युधिष्ठिर – सार्वभौम दिग्विजयी हिन्दूराष्ट्र निर्माता सम्राट

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सम्राट युधिष्ठिर महाभारत पाण्डव कृष्ण yudhishthira yudhishthir dharmaraja धर्मराज

जैसा कि युधिष्ठिर जी आदि पर विवाद देखने को मिलता है तो हमें महाभारत में ही देखना चाहिए कि युधिष्ठिर आदि पाण्डव स्वयं से भी शक्तिशाली या धर्मपुंज थे अथवा नवयुगी दुष्प्रचार अनुसार मात्र श्रीकृष्ण की दया पर ही लंबित थे क्योंकि ऋषि बार बार उनको धर्मराज कह रहे तब उनका वचन मिथ्या नहीं हो सकता। अध्यात्मपक्ष में निश्चित रूप पाण्डव क्या सब कृष्ण के लंबित है पर यहाँ पांडवों का भौतिक जगत में स्वयंबल भी देखना चाहिए। युधिष्ठिरजी समेत सभी पांडव देवताओं के अंश थे। भगवान श्रीकृष्ण मूर्ख नहीं थे जो पांडवों के पक्ष में रहा करते थे। जिसके पक्ष में कृष्ण खड़ा हो जाए उसकी हस्ती कितनी विराट होगी।

पूरी महाभारत में युधिष्ठिरजी की महानता के हज़ारों प्रसङ्ग हैं। पांडवों को नीचा दिखाकर कृष्ण की महानता नहीं हो सकती है। स्वयं हस्तिनापुर की प्रजा युधिष्ठिर को हृदय से राजा बनाना चाहती थी। (आ.प.अ-140) में उल्लेख है हस्तिनापुर की प्रजा हर सभा, चौराहे पर इकट्ठी होती तो युधिष्ठिर के सत्य, दया, विद्या, गुणों की प्रशंसा कर उन्हें राजा बनाने की कसमें खाया करती। यह सुन जलाभुना दुर्योधन धृतराष्ट्र से शिकायत करने भाग गया।

भारतीय इतिहास में युधिष्ठिर की विश्वविजय ही भारत के इतिहास की यथार्थ केन्द्रबिन्दु है। राजसूय यज्ञ से पहले युधिष्ठिर के निर्देश से पाण्डवों ने पूरे भूमण्डल की दिग्विजय अपने शौर्य से की थी।

अर्जुन ने उत्तर दिशा में पुलिन्द, कालकूट, आनर्त्त, प्रतिविन्ध्य, शाकलद्वीप, प्राग्ज्योतिषपुर, किरात, चीन (वर्तमान चीन), समुद्री टापुओं के म्लेच्छों, त्रिगिरि, उलूक, वृहन्त, पौरव, काश्मीर, पर्वतीय लुटेरों, त्रिगर्त, कोकनद, चोल, वाह्लीक, कम्बोज, ईशानकोण के डाकुओं समेत उत्तर के समस्त देशों, राजाओं, लुटेरों को भयंकर युद्ध में परास्त किया और राजग्रहण मोक्षानुग्रह, करदानाज्ञाकरण प्रणामागमन की नीति लागू कर उन्हें हरा उन्हें ही पुनः बिठाकर टैक्स हासिल किया था।

भीम ने पूर्व दिशा में जाकर पांचाल अहिच्छत्र, दशार्ण, कोसल, काशी, मत्स्य, मलद, वत्स, भर्गों, निषादों, मल्ल, शर्म, वर्म, शकों, बर्बरों, किरातों, दण्डकों, व अंगराज कर्ण को पराजित किया, समुद्र के सब म्लेच्छों पर अपनी नीति और पराक्रम से विजय प्राप्त कर उन्हें अधीन किया।

सहदेव ने दक्षिण में भोज, पांड्य, माहिष्मती, द्रविड़, केरल, आन्ध्र, यवन, कालमुख राक्षसों, कोलगिरी, मलेछों, निषादों व लंका को अपने बुद्धि, रण एवं चातुर्य से वश में किया था।

नकुल ने पश्चिम में मारवाड़, शिवि, त्रिगर्त, अम्बष्ठ, मालव, आभीर, पंजाब, राहठ, शक, हूण, म्लेच्छ, किरात, यवन, बर्बरों को अपने अधीन किया था।

इस प्रकार जब पाण्डवों के युद्धकौशल, नीति, शौर्य के आगे चार दिशाओं के सब राजाओं ने अपना मस्तक झुका दिया तब पृथ्वी से समुद्र पर्यन्त एकराट् सम्राट राजसिंह धर्मराज युधिष्ठिर ने हिन्दूराष्ट्र की स्थापना की थी, इसीलिए सारे विधर्मी अधर्मियों के हृदय राजा युधिष्ठिर की कीर्ति देख विदीर्ण हुआ करते थे। जब सार्वभौम चक्रवर्तित्व की शपथ हेतु राजसूय यज्ञ का अनुष्ठान किया तब एक एक राजा प्रसन्नता अथवा विवशतावश इनके लिए उपहार लेकर आया था। इनके उदार शासन में एक भी मनुष्य दुःखी नहीं होता था इसलिए प्रजाजन लोकहितकारी रामराज्य का आनन्द मनाया करते थे।

सम्राट युधिष्ठिर को मिली भेंट और उनकी साम्राज्यलक्ष्मी से विदीर्ण दुर्योधन दो दो अध्यायों में धृतराष्ट्र को रोकर सुनाता हुआ कहता है, “न रन्तिदेव, न नाभाग, न मनु, न पृथु, न भगीरथ, न ययाति, न नहुष ही ऐसे एश्वर्यसम्पन्न सम्राट थे जैसे आज युधिष्ठिर हैं, यह सब देख मेरा जीवित रहना व्यर्थ है।” (म.भा. स.प. अ-53)

उस सम्राट युधिष्ठिर की हस्ती का अनुमान लगाइए अब जिनके आगे सारे विश्व ने सर झुका दिया था, सेनापति, मंत्री आदि कितने ही योग्य क्यों न हों, यदि सम्राट निस्तेज हो तो यह सब हीन होते हैं। इन्हीं युधिष्ठिर को महाभारत में धर्मपुत्र, धर्मराज, धर्मात्मा, धर्मवत्सल, नित्यधर्मा, महाप्राज्ञ, महाबाहो, महामना, परन्तप, पुरुषव्याघ्र, राजशार्दूल, भरतभूषण आदि शताधिक विशेषणों से उस समय के सर्वोच्च राजा, भगवान्, ऋषियों से लेकर ग्रामीण आबालवृद्ध द्वारा विभूषित किया गया था।

कर्ण जैसे अधर्मी को केवल अर्जुन ने दर्जनों बार पराजित किया था। उसके पश्चात कर्ण भीम, युधिष्ठिर, सात्यकि आदि से वह कितनी बार पराजित होकर मुँह छूपाए घूमा करता था इसके अमिट लेख महाभारत में भरे पड़े हैं। कर्ण की कथित दिग्विजय भी मात्र वनवास में भेज दिए गए पांडवों की अनुपस्थिति में उनके ही द्वारा पूर्व में ही विजित राज्यों का प्रतिग्रहण मात्र थी। जैसा कि ऊपर बता आए हैं सम्पूर्ण विश्व को पाण्डव पहले ही अपने अधिकार में कर चक्रवर्ती की उपाधि धारण कर चुके थे।

जहाँ तक युधिष्ठिर के द्यूत के व्यसन की बात है कि उन्हें इसके प्रति लगाव था यह सत्य हो सकता है क्योंकि महाभारत में ऐसे संकेत मिलते हैं पर इससे वे सदैव उचित दूरी बनाए रखने का प्रयत्न करते थे। फिर विधि का विधान सबसे प्रबल होता है। उन्हें किन परिस्थितयो में द्यूत खेलना पड़ा वह अवश्यम्भावी थी। शकुनि ने कई बार (स.प. द्यूतपर्व अ-48)उन्हें द्यूत प्रेमी कहा पर शकुनि की धूर्त वाणी को न मानें तो भी, स्वयं अर्जुन ने कर्णपर्व के 70वें अध्याय में युधिष्ठिर जी को 2 बार द्यूत जुआ का व्यसनी कहा है। यह वह प्रसङ्ग है जब अर्जुन युधिष्ठिर जी को सङ्कल्पपूर्ति हेतु कृष्णादेश के अनुसार अपमानित करते हैं। यहां मात्र अपमानित करने की ही शर्त थी असत्यभाषण की नहीं, यदि युधिष्ठिरजी को जुआ का तनिक भी प्रेम नहीं होता तो वे कभी उन्हें दो बार द्यूतव्यसनी कहकर लांछन न लगाते।

अर्जुन के वक्तव्य से आहत एवं प्रायश्चित्त की आग में जलते हुए युधिष्ठिर अपनी स्वनिन्दा करने लगते हैं, इसमें वे स्वयं को पापमय दुर्व्यसन में आसक्त कहकर धिक्कारते हैं, निश्चित रूप से यह एकमात्र जुआ के अतिरिक्त युधिष्ठिरजी के धवलतम चरित्र में दूसरा नहीं हो सकता। आज धर्मराज अपनी एकमात्र कमजोरी को खुलेमन से स्वीकार कर रहे हैं।

शास्त्रों में 438 प्रकार की कलाएं बताई हैं पर इनमें 64 प्रधान हैं। इन 64 कलाओं में से अधिकाधिक में राजा को निष्णात होना चाहिए। इसमें 8वें नम्बर की कला “द्यूत” है। चोरी करना और वेश्या सम्बन्धी ज्ञान लेना भी 64 कलाओं में शामिल है। उस समय द्यूत प्रधानविद्या थी, तब ही शास्त्र ने कहा “आहूतो न निवर्तेत द्यूतादपि रणादपि” यह तब बहुत प्रचलित थी, इसी वचन के कारण युधिष्ठिर द्यूत के लिए हाँ किए थे यह महाभारत में उन्होंने कई बार कहा है। द्यूत शिकार जैसी प्रचलित थी, अतः राजा के लिए यह स्वाभाविक भी था, वरना श्रीकृष्ण छल में स्वयं को द्यूत कहकर गीता में इसे इतना महत्त्व न देते।

एक बार तो द्यूत से हटकर वे सब इंद्रप्रस्थ तक जा पहुंचे थे तब धृतराष्ट्र का पुनः जुआ खेलने का निमंत्रण आ गया। तब युधिष्ठिर जी ने प्रारब्ध को प्रधान व कुरुकुल और समस्त लोक का नाश अवश्यम्भावी मानकर खुदको जुए में पुनः झोंक दिया। तब वैशम्पायन जी ने कहा है कि, “पशु शरीर कभी स्वर्ण का नहीं होता तो भी श्रीराम लुभा गए उसी प्रकार पतन के निकट होने पर युधिष्ठिर जी की बुद्धि आज विपरीत हो गयी है।” वे शकुनि की माया को जानते हुए भी जुआ खेलने चल पड़े। तब भीष्म, द्रोण, विदुर, कृपाचार्य, संजय, पांडव, गांधारी, द्रौपदी, अश्वत्थामा तक युधिष्ठिर को रोक रहा था पर माया के वशीभूत होकर जुए से नहीं हटे। निश्चित ही राजाज्ञा का इतना ही महत्त्व होता तो ये सारे विद्वान वरिष्ठ उन्हें रोकते नहीं।

परन्तु अब देखिए, कुछ तो जगन्मोहिनी माया, दूसरा धर्माभास उत्पन्न क्षणिक अहंकाराभास, तीसरा अवचेतन मन की दमित तृष्णा व सबसे महत्त्वपूर्ण पिता के भी ज्येष्ठ भाई पितृतुल्य राजा धृतराष्ट्र की आज्ञा, शास्त्र का रण व द्यूत दोनों से ही पीछे न हटने का आदेश,  इन सबने खींचकर युधिष्ठिरजी को जुए के मेज पर ला बैठाया। शकुनि की एक ही चाल ने सम्राट को वनवासी बना डाला। क्षात्रधर्म के आलोक में द्यूत का निमन्त्रण देकर एवं उसका अनुमोदन कर हस्तिनापुर ने पाप किया था इन्द्रप्रस्थ ने नहीं। कोई भी सम्पत्ति शेष रहने तक स्वयं धृतराष्ट्र ने द्यूतकर्म से निवृत्त होने का निषेध किया था। पिता से भी उच्च उनके बड़े भाई की आज्ञा का उल्लंघन युधिष्ठिर के लिए असम्भव था, अथवा द्यूत नियमों से भाइयों समेत उनका वध विधिसम्मत हो जाता। वास्तव में तो गीता में छल में स्वयं को द्यूत कहने वाले निरंकुश भगवान् श्रीकृष्ण ही यहाँ दुराचारी कौरवों से अक्षम्य पाप करवाकर युगपरिवर्तक महायुद्ध महाभारत की भूमिका बनाने हेतु द्यूत का अवश्यम्भावी खेल निर्मित कर रहे थे, जिससे कोई भी चाहकर भी नहीं हट सकता था। 

युधिष्ठिर जी को पूर्व में द्यूत पर अधिकार नहीं था पर द्यूत पर अधिकार वे अवश्य करना चाहते थे। यह अवसर उन्हें वनगमन करते ही मिल गया, वनपर्व के 79वें अध्याय में युधिष्ठिरजी बृहदश्व ऋषि से द्यूत विद्या का यथार्थ रहस्य सिखाने का निवेदन करते हैं। वे मुनि युधिष्ठिर जी को द्यूतविद्या प्रदान करते हैं।

युधिष्ठिरजी जी धर्मराज/ यमराज थे, यही पूर्वजीवन में हरिश्चंद्र थे। गलत कार्य के कारण उन्हें महर्षि दुर्वासा का शाप मिला, इसी कारण हरिश्चंद्रजी व युधिष्ठिर जी को महान कष्ट मिला। महाराजा हरिश्चन्द्र को भी अपनी पत्नी एवं पुत्र को बेचना पड़ा था। धर्मराज की ही दूसरी मूर्ति विदुर जी भी पूर्वजीवन में ऋषि अपमान के कारण मिले शाप के कारण शूद्र बने। अतः युधिष्ठिरजी के धर्ममय तपोमय जीवन में भी द्यूत उसी तरह है जैसे चन्द्रमा के मुख पर दाग, दोष तो इन्द्र चन्द्र आदि में भी थे इसे स्वीकार करना चाहिए। प्रश्न तो मर्यादा पुरुषोत्तम पर भी उठा दिए जाते हैं। पर इससे युधिष्ठिर जी जी का सम्मान कम नहीं होता, धर्म की साक्षात मूर्ति थे। स्वयं वेदव्यासजी ने उन्हें धर्मरूपी वृक्ष कहा है।

पर किसी भी परिस्थिति में पांडवों का चरित्रहनन गलत है। यह धर्म के सर्वोच्च प्रतीकों में हैं। अफगानिस्तान से लेकर जावा द्वीप तक पांडवों का चरणचिह्न बिखरा हुआ है। इन्होंने सम्राट होते हुए, जन जन जाति जाति राजा राजा को जोड़ते हुए, स्वयं कांटों पर पैदल चलकर सम्पूर्ण भारत का न भूतो न भविष्यति दिग्विजय किया था। उन्होंने भारत भर के एक एक तीर्थ का दौरा किया था और भारत के रोम रोम को आत्मसात् किया था। आज ही प्रायः एक भी तीर्थ ऐसा नहीं है जहाँ पाण्डवों का बनाया मन्दिर, कुण्ड या उनसे सम्बंधित कोई स्थान न हो। उन्होंने मात्र पूर्ववाहिनी 500 नदियों में स्नान किया था अन्य नदियों की संख्या की गिनती ही क्या। प्रत्येक तीर्थ में यज्ञ और तर्पण कर सारे भारत में वैदिकी मर्यादा को अखण्ड बनाया था। अन्य राजा राजविलास में मस्त थे, एक राजर्षि युधिष्ठिर गांव गांव वन वन के पीड़ित भारतवासियों का आशाकेन्द्र बना हुआ था। वह पाप, अधर्म, रक्तपात, दुःख से स्वयं डरता था, पर अन्यों के जीवन से यह मिटाने के लिए स्वयं दीपक बन जला करता था। देवानां प्रियदर्शी एक ही सम्राट हुआ था, समस्त विश्व की सत्ता ने चक्रवर्ती युधिष्ठिर के आगे अपना मस्तक झुका दिया था, इनकी सदाशयता से इनके शत्रु लज्जित हुआ करते थे। इन्हीं का पुरुषार्थ भारतीय इतिहास का केंद्रबिंदु बना था और है। वनगमन के समय प्रजा युधिष्ठिर के पीछे अन्न धन की चिन्ता छोड़ वैसे ही चली थी जैसे श्रीराम के वनगमन के समय, तब युधिष्ठिर जैसे साम्राज्यप्रतिपालक ने उनके पालन पोषण हेतु सूर्य उपासना कर अक्षयपात्र प्राप्त किया था। क्योंकि ब्राह्मणों का वचन था दुर्योधन की अथाह पृथ्वी भी न के बराबर है हम युधिष्ठिर के साथ बिना अन्न के भी रह लेंगे। यही श्रीराम के लिए कहा गया जहाँ श्रीराम रहेंगे वह वन भी राज्य हो जाएगा जहाँ न हों तो राज्य भी जंगल हो जाएगा।

वेदव्यासजी ने युधिष्ठिर को दिव्य वेदोक्त प्रतिस्मृति विद्या प्रदान की थी, इस विद्या से सारा जगत एकसाथ दिख जाता था। सिद्ध करने पर युधिष्ठिर ने इस विद्या की दीक्षा अर्जुन को दी और अर्जुन के गुरु भी बन गए और अर्जुन भीम आदि को विभिन्न विद्याओं, दिव्यास्त्रों-शस्त्रों का शक्तिसंचयन करने भेजा। यक्षप्रश्न में इनकी विद्वता, सौतेली माँ के पुत्र का जीवन मानना, कुत्ते के लिए स्वर्गत्याग करना आदि तो सर्वविदित है। सम्राट युधिष्ठिर विश्व के अकेले व्यक्तित्व थे जिनपर शत्रुपक्ष के सेनापति को विश्वास था और कहा, “यदि धर्मराज कह दें कि अश्वत्थामा मर गया तो मैं मान लूँगा।” विश्व में ऐसा कहीं देखने को नहीं मिलता। सत्य के प्रभाव से धर्मराज का रथ धरती से चार अंगुल ऊंचा चला करता था, जो एकमात्र अर्धसत्य के कारण झुक गया।

धर्मराज के आगे श्रीकृष्ण भी सिर झुकाया करते थे, वे हमेशा युधिष्ठिर को प्रणाम किया करते थे, युधिष्ठिर के धर्मतत्व का वे हमेशा समर्थन किया करते थे, संसार में श्रीकृष्ण युधिष्ठिर की सबसे अधिक प्रशंसा किया करते थे। वनवास में शौनक, धौम्य, लोमश, व्यास, मार्कण्डेय आदि ऋषि मुनि आकर युधिष्ठिर जी से धर्म की चर्चा किया करते थे। ब्रह्मज्ञानी ब्राह्मण वन में भी सदा राजर्षि युधिष्ठिर का अनुसरण किया करते थे। महर्षि जनक की राजर्षि कोटि के हैं युधिष्ठिर जी। पांडव भी श्रीकृष्ण को पूर्ण ब्रह्म मानकर उनके लिए जान न्यौछावर करने को तैयार रहते थे। पाण्डव अपने बल शौर्य विद्या का रंचमात्र भी अभिमान नहीं करते थे, हर जगह खुलेरूप में कहा करते थे, “करते हो तुम कन्हैया मेरा नाम हो रहा है।”

कृष्ण युधिष्ठिर पाण्डव नकुल सहदेव भीम अर्जुन धर्मराज

गीता में भगवान ने अर्जुन को ‘इष्टोsसि मे’ (18.64) कहकर अत्यन्त प्रिय कहा है और ‘प्रीयमाणाय’ (10.1) कहकर अर्जुन का सबसे प्रिय स्वयं को बताया है। भगवान् श्रीकृष्ण ने अर्जुन को 13 बार महाबाहो और 8 बार परन्तप कहा है। अन्त में गीता कहती है “यत्र योगेश्वरो कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः। तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम।” अर्थात् श्री, विजय, विभूति और नीति वहीं हैं जहाँ कृष्ण भी हों और अर्जुन भी। दोनों एक दूसरे के बिना अधूरे हैं। पांडव हम सबमें हैं, उनके असमंजस, उनके संशय, उनकी समस्या सबकी व्यक्तिगत समस्या है, उनका संघर्ष सबका आंतरिक युद्ध है। तभी अर्जुन के माध्यम से भगवान् ने गीता उपदेश दिया। सम्पूर्ण भारतीय इतिहास में एक भी सन्त ऋषि आदि ने पाण्डवों की निन्दा नहीं की है।

संसार में धवल से धवल चरित्र पंक से प्रतिहत किया गया है। स्वयं मर्यादा पुरुषोत्तम को भी नहीं छोड़ा गया है फिर युधिष्ठिर की बात ही क्या। इन सबके बीच एक ही है जो कीचड़ उछालने पर भी कमलवत निर्मल ही रहता है, जो परस्पर विरुद्ध धर्मों को आश्रय देता है, पर उन दोनों से अतीत है, इसलिए धर्म अधर्म के भ्रमपूर्ण बुद्धिविलास से पृथक रहता है क्योंकि वह तो कथित अधर्म के सन्निवेश से भी धर्म के तत्त्व को प्रकट कर देता है, तब सारे धर्मी अधर्मी चकित होकर उसके आगे लोट लगाने लगते हैं, इसलिए उसने धवल होने की लोकव्यंजनाओं से स्वयं को पृथक कर लिया है, और स्वयं को नाम से ही “कृष्ण” घोषित कर दिया है। अब चाहे अपनी “श्वेत” धारणाओं का कितना ही कलुष उसपर क्यों न उछालो उसका स्वयंप्रकाश “कृष्णत्व” अस्पर्श ही रहता है, क्योंकि दूसरे का प्रकाश तो कृत्रिम व परिच्छिन्न है, पर उसका कालिमा रूपी अंधकार सूक्ष्मतम, प्राकृतिक और सर्वत्र अनुस्यूत परमकारण है। वही “कृष्ण”…

श्री कृष्ण के जीवन में बसा है संसार का हर रूप.

जब भगवान् श्रीकृष्ण ने की भीष्म पितामह की स्तुति!

श्रीमद्भागवत व अन्य पुराणों की ऐतिहासिकता और प्रामाणिकता

आधुनिक विज्ञान की नजर में मटकों से सौ कौरवों का जन्म

उपरोक्त लेख आदरणीय लेखक की निजी अभिव्यक्ति है एवं लेख में दिए गए विचारों, तथ्यों एवं उनके स्त्रोत की प्रामाणिकता सिद्ध करने हेतु The Analyst उत्तरदायी नहीं है।

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