सूर्यसिद्धान्त सार्वकालिक और सार्वभौमिक है

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सूर्यसिद्धान्तीय पञ्चाङ्ग सूर्यसिद्धान्त श्रीसर्वेश्वर जयादित्य पंचांग विनय झा vinay jha

विक्रमादित्य के नवरत्न वराहमिहिर की पञ्चसिद्वान्तिका−१⁄३ में सूर्यसिद्धान्त को “सौर” सिद्धान्त की संज्ञा दी गयी तथा पञ्चसिद्वान्तिका−१⁄४ में इसे “सावित्र” सिद्धान्त कहा गया। अतः वराहमिहिर के अनुसार गायत्री मन्त्र के वैदिक देवता सविता ही सूर्यसिद्धान्त के प्रतिपादक हैं, तथा उनके काल में जितने सिद्धान्त उपलब्ध थे उनमें सूर्यसिद्धान्त को ही सर्वाधिक स्पष्ट उन्होंने कहा।

पञ्चसिद्वान्तिका−१⁄२ में वराहमिहिर ने लिखा कि पूर्वाचार्यों के मतानुसार बीज के रहस्य को वे स्पष्ट करेंगे। इस प्रकरण का नाम ही करणावतार है, जिसका अर्थ है सिद्धान्तग्रन्थ पर आधारित व्यावहारिक गणना को सुगम बनाने वाली करणप्रक्रिया। परन्तु उपलब्ध पञ्चसिद्वान्तिका में करणप्रक्रिया स्पष्ट नहीं है, सम्पूर्ण मूल ग्रन्थ बचाया नहीं जा सका। भारत के विभिन्न प्रान्तों में जो सूर्यसिद्धान्तीय करणग्रन्थ और उनसे बनी पञ्चाङ्गोपयोगी मध्ययुगीन सारिणियाँ उपलब्ध हो सकीं उनमें जिस सिद्धान्त तथा करणप्रक्रिया का अनुसरण किया गया उसी के अनुसार सम्पूर्ण कल्प हेतु सूर्यसिद्धान्तीय सॉफ्टवेयर २००० ई⋅ में बनाया गया जिसे प्रकाशनार्थ स्वरूप २००४ ई⋅ के आरम्भ में दिया गया।

मकरन्दीय करणप्रक्रिया भारत में सर्वाधिक लोकप्रिय रही है। शाके १४०० हेतु काशी में बनी मकरन्दसारिणी में इसे श्रीसूर्यसिद्धान्तमतेन कहा गया जो सत्य है। केवल मङ्गल का बीज उसमें छूट गया था जिसे अन्य स्रोतों से लिया गया। बीज का रहस्य आजतक किसी ने प्रकाशित नहीं किया, केवल बीजों के गणितीय मान मध्ययुगीन सारिणियों में हैं। पूर्णाङ्क महायुग−भगणमानों द्वारा ग्रहगणित किया जाता है, तत्पश्चात उसमें बीजसंस्कार करके मध्यमग्रह बनाया जाता है। बर्जेस पहले व्यक्ति थे जिन्होंने अज्ञानतावश सूर्यसिद्धान्त में बीजसंस्कार को नहीं माना। आचार्य रङ्गनाथ के ही काल में सूर्यसिद्धान्त की जो पाण्डुलिपि उपलब्ध थी उसमें “बीजोपनयन−अध्याय” तो था किन्तु बीजप्रक्रिया को किसी ने इस्लामी ग्रहगणित के तुल्य बनाने की चेष्टा में भ्रष्ट कर डाला और उस प्रयास में असफल होने पर अधूरा ही छोड़ दिया। बर्जेस को पता नहीं था कि सूर्यसिद्धान्त की सैकड़ों सारिणियाँ और करणप्रक्रियायें उपलब्ध रहीं हैं, जिनकी सहायता से बीजोपनयनाध्याय को पुनर्निर्मित किया जा सकता है।

बीज के रहस्य पर ही सूर्यसिद्धान्त और ब्रह्मसिद्धान्त का परस्पर सम्बन्ध स्थापित होता है। ब्रह्माजी की परमायु का गणित ब्रह्मसिद्धान्त है, उसी का कल्पगणित सूर्यसिद्धान्त कहलाता है। ब्रह्मसिद्धान्त केवल सृष्टि के आरम्भ में प्रकट होता है। सूर्यसिद्धान्त प्रत्येक महायुग में प्रकट होता है — सतयुग के अन्त में। सतयुग में फलकामी विद्याओं की आवश्यकता नहीं पड़ती, और सतयुग के पश्चात सम्पूर्ण सूर्यसिद्धान्त को ग्रहण करने की क्षमता किसी में नहीं रहती, अतः सतयुग के अन्त में सूर्यसिद्धान्त प्रकट होता है शेष तीनों युगों के लिये। कलियुग में समस्त वेद−वेदाङ्गों सहित सूर्यसिद्धान्त की भी अवमानना होने लगती है। धर्म के एक पाद को कलियुग में जो लोग थामे रहते है उनके लिये सूर्यसिद्धान्त है।

अन्य सारे आर्ष सिद्धान्त सूर्यसिद्धान्त के ही विभिन्न कालखण्डों में प्रकट तात्कालिक तन्त्रग्रन्थ तथा करणग्रन्थ हैं। उपलब्ध सूर्यसिद्धान्त भी सिद्धान्त के साथ−साथ एक तन्त्रग्रन्थ भी है, क्योंकि यह पिछले सतयुग के अन्त की ग्रहस्थिति से गणना का निर्देश देता है। परन्तु उस समय के बीजसंस्कार का अध्याय किसी ने मध्ययुग में भ्रष्ट कर दिया। किसी युगारम्भ से गणना की प्रक्रिया को तन्त्रप्रक्रिया कहते हैं, अन्य किसी काल के बीज द्वारा जो प्रक्रिया हो उसे करण कहते हैं। बिना कम्प्यूटर के सीधे सिद्धान्तग्रन्थ द्वारा कोई मानव पञ्चाङ्ग नहीं बना सकता। कम्प्यूटर उपलब्ध हो तो करण वा तन्त्र की आवश्यकता नहीं, सीधे सिद्धान्त द्वारा गणना कर सकते हैं। परन्तु कम्प्यूटर में भी यदि करणप्रक्रिया को अपनाया जाय तो गति बढ़ जाती है।

मन्दफल और शीघ्रफल की दोषपूर्ण व्याख्यायें बर्जेस ने दीं, क्योंकि उनको मेरुकेन्द्रित सौरगणित का ज्ञान नहीं था। सही गणित मकरन्द जैसी प्राचीन सारिणियों में है, जिसपर बर्जेस ने ध्यान नहीं दिया। परन्तु उन सारिणियों में केवल परिणाम हैं, सूत्र नहीं। सूत्र सूर्यसिद्धान्त ग्रन्थ में है जिसकी गणितीय व्याख्या आजतक किसी गणितज्ञ ने नहीं लिखी है। सूर्यसिद्धान्त की गणितीय व्याख्या मुझे डॉ. लक्ष्मण झा (एल.एन.मिथिला विश्वविद्यालय के अवैतनिक पूर्व कुलपति बालब्रह्मचारी साधु) की कृपा से प्राप्त हुई।

करणप्रक्रिया का अर्थ यह है कि सिद्धान्तग्रन्थ द्वारा पहले किसी पास वाले व्यतीत समय तक का मध्यम ग्रहगणित बनाकर रख लें और फिर उस समय से वाञ्छित समय तक की गणना करके जोड़ लें। मकरन्द सारिणी शाके १४०० अथवा १४७८ ईस्वी हेतु बनी थी, अर्थात् उस समय तक के ग्रहस्पष्ट के बाद की ही गणना हर वर्ष करनी पड़ती। परन्तु अन्य करणग्रन्थकारों की तरह मकरन्द में भी ऐसी करणप्रक्रिया का अनुसरण किया गया ताकि कुछ दशकों वा एकाध शताब्दी के पश्चात करणग्रन्थ पुनः बनाना पड़े। दासता के कारण सैद्धान्तिक करणग्रन्थों का नवीनीकरण शाके १४०० के पश्चात नहीं हो सका।

पराशरी होरा में ग्रहों को देवता कहा गया जो जीवों को कर्मफल देने के लिये अवतरित हुए। परन्तु दृक्पक्षवादियों के अनुसार आकाशीय भौतिकपिण्ड ही कर्मफल देते हैं और पूजन द्वारा शान्त होते हैं! इससे बेहतर आधुनिक वैज्ञानिक हैं, जो भौतिक पिण्डों में दैवी शक्ति नहीं मानते। ज्योतिष के ग्रह देवता अदृश्य हैं व भुवर्लोक में निवास करते हैं। बाह्य चक्षु से जो दिखते हैं वे ऐन्द्रिक विषय हैं, देवता नहीं। ज्योतिष का प्रमाण फलादेश की जाँच है, न कि ऐन्द्रिक नक्षत्रसूचन। भौतिकवादियों को देवता में भी तभी विश्वास होगा जब परखनली में डालकर जाँच न कर लें और देवता के भार, चुम्बकत्व, आदि भौतिक लक्षणों का सत्यापन न कर लें। भौतिक पदार्थों में भौतिक लक्षण होते हैं तथा अभौतिक तत्वों में अभौतिक लक्षण।

सन्दर्भ:-
पौलिश-रोमक-वशिष्ठ-सौर-पैतामहास्तु पञ्च सिद्धान्ताः।
पौलिशतिथिः स्फुटो अस्तु तस्यासन्नस्तु रोमकप्रोक्तः। स्पष्टतरः सावित्रः परिशेषौ दूरविभ्रष्टौ।।
पूर्वाचार्यमतेभ्यो यद् यच्छ्रेष्ठं लघु स्फुटं बीजम्।  तत्तदिहाविकलमहं रहस्यमभ्युद्यतो वक्तुम्।।

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