सनातन धर्म के शैव सम्प्रदाय

shaiva

” लयनात इति लिंगमुच्यते “

जिसमे सर्व सृष्टि लय हो जाये वही लिंग है अर्थात सकल जगत लय होजाने के बाद शेष बचे वह अर्थात ब्रह्मपदार्थ। सकल शैव जगत मे परमात्मा शंकर की लिंग रूप मे उपासना की जाती है। पहले ये जाने की शैव होते क्या हैं मोटे मोटे शब्दो में, शैव मंजे शिव को ही पूर्ण परमात्मा और सकलसृष्टि का एकमात्र आधार जानकर पूजित करने वाले लोग। शैवोपासना बहुत प्राचीन समय से जगत मे प्रचलित है। मोटा मोटा तीन चार हिस्सों में उसे बांटा जा सकता है।

प्रथम कश्मीरी शैव 

जिसका प्रारंभ वसुगुप्त से होता है तप करते हुये वसुगुप्त के सामने एक चट्टान पलट गई जिस पर कुछ सूत्र अंकित थे। उन्होने उसे लिपिबद्ध करदिया शिवसूत्र के नाम से। उनके परवर्ती आचार्यो जैसे श्रीकंठ ने इस परंपरा को और समृद्ध किया। महामहेश्वर अभिनव गुप्त ने इसे सम्पूर्ण रूप प्रदान किया उन्होने तंत्रालोक जैसा महान ग्रंथ रचा जिसके लिये कहा गया की उसको समझने मे एक जीवन कम है। अभिनव गुप्त ने प्राचीन काशिमीरी शैव संप्रदाय के अलावा पाशुपत शैव संप्रदाय से और वेदों से भी कई विषय ग्रहणकर इस पवित्र परंपरा को समृद्ध किया। इनमें शैवागम और वेद दोनों को महती मान्यता प्राप्त है। शाक्तो के महान दर्शन ग्रंथ जैसे स्पंदकारिका, प्रत्यभिज्ञा हृदयम इत्यादी भी काश्मीरी शैवो की देन है। वर्तमान में इनके प्रमुख आचार्य थे भगवान गोपीनाथ औऱ स्वामी लक्ष्मण जू। उनकी परंपरा के एक मूर्धन्य साधक से मिलने का महती लाभ हमें मिला अब वो कीर्तीशेष हैं।

अभिनव गुप्त
आचार्य अभिनव गुप्त

पाशुपत शैव 

इस परंपरा का उत्स होता है गुजरात मे बड़ोदा के पास के कायावरोहण वर्तमान कारवाण नामक जगह पर जन्मे भगवान लकुलीश के द्वारा।
भगवान लकुलीश को लिंग पुराण मे सदाशिव का 28वां अवतार कहा गया। इस संप्रदाय की पताका चतुर्दिक फैली काश्मीर से कन्याकुमारी। पूरे मध्यभारत में ये और इसके उपसंप्रदाय फैल गये जैसे कालमुख, जटी, मत्तमयूर। मत्तमयूर संप्रदाय का उद्गम हमारा पैतृक गांव रन्नौद (अरणिपद)थ। सारे भारत मे भगवान लकुलीश के शिष्यो ने मठ मंदिर स्थापित करे। कहा तो ये भी गया की बारहो ज्योतिर्लिंग पहले पाशुपतों के अधिकार में थे। पूरे भारत मे भगवान लकुलीश को सदाशिव स्वरूप मानकर मूर्तियों में अंकित किया गया। कुमाऊं के प्रसिद्ध मंदिर जागेश्वर तक जब भगवान आदिशंकरपहुंचे तो ये स्थान पाशुपत योगियों के पास था। आदिशंकर में भगवान लकुलीश का स्वरूप देख उन योगियो ने स्थान आदिशंकर को समर्पित करा और कैलाश यात्रा पर निकल गये। आदिशंकर द्वारा पूजित लकुलीश प्रतिमा अद्यावधि वहां पर है हमने दर्शन किये हैं उसके। ग्यारहवी बारहवी शताब्दि तक इनका ध्वज पूरे भारत मे फहराता था। परंतु समाप्त हैं अब लगभग। या फिर कई अन्य संप्रदायो के रूप मे अलग अलग प्रचलित हो गया है। आधुनिक काल के कई संप्रदायों के मूल मे पाशुपतों से ली गई कई महत्वपूर्ण दार्शनिक और आगमिक बाते हैं।

कायावरोहण (कारवण-मंडारा) गुजरात में लकुलीश प्रतिमा, ब्रह्मेश्वर लिंग

फिर आये दक्षिण के शुद्ध शैव

यह संप्रदाय दक्षिण प्राचीनकाल से है। प्राचीनकाल के सिद्धों की पूरी श्रृंखला इसका प्रतिपादन करती रही। जिनमें सिद्धर बोगर, अगस्त्यर इत्यादी प्रमुख हैं। फिर इनमे 63नयनारो का प्रादुर्भाव हुआ। जिन्होने दर्शन को भक्ति के रस से सिक्त किया जिनमे चार प्रमुख हैं। अप्पर ,सुदंर, माणिक्क वाश्गर, तिरू ज्ञावसंबधर। इनमे भी कई शाखाये बंट गई। दक्षिव शैव, चिदंबर शैव औऱ अन्यान्य। आज भी शुद्धशैव वर्तमान हैं दक्षिण के कई शिवमंदिरो के मुख्य अर्चक यही लोग हैं। परम ज्ञानवंत, महान आगमिक, सम्माननीय जन।

इन्हीं की एक शाखा वीरशैव कहलायी 

कथाओ में वीरशैवों का उद्गम रेणुकाचार्य जी से माना जाता है। जिनकी उत्पत्ति तैलंगाना के कोलपाक लिंग से मानी गई। उनके चार मुख्य शिष्य हुये। दारूक, एकोराम, पंडिताराध्य, और विश्वेश्वर। इन्होने पांचमठ स्थापित किये। रंभापुरी, बेलोनूर, उज्जनि (कर्नाटक), श्री शैलम।
काशी (काशी के प्रसिद्ध जंगम बाडी मोहल्ले में), केदार (उखी मठ जहां शीतकाल मे केदारनाथ की प्रतिमा रहती है)। यद्यपि केदार मंदिर शांकर मताधीन है परंतु वहां के मुख्य अर्चक उखी मठके शिवाचार्य होते हैं। यह परंपरा भगवान आदिशंकर के द्वारा ही की गई है। वर्तमान में वहां के शिवाचार्य भीमशँकरलिंग जी स्वामी हैं। इन पांचो मठो को लिंगायतो मे बहुत सम्मान प्राप्त है। इन्ही वीरशैवों से एक और नवीन शाखा निकली जिसकी स्थापना बारहवी सदी मे कर्नाट केराजा बिज्जल द्वीतिय के महामंत्री बसवन्ना ने की थी।

कोलपाक लिंग से प्रकट होते जगदगुरू रेणुकाचार्य

बसवन्ना का लिंगायत शैव सम्प्रदाय

बसवन्ना महान राजनयिक, विचारक, साधक और दार्शनिक थे। उन्होंने तत्कालिक आवश्यकता देखकर लिंगायत संप्रदाय की स्थापना की। इसमें मंदिर और जातिप्रथा को अनावश्यक कहा गया। साधक को अष्टआवरण धारण करने पर लिंगायत की उपाधि मिलती है। दूसरा कारण इसके अनुयायी केवल अपने उस इष्ट लिंग की उपासना करे हैं जो दीक्षा के समय जंगम योगी उसे प्रदान करते हैं। और उस लिंग को हमेशा गले मे धारण करे रहते एक रजत संपुट में। इस कारण इन्हे लिंगायत कहा गया। दक्षिण में इनका खूब प्रसार हुआ। कई महान विभूतिया उत्पन्न हुईँ। जैसे अक्क महादेवी, सोलापुर के सिद्धरामैया स्वामी, कई राजवंश इनके अनुयायी रहे। कित्तूर की रानी चेनम्मा, काकतेय रूद्रम्मा देवी, केलदी नरेश आदि। खैर वर्तमान मे लिंगायत संप्रदाय मे एक प्रात:स्नरणीय विभूति हैं सिद्ध गंगा मठ के श्री शिवकुमार स्वामी जो 110वर्ष की उम्र मे भी शिवार्चन रत रहते हैं।

सिद्धगंगा मठ ते 110वर्षीय शिवकुमार स्वामी जी शिवार्चन रत

लिंगायतों को तोड़ने की राजनीती विफल

वर्तमान मे लिंगायतो के कुछ छोटे मोटे मठपतियों और एक बदहवास बुढ़िया महंतानी माते महादेवी को राजनीतीक महत्वाकांक्षा उत्पन्न हुई औऱ उनने लिंगायतो को हिन्दुओ से अलग धर्म मानने के लिये आंदोलन किया। कांग्रेस जो हिन्दुओ को तोड़ने हमेशा तैयार रहती है उसने प्रस्ताव भी परित कर दिया। पर बहुसंख्यक लिंगायतों ने विरोध किया। पांचो मठो के शिवाचार्यो ने विरोध किया। यह सब काम कांग्रेस ने चुनाव में लिंगायतों को बीजेपी से अपनी ओर खींचने के लिये किया। पर परिणाम सामने है सत्तर प्रतिशत लिंगायतो ने बीजेपी को वोट दिया।

अक्क महादेवी, काश्मीर की प्रसिद्ध स्त्री शैवसंत ललद्यद के समकक्ष औऱ उन्ही की तरह चर्यायुक्त महान लिंगायत संत

 – श्री अविनाश भारद्वाज शर्मा, लेखक सनातन संस्कृति, सम्प्रदायों, परंपराओं के गहन जानकार और लेखक हैं।

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