सर्वपल्ली राधाकृष्णन का अनसुना सच

0
2729

आपका बच्चा टीचर्स डे उत्साह से मनाता है पर गुरु पूर्णिमा पर कोई ध्यान नहीं देता। क्यों?

शिक्षा द्वारा ब्रेनवॉश!

मुझे आपके द्वारा इस व्यक्ति की जयंती को शिक्षक दिवस या अन्य किसी दिवस के रूप में मनाने से कोई आपत्ति नहीं है पर मैं आपको इनका दूसरा पक्ष दिखाना भी मेरा कर्तव्य है। कैसे हम सबके दिमागों में झूठे आदर्श स्थापित किए गये हैं उसकी एक बानगी सर्वपल्ली राधाकृष्णन भी हैं। बिना जिन्हें जाने समझे देश के बच्चे हर साल उनकी तस्वीर पर गेंदे के फूलों की माला चढाते आए हैं। इन सभी झूठे आदर्शों में एक बात कॉमन रही है, और हिन्दू धर्म, उसकी संस्कृति और इतिहास से घृणा!!

मैं जानता हूँ कि कोई भी सम्पूर्ण नहीं होता और मैं अपूर्ण की पूजा नहीं करता।

झूठे भगवानों की पूजा

विकिपीडिया कहता है, सर्वपल्ली राधाकृष्णन एक भारतीय दार्शनिक और राजनेता थे, जो भारत के पहले उपराष्ट्रपति (1952-1962) थे और 19 62 से 1967 तक भारत के दूसरे राष्ट्रपति थे।

तुलनात्मक धर्म और दर्शन के भारत के सबसे प्रभावशाली विद्वानों में से एक, राधाकृष्णन ने पूर्व और पश्चिम के बीच एक सेतु का काम किया और दिखाया कि कैसे प्रत्येक परंपरा के दर्शन दूसरे की परिभाषाओं के अनुसार समझे जा सकते हैं। उन्होंने अंग्रेजी बोलने वाली दुनिया के लिए भारत के धार्मिक और दार्शनिक साहित्य के प्रामाणिक दस्तावेज लिखे।

मेरे ऑनलाइन मित्र ने शिकायत की। भारत की श्रेष्ठता बनाम पश्चिम की तुलना करके, मैं और अधिक पोस्ट क्यों लिखता हूँ? यहाँ उनके लिए जवाब है।

मैं ऐसा करता हूं क्योंकि हममें से अधिकांश को सर्वपल्ली राधाकृष्णन जैसे झूठे देवताओं की पूजा करने के लिए बाध्य किया गया था। भारतीय स्कूलों में बच्चों को उनके जन्मदिन 5 सितंबर को शिक्षक दिवस के रूप में भारत में मनाना सिखाया जाता है। पर क्या बच्चों के लिए वह अनुगमन करने लायक विद्वान हैं, उनकी किताबें कॉलेजों में पाठ्यपुस्तकें हैं।

असली सर्वपल्ली राधाकृष्णन और उनके अपमानजनक लेखन को जानिए।

कुछ महान विद्वानों तथा भारत के तथाकथित देशभक्तों के मन पर भी पश्चिमी शिक्षा ने गहरा प्रभाव डाला जो हिंदू संस्कृति, इतिहास और धर्म के लिए निम्नता की भावना रखती थी। उन्होंने पश्चिमी लेखकों के बौद्धिक गंदगी को भी इकट्ठा किया और अपने लेखन में इसका इस्तेमाल किया।

वे नहीं जानते थे कि वे क्या कर रहे हैं, उनके लेखन जैसे: “राम केवल एक अच्छे आदमी थे, वह भगवान नहीं थे।” ने लाखों हिंदुओं से विश्वासघात किया और उन्हें भ्रमित किया साथ ही वेदव्यास के प्रामाणिक लेखन का खंडन किया जो कि भारत के राष्ट्रीय खजाने हैं।

अब आपको कुछ उदाहरण देता हूँ —

[1] ऋग्वेद आदिम कवियों के सामान्य गीतों का संग्रह है। (IP/I-71)

[2] अथर्ववेद में प्राक वैदिक काल की आत्माओं और भूतों के धर्म की बातें हैं। यह भारत की जनजातियों में प्रचलित प्रेत विद्या का आधार है (PU-45;IP/I-121)

[3] प्राचीन वैदिक ऋषि प्रकृति की पूजा करते थे… वैदिक देवता मूर्खतापूर्ण तरीके से आत्म-केन्द्रित थे … देवताओं और भूतों ने लोगों के जीवन को शासित किया। (IP/I-121)

[4] उपनिषद (अरण्यक) वनवासियों के अनुमान हैं। उनकी शिक्षा बचकाने अंधविश्वासों की गड़बड़ अस्तव्यस्तताओं में खो जाती है।(IP/I-355)

[5] वह (राधाकृष्णन) पुराणों के कृष्ण को स्वीकार नहीं कर सकते। यह गीता के केवल अज्ञात लेखक थे जिन्होंने कृष्ण को अपने लेखन के माध्यम से प्रसिद्ध किया और उन्हें भगवान (ब्रह्म) के रूप में प्रस्तुत किया। (IP/I-496, 521)

[6] राम केवल एक अच्छे आदमी थे, वह भगवान नहीं थे व उनका धर्म बहुदेवतावादी और बाहरी है।

[7] शंकराचार्य के सुदूर तर्कों ने उनकी प्रणाली को अनाकर्षक बना दिया, और रामानुज की दूसरी दुनिया की कहानियों में कोई वजन नहीं है। (IP/II-711)

IP = Indian Philosophy Vol 1 and Vol 2 (भारतीय दर्शन, खण्ड 1 और 2)

वे वैदिक ऋषियों को आदिम कवियों के रूप में बुलाते हैं जिनके सामान्य गीत ऋग्वेद में हैं। वह कहते हैं कि अथर्ववेद में आदिम जनजातियों के शैतान को शामिल किया गया; वैदिक देवता मूर्खतापूर्ण तरीके से आत्म-केन्द्रित हैं; और उपनिषद बचकानी अंधश्रद्धा हैं।

हिन्दू धर्म खिलाफ अंग्रेजों द्वारा शुरू किए गए पश्चिमी विद्वानों के अपमानजनक लेखन ने भारतीय दिमागों पर बहुत प्रभाव डाला। लेकिन राधाकृष्णन द्वारा उन पश्चिमी विचारों के पुष्टिकरण ने हिंदू दर्शन, हिंदू शास्त्र और हिंदू धर्म के बारे में पूरी तरह से गलत इनपुट देकर बहुत हानि की और दुनिया भर में दर्शन और धर्म के लाखों विद्वानों को बहुत अधिक भ्रमित किया। उनके कुछ गलत अनुवादों की ही जांच कर लें।

राधाकृष्णन के अपमानजनक लेखों ने भगवान की प्राप्ति के मार्ग खोज रहीं लाखों अच्छे लोगों को उलझाया। उन्होंने हिंदू धर्म के सभी पहलुओं पर (धर्मग्रंथ, आचार्यों और भगवान के अवतारों के ग्रन्थ) हिंदू धर्म की संपूर्ण संरचना को नष्ट करने की कोशिश की।

इसलिए, मेरे प्यारे दोस्त, झूठे भगवानों को उजागर करना आवश्यक है ताकि देश के बुद्धिजीवी वास्तविक सनातन धर्म और ईश्वर की प्राप्ति के रास्ते समझ सकें।

 – मूल लेख श्री मरुत मित्र जी द्वारा लिखा गया है, (prachodayat.in)।

यह भी पढ़ें,

वेदमूर्ति पण्डित श्रीपाद दामोदर सातवलेकर जी का पुण्य स्मरण

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here