दो सूफियों ने लिया था बाबर से श्रीरामजन्मभूमि मन्दिर तोड़ने का वचन

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श्रीरामजन्मभूमि मन्दिर राम मंदिर आंदोलन अयोध्या

भारत पर आक्रमण करने से पहले बाबर एक सूफी कलन्दर के छद्म वेष में भारत आया था । कलन्दर बनकर उसने दिल्ली के सुल्तान सिकन्दर लोदी से भी भेंट की । अयोध्या भी गया,जहाँ के दो फकीरों (सूफियों) ने उससे वचन लिया कि वह श्रीरामजन्मभूमि मन्दिर को तोड़कर वहाँ मस्जिद बनवायेगा तो उसे फकीरों की दुआ मिलेगी ।

तथाकथित सूफी फकीर ऐसे होते हैं!

बाद में जब बाबर ने उत्तर भारत पर अधिकार कर लिया तो उसने अयोध्या में अपने वचन का पालन किया । उसकी आज्ञा पर बनी बाबरी मस्जिद में अभिलेख में बाबर को “बाबर कलन्दर” अर्थात् सूफी फकीर कहा गया और बाबर की आज्ञा पर बाबरी मस्जिद उसके सेनानायक मीर बाकी द्वारा बनवाने का उल्लेख था ।

बाबर को श्रीरामजन्मभूमि मन्दिर तोड़ने के लिये जिस फकीर ने उकसाया उसका कब्र भी बाबरी मस्जिद के बगल में ही बनाया गया जिसमें मन्दिर के अवशेषों का प्रयोग किया गया ।

औरंगजेब की पोती ने लिखा कि औरंगजेब ने रामकोट के किले को नष्ट किया (जिसके अन्दर श्रीरामजन्मभूमि थी) और अवध,मथुरा तथा बनारस में मस्जिद बनवाये । औरंगजेब ने रामकोट तोड़ा,श्री रामजन्मभूमि मन्दिर तो बाबर ही तोड़ चुका था ।

अयोध्या में श्रीरामजन्मभूमि मन्दिर के अलावा चार और प्राचीन मन्दिर थे,एक सरयू में बह गयी ऐसा इतिहासकार कहते हैं,दूसरी का कोई अता−पता नहीं मिलता,श्री रामजन्मभूमि मन्दिर तथा दो अन्य को मस्जिद का रूप दिया गया । श्रीरामजन्मभूमि मन्दिर को मस्जिद का रूप बाबर ने दिया और अन्य दो को औरंगजेब ने । अयोध्या में सरयू−स्नान पर पाबन्दी लगा दी गई थी और छोटे निजी मन्दिरों के अलावा मन्दिर बनाने पर भी रोक थी ।

परन्तु 1717 ईस्वी में जयपुर के राजा जयसिंह ने अनेक हिन्दू तीर्थस्थलों सहित श्री रामजन्मभूमि मन्दिर अथवा बाबरी मस्जिद की सारी भूमि रामलला के नाम से खरीद ली । तब से कानूनन उस भूमि पर हिन्दुओं का अधिकार बनता है ।

श्रीरामजन्मभूमि स्थल का बाबरी मस्जिद के काल का मानचित्र संलग्न है — 1950 का,जो फ़ैजाबाद न्यायालय में प्रस्तुत किया गया था :-

श्रीरामजन्मभूमि मन्दिर

इलाहाबाद उच्च न्यायालय में जब मुकदमा चला था तो अनेक हिन्दू सेक्यूलर “स्वतन्त्र विशेषज्ञों” ने बाबरी मस्जिद के पक्ष में गवाही दी जिसपर न्यायालय ने कहा कि वे “स्वतन्त्र” नहीं हैं बल्कि गिरोह के अङ्ग हैं और असत्य बोलते हैं;यही कारण है कि इसबार ऐसे सेक्यूलर “स्वतन्त्र विशेषज्ञों” का गिरोह सर्वोच्च न्यायालय में अपना जौहर नहीं दिखा सका,न्यायालय ने नौटंकी करने का अवसर ही नहीं दिया ।यह उल्लेख करना आवश्यक है कि 1949 में जवाहरलाल नेहरु ने विवादित परिसर से रामलला की मूर्ति हटाने का आदेश दिया था जिसे मानने से रामभक्त जिलाधीश के⋅के⋅के⋅ नायर ने मानने से इनकार कर दिया — उनको नेहरु ने बर्खास्त कर दिया ।

नायर महोदय के कारण ही 1949 से मुसलमानों को बाबरी मस्जिद से २०० मीटर की दूरी के अन्दर आने पर मनाही लग गयी और हिन्दुओं को भीतर घुसकर पूजा करने की छूट मिली — नेहरू भी हिन्दुओं का आक्रोश देखकर इस आज्ञा को निरस्त करने का साहस नहीं कर सका । बर्खास्त होने के बाद भारतीय जनसंघ में भर्ती हो गये ।

रामशरण शर्मा जैसे अनेक वामपन्थी इतिहासकारों ने बाबरी विध्वंस के बाद लिखा था कि वहाँ कभी कोई मन्दिर नहीं था — पुरातात्विक उत्खनन 1970 और 1992 में भी हुए थे जिसे उनलोगों ने अनदेखा किया,अन्तिम उत्खनन 2003 में हुआ जो सबसे विस्तृत था । सेक्यूलरों और जेहादियों ने कभी भी सबूतों को नहीं माना । अतः विवाद का ‘अन्तिम’ समाधान समझौते द्वारा असम्भव है । भीख माँगने से अधिकार नहीं मिलता । रामजी रावण से भीख माँगने नहीं गये थे,उनके भक्तों को भी रावणभक्तों से भीख नहीं माँगना चाहिये ।

 – आचार्य श्री विनय झा

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