इतने साल पहले हुआ था भगवान श्रीराम का जन्म

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सनातन संस्कृति कालसापेक्ष नहीं है, इसलिए सनातन कहलाती है। जो तीनों कालों का परंपरा से चला आ रहा शाश्वत धर्म समय से परे है वह सनातन है। पर आधुनिक विज्ञानवाद से प्रभावित लोगों की बुद्धि भौतिक पैमानों पर ही जवाब दे जाती है। श्रीराम के जन्मकाल पर काफी विवाद किया जाता है। पर इस का निर्णय केवल शास्त्र ही कर सकता है, पश्चिमी मान्यताओं पर आधारित किसी तथाकथित विद्वान का “रिसर्च” वाला काल, परंपरा और शास्त्रीय सिद्धांत के विपरीत होने पर असत्य ही कहा जाएगा। तीन कालों में सनातन धर्म को अविच्छिन्न रखने वाली शक्ति का नाम परंपरा है। आज कल कई कथित इंडोलॉजिस्ट वैदिक रिसर्चर “विद्वानों” द्वारा शास्त्रों की विकृत व्याख्या करके और निराधार प्रयोगों के आधार पर रामायण का काल 7 से 12 हज़ार वर्ष बताया जाता है। जबकि वाल्मीकि रामायण व पुराणों के स्पष्ट वचन, श्रीराम ने 11 हज़ार वर्ष तक शासन किया (वा.रा. युद्धकाण्ड 128.95), केवल इसी बात से इनकी बातें शास्त्रविरुद्ध और झूठी सिद्ध हो जाती हैं।

आइये शास्त्र के अनुसार श्रीराम का वास्तविक काल देखें। हिन्दू शास्त्रों में युगों की यह गणना बताई गई है जिसे कुछ नवीन रिसर्चरों को छोड़कर सभी शास्त्र, सभी आचार्य, सनातन धर्म के सभी सम्प्रदाय समान रूप से मानते हैं।

सतयुग = 1728000 वर्ष
त्रेतायुग = 1296000 वर्ष
द्वापरयुग = 864000 वर्ष
कलियुग = 432000 वर्ष
4 युग = 1 चतुर्युगी/महायुग
चतुर्युगी = 4320000 वर्ष
1 मन्वन्तर = 71 चतुर्युगी
1 कल्प = 1000 चतुर्युगी
1 कल्प = 14 मन्वन्तर
1 देववर्ष = 12000 मानववर्ष

इस कल्प के 7 वें मन्वन्तर की 28वीं चतुर्युगी का कलियुग इस समय चल रहा है। 28वीं चतुर्युगी यानि इस महायुग में भगवान श्रीराम हुए तो उनका काल होगा—>
द्वापरयुग + कलियुग (क्योंकि वे त्रेता और द्वापर की संधि में हुए)
= 864000 + 5120 (कलियुग के बीते हुए वर्ष)
= 869190 वर्ष

अब वाल्मीकि रामायण के अनुसार श्रीराम ने 11 हज़ार वर्ष राज्य किया जो त्रेता का अंश था। इसके अतिरिक्त जन्म से लेकर राज्याभिषेक तक का समय मिलाकर लगभग कम से कम 8 लाख 80 हज़ार वर्ष श्रीराम को हुए हैं। सृष्टि और प्रलय के बीच की सन्धि के काल की एक विभिन्न व्याख्या के अनुसार 17 लाख वर्ष पूर्व का काल बैठता है।

पुराण के कुछ वचनों के आधार पर श्रीराम 24वीं चतुर्युगी में बताए जाते हैं जिसके अनुसार रामायण का काल एक करोड़ 80 लाख वर्ष पूर्व सिद्ध होता है। परन्तु इससे अंतर नहीं पड़ता क्योंकि श्रीराम का अवतार प्रत्येक महायुग के त्रेता में होता है। वर्तमान की 28वीं चतुर्युगी के श्रीरामावतार के आधार पर श्रीराम व श्रीरामसेतु का काल कम से कम पौने 9 लाख साल सिद्ध होता है। 5, 7, 12 हज़ार वर्ष पूर्व सिद्ध करना अप्रमाणिक, शास्त्रविरुद्ध, सनातनधर्म की सम्प्रदायसिद्ध प्रक्रियाविरुद्ध, षड्यंत्रपूर्ण झूठी बातें हैं।

कुछ हज़ार वर्षों में श्रीराम को समेटने वाले 1 देववर्ष में 12 हज़ार मानव वर्ष नहीं मानते और देववर्ष को मानववर्ष बताते हैं, जबकि यह शास्त्र व ज्योतिष के विरुद्ध है। यदि देववर्ष को मानववर्ष माना जाएगा तो सभी ग्रह सूर्य के चारों ओर 360 गुणी गति से घूमने लगेंगे। भारत के सभी पंचांग इसी कालगणना से बनते हैं। युगों के उपर्युक्त कालमान के शास्त्रीय प्रमाण यहां देख सकते हैं:-

प्रमाण:
● मनुस्मृति, प्रथम अध्याय, श्लोक 67 से
● मत्स्य पुराण, “चतुर्युग मान वर्णन” अध्याय 56, श्लोक 46;
● श्रीमद्भागवत पुराण द्वितीय स्कन्ध, एकादश अध्याय,
● ब्रह्मवैवर्त पुराण, ब्रह्मखण्ड, अध्याय 5,
● पद्म पुराण, सृष्टि खण्ड, द्वितीय अध्याय;
आदि सभी पुराण..

सभी पुराणों ने मनुस्मृति में बताई गई युगमान गणना को ही माना है। इसलिए इस वैदिक युगगणना के संदर्भ में प्रचुर प्रमाण, समस्त आचार्यों की सम्मति होने पर भी भ्रम करना ठीक नहीं है।

दरअसल श्रीराम को कुछ हजार वर्ष पूर्व सिद्ध करने वालों की भौतिकवादी डार्विनग्रस्त बुद्धि कुछ हज़ार वर्षों के पीछे सोचने समझने की क्षमता खो देती है। असल में वे भी सनातन धर्म को अन्य मजहबों की तरह एक विशेष समय से शुरू हुआ मजहब मानते हैं, इसीलिए वे काल के अनादि प्रवाह को ईश्वर व शास्त्र से बड़ा मानते हैं। इस समझ के अनुसार सनातन धर्म को लाखों वर्ष पुराना मानना अवैज्ञानिकता है और उस काल में मनुष्य का रामायण जैसा अस्तित्व होना असंभव है, क्योंकि उस काल के भौतिक अवशेष नहीं मिलते, जो कि जड़वादी आधुनिक विज्ञान के लिए “परमात्मा” के समान हैं। धर्म को कालसापेक्ष और अनादि न मानने वाले निश्चित तौर पर विशिष्ट प्रकार के नास्तिक हैं, क्योंकि इनके अनुसार भगवान व धर्म से बड़ा काल है। ऐसा ही धर्मदूषक कबीरपंथी मानते हैं। इस समझ के अनुसार शास्त्र/धर्म/ईश्वर काल से छोटा हुआ, और धर्म अनादि यानि सनातन नहीं है इसलिए ईश्वर भी सनातन नहीं माना जा सकता, बल्कि कल्पित और मिथ्या हुआ। फिर शिव विष्णु सभी को किसी काल की कल्पना ही मानना पड़ेगा।

हालांकि मैं ऐसे लोगों को विशिष्ट नास्तिक कह रहा हूँ, पर इसमें धार्मिक भी हैं जिनकी बुद्धि भ्रमित है और काल को ईश्वर से बड़ा मानती है। ऐसा ही भ्रम अर्जुन को भी हुआ था। गीता चतुर्थ अध्याय में भगवान ने अर्जुन से कहा, “मैंने इस योग को सूर्य से कहा था। सूर्य ने वैवस्वत मनु से और मनु ने इक्ष्वाकु से कहा। इस तरह राजर्षियों को यह योग परंपरा से प्राप्त हुआ और वही सनातन योग आज मैंने तुझसे कहा है।”

तब भगवान के जन्म के सम्बंध में अर्जुन मोहित हो गए और काल को भगवान के अधीन न मानकर उनसे बड़ा मानते हुए प्रश्न किया कि, “आपका जन्म तो अभी का है और सूर्यका जन्म बहुत पुराना है अतः आपने ही सृष्टिके आदि में सूर्य से यह योग कहा था यह बात मैं कैसे समझूँ?”

तब श्रीभगवान् बोले, “हे अर्जुन मेरे और तेरे बहुत से जन्म हो चुके हैं। उन सबको मैं जानता हूँ पर तू नहीं जानता।” इसके भाष्य में आद्य शंकराचार्य ने लिखा है कि अर्जुन ने ईश्वर के अस्तित्व पर प्रश्न लगाने वाले मूर्खों की तरफ से भगवान के जन्म पर प्रश्न किया, इसपर भगवान बोले “तू नहीं समझता क्योंकि पुण्यपाप आदि के संस्कारों से तेरी ज्ञानशक्ति आच्छादित हो रही है।” कहने का मतलब यह कि भगवान अनादि और नित्य हैं। अतः उन्हें कल्पना के वशीभूत होने वाले काल में नहीं समाया जा सकता। यही हाल भगवान का काल कुछ हज़ार वर्षों में समेटने वाले विशिष्ट नास्तिक बड़े भारी रिसर्चरों का है। बाद में भगवान ने कहा “जन्म कर्म च मे दिव्यं”, मेरे जन्म और कर्म दिव्य हैं। इसलिए दूषित व अहंकारी बुद्धि में भगवान के दिव्य जन्म कर्म नहीं घुस पाते।

श्रीराम का काल जन्म

वेदान्त कहता है, काल, देश और ब्रह्म, नित्य तो ये तीनों हैं। पर काल बहता हुआ नित्य है। देश फैलता और सिकुड़ता हुआ नित्य है। इसलिए काल और देश “सापेक्ष नित्य” हैं। काल का अनादि होना और उसकी प्रवाहरूप से नित्यता भी एक कल्पना है। क्योंकि काल की नित्यता केवल बुद्धि के सामर्थ्य के अनुसार सोच सकते हैं, देख नहीं सकते। किसी को हज़ार, किसी को लाख, किसी को करोड़ तो किसी को अनंत दिखता है। पर काल की नित्यता को जो साक्षी आत्मा अंतःकरण में देखता है, वह नित्य है न अनित्य है, केवल वही सत्य है। काल में पैदा होने वाले पृथ्वी, जीव आदि अनित्य हैं। काल का अधिष्ठान ब्रह्म सत्य है। इसलिए वह अधिष्ठान ब्रह्म श्रीराम लाखों, करोड़ों वर्ष पहले और बाद में प्रकट हो सकता है, पर शास्त्रविरुद्ध रूप से हज़ार सालों की परिधि में जन्म नहीं ले सकता। क्योंकि ब्रह्म भी शास्त्र का अतिक्रमण नहीं करता क्योंकि ‘शास्त्रयोनित्वात’ ‘पुत्रस्थानीय’ परमात्मा के भी पिता समान एकमात्र शास्त्र ही हैं।

इसलिए सनातनियों को कभी इन निराधार थ्योरी और एक्सपेरिमेंट के चक्कर मे नहीं आना चाहिए। लाखों वर्ष पुराने सनातनी इतिहास को कुछ हज़ार वर्षों में समेटना उसकी गला घोंटकर हत्या करना है। शास्त्र में जो तथ्य हैं वही मान्य हैं, बाकी के कपोल कल्पित शास्त्रविरुद्ध रिसर्च कूड़ेदान में फेंकने योग्य हैं।

जैसे जैसे नए उपकरण आते जाएंगे हमारा काल कितना पुराना है स्पष्ट होता जाएगा। विज्ञान तो वनस्पतियों में भी जीवन नहीं मानता था, पर जैसे ही उचित मशीन आई जगदीश चन्द्र बसु जी ने वैदिक सिद्धांत सिद्ध कर दिया कि वनस्पति भी जीवित हैं। 9 लाख साल पुराने राजमहल या मिट्टी के बर्तनों को कोई सुरक्षित रहने के लिए बाध्य नहीं कर सकता, वह तो नष्ट होंगे ही। इसलिए आधुनिक विज्ञान केवल भौतिक तथ्यों के आधार पर मनमाना काल निर्धारण नहीं कर सकता। जहाँ जहाँ आधुनिक विज्ञान ने वैदिक विज्ञान से मुंह फेरा वहाँ वहाँ औंधे मुंह गिरा, वापिस लौट के वैदिक विज्ञान की ही बात इसे माननी पड़ी।

ज्यों ज्यों हमारी प्राचीनता की खोज बढ़ती जाएगी।
त्यों त्यों हमारी उच्चता पर ओप चढ़ती जाएगी।
जिस ओर देखेंगे हमारे चिन्ह दर्शक पाएंगे।
हमको गया बतलाएंगे तो वे कहाँ तक जाएंगे।
कल जो हमारी सभ्यता पर हँसे थे अज्ञान से।
वे आज लज्जित हो रहे हैं अधिक अनुसन्धान से।
गिरते हुए भी दूसरों को हम चढाते ही रहे।
घटते हुए भी दूसरों को हम बढाते ही रहे।

इस सन्दर्भ में पढ़ें,
– इतिहास का उपहास, आचार्य श्री विनय झा जी की पुस्तक, श्रीरामजन्मकाल ज्योतिष से सिद्ध
– पुराण परिशीलन, श्री गिरिधर शर्मा चतुर्वेदी रचित, बिहार राष्ट्रभाषा परिषद से प्रकाशित
– वैदिक विज्ञान और भारतीय संस्कृति, श्री गिरिधर शर्मा चतुर्वेदी रचित, बिहार राष्ट्रभाषा परिषद से प्रकाशित

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