनमे इस बात का रोना रोया गया है कि प्रमुख पुरातात्विक स्थलों, जैसे कि मोहनजोदड़ो- हड़प्पा, की खुदाई अवैज्ञानिक तरीके से की गयी जिस कारण विभिन्न स्तरों का कालक्रम और संरचनात्मक विशेषताओं को उत्खनन करने वालों की अज्ञानता या हड़बड़ी के कारण सदा के लिए नष्ट कर दिया गया।

पाकिस्तान सरकार ने इसी बहाने 1964 ईस्वी में आदेश जारी कर दिया कि हड़प्पा मोहनजोदड़ो की खुदाई कोई नहीं कर सकता, केवल सतही सर्वेक्षण आदि की जाँच कर सकता है। किन्तु यह बहाना झूठा है, असल में इतने प्रमाण उपलब्ध हो चुके थे जो सिद्ध करते थे कि यह संस्कृति पश्चिम से नहीं आयी थी, बल्कि स्थानीय प्राचीन संस्कृतियों से ही विकसित हुई थी, जिस कारण पश्चिमी राष्ट्रों के दवाब के कारण उत्खनन पर रोक लगवाई गयी ताकि हिन्दू संस्कृति की प्राचीनता सिद्ध न हो सके। मोहनजोदड़ो में सबसे ऊँचे स्थल पर बौद्ध स्तूप है जिसकी रक्षा के बहाने उसके नीचे दबे राजप्रासाद की खुदाई नहीं की गयी, जबकि अनेक पश्चिमी स्थलों पर सुरंग बनाकर उत्खनन किया गया है जिससे ऊपर की संरचना पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। कोयला खदानों में तो मीलों लम्बी सुरंगे बनाकर खुदाई की जाती है, मोहनजोदड़ो में केवल दो सौ फीट की सुरंग से ही सम्पूर्ण राजमहल की खुदाई सम्भव है। किन्तु वह महल किसी ईसाई, यहूदी या मुस्लिम का तो था नहीं, यह गड़े मुर्दों को गड़ा ही छोड़ना ठीक समझा गया।

वास्तुशास्त्रीय विश्लेषण

मुआँ-यो-दड़ो का नगर विन्यास गूगल अर्थ या विकिमपिया के उपरोक्त लिंक से देखा जा सकता है। यहाँ सम्पूर्ण वास्तुशास्त्रीय विश्लेषण नहीं दिया जा रहा है, केवल सर्वाधिक महत्वपूर्ण विवरण दिए जा रहे हैं जो सिद्ध करते हैं कि महिषासुर की राजधानी और राजमहल आदि का निर्माण दानवराज मय रचित “मयमतम्” पर आधारित था जो सम्पूर्ण ऐतिहासिक काल में भी दक्षिण भारत के समस्त एवं उत्तर भारत के बहुत से मन्दिरों, नगरों, भवनों, मूर्तियों, आदि के निर्माण का प्रमुख शास्त्रीय आधार-ग्रन्थ है। मय दानवों के अधिपति थे, किन्तु तप द्वारा शुद्ध होने के पश्चात सदैव दैवी शक्तियों के ही पक्षधर रहे। भारतीय ज्योतिष-सिद्धान्त का आधार ग्रन्थ सूर्यसिद्धान्त भी सूर्यदेव ने मय को सतयुग के अन्त में दिया था ; त्रेता के अन्त में वे रावण के श्वसुर थे और रावण को सन्मार्ग पर लाने का प्रयास किये थे, द्वापर के अन्त में इन्द्रप्रस्थ का निर्माण भी श्रीकृष्ण की आज्ञा से मय ने ही किया था, अतः कुछ लोगों का यह प्रचार असत्य है कि मय हिन्दू नहीं थे। आधुनिक इतिहासकारों ने जानबूझकर प्राचीन ऐतिहासिक स्थलों की जाँच में वास्तुशास्त्रीय विश्लेषण को अनदेखा किया है, क्योंकि ऐसा करने पर न केवल भारत बल्कि विश्व की अन्य प्रमुख प्राचीन सभ्यताओं के अधिकाँश नगर, भवन, आदि हिन्दू वास्तु पर ही आधारित सिद्ध हो जायेंगे। यह अच्छा ही है कि इनलोगों ने भारतीय वास्तुशास्त्र पर ध्यान नहीं दिया, वरना इस शास्त्र को भी उत्तर या दक्षिण ध्रुव से आयातित सिद्ध कर देते।

तथाकथित “विशेषज्ञ” कितने अज्ञानी होते हैं इसका एक उदाहरण प्रस्तुत है : Vidale ने इस स्थल के राजप्रासाद पर एक लेख लिखा है जिसमें “केन्द्रीय” प्रसाद के महत्त्व पर बल दिया है। विकिमपिया के मानचित्र को ज़ूम-आउट करके देखा जा सकता है कि मुआँ-यो-दड़ो का प्रासाद मुख्य नगर के केन्द्रीय भाग (ब्रह्मस्थान) के पश्चिम में था, नगर केन्द्र में नहीं ; भारतीय वास्तु के अनुसार नगर या ग्राम या मन्दिर या गृह के केन्द्र में ब्रह्मस्थान होना चाहिए। गृह में ब्रह्मस्थान एक खुला आँगन होता है जहाँ तुलसी-चौरा या कोई देव प्रतिमा स्थापित की जाती थी। मन्दिर में ब्रह्मस्थान था गर्भगृह जहाँ मुख्य देवता का विग्रह रहता था। नगर या गाँव में ब्रह्मस्थान पर कोई प्राचीन बरगद का पेड़ और संलग्न देवाशाला होता था। मयमतम् (अध्याय 10, श्लोक 71) के अनुसार नगर के ब्रह्मस्थान से पश्चिम में इष्ट स्थल पर नृप का आवास होना चाहिए : “ब्रह्मांशात्-अपरांशो यद्-अभीष्टम् तत्र नृप-वासम्”। आवास के वास्तु-मण्डल के पश्चिम में “वरुण” का स्थान है, अतः महिषासुर के प्रासाद के पश्चिम में Bath (पुष्कर, swimming pool) है। ये कुछ छिटपुट उदाहरण हैं। आजकल तो ज्योतिष और वास्तु के नाम पर लोगों को ठगने वाले लोग इन विद्याओं को ही विकृत कर रहे हैं।

– आचार्य श्री विनय झा

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